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श्री: ।। कं #”५ गोतमधमंसत्राणि हिन्दीव्याख्याविभू बित- हरदत्तकूत-मिताक्षरावृत्ति-सहितानि

हिन्दी व्याख्याकार डॉ० उमेठाचन्ध पाण्डेय

एम० ए०, पी-एच० डी,० साहित्य रत्न,

... चीखम्बा सैस्कृत सीरीज आफिस,वाराणसी :१

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प्रकाशक : चौखम्बा संस्क्ृत सीरीज आफिस, वाराणसी-१ भुद्रक : विद्याविदास प्रेस, वाराणसी-१ संस्करण : प्रथम, संचत्‌ू १२०२३... की

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दो शब्द

भारतीय साहित्य से परिचित सुधी पाठकों को गोतस-घर्म का परिचय देने को आवश्यकता नहीं। घम्रमनन्‍्थों में इसका महत्वपूर्ण स्थान

है | आज के युग में भारतीय घन के शाश्वत मूल्यों की स्थापना के बिना

समाज को सही दिशा कठिनाई से मिल सकती है। आवश्यकता है मा भतीत की सभी अच्छाइयों को ग्रहण कर वर्तमान जीवन में पिरोने की, ऑर इसके लिए हमें उस अतीत को सही रूप में पहचानना होगा

'गोतम-घर्म-सूत्र” का यह संस्करण उत्त अमूल्य निधि के एक अंश को आधुनिक पाठक के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास है। केक्‍्ल

: सूत्रों में ही हिन्दी व्याख्या दी गयीं है और इस बात का गयल किया

गया है कि सूत्र का पूरा भर्थ सरलता से, स्पष्ट हो जाय। भूमिका में सूत्र साहित्य, भारतीय घर्मं और इस ग्रन्थ की विषयवस्तु के कुछ पक्षों पर... आलोचनात्मक दृष्टि से विचार किया गया है | हर

में इस बात का दावा नहीं करता कि मेरा योगदान बहुत महत्त्वपूर्ण है। बहुधा लेखक कातिपय सीमाओं में बद्ध होता है। इस ग्रन्थ को

- कत॑मान कल्ेवर प्रदान करने का श्रेय चोसम्बा संस्कृत सीरीज़ आफिस के : सुयोग्य प्रबन्धकों को है, जो संस्कृत एवं संस्कृति की सेवा और प्रतिस्था-

पना में चिरकाल से अहर्निश्न संलरन हैं। मैंने उन्हीं की प्रेरणा से इस

- पुस्तक के वर्तमान संस्करण द्वारा भारतीय वाब्मय की जो तुच्छ सेवा की

है उत्तसे मुझे संकोच है, किन्तु सन्‍्तोष भी है

अपनी ओरे से दो शब्द कहते हुए में अपने कतिफ्य प्रियजनों का, जो

. मेरे जीवन के मधुर ग्रेरणा-स्रोत हैं, प्रेम और कतज्ञता से स्मरण करता

.हैं | मेरा श्रम निष्फल नहीं होगा, यही मेरी आश्ा है

'विख़ानि देव सवितदुरितानि परा सुब | यद्‌ भद्रं तब घुव ॥? लक 2. उमेशचन्द्र पाण्डेय...

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भूमिका प्तत्न साहित्य

सूत्र साहित्य भारतीय वाइमय का एक अनूठा वर्ग है ओर इसकी विशेषता है इसकी अनोखी शेछी | वैदिक साहित्य में सूत्रों का काछ अध्ययन और चिन्तन की पुंक परंस्परां का प्रतिनिधि है और भारतीय साहित्य में इसका मंह्त्वपूर्ण स्थान है। यह वेदिक साहित्य को परवर्ती संस्कृत साहित्य से जोड़ने वाली #ंखका है। जैसा कि माक्स म्यूहलेर ने कहा है इन सूत्रों की शेछी का परिचय उसी व्यक्ति को सिठ सकता है जिसने इन्हें समझने का प्रयत्न किया है ओर इनका शाब्दिक अनुवाद तो संभव हो ही नहीं सकता। सूत्र का अर्थ है धागा और सूत्रों में छोटे, चुस्त, अरथंगर्भित वाक्यों को मार्नों एक धागे में पिरोकर रखा जाता है।

. संक्षिप्तता इनकी विशेषता है। पश्चिमी विद्वानों ने इन सूत्रों कीं शैली पर बहुत

आलोचनास्मक ठेंग से विचार किया है। प्रो० माक्स ग्यूडलेर ने प्राचीन संस्कृत साहित्य के इतिहास नामक ग्रंथ में सूत्र साहित्य के सन्दर्भ में कहा है: “छए्टःप त007)6 एड 72००० 060, ग्रीलालश'. छाक्यागशत्वा', ॥स्‍076, [89, 07 |#0680०|79, 48 ॥607060 40 & ए/शा8 ४(6/९0007. &7ी (९ ॥्रगएणांत्राया एणंगाड शा [णी7(8 0[ 8 5च४&ाय 86 80 0०फुछ शा! 008 शाट्प्रलिश, एाठ्टाडइंता धातव 2687॥९88, 66 78 70078 7 0856 00778 [76 ०0०776007 ०7 6०ए९(0%77९7 ०708898.” ( 2826 37 ) |

