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संस्कृत वाक्य प्रबोधः

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अजमरनगरे वैदिकयन्त्रालये सुद्धितः पठनपाठनव्यवस्थायां द्वितीयं पुस्तकम्‌

इस पुस्तक दापने का अविकार कषस को न्दी

क्यांकि (सिक ग. १.१ ९. \ 4 स्टरी कराई गई है. | + , सवत्‌ १९७० बि० नवमवार मूल्य %)

श्रीमहयानन्दाय्द्‌ ३१

५७०० डकस्यय )]

्ै (~ 9 1 ५५ ना सनीय 1८.44 ष्ठ (2 1 (६, 14 (२ 1 भौ; ५4 4 ` 5 १, #॥ # (६; 1 धि 1 क्‌ | ए! 1.

९५ | परमयुरव परमात्मने नसम + ~ +~ + मल

वप्रय संस्रतवाक्छयप्रनोधः॥

< गुरुशिष्यवातालापप्रकरणम्‌ >

भोः शिष्य उलिष्ठ परातःकालो जातः | हे शिष्य ! उट सवेरा हुश्रा

उतिष्ठामि | उठता हं ये सरवे विधार्थिन उस्थितानवा? चौर सव विद्यार्थी उठे वा नरह !

अधुना तु नोस्थिता खलु ्रभी तो नहीं उठे हं तानपि सबानुरथाश्चय उनसवकोभीउटादे।

४.

सवे उत्यापिताः ।' सव ष्ठा दिये सम्मत्यस्मायिः ङं कलेग्यम्‌ इस समय हेम को क्या करना चाहिये श्मादश्यकं शौचादिकं कृत्वा सन्ध्या- | आवश्यक शरीरद्धि करके सन्ध्योपासना।

वन्दनम्‌ श्माशयकं कृत्वा सन्ध्यापासिताऽतः

परमस्मामिः कनि करणीयम्‌ !

श्रावहयक कम करके सन्ध्योपासने कर- लिया इसके श्रागे हमको क्या करना

्वाटिये ?

श्रग्निहोत्रं बिधाय पठत ्ग्निहोत्र करके पदो

पूवं कि एठनीयम्‌ ! | पिले क्या पद्ना चाहिये वर्णादारणरेक्तामधीष्वम्‌ वर्णो्ारणशेक्षा को पदो

पश्चाक्किमध्येतव्यम्‌। ` पीट क्या पद्ना चाहिये ?

क्रिवित्सस्छृताक्तिवोधः क्रियताभ्‌। | कुठ संस्छृत बोलने का ज्ञान फिया जाय।

पुनः; किमभ्यसनीयम्‌ { | फिर कसक च्रभ्यास करना चाहिये

संस्छृतवाक्यमषोषः का

1 भरयतथ्वम्‌।

इतोऽवुचितव्यवहारकतविंचैव जा- यते।

को विद्वान्‌ भवितुमहति ` यः सदाचारी पराह्ठः पुरुषाथीं भवेद्‌ दीटशादाचार्यादधीत्य परिढतो भ- वितु शक्नोति!

अनूचानतः

किमध्यापयिष्यते भवता ?

1.)

अष्टाध्यायीमहामाष्यम्‌

किमनेन पठितेन भविभ्यति ? शब्दाथंसम्बन्धविङ्गानम्‌

पुनः कभेण ङि किमध्येत्तभ्यम्‌ ! शिक्ताकन्पनि पणटुनि रुक्त दन्दोज्योति- चाणि वेदानामङ्गानि पीमांसवेशेषि- कन्याययोगसांख्यवेदान्तान्युपाङ्न्या- युषैनुगौन्धवीथौनुपवेदादेतरेयशतपय- सापगोपय ब्राह्मणान्य्पीस्य श्छग्यजु- स्सामाऽयवेवेदान्‌ पटन्तु

एततसर्द विदित्वा कार्यम्‌ !

धमजिङ्गासाऽचुष्ठाने एतेषमेवाऽष्या- पनं च|

यथोत व्यत्र्ठीर करमे के लिये प्रयन्न करो

कयांकि उलट यवहार करनेहारे को विदा ही नरह होती

कौन मनुष्य विद्धान्‌ ने के योग्य होता है जो सत्याचरणशील वुद्धिमान्‌ पुरुषार्था हो केसे श्राचायै से पद पण्डित हो सकता है !

पूणे विद्यावान्‌ बक्ता से

छव श्राप इसके श्ननन्तर हम को क्या पदाइयेगा ?

श्रष्ठाध्यायी श्रौर महाभाष्य

इसके पढने से क्या होगा !?

शब्द्‌ श्रथ श्रौर सम्बन्धं का यथा्थैबोध फिरक्रमसे क्या पटना चाहिये। शिक्ता, कल्प, निघण्डु, निसक्त, छन्द श्चौर्‌ ज्योतिष वेदों के च्रङ्ग मीमांसा वैशे- पिक, न्याय, योग, सांख्य श्रौर वेद्यन्त उपाङ्ग श्चायुर्वेद, धनुर्वेद, गाधवैवेदं, शौर श्रथेवेद उपवेद पेतरेय, शतपथ, साम श्रौर गोपथ ब्राह्मण भरन्थों को प्रदके ऋग्वेद , यजुर्वेद, सामवेद श्चौर श्रथर्वयेद्‌ को पडो

इन सव को जनके फिर क्या करना | चाहिये ?

धम के जानने की इच्छा तथा उसका अनुष्ठान भ्नौर इन्दं को सवेदा पदाना।

-

नामनिव।सस्थानप्रकरणम्‌

तव किञ्चामास्ति !

देबदत्तः

कोऽभिजनो युव योरव॑त्तते ! इरुचेत्रम्‌

युष्पाकं जन्मदेशः को विद्यते ! पञ्चालाः

भवन्तः ञुत्रत्याः !

वयं दाक्निणास्याः स्मः।

तत्र का पूवः!

मुम्बापुरी

हमे निवसन्ति !

नयपाले

श्रयं किपघीते !

व्याकरणम्‌

त्वया फिमधीतम्‌ !

न्यायशाज्ञम्‌ ;

दमयं भवदीयशवात्रः कं प्रचचेयति ! छग्बेदम्‌

त्वं कि कत्तं गच्छसि

पाठाय व्रजामि

करुक्मदधीपे

यज्ञद चात्‌

इमे कुतोऽधीयते !

विष्णुपित्रात्‌

त्वयि पठति कियन्तः संवत्सरा व्यतीताः! पञ्च

भवान्‌ कतिवार्षिकः !

~

तेरा क्या नाम है

देवदत्त

तुम दोनों का जन्मदेश कौन दै कुरुकतत्र देश

तुम्हारा जन्मदेश कौन है ! पञ्जाव

आप कहांकेहो !?

हम दक्षिणी हे

वहां च्राप के निवास की कोन नगरी है? सुम्बहे

ये लोग कदां रहते हे

नयपाल में

यह क्या पदता है ?

व्याकरण को

तूने क्या पदा है?

न्यायशाख

यह्‌ श्राप का विद्यार्थी क्या पदता हे ऋग्वेद को

तू क्य करनेको जाताहै ?

पठने के लिये जाता हूं

किससे पठता है !

यज्ञदत्त से

ये किम॑से पठते हँ ?

विष्णुमित्र से

तुम को पृते हुए कितने वर्षं बीते ! पांच

श्राप कितने वष के हुए

\ संस्टृतबाक्यपप्रोषः

"---+----------------~--------~----------- -~ .~--^~----- -~---~-“~-~

वरयोदशवार्थकः। | तेरह वपे के तबया पटनारम्मः कदा कृतः ? तूने पने का आरम्भ कब किया था ! यद्‌ाहमष्टवापिंकोऽभूवम्‌ जवनौ श्नाठ वर्का दुश्ना था। तव मातापितरौ जौबतोन वा! तेरे माता पिता जीते है वा नदीं जौबतः जीते हैः तव कति भ्रातरो भगिन्यश्च ? तेरे कितने भाई रौर वाहेन है प्रयो भरतरघेका भगिन्यस्ति। तीन भाई श्रौर एक विनि है तेषु स्वं ज्येष्ठस्ते, सा, बा ? उनमें तृ ज्येष्ठ वा तेरे माई अथवा बहिन ! अहमेषाग्रजोऽस्मि। भँ द्यी सव से पदिला जन्माहं तव पितरौ विद्रासौनवा! तेरे माता पिता विदा पदर वा नद्यं? महाबिद्रांसी स्तः। बडे चिद्रान्‌ दं तषि त्वय। पित्रो सकाशातो विद्या | तो तुन माता पिता से विद्या रहण क्यों गृहीता ! नकी! अष्टमवरषपय्यंन्तं कृता ठं वपै पर्यन्त की थी। भरत उध्वं कुतोन कृता? इससे श्रगे क्यीन की ? माुमान्‌ पितृमान(चस्य॑वान्‌ पुरुषो | माता पिता से अठ वषै पर्यन्त इसके वेदेति शाङ्ञाविषेः। अगे आचाय से पढने का शाख्खमें वि- धान दहै इस से।

अन्यञ्च शे कार्यवदूल्येन निरन्तर | चौर भी षर मं वहत काम दोनेसे निर मध्ययनमेव जायते | ' न्तर पदन दी नदीं दता ्रतःपरं शियद्रषेपयेन्तपध्येष्प से ? इसके आगे कितने वष पर्यन्त पदेगा

|

~+ ~ - ~+ --~ -----~---~

पञ्सत्रिशद्रषोणि चनीस वपे तक

ग्हाश्रमप्रकरणम्‌

+न ~ = ~

+~ ~~ ~~ +

पुनस्ते का विक्षीपास्ति | कि तुमः को क्या करने की इच्छा है दभ्रस्य गृहाश्रम की किव भोः पृणंिधस्यं नितिनदियस्यं | क्यो जी ! जिस को पूरं विया श्नौरजो

परोपदगरकरणाय संम्यासाश्रमग्रहणं | जितेन्द्रिय है उस को परोषकारं करने

संस्कृतवास्यप्रवोधः

शाष्लोकपस्ति तश्र करिष्यसि ! ` फे लिये सन्यासाश्रम का ब्रहण॒ करना शा- स््रोक्ते है इसको करोगे !

कि गृहाश्रमे परोपकारो भवति | क्या गृहाश्रम में परोपकार नं होता !

यादृशः सन्न्यासाश्रपिणा कर्तुं श~ | जेसा संन्यासाश्रमी से मनुष्यों का उपकार

क्यते तादृशो शाश्रपिणाऽनेक- | हो सकता है वैसा गृहाश्रमी से नदीं दो

कार्यः प्रतिबन्धकत्वेनाऽस्य सवत्र | सकता क्योकि श्ननेक कामों की रुकावट

शरपणाशुक्यत्वात्‌ से इसका सवत्र भ्रमण ही नदीं दो सकता।

~--------------*-----~----- -- -- ----- - ---~------ ---- --- ---~ ~ --- ~~ तक ----~~ ~----~--- -~ -~ ( -- 4

भोजनप्रकरणम्‌

नित्यः स्वाध्यायो जातो मोजनस्षमय | नित्य का पदना पदाना दोगया, भोजनस-

भागतो गन्तन्यमू्‌ मय श्राया चलना चाये

तव पाक्शालायां मत्यं भोजनाय | तुम्दारी पाकशाला में रविदिनि मोजनके

{$ पच्यते ? लिये क्या पकाया जाता है?

शाकमसूपोदरिबत्फोदनापूषादयः | शाक, दाल, कटी, भात, पुश्ा च्रौर रोटी

यादि

कि वः पायक्षादिभधुरेषु रुचिनीस्ति | क्याच्राप लोगोंकी खीर आदि मीठे भो- जनो मे रुचि नहीं टै ?

अस्ति खल्‌ परन्त्ेतानि कदावैर्‌ , दै सदी परन्तु ये भोजन कभी होते दै

भवन्ति |

कदाचिच्ष्डृली श्रीखणएडादयोऽपि कर्मी पूरी कचोड्‌) शिखरन रादि भी होते

भवन्तिन वा ? हवा नदीं?

भवन्ति परन्तु यथत्तुंयोगम्‌ होते परन्तु जेसा ऋतु का योग दो

सत्यमस्माकभपि भोजनादि कूमेवरमेव- | ठीक दै हमारे भी भोजन आदि रएेसे ही व-

निष्पद्यते नते हे त्वं भोजनं करिष्यसि वा ! तू भोजन करेगा वा नहीं श्रथ करोम्प्रजीणेतास्ति | माज नदं करूगा श्रजीरेता है

अधिक भोजन का यदी फल है

अधिक ोभनप्येदमेव फलम्‌

थमनम

बुद्धिमता तु याचल्नीयैत तावदेष भु ज्यते

्रतिस्यल्पे सुक्क शरोरबलं दसत्यधिके चातः सवेदा मिताहारी करत्‌ योऽन्यथाऽऽहारव्यवहारो करोति कथंन दुःखी जायत !

येन शरीराच्छभो क्रियते सनेव शरीरसुखमाप्राति

येनात्मना पुरुषायीं दिधीयतेनस्या- त्मनो बलपति जागते तस्पात्सर्थैमनुष्येयेयाशा सक्किया निस्य साधनीया

भो देवदत्ते ! त्वामहं निन्नये। मन्येऽ कटा खल्वागर्शरेय्र ?

श्वो द्ितीयपहरपषपे अगत्तग्य्म्‌ | अगच्छ भो आ्आह्ठनयध्यास्स्व | भदता ममोपरि महती कृपा छना

1

पस्छतवाक्यपयोषः

~ +~ ~^ ~~ ~~ ~~, ~~

~~~

वुद्धिमान्‌ पुरुष तो जितना पचे खतना ही खाता है

वहत कमं चौर च्रत्ययिक भोजन करने मेँ शरीर का बल घटता है इससे सब दिनि मिताऽऽहारी होवे

जो उलट पलट आहार श्रं यवहार क- रता है वह्‌ क्योंन दुःखी होवे

जो शसीर को प्राप्र होकर परिश्रम नदीं क- रता वह शरीरके सुख को प्रप्र नहीं होता। जो श्रात्मा से पुरुषां नहीं करता उसको अत्मा का बल मी नहीं द्योता

इसमे सव मनुष्यों को यथाशक्ति उत्तम कमो की साधना नित्य करनी चादिये हे देवदत्त! तुम्हारा निरमत्रण करता हूं मानता हं परन्तु किस समय आराडं ? कल दापदर दिनचद आना चाहिये

हे सुजन ! आद्य श्च।सन परं वैषये . अपन मुमः पर वड़ी छपा की।

दशदेशान्तरप्रकरणम्‌

किन्नाम एत पूत्रह्याः खद्धु !

अयं यक्षदूसः कामानिगानी | पिष्लवित्रोऽपं कुरे वाललन्यः | सामदत्तायं प्रायुरः

अयु प्व ीयः।

भवनितान्‌ जानानीप् पद्रः सन्ति

आप इनफा जानत्‌ ये बडे विद्धान्‌ है इनक क्या नाम ओौरये कषां २फे रहनेवाले

यह्‌ यज्ञदत्त कशी निवास करता है। यद्‌ विष्णुमित्र कुरुतेन मे वसता है यह्‌ सास्थत्त मथुरा ग्दता है

यद्‌ घुशम्म पव॑त में रहता

सस्छृतवाक्यपरषोधः

~-----------------+--~--------~--------- *--- -~ ~~ -+~ ~

अ्रयपराश्वलायनो दाक्निणात्योऽस्ति भ्यं जयदेवः पाशचाल्यो वतेते रयं कुमारमटो बाङ्गो विश्रते।

अयं कापिज्यः पाराल मिवस्ति

|

श्यं चित्रभायुहरिवरषस्थः।

| इमौ सुकामसुभद्रौ चीननिकायौ | श्रयं सुमित्रो गन्धारम्थायी | श्रयं सुयटो लङ्काजः। इमे पंच सुवीगातिदलतु हभसथर्षशतध- न्वानो मारवा; एते मया आपन्विताः स्वस्वस्थानादा- गताः इमे शिवकृष्यगोपालषात्रनसुचःद्रष्क- मभूदेवचिव्र्ेनपदारथः श्रृलयाः अहोमाग्ये मे यह्‌ मवत्कृपयेतेषामपि | समागमो जादः श्महमपि सभवतः सर्वानिता्निमन्वमि- तुमिस्छामि। अस्मामिभेवमिमन्त्रणमूरीटतम्‌ प्रीतोस्मि परन्तु भवद्धोजनाथं पक्तम्यम्‌ !

[१०५

यद्यद्धोक्तुमिच्छास्ति तचदाज्ञापयन्तु

यह्‌ श्राश्चलायन दक्षिणी है

यह जयदेव पञ्िमदेशवासी है

यह्‌ कुमारभद्र वंगाली है

यह कापिलेय पाताल च्र्थात्‌ अमेरिकामें रहता है

यह चिध्रभानु हिमालय से उत्तर हरिवषे रथात्‌ चूरेपसे रना

ये सुक्ाम आर सुभद्र चीनके वासी है। यह्‌ सुमित्र गन्धार्‌ अर्थान्‌ काचिल कृम्ध्रार का करने बाला है।

यट सुभट लंका में जन्मा दहै

सवीर, अतिवल, सुकमौ, सधम शौर शतधन्वा मे पांच मारवाड फे रटने वाले है। ये सव मेरे बुलाये हुए अपने २घर से अये दें

भिव, कृष्ण, गोपाल, गरव, मृचन्द्र, श्र- कग, भूदेव, चित्रसेन च्ौर महारथ ये नव इस मध्यदेश रहने वाल दै

मेया वदरा भ्व कि जोश्रापकी कृपा से हन मत्पृरुषों का मी 1देलाप दुश्रा |

| नि सभी आपके समत इन सव का निम-

न्वण करना वाहना हू

हमने ख।पका निमन्त्रण स्वीकार किया।

चापकर निमन्त्रण साननेसेमे बडा प्रसन्न

हुश्रा परन्तु श्राप दै भोजन केलिये क्या

क्या पकाया जाय !

जिस पाथं के मोजन की इच्छादहो | उस की श्माज्ञा कीजिये

नि

-- ---- ---*~----- ~ ~~ ~~ --~----~------------~ ~ ~------~

( संस्छृ तवाक्यपबोषः

भवान्‌ देशकालङ्घः कथनेन किं यथा- | श्राप देशकाल को जानते हे कहने से क्या योग्यमेव पक्तष्यम्‌ यथायोग्य ही पकाना चाहिये सत्यमेवमव करिष्यामि ठीक है एेसा ही करूंगा

छचिष्ठुतं भोजनसमय आगतः पाकः

सिद्धो वत्तते

भो भृत्य ! पाद्यमध्यमाचमनीयं जलं

देहि

इदमानौतं श्ष्यताम्‌

भोः पाचकाः सर्वान्‌ पदायीन्‌ कमेण

परिषेषिष्ट

ञ्ञीध्वम्‌

भोजनस्य सर्वे पदाथाः शष्ठ जाता

नवा?

अत्युत्तमाः सम्पन्नाः किं कथनीयम्‌

भवता चित्‌ पायसं प्राह्च वा यस्ये- 1ऽस्ति।

भभूतं भुक्तं तक्ताः स्मः

तदटौतिष्ठत

जलं देहि

गृष्यताम्‌ ताम्बूलादीन्यानीयंताम्‌ इमानि सन्ति गृणन्तु

|

उटिये भोजनसमय श्चाया पाक तैयार है|

हे नौकर ! इन को पग हाथ मुख धोने के लिये जल दे।

यह्‌ लाया लीजिये

हे पाचक लोगो ! सब पदार्थो कोक्रम से परोसो

भजन कीजिये

भोजन के सव पदाथ च्छे हुए वाः नहँ !

क्या कहना हे बडे उत्तम हए हैः

श्राप थोडीसी खीर लीजिये वा जिसकी इच्छा हो

बहुत रुचि से भोजन किया वृप्तहो गये

तो उवियि

जल दे।

लीजिये

पान बीडे इलायची श्रादि लाश्रो

ये है लीजिये

समाप्रकर्णमर्‌

इदानीं सभायां काचिश्ा विधेया

धम्पैः किंलप्तणोऽस्तीति पृच्चामि | नै पूता हं छि धम्मे का क्या लक दै १,

सभामें कुष वातालाप करना चाहिये

&

-------------

बेदपरतिपाथ्ो न्याय्यः पक्तपातरद्ितो | वेदोक्त न्यायानुकूल पक्तपात रदित श्रौर यश्च परोपकारसत्याऽऽचरणलश्नणः | जो पराया उपकार तथा सत्याचरणयुक्ष है उनी को धमै जानना चाहिये

दृश्वरः फोऽस्तीति ब्रहि ? दश्रर किसको कहते है श्राप किये !?

यः सचिदानन्दस्वरूपः सत्यगुणकर्म- | जो सचिदानन्दस्वरूप श्रौर जिसके गुण

स्वभावः| कमे स्वभाव सत्य ही बह ईश्वर कटाता

मनुष्यैः परस्परं कथं वससित्यम्‌ १- | मनुष्यों को एक दूसरे फे साथ कैसे वत्तेना चाष्टिये ¢

धम्पेवुशीलतापरोपकारेः सह यथा- धर्म, भ्रष्ठ स्वभाव शौर परोपकार के साथ

योग्यम्‌ जिनसे जैसा व्यवहार करना योग्य हो वैसा ही उनसे बर्तना चाहिये

=

यावत्तेचक्र्वत्तिराजप्रकरणम्‌

अरिमन्नायोवत्तं पुरा के के चक्रवर्भि- | इस व्मस्यौवतते देश में पहिले कौन

राजा अभूवन्‌ ! चक्रवर्त्ती राजा हुए है

^~ 1 >. ५६ स्वयंभुवाधा युधििरपयन्ताः स्वयम्भू से लेके युधिष्ठिर पर्यन्त चक्ररत्तिशन्द्स्य'कः पदायै; ? चक्रवत्ति शब्द काक्या श्रथ है? एकस्मिन्‌ भूगोल स्वकरीयपाह्वां | जो एक भूगोल भर में ्रपनी राजनीति- भवत्तयितुं सपाः रूप याज्ञा को चलाने में समथो ते कीटशीपाज्ञां प्राचीचरन्‌ ! वे कैसी आमाज्ञा का प्रचार करतेये ? यया धाभिकाणां पालनं दृष्टानां | जिससे धर्म्यो का पालन श्रौरदुष्टोका ताडनं भवेच्‌ | ताडन होवे

~~~ ------ -------~----- ~ -------~~~-~---

राजप्रजाटक्षणराजनस्यना।तप्रकर्णम्‌

-----~~-~ ~~ ~ ------~-----~ ~~~ ----~-~~- ---*~- --------~ ---- --

| राना को भवितु शवनोति ` __ | को भवितुं श्क्नोति !` | राजा फौन हो सकता है ?

र्‌

= धार्पिकाणां सभाया अधिपतिश्षे योग्यो भवेत्‌

यः परजां पीडयित्वा स्वां साधयेत्‌ राजा भवितुमर्होऽस्तिनं बा! नहि नहिनरिसत्‌ दस्पुः खलु) यारनद्रह्िणीसातुन प्जाङ्किन्तु स्तेनतुल्या मन्तव्या

कथभूताः जनाः भजा भवितुषहः ये धारकाः सततं राजाप्रियकारिणः।

सदा भवितव्यम्‌

राजपरजोत्तमपुरुषैररयः सामद।मद णद- भेदैवशमनियाः।

सदा स्वराञ्यप्रजासेनाकोषधमविधा- सुशिच्ा बद्धनीयाः

यथाऽषमोविधादुष्टशिक्ञादस्पुचोरादयो - बद्धुरंस्तथा सततमनुष्ठेयम्‌

१० सेस्छृतवाक्यमयोधः

होने योग्य बे

1 राजुरूपैरप्येवभेव परनापियकारिभिः |

शतुवशकरणप्रकरणम्‌

एते शश्ुभिः सह कथं वर्तेरन्‌ ! | ये लोग शचरश्रों के साथ कैसे वर्त ?

जो धमौत्माश्यो की सभा का सभापति

जो प्रजा को दुःख देकर अपना प्रयोजन साधे वह राजा हो सकता है वा नहीं ! नही नही नही वहतो डक्षदहीहै) जो राजव्यवबहार में बिरोध करे बह प्रजा तो नीं किन्तु उसको चोर के समान जनिना चाहिये

कैसे मनुष्य प्रजा होने को योग्यै! जो धमौत्मा श्मौर मिरन्तर राजा के प्िय- कारीदहों।

राजसम्बन्धी पुरुषों को भी वैसे ही प्रजा

के प्रिय करने मँ सदा रहना चाहिये

--------------~ ---~-------~-+--------------~- ----- --~--

राजा श्रौर प्रजा के प्रष्ठ पुरुषों को योग्य है कि अरियोंका( साम ) मिलाप (दाम) गुषदण्ड श्मौर ( दण्ड ) उनको दण्ड भेदं ) आपस मे उनको फोड़ देना उन- से वश में करना चाहिये

सव दिन अपना राज्य, प्रजा, सेना, कोष, धम्म, विद्या चौर शरष्ठ शिक्षा बडे रहना चाहिये

जिस प्रकार से अधमे, चविधा, बुरी शिक्षा, डाकू श्रौर चोर रादि बद वैसा निरन्तर पुरुषाथं करना चाहिये

= 0000०11

सच्छहवक्वपरधोधः |

८०५

धामिकः सहे दापि योदुव्यम्‌

निर्भिता अपि दृष्टा विनयेन सर्कर्तञ्या,।

राजपरजाजनाः भराणवत्‌ परस्परं सं- पोष्य सुखिनो भवन्तु कर्षिते चयरोगवदुमे विनश्यतः

सदा ब्रह्मचयण विद्या शरीरात्म बलमेधनीयम्‌

यथा देशजं पुरषार्थन यथावत कर्माणि कृत्वा सवथा सुखयितग्यम्‌

धमोत्माश्ों साथ कभी लडाई करनी चाहिये

पराजित किये शघुश्रों काभी विनय के साथ मान्य करना चाहिये

राजा श्चौर प्रजा प्राण के तुर्य एक दूसरे की पुष्टि करके सदा सुखी रहँ

एक दुसरे को निवेल करनेसे दमारोग के समान दोनों निबेल होकर नष्ट हो जते सव काल मं नक्मच्यं चौर विद्या से शरीर चनौर श्यपतमा का बल बदुते रहना चाये

देश काल के अनुसार उद्यम से टीकर कम करके सव प्रकार सुखी रहना चाहिये।

~------ --------------- - -- ~~ -- ---------- ~~

, वेश्यग्यवहारप्रकरणम्‌

-------------- -----+

वैश्या; कथं ! सबा देशमापषलखाव्यवहारं बिङ्गाय

पशुपालनक्रयविक्यादिग्य(पारछुतीर- वृदधिकृषिकभणि धर्मेण कुबन्तः

~~" -----------------------------------------------

~~ ~-------~--~----~-----*~-

वनिय लोग कैसे वर्ते ?

सव दशनाप रं(र हिसःवक्तो ठीक जान

कर पथु कीः रक्षालेन उनस्रादि व्यव- ष्‌ (~ {| ग्वे्ती ¢

हार -यराजवृद्धि श्र मेती कम धमके

साथ करते हर्‌

कुरस(दग्रहमगा प्रकरणप

यद्कवारन्दधाद्‌ गृह्णीयाच्च तहिं सीददृद्ध्या द्दुएये षर्मोऽधिकेऽधमं इति वेदित

जो एक वार दे ले तो व्याजवृद्धि सहित मूल धन द्विगुण तक लेने धमं श्रौर अथि लेने श्रध होता है एेसा जानना

चाष्िये

[ए परा --

प्रतिमासं प्रतिबप बा यदि ङसीदं इीयाच्दा समूलं दवियुखं धनमागच्ञ- | लेता जाय जब धन भ्राजाय फिर

सदा मूलमपि त्याज्यम्‌

----~- ---~-------------~.-

नवक्रावमनादचालनप्रकरणम्‌

त्वं नौकाश्चालयतसि वा? चालयामि

नदीषु वा सषुदरेषु !

मयते चालयामि

कस्यान्दिशि कस्मिन्देशे गच्छन्ति ? सवासु देच पातालदेशपर्यन्तम्‌

ताः कीटश्यः सन्ति कन चलन्ति? [1

केवसेबाय्वग्निजलकलावाप्पादिभिः।

याः पुरुषाश्चालयन्ति ता हृस्वाः या पहत्यम्ता बाय्वादिभिश्चानल्यन्ते ता- श्ाश्बतरीश्यामफणाश्वाख्याः सन्ति

विमानादिभिरपि मैत्र गच्डुपश्न।

क्रयविक्रयप्रक्रणम्‌

-~~-~"-----------------------~----~ ~~ ~--- ----- ---~

4, = किम्मूल्यम्‌ ! पश्व सूप्याणि

शरणेदं बस्तर देहि अ्यशवो पृतस्य कोऽप; !

तू नाव चलाता दै वा नीं ?

जो महीने में अथवा वर्ष मँ भ्याजः

श्रमे कठं मी लेना चाहिये

चलाता हू

नदिय), अथवा समुद्रम?

दोनों में चलाता हूं

किस दिशा च्नौर किस देश मे जाती ! सव दिश, श्रो में पातालदेश अथौत्‌ एमेरि- का देश पय्यन्त

ये नौका कैसी ओौर किससे चलती है ? मल्ला वायु अग्नि जल कलायन्त्र श्नौर भाफ श्रादिसे।

जिनको मनुष्य चलते वेद्धोटी नोकाश्रौरजो बड़ी होतीहेबे वायु आदि से चलाई जती है उन के प्रशवतरी श्रौर इयामकर्णश्व शमादि नाम है |

चौर विमान श्र'दिसेसवेत्र श्राया जाया करते

-. ---~--~ -------~ ~ ~~ -~~--------~-~------

इस का क्या मूस्य है ! पांच रुपये

ली जिये पांच रुपये यद वस दीजिये प्ाजकलघी काक्या भवदहै!

= सपाद्पस्थं विक्रीणते गुडस्य फोभावः श्र्टभिः पररेकसेटकमात्रं ददवि त्वमापणं गच्डं एलामानय श्रानीता गृहाण कस्य इट देधिदुग्षे अच्ं पाप्तुतः ?

धनपालस्य

सस्येनैव ऋयविक्रयौ करोति श्रीपतिवेणिकीदशोऽस्ति

पिथ्याकारी।

श्रसिमन्दवत्सरे क्ियाल्लाभो अ्ययश्च जातः

पचलक्नाणि लाभो ल्रद्रयस्य व्ययश्च

मम्‌ सन्बरस्मन्‌ दुं लघत्रयस्य हानि- जाता

कस्तुरा कसमादाीयते |

नयपाला्‌

बहुमूल्यमाविकं ईत भ्रानयन्ति ? कर्मीरात्‌

१३

एक रुपया का सवासेर बेचते गुड का क्या भावदै! दो श्रनेकाएकसेर भरेते,

तू दुकान पर जा इलायची ले श्चा

ले श्राया लीजिये

ंसकी दूकान पर दूध भौर ष्टी च्छे मिलते ?

धनपाल की

वह्‌ सत्यदह्ी से लेन देन करता है श्रीपति बनियां कैसा है ?

बह यूटा हे

इस वषे में कितना लाभ श्रौर खच हुधा।

पांच लाख रुपये लाम च्रौर दो लाख खच हुए

मेरी तो इस वषै मे तीन लाख की हानि होगद

कस्तूरी कदां से लाई जाती है ! नयपाल से।

दुशले रादि कषां से लते हँ ? कश्मीर से।

------------+~ -~----------- ---- ~~ -~ --*--- ~~ ~~~

गमनागमनप्रकर्णम्‌

श्र गच्छसि ! | कहां हो पाटलि पटने को

अदाशि कब श्राश्रोगे एकमासे + एक महीने मे सङ गतः! वह्‌ कटां गया ! शा$मानेतु्‌ शाक लेने को

4

१४ सेररतवाक्यधंवोधः क्त्रवपनत्रकरणम्‌

ततेज्राणि कषन्तु | खेत जलो

बीजान्युप्रामि षा ? बीज बोये वा नदी ? क्तानि बोदिये

| अस्मिम्‌ तेतर किपुपम्‌ ? इस खत मे क्ष्या बोयः है ! व्रीहयः धान पतस्मिन्‌ इस मे ? गोधूभाः। गेहूं अस्मिन्‌ फिं वपन्ति ! इस खेत में क्या बोते तिलयुद्गभाषादशीः तिल मूंग उडद्‌ श्चौर अरहर एतस्मिन्‌ किमुप्यते ? | इस मे क्या बोया जाता टै? यकाः | जौ

रस्वच्छदनप्रकरणम्‌

~~~

संप्रति केदाराः पकाः यदि पक्राः स्युस्त लुनन्तु

इदानीं इृषीवला अन्योन्य केदारान्‌ व्यतिलुनन्ति

एषो धान्यानि प्रभूतानि जतानि

ञ्जत एवकस्या मुद्राया गोधूमाः खारी- भमिता भ्रन्यानि तण्दुलादीन्यपि क्षि- चिदधिकन्युनानि परिलिन्ति

---~------~--------------- ---- ~~ ~~

गवादिदोहनपरिमाणग्रकरणम्‌ ,

इयं गेषं ददातिन वा!

(जानमि,

| यह गौ दूध देती दै वा नदी !

इस ससय खत पक गये

ज) प्रकृ गयेहांतो काटा

इस समय खेती करन बाले अपस मं एकर दूसरे का पारापारो खत काटते है इस साल मेँ धान्य बहुत हुए दै

इसी से एक रुपये के गेहं एक मन श्रौर चावल आदि ्न्नमी मनसे कु श्रधिक न्यून मिलते दै

-----------~-~

7

3

संस्तेश्राकवधमोषः १५

| इयं महिषी जयद्‌ दुग्धं ददाति ! दशपरस्थाः

तवाऽजावयः सन्तिन वा!

सन्ति

भरतिदिनं ते कियद दुं जायते ! ˆ पञ्च खार्यः

नित्यं किंपरिमाणे घूतनदनीते भवतः! सादध्ादशमस्ये

त्यहं कियव्‌. युज्यते क्ियभ्च वित्री- यते

सा्द्विमस्थं युज्यते दशभस्थं विक्री- यते

कयाविक्रयावप्रकरणप्‌

देती है। यह्‌ कितना दूध देती. है !

दश सेर

तेरे घकरी भेश है वा नहीं!

निल तेरे कितना दूध होता है

पांच मन |

प्रतिदिन कितना घी श्नौर मक्खन होता है ? सदेवारह सेर

भतिदिन कितना खाया जाता चौर कितना विकता दै !

अद्‌।इ सेर खाया जता श्रौर दश सेर बिकता है |

एतदूष्येकेन कन्‌ लति !

त्रित्रिभरस्थम्‌

तैलस्य फियन्‌ मूल्यम्‌ 1 मद्रापादेन सेटकद्वयं प्राप्यते अभ्मिनगरे कति इटास्सन्ति ? पश्चसहस्रणि

-----------~ -----------

शतंणु्ादेदि। | सौरये मुद्रा देहि।

कुसीदप्रक

| सो रुपये कीजिये

~~ ~~ --*~ --+~~------*. - ~~~

ये धी श्मौर मक्खन एक रुपया का कितना भिलता है?

तीन तीन सेर

तेल का क्या मूल्य है !

चारश्नेका दो सेर मिलता है

हस नगर मं कितनी दूकान है ` पांचहजार

=

रणम्‌

१६ संस्छतवाकयपरवोषः इदामि परन्तु कियत्‌ सीदं दास्यसि | दुगा परन्तु कितना व्याज देगा ?

भतिमार पुद्राद्धम्‌ प्रतिमहीने श्राठ्याना उत्तमणांघमणंप्रकरणम्‌

भो भषमणौ ! यद्धनं त्वया पूर्वं | दे छणिया ! जो घन तूने पिले

गृहीते तदिदानीं देहि था बह श्रव दे।

मप सापरतै तु दात सामर्थ्यं नास्ति। | मेराइससमयतो देने का सामथ्यै नही है।

कद। दास्यसि कव देगा !

मासद्रबाऽनन्तरभ्‌ दो महीने के पीठे

यथ्ेताष्रतिषमये दास्यसि चेत्तहिं | जोत इतने समयमे देण तो राज

राजनियमानिग्र्ीष्यापि। प्रबन्ध से पकड़ा के टूगा

यथेव कर्य्या तहिं तथेव प्रहीतन्यम्‌ | जो ेला करं तो वैसे दी लेना र[जप्रजसिम्बन्धप्रकरणम्‌

भो राजन्‌ ! ममायमृणं ददाति | हे राजन्‌ ! मेरा यष नदीं देता यदा तेन शरहीतं तदानीन्तनः कित्‌ | जब उसने लिया था उस समय का कोई

साद्धी वतते वा! साक्षी वतमान है वा नष्ट ?

भरस्ति। है

तङ्लीनय तो लाश्रो

्रानीतोऽयमस्ति लाया यह्‌ साक्षिप्रकरणम्‌

नज सारिस्स्वमत्र किंभ्वि्नानासि | है साक्षी ! तू. इस विषय मेङ जानता बा! हवा नदीं !

संस्कृतवास्पपबोषः

~~~ ~~~ -------+~~------

भानामि।

याशं जानासि तादृशं सत्यं बूहि सस्यं वदामि भप्पादनेन मत्मक्ते सहस पदर गहीतः, नमो भृत्य ! तं शीघ्रमानय ्ानयापि।

गण्ड राजसभायां राज्ञा त्वमाहूतोऽचि

चलामि।

भो राजञ्चुपरिथितस्सः 4

त्वयाऽस्यष कुतो नायि ?

अस्मिन्‌ समयेतु मम सामध्येन्नास्ति षयम्रासानन्तर दास्यामि पुनभिलम्बन्तु करिष्यसि ! महाराज ¦! कदापि करिष्यामि अच्च गच्छ धनपाज्ञ यदि सक्तपं मास्षयं दास्यति तर्नं (1 दापयिष्वामि।

शयं पम शतं युदा ए्हीतवाऽ्युना | ददाति किंचमो यदयं बदति तत्‌ सत्यंन वा!

मिथ्यैवाऽसति।

अहन्तु जानाम्यपि नाऽस्य युद्रामया

कद्‌ स्वीडताः।

उमयोर्साद्िणः सन्तिनवा! सन्नि

| चल राजसभार्मे राजाने बुलाया

~~~ ~~~

१७

आनता हूं

ज्ेसा जानता है वैसा सच कह सव्य कता हं इससे इसने मेरे सामने सष्टख रुपये लिये भे। श्रो नौकर | उस को जलदी लेशा लाता हू

चलता हू |

हे राजन्‌ ! वह श्राया है

तूने हस का ऋण क्षयो नहं दिया हस समय तो मेरा सामथ्यं नही है परन्तु छः महीने के पीछे दंगा

फिरदेरतो फरेगा

महाराज | कमी करूंगा

श्रच्छा जाश्रो धनपाल जो यह सातवे महीने में देगा तो इसको पक्के दिलादंगा

यह मेरे सौ रुपये लेके अव नदी देता

क्यौजी जो यह्‌ कता है बह सच हैषा नष ?

मूठदीह।

मै तो जानता भी नदीं फि इसके रुपये मैने कब लिये थे

दोनों के साकी लोगर्हवा नद्यर्हे?

= तर ब्ेन्ते !

इम उपतिष्ठन्ते

मनेन युष्माकं सप्ते शतं पुद्रादसान बा

दच्ास्तु खलु |

नेन शतं मुद्रा शहीतान अआ!

बयं जामीषः।

भराददिवाकेनोक्तम्‌

अयमस्य साक्तिणश्च सर्वे मिथ्यावदिनः सम्वि।

कुत इदमेतेषां परस्परं विश्दबवोऽस्ति।

यतरत्वया मिथ्यासपितमतपएव तवेक- सेवतसरपय्य॑न्तं काराग्रह बन्धः क्रियते।

अययुत्तमशस्त्वदीयान्‌ पदाथौन्‌ गृहीत्वा विक्रीय वा स्वं ग्रहीष्यति

रयं मदीयानि पञ्चशतानि ख्प्याणि स्वीढृस्य ददाति

कुतो ददासि !

मया नेव गृहीताः कयं दयाम्‌ 1 भरयम्पम लेखोऽस्ति पश्य तम्‌ ्रानय

गृह्यताम्‌

रयं लेखो मिथ्या प्रतिभाति। तस्मान्‌ स्व॑ षण्मासान्‌ कारागृहे वस

9

संस्छतवाक्यभवोषः

कषां वतेमान

ये खडे है

इसने तुम्हारे सामने सौ रुपये दिये वा नष्ट ?

निश्चित दिवे तो है

इसने सौ रुपये लिये बा नही ?

हम नदय जानते

वकील ने कहा

यह्‌ श्रौर इसके साक्षी लोग सब मैट बोलने बाले हँ

क्योकि यह इन लोग का बवन परस्पर विरुद्ध है

जिससे तने शठ बोला इसी कारण तेरा एक वषे तक अन्दीघर मेँ बन्धन किया जाता है

यह सेठ तेरे पदार्थो को लेकर श्रधवा बेच के श्पनेऋणकोलेलेगा।

यह मेरे पांचसौ रुपये लेकर नदीं देता

तू क्यो नी देता !

मने लिये टी नहीं केसे दुं !

यह्‌ मेरा लेख है देखिये इसको लाश्रो

लीजिये

यह लेख शूट मालूम पड़ता हे

| इस से छः महीने बन्दी मे रह भरे

तवेमे ता्तिणश द्रौ द्रौ मासौ तत्रैव बसेयुः॥ तेरे सक्ती मी दो दो महीने वीं रई।

१६

~---~----~----------------------------------------~~----------------~--- -----------------

सव्यस्वक्प्रकरणम्‌ भो मङ्गलदास ! सेषरर्य कैं करि- | हे मंगलदास ! सेवा फे लिये नौकरी ष्यति ! करेगा करिष्यामि करूगा कं परतिपासं मासिकं ्रहीतुमिच्डापि | प्रतिमदीने कितना वेतन लिया चा्ता है परश्चरूप्याशि | पांच रुपये मयैतावहास्यते चेद्यथायोग्या परिच- | मे इतना दूंगा जो तुद्च से ठीक सेवा य्यी बविषेया हो सकेगी यदाहं भवन्तं सेविष्ये तदा भवानपि | जव श्रापकी सेवा करूंगा तव श्राप मी पसम एव भदिष्यति प्रसन्न ही होगे देन्तधाबनमानय | दातून ले भ्रा स्नानार्थ जलमानय नहाने के लिये जल ला उत्तरीयं वस्त्रं देदि। गोधा दे प्रापस्तन स्थापय श्रासन रख पाकं र्‌ रसोई कर हे सूद्‌ ! स्वयानं व्यञ्जनं सुष्टु हे रसोद्ये!त्‌ अन्न चौर शाक श्रादि सम्भादनीयम्‌ , उत्तम बना अच रि इयाम्‌ ? | श्ाज क्या करू

व्यञ्जनादीनि रौर चटनी रादि भी।

पायसमोदक्ोदनसूपरोरिकाशाकान्युपः | खीर, लड्डू, चावल, दाल, रोटी, शाक

~~ ----~----

पमिश्रितप्रकरणम्‌

~~~ ---- ~~ ~ ~

नित्य प्रति किं बेतनं दास्यसि !? निव्यप्रति क्या नौकरी दोगे !

प्रत्यहं द्रादश पणाः प्रतिदिन बारह वैसे बस््राणि श्लदणे पट पक्ताल नौयानि | | कपडे चिकने साफ्‌ पत्थर की पटिया यर | धोमे चाहिये

ट:

-~----------------~----~----------------------------------~~ -- ~ -" ^~ ^~

गा बने चारय। गाये बन मे चरा। पुप्पवारिकायां गन्तन्यमस्ति पलों की बगीची मे जाना दै

भआभ्रफलानि पकानि नबा! शाम पके वा नदीं पङानि सन्ति पके है

उपानहाषानय जूते लाश्रो गमनाममनप्रकरणम्‌

भयं रक्तोष्णीषः गच्छति ! यह लाल पगड़ी वाला कां जाता है स्वगृहम्‌ अपने धर को

भस्य कद्‌ जन्म।ऽभू्‌ ! इस का कब जन्म हुश्चा था

पश्च संवत्सर! अतीताः पांच वषे बीते

परेधुग्रीमो गन्तव्यः कल गांव जाना चाष्टिये

गिष्यापि जारंगा

भवान्‌ परशुः क्व गन्ता ! श्याप कल कदां जाश्रोगे अयोध्याम्‌ अयोध्या को

तन्र कि कयेमसिति वां क्या काम है !?

मिभैः सह मेलनं कर्स॑व्यमस्ति मिन्नोः के साथ मेल करैव्य है कदागतोऽसि कव श्राया है

इदानीमेवाऽगद्डामि अभी आतां 9 वतका अथ रोगप्रकरगाम्‌

अस्य कीष्टशो रोगो बते ? षस फो फिस प्रकार कारोग है! भीयोऽ्वरोसति जीणीज्वर दै

भोषषं देहि श्नौषध दे

ददामि देता हूं

=

सेस्कृतवाक्यप्रगोधः २१

परन्तु पथ्यं सदा करव्यं इतो नहि

पथ्येन विना रोगो निबते

अयं कुपथ्यक्रारित्वाद्‌ सदा रुग्णो सेते

शरस्य पित्तक्षोपो वर्तेते

मम कफो वद्धेत भौषधं देहि निदानं कृत्वा दास्यामि

अरस्य महान्‌ कासश्वासोऽस्ति

मम शरीरे तु बातव्याधथिषैसैते संग्रहणी निद्चा वा ! ्रयपयेन्तन्तु निद्रता |

श्रोषधं संसेव्य पथ्यं करोषिन वा !

क्रियते परन्तु सुब्या मिलति कथि सम्यक्‌ परीदय।षधं दद्यात्‌

तृषाऽस्ति चेजड् पिब ¦

परन्तु पथ्य सदा करना चाष्िये क्योकि पथ्य के बिना रोग निवृत्त नष्ट होता यह्‌ कुपथ्यकारी होने से सदा रोगी रहता

है

इसको पित्त कोप है

मेरे कफ बढता जाता है श्रौषध दीजेवे रोग की परीक्षा करके दूंगा

इसको बड़ा कासश्वास अथौत्‌ दमा है मेरे शरीर में तो वातव्याधि है सम्रहणी वा नहीं !

अराज तक तो नहीं छृटी

छोषथि का सेवन करके पथ्यकरतेष्ोवा नहीं ?

करता तो परन्तु च्रच्छा वैय कोद नही मिलता कि जो च्रच्छे प्रकार परीक्षा करके श्रौषध देवे

प्यास हो तो जल पी।

इदान; शोत (नष्चद्ष्णममपय भागतः।

हेमन्ते स्थितः !

बगेषु

पश्य ! मेधोसतिं कथं गर्जति कि थोत्ते

अय परह्ती इष्टिजाता यया तड़ागा नयश्च पूरिताः।

मिश्रितप्रकरणम्‌

| श्रवतो शीत निदृत्त हुश्चा गरमी का समय

श्राया

जामे कां रहा था? बङ्गल मे

देखो ! मेध की बढती, कैसा गजैता भौर बिज्ुली चमकती है

श्राज बडु वषौ हृद जिससे तालाब श्रौर नदियां भर गई

५.

शृणु, मयुराः सुशम्दयन्ति कस्प्रात्‌ स्थानादागतः ! जङ्गलात्‌

तत्र त्वयाकदापि सिंहोद्ष्टोनवा! बहुवारं दृः

नकी पूणा बत्तते कथपागतः ! नकया

भ्ारोहत हरितिनं मच्टेम

हन्तु रयेनागच्डामि

अहपश्वापरि स्थित्वा गस्य शिविका यांबा!

पश्य ! शारदं नभः कथं निर्पलं बसवे।

चन्दर उरितोन बा! श्दानीन्तु नोदितः खलु कीटटश्यस्तारकाः प्रकाशन्ते सूर्योद्यास्चलन्नागच्चामि कापि भोजनं ऊृत्न वा ! ृतम्पध्याहनात्‌ प्रार्‌ अपुनाऽत्र कचेव्यम्‌ करिष्फामि |

सस्छृतवाक्यव्रभोषः

सुनो, मोर च्छा शब्द्‌ करते हैँ किस स्थानसे श्राया

जङ्गल से

वहां तूने कभी सिंह भी देखा था वा नी कट तेर देखा

नदी भरी है से श्राया ?

नाव से।

चदो हाथी पर चर्लँ

से तोरथसे श्नातादहू।

मे घोडे पर चद के जाडं च्रथवा पालकी पर !

देखो शरद्‌्रतु का श्राकाश कैसा निमैल

है

चन्द्रमा उगा वा नष्टौ ! इस समय तो नदी उगा है किस प्रकार तारे प्रकाशमान दो रहे है। सूर्योदय से चलता हृश्रा श्राता हूं कहीं भोजन किया वा नहीं !

| किया था दोपहर से पहले

अव यहां कीजिये करूगा |

विब्हस्त्राप् स्षलपिप्रकरणम्‌

त्वया कीटटशो विवाहः कृतः स्वयबरः ब्थनुङूलस्ति वा ?

~--~ ~ ~ ~ ------~--~~~

तने फिस प्रकारका विवाह फिथा था ! | स्वयंवर

3

स्वैथाऽ्वुङूलाऽस्ति कत्यपस्यानि जातानि सन्ति ! चतवारः पुत्रा दे कन्ये च।

| स्वामिभममस्ते

नपरस्ते परिये ! कचित्तेबापनुज्ञापय

सवेथेव सेवसे पुन राज्ञापनस्य कावश्यक-

ताऽस्ति। अद्य भवारच्दपं कृतवानत उष्णेन जलेन स्नातव्यम्‌

श्ाणेदं जलमासनं

इदानीं रमणाय गन्तव्यम्‌

गच्छेव !

उग्यानेषु

सब प्रकार से श्रुकूल दै कितने लड्के हुए दँ ! चार पुत्र श्रौर दो कन्या | स्वामीजी, नमस्ते श्रथौन्‌ मँ श्राप का सत्कार करती हूं

नमस्ते प्रिया

किसी सेवा की श्चाज्ञा करिये

सव प्रकार की सेवा करतीदहीष्ो फिर श्माज्ञा कराने की क्या श्रावश्यकता है आज श्चापने श्रम क्रिया है इस कारण गरम जलसे स्नान करना चाद्ये लीजिये यह्‌ जल श्रौर शरासन

इस समय धूमने के लिये जाना चादिये।

कां चलें ?

स्वरश्वश्रूह्वशुरादिसेव्यसेवकप्रकरणम्‌॥

हे श्वश्च ! सेवामाज्ञापय कं याम्‌ !

सुभगे ! जलं देहि गृहाणेदमास्ति

हे सास सेवा की च्राज्ञा कीजिये क्या करू !

सुभगे ! जल दे

लीजिये यदह है

हे श्वशुर ! भवान्‌ किपिस्दत्याङ्गाप- दे उवशर ! अप की क्या इच्छा हे श्राज्ञा

यतु हे बश्चबदे ! नित्यं सदाचारमाचर।

| कीजिये | हे वशंवदे ! नित्य सती लियो का भा- | चरण कर

> ~

२४

हे ननन्दरिषहागस्ड वासलापं कुर्याव

बद्‌ श्रातृजाये ! किपिच्छसि !

तव पतिः फीटशोऽस्ति

अतीव सुखपरदो यथा वव

मया स्वीडशः पतिः सुभाग्येन लब्धो- स्ति।

कदाचिदमियं तु करोति !

कदापि नहि किन्तु सवेदा भीतिं बद्धेयति

पश्य। भ्यां बाल्यावस्थायां विवाहः कृ. तोऽतः सद्‌ा दुःखिनौ वतेते

यान्यपत्यानि जातानि तान्यपि रुग्णा.

स्यग्रऽपत्यस्याऽऽशेव नास्ति मिषलस्वात्‌।

पश्य तव मम कौरशानि पुष्टान्य- परस्थानि द्विवषौनन्तरं जायन्ते

स्वेदा भसन्नानि सन्ति बद्धेन्ते सुशीलत्वात्‌

नश्चस्मिन्‌ ससारेऽलु ल्ली पतिजन्यस- दुशं सुखं किमपि विधते

संस्छृतवाक्यमरषोषः अथ ननन्दभ्रत्‌जायवादग्रकरणम्‌

हे ननन्द ! यहां ्राश्रो बात वीत करे कहो भौजाई ! क्या इन्दा है

तेरा पति कैसा है ?

श्रत्यन्त सुख देने बाला है, जसा तेरा भने तो इस प्रकार का पति अच्छ भाग्य से पायादै।

कभी कोड बुरा तो नहं करता ? कभी नहीं किन्तु सव दिनि प्रीति बदाता हे

देखो इन दोनों ने बाल्यावस्था मे विवाह किया है इससे सदा दुःखी रहते ह्‌

जो ल्के हए वे भी रोगी श्रागे लड़का होने की आशा ही नीं है निबैलता से | देखो तेरे श्नौर मेरे केसे पुष्ट लड़के दो वष के पी होते जाते है

सब काल में प्रसन्न नौर बढते जाते है सृशीलता से शस संसार मे श्रनुकूल खी श्नौर पुरुष से होनेवाले सुख के सदृश दुसरा सुख कोई न्यं है) `

इदानीं रद्धाऽवस्था पराप्ठा यौवनं गतं | इस समय ृद्धावस्था श्याई जवानी गह केशाः श्वेता जाताः प्रतिदिनं बलं | घाल सफेद हुए श्रौर नित्य बल घटता है

हसति च।

=

श्दानीं गमनागमनमपि कतैमशक्तो जआतः। बुद्धिविपर्यासत्वादिपरीतं भाषते

श्रचाऽस्य परणसमय आगत उर्ध्व श्वासत्वात्‌ सोऽथ मृतः

नीयतां श्मशानं बेदमन्नैषतादिभिर्द- प्रताम्‌

शरीरं भस्मीभूतं जातमतस्वृतीयेऽल्नय- स्थिस्तंचयनं त्वा पुनस्तनिमित्तं शो- कादिकं किचिदपि नैव कायम्‌

त्वं मातापित्रोः सेवा करोष्यत, कृतघ्नो ऽवक्तैसेऽतो मातापितृसेषा के- नापि स्याञ्य

इदानीन्तु सन्ध्यासमय आगतः साय- सन्ध्याघ्चुपास्य भोजनं कृत्वा षण रत

अद्य त्वया कियत्कायं कृतम्‌ ! पएताषत्छृतमेतावद बशिष्टमस्ति

अथ कियाघ्नाभो व्ययश्च जातः ! प्वशतानि शुदा लाभः साद्धदेशते व्ययश्च

अथ सायेक।लक्ृत्यप्रकरणम्‌

|

वह इस समय शाने अनेको भी चस- मथेष्ो गयादै।

बुद्धि के विपरीत होने से उलटा बोलता है

शाज इसके मरने का समय श्चाया $पर को श्वास के चलने से

वह्‌ श्राज मरगया

ले चलो श्मशान को वेदमन्त्रा करके घी शादि सुगन्ध से जला दो।

शरीर भस्म होगया इससे तीमरे दिन हाडोंको वेदी इकट कर उठाके फिर उसके निमित्त शोकादि कुद भीन करना चाहिये

तू माता पिता की सेवा नहीं करता इससे कृतघ्नी है इसलिये माता पिता की सेवा का त्याग किसी को कभी करना चाहिये

प्रवतो सन्ध्या समय श्राया सन्ध्योपासंन श्रौर भोजन करके घूमना घामना कर

भ्राज तूने कितना काम किया

इतना किया श्रौर इतना शेष है चाज कितना लाम च्चौर खयै हुता पांच सौ रुपये लाभ श्चौर श्रद्द सौ खयै हुए

1 संस्कृतवाक्यभषोधः

~ -----------------~-~---------~-----~

इदानीं सामगान क्रियताम्‌ सर समय सामवेद का गान कीजिये ¦ वीणादीनि बादिश्राययानीयताम्र्‌ | वीणादिक बाजे लाये नीतानि लाये

बाधताम्‌ बजाश्ये `

गीयताम्‌ गाये ¦

कस्य रागस्य समयो वतैते किस राग की वेला है।

षदजस्य षड्ज की

इदानीं तु दशघटिक्राप्रमिता रा्यागता, | इस समय तो दश घड़ी रात श्राई सोहये शयीध्वम्‌

गम्यतां स्वस्वस्थानम्‌ जाइये अपने धर को स्वस्वशग्यायां शयनं केन्य श्रपने पलेग पर सोना चाष्िये सत्यमेवेश्वरङृपया सुखेन रात्रिगैच्ये- | सत्य है एेसे टी हर की कृपा से सुख- त्मभातं भवेत्‌ पूर्वक रात बीते श्रौर सवेरा होवे

शराराञवयवप्रकरणम्‌

अभ्य शिरः स्थूलं षरे का शिर बड़ा दै

देवदत्तस्य मूद्धकेशाः ष्णा वकचन्ते | देवदत्त फे शिर मे बाल कले है ममतु खलु शेता जाताः। मेरे तो सुपेद्‌ होगये

तवापि केशा अ्रद्ध॑भरेताः सन्ति तेरे भी बाल श्राधे सुपेद है रस्य ललाटं सुन्दरमस्ति इस का माथा सुन्दर दै

अयं शिरसा खन्वाटः। सके शिर में बाल नदं तस्योत्तमे श्वो स्तः उस की श्रच्छी भिदे

भोत्रेण शृणोषि वा! कानसे सुनतादहै वा नदी भृणोषि सुनता दं

अनया च्धिया कयोयोः परशस्तान्याभू- | इस स्त्री ने कानों में श्रच्टे सुन्दर गने षणानि एतानि पदिने हे

किमयं करणाभ्यां कधिरोस्ति ! क्या यह्‌ कानों से बहिरादै १.

: परन्तु भ्रवणे ध्यान ददाति

श्रयं विशालान्तः त्वं च्ुषा पश्यसि बा ! पश्यामि परन्त्विदानीं मन्ददृष्टिनातो- हमस्मि

इदानीन्ते रक्ते अक्षिणी कथं वर्तेते ? यतोहं शयनादुत्थितः काणो धूरतोऽस्ति दरष्टन्यमयमन्धः सचच्चुष्कवत्‌ कथं गच्- वि।

तवाऽक्निणी कदा नष्टे यदाऽहं पञ्चवर्षो ऽभूवम्‌ इदानीम्मनत्रे रोगोऽस्ति कथं निव- त्स्येति ?

भन्जनाथोषधतिवनेन निव्चप्यते

तस्य नासिकोत्तमास्ति

भवानपि शुकनासिकः

घ्राणेन गन्धं जिघ्ैसिन वा? श्सेष्पकफत्वान्पया नाप्िकया गन्धो भरतीयते

अयं पुरुषः सुकपोलोऽस्ति अतिस्थूल्तत्वादस्य नाभिर्गभीरा त्वमथ प्रसन्नमुखो दश्यते किमत्र कार- ण्‌

श्रयं सदाऽदल।दितवदनो बिद्यते

अररयौष्ठौ शरेष्ठौ वरते भर्येल्म्बोषवत्वाद्धयङ्रोस्ति

सस्छतगाक्यरषोषः ४७

बहिरा तो नीं परन्तु सुनने मे ध्यान नष देता

यह्‌ चच्छे नेत्रवाला है

तू श्रांख से देखता है वा नहीं ?

देखता हूं परन्तु इस समय मन्ददृष्टि भथौत्‌ थोदी दृष्टिवाला होगया हूं

समय तेरी श्रांखं लाल क्यों है? जिससे मे सोनेसे उठा हूं

बह काना धृत्तं है

देखना चाष्िये यदह अन्धा आंखवले के समान कैसे जाता है

तेरी ्राखं कब नष्ट हुई !

जव मे पांच वधै का हुश्ना था।

इस समय मेरे नेत्रमें रोग दै बहु कैसे निवृत्त होगा ?

शरन शादि भौषध के सेवन से निवृत्त ह्योगा

उसकी नाक श्चति सुन्दर है

श्रापभी सुग्गे के सी नाकवाले हैँ नाक से गन्ध सूघतेहो वा नहीं? सर्दी कफ होने से मुञ्च को नासिका से गन्ध की प्रतीति नहीं होती

यह्‌ पुरुष श्न्छे गालवाला है

बहत मोट! होने से इसकी नाभि गहरी है तू श्राज प्रसननमुख दिखाई देता है इसमे क्याकारणदहै १.

यदह सव दिन प्रसन्नमुख बना रहता है इस के श्रोष्ठ बहुत अच्छे है

यह लम्बे श्रोष्ठवाला होने से भयङ्कर है।

= ~ संस्ृतबाक्पश्वोषः

सर्वजेंइया स्वादो श्त सबलोग जीभ से स्वाद्‌ लिथा करते

बाचा सत्यं मियं मधुर सदैद बाच्यभर | वाणी से सत्य श्रौर प्रिय सव दिन बोलना चाहिये

नैव केनचित्खन्वदतादिकं बक्तव्यमू्‌ | कभी किसी को शूठ वोलना नहीं चा्िये।

अयं सुदन्‌ वततत यद्‌ श्रच्छे दांतों बाला दै

तव दन्ता दृढाः सन्ति बा चलिताः | तेरे दांत द्द्‌ वा चल गये दै!

ममद्दा स्यतु बुटिता; सन्ति। | मेरे द्द दै अथोत्‌ निश्चल दश्नोरइसके तो टूट गये है

मन्पुख एकोऽपि दन्तो नास्त्यतः कष्टेन | मेरे यख मे एक भी दांत नहीं है इससे भोजनादिकं करोमि क्लेश से भोजन करता हूं

अस्य रमश्रूणि लम्बीभूतानि सन्ति | इसको मृचं लम्बी दँ

तव चिबुङस्योपरि केशा न्यूनाः सन्ति।| तेरी ठी के उपर वाल योढ़ त्वया कणठ इदं किमर्थं बयम्‌ ! तूने गले में यद्‌ किसलिये बांधा दै ? पअस्योरू विस्तीणों स्तः इसकी जंघा तैयार दै

स्वया हृदये $ लिप्तम्‌ | पूने छाती में क्या लगाया है! इदानी हमन्तोऽस्त्यतःङ्कमशसतू। सिपन| इस समय हेमन्त ऋतु है इससे केसर बोर कस्तूरी लेपन किये है

तथा दृच्दुलनिबारणायोषधम्‌ वैसे हृदयशूल निवारण के लिये शचं पध।

माणवकः स्तनाद्‌ दुग्धं पिबति लङ्का स्तन से दुध पीता दै

पश्य ! देवदक्तोऽयं लम्बोदरो अतैते देख ! देवदत्त यह्‌ बडे पेटवाला अर्थात्‌ | बुन्दीला है

श्रयन्तु खलु क्षामोदरः यह तो घ्वोटे पेटवाला

तब पृष्ठे फं लग्नमस्ति !? तेरी परमे क्यालगाटहै !

8

कि स्कन्धाभ्यां भारं बहसि ? क्यातु कम्धोंसे भार उठातादै!

पश्याऽस्य द्त्रियस्य बाहव येन स्वभुजबल्तपतापेन राज्यं बदधितष्‌

देख ! इस क्षत्रिय का बाहुबल जिसने श्रपने बाहुवल राज्य बढाया है

"----- --~~~---~------ -

संस्छृतवाकयभगोषः

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मनुष्येण इस्ताभ्यामुचमानि धमेकायां णि सेव्यानि नैव कदाचिदधम्यांणि।

भरस्य करपष्े करतले घृतं लग्न मस्ति

युष्टिबन्धने सत्येकत्राऽङ्गुष्ठ एकत्र प- ऽ्चाङ्गुलयो भवन्ति

शरीरस्य मध्यभागे नाभिः पुरतःष शपतः कटिः कथ्यते

भयं मन्नः स्थूलोरः

माणवको जानुभ्यां गस्डति अद्यातिगपनेन जपते पीडिते स्तः भदहं पद्म्यां ह्यो प्राममगमम्‌

शरस्य शरीरे दीघौणि लोमानि सन्ति। तव शरीरे न्यूनानि सन्ति

स्य शरीरचमं छदं वचेते पश्यास्य नखा रक्ताः सन्ति रयं दक्निणेन हहतेन भोजनं वामेन जलं पिबति ` इदानीं त्वया श्रम! ठृतोऽस्त्यतो धमनी शीघ्रं चलति

भअपुना तु ममान्तस्त्वग्‌ दह्मतेऽस्थिषु पीडापि वक्तेते

कमर

= --~

#

मनुष्य को चाहिये कि हार्थो से उत्तम धमेयुक्त कमै करे कभी अधमेयुक्त कर्मो को।

इस के हाथ की पीठ श्रौर तलेमेंषी लगा है

मूटी वाधते मे एक श्रोर श्रगूहा श्नौर एक श्रोर पांच गुली दोती है

शरीरके श्रागे बीच भागको नाभिश्रौर पी के भाग को पीठ कहते

यह पहलवान्‌ मोटी जधा वाला है लडका घोट के बल से चलता है। त्राज बहुत चलने से जां दूखती पैदल कल गाव को गया था।

इसके शरीर भे बडे रोम है

च्रौर तेरे शरीर मे थोडे रोम इसके शरीर का चमडा चिकना है देख ! इसके नख कुछ लाल है| यह दाहिने हाथ से भोजन नौर बये से जल पीता द्वै

इस समय तूने श्रम किया है इससे नाडी शीघ्र चलती है

इस समय मेरे भीतर की त्वचा जलती

श्रौर हाडोंमे पीडा मीदहै।

अय रजस्षमाप्रकरणम्‌

(अ (~ भो देवदत्त ! त्वया सह गच्डामि | खडा रह्‌ देवदत्त ! तेरे साथमेँभी

राजसभाम्‌

सभा को चलतां

0

3 9 सैस्छतवियपोषः

~~~" ~^ ~~

या सत्यास॒त्यनिणेयाय प्रकाशयुकता वर्तेत

तत्र कति सभासदः सन्ति

सहसतमर्‌

य।[ मम प्रामे समारसिति तत्र खलु पञ्च- शतानि समासदः सन्ति

इदानीं सभायां कस्य विषयस्योपरि विचारः कत्तभ्यः

युद्धस्य

तेन सह युद्धं कर्त॑न्यं नवा?

यदि कच्चग्यं तदं कथम्‌

यदि षमौत्मातदातु करतष्यम्‌।

पािष्ठश्चेत्तहिं तेन सह योद्धग्यमब

सोऽन्यायेन मरजां शश पीडयत्यतो म- हापापिष्ठुः।

एवं चत्र शल्ञन्लपमर्तेपधुद्धकशला बलिष्ठा कोशधान्यादिसापग्रीसहिता सेना युद्धाय पेषणीया

सत्यमेबात्र वय सवे सम्प्रति दमः

इदानीं कस्यां दिगि केः सह युद भ- वचचेते

पथिमायां दिशि यवनैः सह हरिदषै- स्थानाम्‌

संमा शब्द का क्थाश्थदहै! जो सच मूढ का निय करने के सिये प्रकाश से सित हो

वहां कितने सभासद्‌

हजार

जो मेरे भराममें सभादहै उसमें तो पाच सौ सभासद्‌ हे

इस समय सभा मे किस विषय पर विचार करना चाद्ये

युद्ध श्र्थात्‌ लडाई का

उसके साथ युद्ध करना चाद्ये वा न्ह ! यदि करना चाहिये तो कैसे

यदि वह्‌ धमीत्मा हो तब तो युद्ध करना योग्य नष

श्रौरजो पापीहो तो उसके साथ युद्ध करना ही चाद्ये

वह्‌ न्याय से प्रजा को निरन्तर पीड़ा देता है इस कारण से बड़ा पापी है| यदि पेसादहै तो शक्ल श्रख चलनेमें च्रौर युद्ध मे कुशल बड़ी लड़नेवाली ख- जाना रौर भ्न्नादि सामभ्री सदित सेना युद्ध के लिये भेजनी चाहिये सचदहीहै इसमे हम सव लोग सम्मति देते है|

इस समय किस दिशा मे कोन २के साय युद्ध होता है

पश्चिम दिशा में मुसलमान का चौर रिवषेस्थ श्रथोत्‌ यूरोपियन्‌. लोगों का

= ६.

पराजिता शपि यवना श्रच्राप्युपद्रषं त्यजन्ति |

भयं खलु पशुपक्षिणापपि स्वभागोऽ-

| स्ति यदा कथित्तद्शहादिकं ग्रहीतुम च्डेत्‌ तद्‌ यथाशक्ति युध्यन्त एव

हारे हुए मुसलमान लोग भी उपद्रष शअरथौत्‌ धूम धाम नदीं घोडे

यह्‌ तो पशु पक्षिया का मी स्वभाष दै कि जब कोद उनके घर भादिको छीन लेने की इच्छा करता है तब यथाशक्ति युद्ध करते श्रथौत्‌ लडते ही

अथ प्रास्मपरुप्रकरणम्‌

भो गोपाल ! गा वने चारय

तत्र या येनवस्ताभ्योऽडई दुग्धं त्वया

दुग्ध्वा स्वापिभ्यो देयम बत्सेभ्यः पाययितग्वम्‌ एतौ वृषभो रथे योक्तुं योग्यो स्तः

इमे, हले खलु पश्येमाः स्थूला बिन्यो वने चरन्ति

भागच् मो द्रषवयम्प्रहिषाणां बुं

परस्परं कीटं भवति मस्य राज्ञा बहब उत्तमा श्रश्वाः सम्ति। किपिय रागः सतुरद्गा सेना गच्ति ?

भोतन्यं हरयः कीटशं देषन्ते यथा हस्तिनो स्थूलाः सन्ति तथा हरित- न्योऽपि

नागास्समं गच्छन्ति ?

भृगु, करिणः कीदशं सदन्त

हे श्रि ! गौश्चों को बन में चरा वहां जो नद व्यानी गौय उनसे शाधा दूध तूने दुहृकर मालिक को वेना श्रौर श्राधा बड़ों को पिलाना चाद्ये

ये दोनों बैल गाड़ी में वारथ मे जोतने के योग्यै

रये दोनों हलदी में।

देखिये, ये मोटी भरसे बन में चरती है आर्मो जी देखने योग्य सों का युद्ध किस प्रकार श्रापसमेंदहोरह्ाहै। इस राजा के बहुत उत्तम घोडे है

क्या यह्‌ राजा की घोड़ों सद्ित सेना जा रही दै?

सुनिये, घोडे किस प्रकार हिनदिनाते हैँ ! जैसे हाथी मोटे होते टं वैसी हथिनी भी

हाथी बराबर चारु से चलते सुन, हाथी कैसे बाते है

र. संस्छृतवाकयत्रवोषः

पश्येमे गजोपरि स्थिस्वा गच्छन्ति स्य राङ्घः कतीमास्पन्ति ?

पञ्च सदस्राणि

राप्रौ श्वानो बुकन्ति

भातः डुक्डुटाः सपवदम्ति

माजौरो मूषकानति

इलालस्य गरेभा अतिस्थूलाः सन्ति भृ, लेम्बकणौ रासमा रासन्ते ्राम्यबरकराः पुरीषं भक्तयित्वा भूरिं शुन्न्ति

ष्टा भारं बहन्ति। द्रजाविपालोऽजा श्रवीदाग्धि | पशवऽपुन्यां जलम्‌

र्मुखो बानरो-ऽतिदु्ो भवति कृष्ण- गुखस्तु श्रष्ठः खलु

बानरी मृतकमपि बालकं त्यजति गोपेन गावो दुग्धा; पयोन वा! कपिलाया गोमेधुरं पयो भवति

अयं षभः कियता मूल्येन क्रीतः ? शतन रूप्यैः `

कतिभिः पणेः परस्थं पयो प्रिलति द्वाभ्यां पणाभ्याम्‌

पर्य, देबद ! वानराः कथुर्प्लवन्ते !

अयं महादनुस्वानुमान्व्तते

1

देख ये हाथी पर बैठे जते है।

इस राजा के कितने हाथी है ?

पांच हजार

रात भें छृत्ते भूसते है

सुबेरे भुरगे बोलते दै

बिल्ल मूसों को खाता दै

कुम्हार के गदहे श्रत्यन्त मोटे

सुन, लम्बे कानोंवाले गदे बोलते है गांव के सुबर मैला खाके भूमि फो शुद्ध करते है

ङ्ट बोमः ढोते है

गरिया बकरी श्रौर भो को दुहता है पशुश्च ने नदी मे जल पीयाथा। लाल मुख का बन्दर बड़ा दुष्ट श्नौर काले मुह का लंगूर तो श्रच्छा होता है। बद्री मरे हृए बच्चे को भी नही छोडती। ग्बलि ने गौश्च से दुध दुद वा नहं कपिला (पौली) गायका दूध मीठा होता है

यह वैल कितने मोल से खरीदा है! सौ रुपयों से

कितने पैसे सेर दूध मिलता है !

दो पैसों से

देख, देवदत्त बंदर कैसे कूदते है

यष्ट बन्दर बडी थुन्डीषाला होने से दयमाम्‌ है

चटकाभ्यां प्रासाद नीडं रचितप्‌

अत्राणडानि धृतानि

ष्दानीं तु चाटकैरा भरपि जताः। पश्य, विष्णुमित्र ! ङुक्ङटयोयुदधम्‌ कुक्कुटी स्बान्यणएडानि सेवते

पश्य, शुकानां समू यो बिरूबश्ुङीयवे।

रात्रौ काका वार्यन्ते

रे ! भृत्योड{यय ध्वांक्तमनेन पातन्य- जलपात्र चञ्खं निर्चिप्य जलं विना- शितम्‌

वायसेन बालकहस्ाद्रोरिका दृता पश्य,कीटशं लूकिकं युद्धं भबसैते।

बने रा्रौ सिंहा गन्ति शादृलं दृष्ट्वा सिंहा निलीयन्ते ह्यः सिषे गापहन्‌

परश्वो विक्रमबर्मणा सिद इवः

अनेन शुकहसतितिरिकपोताः पालिताः

सस्छतगाक्यमनोषः

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अथ ग्रामस्थपक्चिपरकरणम्‌

~ --

१३.

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इन चिडयां ने श्रटारी पर धोसला बनाया

यहां अण्डे धरे है

श्रवतो इन के बच्चे भीष्टोषये है। देख विष्णुमित्र मुरगों की लड़ाई मुरगी श्रपने अडो को सेवती है

देख, सुग्गों के सड को जो चंता हा उड़ा जाता है

रात मे कौवे नदीं बोलते है

श्रे नौकर ! कोवे को उडादे उसमे पीने के जलके बरतन में चोच डारुकर जल नष्ट कर दिया

कौएटने ्ड्केके दाथसे रोटी लेली। देख, किस प्रकार की करौदे श्रौर ल्श की लशहेहोरदहीहै।

सने सुग्गा हंस तीतर शौर कबूतर पले है|

अथ वन्यपरुप्रकरणम्‌

वन मेँ रात के समय सिष्ट गजैते है शादूल को देखकर सिह छिप जते

| कल स्हनेगौ को मारडाला। | परसो विक्रमवमा क्षत्रिय ने सिह भारा।

दरष्न्यं इस्तिसिदरणम्‌

जङ्गले हस्तियूथाः परि धमन्ति ष्दानीमेष हकंण मृगो गृहीतः

श्रयं ङुकडुरो बलवाननेन धिहन सदा- ष्याजिः कृता

पश्य सिंदव्रराहसंग्रामम्‌

शकरा इद्ेश्राण भच्रयित्वा विना शयम्ति

पश्य, वेगेन धावतो पृगान्‌

अयं रर्ैषभवत्स्यूलोरित

यो निलयादुस्प्लुस्य धावति ॒शश- स्त्वयादष्टोनना!

बदृन्ह्टवान्‌ | कदाचिद्धालबोऽपि दष्ानवा? एकदा ऋच्डेन साकं मथ युद्धं जातम्‌

----------_------_-------~~~_ ~~~ ~~~] 1

रात्रौ श्रृगालाः कोशम्ति। कदा चित्खदगोपि ृष्टोनवा! श्रारण्या महिषा बलवन्तो भवन्ति

तान्कदाचिद्‌ दष्षाकश्न वा!

|

देख शाथी नौर सिह की लडाई जंगल में क्ाथि्यों के धूमते है श्रमी भेद्ये ने हिरन पकड़ लिया यह कुत्ता वश बलवान्‌ है इसने सिं के साथ भी लडाई की।

देख सिंह रौर शूकर का युद्ध

शकर ऊख फे खतो को खाकर नष्ट कर देते दै।

देख, वेग से दौडते हुए हिरनों को यह्‌ काला रोज वैल के समान मोटा है जो भांटी से लपटभपट के दौडता उस खरहा को तूने देखा दहै वा नीं? बहुतों को देख! है

कमी री भी देखेर्देवा नहीं!

एक स्मय रीछ के साथ मेरी लड़ाई भी हृद थी

रात्रि मे सियाल रोते है

कभी गडा भीदेखावा नष्टं?

जो श्ररणा से बलवान्‌ होते है उनको

कभी देखा 'वा नहं !

अथ वनस्थपश्चिप्रकरणम्‌

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कदाचित्सारसावष्युङ्ोयमानौ क्रीडन्तौ महाशब्द इुरुतः श्येनेनातिषेगेन वर्तिका इता

शणः तित्तिरयः कीदशं मधुरं नदन्ति 1

कभी सारस पक्षी भी उडते श्रौर क्रीडा करते हुए बडे शब्द करते हँ

| बाज ने बडे वेग से बटेर मारी

सुन, तित्तिर किस प्रकांर मधुर बोलवे है

| बसन्ते पिकाः मियं कूजन्ति

1.

सस्छृतबाक्यप्रबोषः

~ -----“ --~ "~~ ~-----~ ~ ~~

न~ ~ ~ ~~ ~~ ~~ ~. ~~

| ऋाककोकिलवद्दुवेचाः सुवाक्‌ मनु-

| ष्यो मदति

भयं देवदतो हंसगति गच्छति पश्येमे मयूरा नृत्यन्ति

उल्का रात्रो बिधरन्ति

पश्य वकः सरस्यु पाखण्डिजनब- न्त्स्यान्‌ हन्तुं कथं ध्यायति

वलाका श्रप्येवमेव जलजन्तून्‌ घ्रन्ति पश्य कथञ्चकोरा धावन्ति येऽसयूष्वैमाकाशे गत्वा मांसाय निप- तन्तिते ग्रधस्त्वयादृषशटान वा!

मनका मनुष्यबदरशन्ति

विध्धिका भाणवर्कहस्वाद्रोटिकां वित्वो-

ङ्ीयतें ¦

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अथ तिर्थगृजन्तुप्रकरणाम्‌

सपाः शीघ्रं सर्पन्ति भयं ठृष्णः फणी महाविषधारी

भवता कदाचिदजगरोऽपि दष्ोन बा! |

पश्याहिनङलस्य संग्रामो बचत वृश्विकफेन दष्टो रोदिति ष्यं गोधा स्थूलास्ति

कवा

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१५

सन्त ऋतु में कोयलत प्रिय शब्द करते | कवे श्नौर कोयल के सदश दुष्ट रौर अच्छा बोलनेवाखा मलुष्य होता है यष देवदत्त हंस के समान चलता है देखिये मोर नाचते है दर््ट्‌ रात को विचरते देख बगुला वलाबों मेँ पाखण्डी सलुष्य के तुल्य मद्ली मारने को किस प्रकार ध्यान करता है ?

वलाका भी दसी प्रकार जलजन्तुश्रों को मारती देख किस प्रकार चकोर दौडते हे जो बहुत उपर आकाश मेँ जाकर मांस के लिये गिरते बेगीध तूने देखेषैवा नीं ! भैना मनुष्य के समान बोलती है चीर्ह लड़के के हाथ से रोटी छीन कर उद्‌ जाती है।

| सर्पं जल्दी सक्रिलते हे

यह्‌ काला सांप बड़ा विषवाला है श्मापने कमी च्रजगर भीदेखा है वा नदीं !

देख सांप श्रौर नेउले का युद्ध होता बह बिच्छू से काटा गया रोता है)

यह गोह मदी है

| 145 प्ध्म्र

1

2६

भूषका बिले शेरते भद्धिकां मश्चयित्वा वमनं प्रजायते . अत्र वासः करन्यो निमेक्विकं वत्तेते

मपुमक्िकादशनेन शोथः परजायते

भ्रमरा गष्जन्तः पुष्पेभ्यो गन्धं शष्ठ न्ति।

सस्छृतदाक्यपषोषः

मूसे षिल मे सोते है

मक्खी खाकर वमन हो जाता है यहां वास करना चाषे मक्ली एक भी ` नहं है

मधुमाक्ष्यों के काटने से सूजन शोजाती हे

भेरि गूंजते हुए, एलो से सुगन्धि प्रहण करते |

अथ जटजन्तुप्रकरणम्‌

तिषिद्किला मत्स्याः समुद्रे मवन्ति। रोहित्‌ सिं¶तुणडराजीवाश पुष्करिणी नदीतङ्ागसमुदरेषु निवसन्ति

मकरः पशूनपि शृहीसवा निगलति

नश्रग्राहा श्रपि महान्तो भवन्ति। करम्मौ; स्वाङ्गानि संकोच्य प्रसारय- . न्ति।

वपासु पणट्काः शब्दयन्ति जलमनुभ्या अप्सु निमज्य तट भासते। |

तिमिङ्गिल मच्छी समुद्रमें होती है। रोह सिदतुण्ड ओर राजीव इन नामों की मद्लियां पुखरिया नदी तलाब श्रौर समुद्र मे बास करती

मगर पड्ुञ्मों को भी पकड करं निगल

जाता दै नके घरियार मी बदर होतेह)

कट्ुए श्रपने अज्ञो को समेट कर केैलाते (५

हैं

वर्पा में मंडके बोलते है

जल के मनुष्य पानी में डूबकर तीर पर बैठते हे

नन --~-~------~-----~-----------------~ ------ -------- ---- ------- - ~ --------- ----------- ------~

अथ वृक्षवनस्पतिप्रकरणम्‌

पिप्पलाः फलिता बा ! |

पीपल फले है बा नी ?

3 वटः धुष्डायास्सन्ति पश्येम उवुम्बराः सफला वसन्ते इमे विन्बाः स्थूलफलास्सन्ति मगोधान भागाः पुष्पिताः फलिताः सन्ति। एदानीं पकफला अनपि वरेन्ते अस्याऽन्रस्य मधुराणि रसवन्ति फ- लानि भवन्ति।

तस्य त्वम्तानि भवन्ति पनसस्य महान्ति फलानि भवन्ति शिंशपाया; काष्ठानि ददानि सन्ति | श्य दीषौणि च।

अस्य बवरस्य करएटास्तीच्णा भवन्ति। बद्रीणां तु मधुगम्लानि फलानि कण्ट काश्च कुटिला मबन्ति | कटुकोानिम्बो अवरं निहन्ति मातुलङ्गकफलरम्नं सूपे निक्िप्य भो क्तव्यम्‌ ,

मपर वारिकायां दाडिमफलान्यत्युचमा- नि जायन्ते

नागरङ्गफल्लान्यनिय

वसन्ते पलाशाः पृष्प्यन्ति ष्टाः शमीटत्तपत्रफलानि भुञ्जते

कदलीफलानि पकानि नवा! तण्डुलादयस्तु वैश्यपकरणे लिखिता- स्तच्र द्रष्टव्याः

ग्रथोपधप्रकराम्‌

सेस्छृषबास्यपरवोषः

ये बड़ चच्छी छाया वाले हँ

देख, ये गूलर फलयुक्त होरे दे

ये बेल बडे फल बलेर)

मेरे बगीचे मे श्राम कृले फले , इम काल पक्के फलवाले भी है इस आ्राम फे मीठे श्नौर रसीले कल होते है

खस के तो खट्टे होते

कटदल के बडे फल होतेह

सीस फी लकी कठिन होती चौर सास की लकड़ी लंबी होती है

इस बवूल के काटे तीखी अणी वाले हेते बेरियो के तो मीठे खट्टे फल श्रौर इन के कटे दे होते है

कडा नीब ज्वर का नाशा कर देता नींवूकारस दाल डालकर खाने योग्य है

मेरे बगीचे मे ्रनार बहुत अच्छे होते है

नारगी के फलों को ला।

वसतचऋछतु मे टाक फलते हैँ

ऊट शमी च्रथात्‌ खींजड ( छोकर) वृत्त के पत्ते श्रौर फलों को खाते हें

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केला के फल पके वा नही चावल शादि तो बनियों के प्रकरणम लिखे है बहां देख लेना

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"~ ~ ~ ~ ~ "---- ~ ----~ ~~~ ---------------~------------+ ~-------+-~~--~~--~-~ ~ ~~ ~~

विषनिबारणायाऽपामागेमानय विष दूर करते फे लिये चिचिङ ला नियुर्ल्याः पत्राणयानेयानि निरीण्डी पत्ते लाने चाये ` ' लजावत्भः कि जायते लञ्जावन्ती का क्या होता दै? गुडूची ज्वरं निवारयति ! . गिलोय अ्वर को शांत करती है

शखाबलीं दुगे पाचयित्वा पिबेत्‌ | शंखावली को दूध में पका के पिये यथक्तेयोगं हरीतकी सेबिता सर्वान्‌ | जिस प्रकारसे ऋतु में ्रडेका सेवन रोगान्निबारयति करना योग्य है वैसे सेवी हु हरड़ सब रोगों को छुडदिती हे शण्ठीमसीवपिष्पली भिः कफवातरोगौ सोठ भिचै श्रौर पीपल से कफ श्चौर बात निहन्तव्यो रोगों का नाश करना चाहिये योऽश्वगन्धं दुरे पाचयित्वा पिबति | जो असगन्धं को दुध पकाके पीताहै पुष्टो जायते बह पुष्ट होता है इमानि कन्दानि भोक्तुमहांणि वर्चैन्ते। | ये कन्द खाने के योग्य है एतेषान्तु शाकमपि श्रेष्टं जायते | इन कन्दो का तो शाक भी श्रच्छा होताहै। अस्यां बारिषायां गुल्पलताः प्रशंस- इस बगीचेे गुच्छा ्ौर लताप्रतान प्रशं- | नीयाः सन्ति | सा के योग्य अथौत्‌ अच्छे हं

अयात्ायप्रकरयाम्‌ तव ज्येष्ठो बन्धुर्भगिनी कास्ति | तेरे बड़ा भाई श्रौर बहिन कौन दै देवदत्तस्युशीला देवदत्त श्रौर सुशीला री बन्धोऽहं पाठय व्रजामि दे भाई! मे पढने को जाता दं | चदं परिय! पूणा विदां कृत्वाऽऽगन्तव्यम्‌॥| जा प्यारे ! पूरी विधा करके राना भवतः कन्या अद्यण्व; परिः पठन्ति ? | च्रापकी बेटियां ्राजकल क्या पडती है !

वणे{ारणशिच्रादिकं दशंनशासराणि | वर्णोश्चारण शिक्षादिक तथा न्याय श्चादि चाधीव्येदानीं भमेपाकशिल्पगणित- | शाख पद्कर अव धमे, पाक, शिस्प श्नौर बिधा अ्रषीयते गणितविया पदती

\

1

अवञ्ञ्येषटठुया भगिन्या किं किपधीतमि दानीस्च तया क्वि क्रियते! बणे्ठानमारभ्य वेदप्यन्ताः सर्वाविधया विदिस्वेदानीं बालिकाः पाठयति

तया बिवाहः कृतो बा ?

इदानी तुन कृतः परन्तु बरं परीय स्वयम्बरं फतैमिच्डति

यदा कथित्‌ स्वतुन्यः पुरुषो मिलिष्यति तदा विवाहं करिष्यति

तव मित्रैरधीतं बा?

सवेएब बिद्रांसो वत्तन्त यथाऽहं तथैव तेऽपि समानध्वमाबेषुयेऽयास्मम्भवात्‌।

तव पितृभ्यः कष करोति ! राञ्यन्यवस्याम्‌

इपे फं तव मातुलादयः ?

बाद्मयं मम माल इयं पिद्ष्वतेयं मादृष्वसेयं सुरुपल्यं गुरः

|

इदानीमेते कस्मै प्रयोजनायैक्त्रमि- लिताः !

मया सत्कारायाऽऽदृताः सन्त अ्रागताः। | इमे मे मातापहीर्वसुरर्यालाद्यः सन्ति। | इमे मम मित्रस्य ्ञीभगिनीदुहिद्नामा- | तरः सन्ति

इमौ मप पिद्ष्यस्य श्यलदौहितरौ स्तः।

सस्कृतवाक्यपबोषः

३६

श्रापकी घडी बहिन क्यार पट़ शब वह क्याकरतीदहै

अक्षराभ्यास से लेके वेद तक सब पूरी बिथ्ा पट़के अव कन्याश्नों को पद्धाया करती दै

उसने विवाह किया वा नटी !

श्रमी तो नही किया परन्तु वर की परीक्चा करफे स्वयम्बर करने कीं इच्छा करती है जब कोद श्रपने सदश पत्ति मिलेगा तव विवाह करेगी

तेरे मिरत्रोनेषडादै वा नहीं!

सब ही विद्वान जेसा्मे हूं वैसेवेभी है क्योकि तुल्य स्वभाव बालों मँ मित्रता

| का सम्भव है

तेरा चाचा क्याकरतादहै!

राजा का कारवार

ये क्यातेरे मामाश्रादिरह!

ठीक यह मेरा मामा यह्‌ बाप की बहिन बूञ्रा यह माता की बहिन मौसी यष्ट गुर

| की खरी श्नौर यह्‌ गुरु है।

इस समय ये सब किंसलिये मिलकर इक हुए है !

सुकसे सत्कार के अथै बुलाये हुए अये है ये मेरे नानी, ससुर ओर साले श्रादिरहे। ये मेरे मित्र की सरी बहिन लडकी श्चौर जमाई हें

ये मेरे मामा श्रौर भानेज

4

४५ संस्छृतवाक्य्रषोधः

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अथ समन्तप्रकरणम्‌

स्वद्शहनिकटे के के निवसन्ति ! तेरे घरके पास कोन रहते? ब्राह्मणक्तत्रियविट्शुद्राः ब्राह्मण, कषत्रिय, वैद्य चौर शूद्र

इमे राजसमीपनिबासिनः ये राजा के समीप रहने बले है

अय कारुतकरणम्‌

भोस्तश्चप्त्वया नोदिमानरथशकटदला- | हे बढ ! तुक्च को नावे, विमान, रथ, गादी

दीनि निर्णय तत्र प्रशस्तानि कलाकी- | भौर हल श्रादि रचके उन में श्रत्यत्तम` लशलाादीनि संयोज्य दातव्यानि | कलायन्त्र कील कांटे रादि संयुक्त करके देने चाहिये

इव काष्ट चित्वा पयय रचय इस लकड़ी को काट के पलंग बना

अप्पात्कषाटाः सम्पादनीयाः इससे करिवाड़ं को बना

षयं इं किमर्थं िनस्सि ! इस वृत्त को किंसलिये काटता है !

ुषलोल्‌खलयोनिमोणाय मूसल श्मौर खरी वनाने के लिये अथवस्कारप्रकरणम्र्‌

भो भयस्कार ! त्वयाऽस्यायसो बाणा- | दे लोहकार ! तुम को इस लोहे के वाण,

सिशक्तितोमरपुद्ररशतध्नियुशुण्डथो | तलवार, बरद्वी, तोमर, सुद्र, बंदूक शौर

निमतश्याः तोप बना देने चाहिय

एतस्य रादीनि | इस के दुरे श्रादि

इमौ कलशफराहौ त्वया विक्रीयेतेन बा ये घडा श्रौर कडाही तुम बेचते हो वा नही ! चिक्रीणामि। बेचता हं |

एतान्‌ कीलकयटकान्‌ किमर्थान्‌ रचयसि! इन कील काटो को किंसलिये बनाता है विक्रयणाय बेचने फे लिये

=

४१

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अथ सुवणकारप्रकरणम्र

सवया सुबणांदिकं नैव चोयम्‌ शआामूषणान्युत्तमानि नि्मिंमीष्व [॥ अस्य हारस्य कियन्मून्यमस्ति ! पश्च सहस्नाणि राज्यो पुद्राः | ४..। [का

इमो इण्डलौ त्वया ष्ठो रचितौ बलयो तु प्रशस्तो

एतान्यंगुलीयकानि पुक्ताप्रवलहरिकनी-

लमणिजरितानि सम्पादय पतेनालङ्क(रा भ्रस्युत्तमा रच्पन्ते नासिकाभूषणं सद्या निष्पादय

इदं अश्रं केन रचितम्‌ !

शिवपरतापेन

शस्य सुणैस्य ; कटककफङ्कवन्‌पुरान्‌ निर्माय स्रो देद।

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गहने श्रच्छे सुम्द्र अना

इस हार का कितना मोर है पांच हजार रुपये

ये कुंडल तूने श्च्छे बनाये परन्तु कड वरो बिगाड़ दिये

ये अगूठियां मोती, मगा, हीरा श्नौर नील- मणि से जड़ी हहं बना

इससे गहने बहुत अच्छ बनाये जाते नथुनी शीघ्र बनादे

यह मुकुट किसने बनाया ? शिव्रप्रतापने

इस सोने के कड़ा ककणी वा कंगना शौर बिद्धिया बनाके शीघ्र दे

अथ कृरखटप्रकरणम्‌

भो ङुलाल ! इम्मशराप्दगवका्िमि-

मीस्व घरं देद्यनेन जलपरानेष्यापि

श्रे कुम्हार ! घडा सरवा चौर मदट्रीष्ी गौश्रों को बना श्रौर घडा दे जल लाङंगा।

अथ तन्तुवायप्रकरणम्‌

भो तन्तुवाय ! श्रस्य सूत्रस्य पटशाद्यु ष्णीषाछि वय

श्रो कोरी ! इस सत के पटका साड़ी च्चौर पगडियां बुन

हः

भो सूच्या सीष्यसि ! शिरङ्गरक्षणाधोबद्लाणि सीन्यामि

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संस्छतवाक्यभगोषः ग्रथ म॒चीकारप्रकरणमय्‌

चअ सूहैसे क्यासीताहे ! टोपी श्रगरखा श्रौर पाजामा सीतां

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ग्रथ मिश्रितप्रकरणप्‌

~

कारक ! कटं बय

इषे व्याधा मृगादीन्पशुन्‌ ध्नन्ति किराता षने निवमन्ति।

सकमलानि सरांसि इत्र सन्ति!

इमे तदधागा ग्रीष्मे शुष्यन्ति कूपाञ्जलमानय

अश्र वाप्यां स्नातव्यम्‌

रश्जकेन शतध्िमञुशुरख्यादयश्चलन्ति। श्रयं कम्बलस्त्वया कस्माद्‌ गृहीतः कस्मै भयोजनाय !

कर्मी राच्डीतनिषारणाय

परय माणवका; क्रीडन्ति पस्पिन्परहेखस्नराणे श्रेष्ठानि सन्ति इमे चोराः पलायन्ते

तत्र दम्युभिरागत्य सवेन्धनं हनम्‌ द्वापरान्ते युिष्टिरादयो वमूतवुः।

मप पादे कण्टकः प्रविष्ट एनघ्ुद्धर

केशान्‌ स्तम्ब

| भो नापित ! नखाञ्डिन्धि मुण्डय शिरः

श्मश्रणि च)

श्रे चटाई वाला चटाई बुन

ये बहेलिये हरिन रादि पश्श्मो को मारते है किरात श्रथौत्‌ भील लोग वन में रहते

कमलवाले तलाब कहां है !

ये सव तलाव गरमी भें सख जते

तू कूए से जल ला।

्राज वावडी मे नहाना चाहिये

वारूद से बन्दूक श्रौर तोप श्रादि चलती यह कम्बल तूने किससे लिया श्रौर किस

प्रयोजन के लिये

कदमीर से जाडा चछुाने के लिये

देख, लड़के लते है

इस धर मे विच्छौने च्रच्छे दहं

ये चोर लोग भागे जाते दै

वहां डाकू लोगों ने श्राकर सब धन हूरलिया। द्वापर के श्रन्त में युधिष्ेरादि हुये

मेरे वैर में कांटा घुस गया इसको

निकाल

बालो को समाल

श्रो नाड ! नखों को काट शिर मूड श्चौर मृद्धं भी मूड

अयं कोटपालो न्यायकारी वतते तु षमास्मा नेवारत्यन्यायकारित्वात्‌

एते राजमन्त्रिणः कुत्र गच्छन्ति ! राजक्षभां न्यायकरणाय यान्ति भोस्ताम्बूलानि देहि

ददामि।

भोस्तैलकार ! तिलेभ्यस्तैलं निः- साय्यं देहि

दास्यापि।

भरे रनक ! वक्नाणि प्रक्षाल्य सयो देयानि

कपाटान्‌ बधान

इदान प्रातःकालो जातः कपाटाबुद्‌- घाटय |

सर्वे युद्धाय सता भवन्तु अरथिपत्यथिनौ हजध्हेयुध्येते। किमियं गोधूमाने पिनष्टि !

तोच दुभ शतध्न्यश्चलन्ति ?

तेन युशुण्ख्या सिंहो इतः तेनाऽसिना तस्य शिरश्डिमम्‌

मञ्जनं किमथमनक्ति ?

उपानहौ ध्रस्वा गच्छसि ? जङ्लम्‌

किं स्थाल्थापोरनं पचसि सूपं वा! कटाहे शाकं पच

~~~

संस्ङृतवाक्यग्रथोधः

~ ~न ^

५१

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भयं शिल्पी भासादमस्युततमं रचयति | यह राज श्रटारी बहुत श्रच्छी बनाता है

यह कोतवाल न्यायकारी है |

बह कोतवाल तो धमत्मा नही हे ्म्या- यकरारी होने से

ये राजा के मंत्री लोग कां जाते है ? राजसभा को न्याय करने के लिये श्रो ! पान दे।

देता हं

श्रो तेली ! तिलो से तेल निकाल कर दे।

दुगा

अरे धो ! कपड़ों को धोकर शीघं देने चाहिये

किवाडों को वन्द्‌ कर

इस समय सुवेरा हुश्रा किवाडे खोल

सब सिपाही लोग लड़ाई के लिये तैयार मुद्र रौर मुदायले कचरी में लडते क्या यह्‌ गद्यं को पीसती है !

क्यो श्रज किलेमे तोप चलती? उसने बन्दूक से वाघ को मारा

उसने तलवार से उसका शिर काट डाला

अञ्जन किसलिये आंजता है !

जूते पदिन के कां जाता है ?

जङ्गल को

क्या बटुवेम भात पकातादहै वा दाल

कडाही मे तरकारी पका

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छ.

बिरुदं बदिभ्यसि चेषा दन्तां्ोपि ष्यामि

संस्छतवाक्यपषोषः - | विरुद्ध बोलेगा घो तेरे दांत तोड़ डादूगा

तब पितुस्तु सामथ्यं नाभूत्‌ तव तुका | तेरे बापकातो सामथ्यं हुश्चा वेसी

कथा येन भरना पाल्यते कथमन स्वर्ग गच्ेत्‌

यो राञ्यं पीड़येतस कथन्न नरके पतेत्‌ !

येनेश्वरमुपाश्यते तस्य विश्वान फुतो बरद्धेत !

यः परोपकारी सततं कथन्न सुखी भवेत्‌ ?

अस्यां मञ्जूषायां किमस्ति!

बद्धधने

श्दानीमपि इम्भ्यां धान्यं बस्ते नवा? स्वल्पमस्ति

त्वमालसीतिष्ठसि कुतो नोधोगं करोषि उभयन्र पभरकाशाय देहल्यां दीपं नि- धेहि

तेनासिचम्माभ्यां शतेन सह युद्ध कृतम्‌

अतिथीन्‌ सवसेन वा।.

भेश्चासमाजं भा गच्ड्‌

चूतसमायौ कदापि नैव सेवनीय

यमन कोजतोोि कि ननभरमा ०१० | ििोगििनििीतोरयय ककि

तोक्ष्याष्टी बात कहनी है

जिसने प्रजा का पालन किया ब्‌ स्वगे को क्यों जाय

जो राज्य को नष्ट करे बह क्यों नरकर्मे पड़े ?

जो इधर की उपासना करे ठसका विज्ञान क्योंन वदृ

जो परोपकारी है वह सवैदा सुखी क्यो होवे

इस संदूक भे क्या है !

कपड़ा श्यौर धन

अव कोटीमेंश्रन्नहैवा नदी! थोड़ासा है

तू ्रालसी रहता है उद्योग क्यं! नदीं करता

दोनों ओर उजियाला होने फे लिय दर- वाजे पर दिया धर

उसने ढाल नौर तलवारसे सौपुरस्पोके साथ युद्ध किया

तिथियों की सेवा करता है बा नद्यं | कभी मेले तमाशे मे मत जा।

जो च्रप्राणी को दाब पर धरं के सेलना वष द्यत श्चौर प्राणी को दाव पर धरके खलना बह समाहय कदाता दै डनको कभी सेवना चावे

संस्छृतवाक्यपरथोषः

यो म्पोऽस्ति तस्य बुद्धिः कथं दसद ?

यो भ्यभिचरेत्स रुग्णः कथं जायेत्‌ ! यो जितेन्द्रियः सर्व कर्तु तो श्तु यात्‌ !

योग।भ्यासः कृतो येन इ्ानदीपषिभेवे मरः

वन्ञप्ूतं जलं पेयं मनः पूतं समाचरेत्‌

भ्रान्तौ कदापि पतेत्‌ | श्रयं बाचालोऽस्त्यतो बरबरयते

भूमितले किमस्ति ?

मनुभ्यादयः

यः पद्यां रमति सोऽरोगो जायते व्यजनेन वायुं ज्र

किं पपद।गतो$सि यत्‌ खेदो जा- तोऽस्ति।

स्वस्थे शरीरे नित्यं स्नात्वा मितं भाक्त- व्यम्‌

जलवायू शुद्धो सेवनीयौ

स्ते शदे शे पः

नेव केन चिन्पलीनानि बद्लाणि धार्याणि। तव फा विक्षीषास्ति ?

पहं गत्वा | भोक्तु

४४

जो मद्य पानेवाला है उसरी वुद्धि क्यों न्युन होवे

जो व्यभिचार करे वह रोगी यो वे ! जो जितेन्द्रिय है वह सब उत्तम काम क्यो कर सके ?

जिसने योग का श्चभ्यास किया है वह ज्ञानप्रकाश से युक ्टोवे

वस्त्र से पवित्र किया जल पीनां चाहिये शरोर मन से शुद्ध जाना ह्या काम करना चाहिये

वष्ट ्रमजाल में केभी नर गिरे

यह बहुत बोलने वाला है इसी कारण वड़वड़ाता है

भूमि के नीचे क्याहै !

मनुष्य आदि

ˆ जो पग से चलता है बह रोगरहित होता है

पङ्खे से वायु ( हवा ) कर क्या घम सरे चाया है जो पसीना दोरहा है

अच्छ शरीर टोते रोज नहा के थोदासा खाना चाहिये

पवित्र जल श्रौर वायु का सेवन करना

| चाहिये

जो सब ऋतुश्रों सुख देनेषाला षो उसी धर में रहना चाष्टिये

किसी को भी मेले कपडे पिनने चाये तेरी स्या करने की इच्छा है

घर जाके खाने की

४६ संस्कुदवाकयप्रगोषः

~ ~~~ ~ ~~~

त्वं सक्तुं भुङ्के वा ! | तू सत्तू खाता है वा नदीं? धृतदुगभरमिष्ेः सहाऽभि घी दृध श्नौर मीठे के साथ खाताहं। त्वयाञ्नफलानि चूषितानि नवा | तूने भ्राम चूसे वा नही? उर्वासकफलान्यत्र मधुराणि जायन्ते ! खरयूजे के फल यां मीठे हेते दै

इ्ुभ्यो गुडादेकं निम्पयते | च्रादि से गुड़ रादि बनाये जतेद

इदानीमाकणठ दुग्धं पीतं परया इस समय गले तक भने दुध पिया

तक्रं देहि। मठादे।

त्र श्वेता शफंरा वतेते यहां सफेद चीनी है

मयं रुच्या दध्नौदनं यद्ध यह्‌ प्रीति से दही के साथ भात खात्ताहै |

भ्य मोदका भुक्तान वा! श्राज ल्द खाये वा नदीं

स्वया कदाचिर्कृशराऽपिभुक्तान वा | तूने कभी खिचडी भी खा बा नी !

मयाऽपूषा भक्धिताः मने मालपूवे खाये है

सशकरं दुग्धं पेयम्‌ शकर के सित दूध पीना चाद्ये

येन धैः सेव्यते एव सुखी जायते | जो धम्मे का सेवन करता दै वही सुखी रहता हे

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रथ लस्यलखक्प्रकरणम्‌

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मनुष्यो लेखाभ्यासं सम्यक्‌ कुयात्‌ , मनुष्य लिखने का अभ्यास श्रच्छे प्रकार

करे अयमत्युचचपमक्षरविन्यासं करोति यद श्रद्युत्तम श्रक्षर लिखता दै लेखिनीं सम्पादय कलम बनाश्रो मक्ठीपात्रमानय द्वात ला पुस्तकं लिख पोथी लिख

तत्र पत्रं लिखित्वा प्रेषितं वा! वदां चिद्धी लिखकर भेजी वा नदीं ! मेषितं पञ्चदिनानि व्यतीतानि वस्य | भेजी पांच दिन बीते उसका जवाब भी भरपुचरमप्यागतप्र्‌ श्गया

सुबणो राणि लिखितुं जानाति बा { , सुनहरी अक्तर लिखने जानता दै वा न्दी

सस्कृतबाक्यमषोषः

जानामि तु परन्तु घ्ापग्रीसंचयने लेखने

विलम्बो भवति।

यथङ्गुष्ठतजेनीभ्यां लेखनीं हीतवा

मध्यपोषरि संस्थःप्य लिखें परशम्तो

लेखो जायेत

श्रयमतीव शीध्रं ज्िखति ¦

एतस्य लेखिनी पन्दा चलति

यदे त्वमेकाहं सततं लिखेम्तदिं #-

यतः शोकांल्लि खतं शक्नुय।ः !

पञ्चशतानि

यदि शिक्तां शीस्वा शनेः शनै्िंसि-

तु१भ्यस्यत्तह्यक्तगाणां सुन्दरं सदररूपं

स्पष्टतया जायेत

रस्मिल्लाक्तारसे कञज्लं सम्परलितं

वा!. वि

मरलितं तु न्यूनं खलु वत्तत

पनुष्मेयीटशः पठनाभ्णासः क्रियेत ता-

टश एव लेखनोभ्यामोऽपि कन्तव्यः।

मया वेद पुस्त शखयितव्यपस्त्येकेन रू-

प्येण कियतः $ोकान्दास्यसि ? श्ररयुत्तमानि ग्रहीष्यसि चत्त शतत्रयं

मध्यमानि चेच्तपश्चकम्‌

साधारणानि सेत्सदस्रं श्लोकान्दा-

स्यामि।

शतत्रयपव ब्रहमष्यामि परन्त्वस्युत्तमं

लिखित्वा दास्यसि चत्‌

४७

जानतातो द्रं परन्तु चीज इकटी करने च्रौर लिखने में देर होती है।

जौ श्रगूढा तजनी श्रगुली से कलम को पकड़कर बीचली श्रगुली पर रखकर लिखे तो बहुत अच्छा लेख हो

यह्‌ श्रयन्त जस्दी लिखता है

इस की लेखिनी धीरे चलती है |

यदि तू णक दिन निरन्तर लिखे तो कितने शोक लिख सके ?

पांच सौ

यदि शिक्त ग्रहण करके धीरे लिखमे का श्रभ्यास करे तो श्रक्षरो का दिव्यस्व- रूप चौर स्पष्टता होवे

इस लाख के रस में कञ्जल मिलाया दै वा नहीं ! मिलाया तो है परन्तु थोडा दै

मनुध्य लोग जेमा पठने का श्नभ्यास करं वैसा ही लिखने का भी करना चाष्िये मुभ को वेद का पुम्तक लिखाना है एक रुपये से कितने शक देगा!

जो बहुत श्रच्छे लोगे तो तीनसौ श्नौर मध्यम लोगे तो पांचसौ

यदि बहुत साधारण वा घटियालोगे तो हजार शाक दुगा |

तीन दही सौ दगा परन्तु वरहुत च्छा लेख करेगा तो

छच्छा पेसा दी करूगा

वरमेवं करिष्यामि

श्रथ म॒न्तम्यमन्तव्यप्रकरणम्‌

स्वं जगत्सारं सचदानन्दस्वरूपं पर- | इस संसार के बनाने वाले सित्‌ श्नौर मेश्वरं मन्यसेन बा! श्ानन्दस्वरष परमेश्वर को मानता है बा नद्यं !

श्रयं नास्तिकत्वात्स्वमाबात्खष्टयुत्पति मलेश्वरं स्वीकरोति

यथयं कतंकायर चकरवनाषिशेषान्‌ संसारे निधिवुयात्तद्यबश्यं परमात्मानं मन्येत योऽत्र सृष्टौ रचितरचनां पश्यति जीवः का्यवत्सष्टारं हुतो मन्येत ?

यत्रात्तथा धार्मिका आस्तिका विदांसो- ऽध्यापका उपदेष्टारश्च स्युस्तत्र कोपि कदाचिभ्नास्तिको भवितु नेवार्हैत्‌ कैः कमेमि्क्तिभंवति तदा वसन्ति तग्र वैः भुञ्यते !

घर्मः कर्पोपासनाविद्नानिमुङ्किजीयते तदानीं ब्हमणि निवसन्ति परमा- नन्दं सेवन्ते

मोक्तं प्राप्य तत्र सदा बसन््याहोखि- त्कदाचिन्ततो नित्य॒ पुनजन्ममग्णो पराप्नुवन्ति !

प्राप्रमोक्षा जीवास्तत्र सर्भदा बसन्ति किन्तु महाकल्पपयेन्तमथाद्‌ बराह्ममा- युयीवत्तावत्तत्रोषित्वाऽऽनन्दं भुक्तवा एनजेन्भमर णे प्राप्नुवन्त्येव

मुक्ि को प्राघ्र हुए जीव वहां सवेदा नी

(नमयन [म

संस्छतवाक्यपषोषः

यह मनुष्य नास्तिक होने से स्वभावसे सृष्टि की उत्पत्ति को मानकर श्वर को नहीं मानता , - जो यह्‌ नास्तिक कत्तौ क्रिया बनानेष्ारा द्मलोर बनावट को इस जगत्‌ मेँ निश्चय करे

तो अवश्य हरर को मने जो इस सृष्टि मे बने हुए पदार्थो की बनावट को प्रयच्त देखताहै वह जैसे कारीगरी को दे- खके कारीगर को निश्चय करते वैसे जगत्‌ के बनानेवाले परमात्मा को क्यों माने

जहां रेष्ठ धमौर्मा श्रास्तिक विद्धान्‌ लोग पदानेवाले श्रौर उपदेशक हो, वहां कोड भी मनुष्य नास्तिक कभी नहीं हो सकता किन कर्मोसे मुक्षिह्ोती है उस समय कहां वास करते श्रौर वहां क्या भोगते है १, धमयुक्त कमे उपासना श्रौर विक्ान से मोक्ञ होता है उस समय ब्रह्म में मुक्त जीव रहते श्रौर परम श्रानन्द्‌ का सेवन करते ) जीव मुक्ति को प्राप्र ्टोके वहां सदा रहते है अथवा कभी वहां से निषत्त होकर पुनः जन्म रौर मरण को प्राप्न होते दै

रहते किन्तु जितना ब्राह्म कल्प का परिमाण है उतने समय तक ब्रह्मम वास कर श्रा- नन्द्‌ भोगके किर जन्मश्रौर मरणको श्रवहय प्राप्र होते है ।,

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इति श्रीमहयानन्दसरखतीस्वामिना निर्भितः सेस्कृतवाक्यप्रवोधनामको निबन्धः समाक्तः॥