कोलेब॒क ने भी इसी प्रकार का विचार व्यक्त किया है:

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सूत्र रचनाओं में अनेक शताब्दियों के ज्ञान का भण्डार एकत्र किया गया है। वे

_ शताब्दियों के चिन्तन, सनन और अध्ययन के परिणाम हैं और उन्हें जो रूप प्राप्त

हुआ है वह भी अनेक शताब्दियों की अनवरत परम्परा का परिणाम दै। धंमंसूत्रों की श्रुति के अन्तगत नहीं माना जाता है, जेसा कि इसके पूर्वचर्ती साहित्य-संद्दिता और आद्वांण को, और इस प्रकार इसे अपोरुंषेय मानकर पौरुषेय सानाँ जाता ._ है। यदि ब्राह्मणों और परवर्ती काल के भन्त्री के साथ तुलना करें तो हमें सैत्रॉर्मे ऐसी कोई बात नहीं मिलती जिंसके कारंण उन्हें श्रुंति में सम्मिलित में किये

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जाथ। हाँ, इसका एक ठोस कारण हो सकता है उनकी बाद के समय की रचना। इनके मलुष्यों द्वारा लिखित होने का स्पष्ट ज्ञान है, यथा :

यथेव हि. कल्पसूत्रप्रंथानितरांगस्शतिनिबंधनानि चाध्येत्रध्यापयितारः स्मरैन्ति तथाश्रकायनबौधायनापस्तंबकात्यायनप्रभ्गतीन्‌ अंधकारत्वेन श्रुति के . विपरीत स्सति में केवछ सूत्र रचनाएं आती हैं अपितु मनु, याशवक्क्य, , पाराशर आदि के छोक में निबन्ध ग्रंथ भी आते हैं, जिन्हें स्पष्टलः स्मृति कहा जाता है। .... रे क्‍ हि स्मृति का आधार भी श्रुति ही दे श्रुति से स्व॒तन्त्न रूप में स्टूति की प्रासा* णिकता नहीं होती जेसाकि कुमारिल ने. कहा ह्वे इसके नाम से ही यह सथ्य ...... प्व॑चिज्ञानविषय्ज्ञानं स्टतिरिहोच्यते ५... 2. :पूर्वजानाहिना तस्या: प्रामाण्यं नावधायते के ... इस प्रकार सूत्रों के दो विस्तृत वर्ग किये जाते हैं : श्ौतसूत्र और स्मातसूत्र। इनमें शऔतसूत्र तो वे हैं जिनके स्नोतर-श्रुति में मिख्ते हैं और स्मात॑ वे हैं जिनका कोई इस प्रकार का खोत नहीं है। यह स्मरणीय है कि जिन विषयों का विवेचन सूत्रों--भ्रौत, ", पल, ओर समयाचारिक--में किया गया है, उन्हीं का. प्रतिपादन श्छोकबद्ध स्म्रतियों में भी किया गया है। जेसा कि आगे बताया जायगा इनका अन्तर विषयवस्तु का नहीं अपितु उनके काछ और उनकी शेली का है '. बेदिक-साहित्य में सुत्न-सांहित्य को वेदांग के अन्त्गंत कप शीषक में रखा जाता है चरणव्यूह के अनुसार-“शिक्षा कल्पो व्याकरण निरुक्त छुन्दो ज्योतिषम”

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ये वेदांग हैं। आपस्तम्ब ने भो इन्हें इस क्रम में गिनाया है--९, ४, “चढ़ंगो वेदः कल्पो व्याकरण ज्योतिर्ष निरुक्त शिक्षा” कल्प सबसे पूण वेदांग है, इसके

अन्तर्गत सूत्रों का विशाल भण्डार समाहित है। ये सूत्र यज्ञ के नियर्मों के विषय में हैं। इनके महत्त्व के विषय में माक्स म्यूल्लेरं ने ठीक ही कह्दा हैं--कल्पसूत्रों का बेद्िक-साहित्य के इतिहास में अनेक कारणों से महत्व है वे केवल साहित्य के एक नये युग के द्योतक हैं और भारत के साहित्यिक एवं धार्मिक जीवन के एक नये प्रयोजन के सूचक हैं अपितु उन्होंने अंनेक ब्राह्मणों के छोप में योग दिया, जिनका केबल नाम ही ज्ञात है। यज्ञ का सम्पादन केवल वेद द्वारा, केवल

कल्पसूत्र द्वारा हो सकता था, किन्तु विना सूत्रों की सहायता के ब्राह्मण या वेद

के याज्ञिक विधान का ज्ञान आप्त करना कठिन ही नहीं असम्भव था। कुमारिल ने कल्पसूत्र के महत्व के विषय सें कहा है-- वेदादते5पि कुबन्ति कढ्पेः कर्माणि याज्ञिकाः | तु कल्पविंना केचिन्मंत्रताह्मणमात्रकात्‌ कल्पसूत्रों के महत्व के कारण ही इनके रचयिता स्थयं नयी शाखाओं के संस्थापक बन गये और उनकी शाखा में उनके सूत्र का ही प्रधान स्थाच हो गया लथा आह्ण और वेद का कुछ खीसा तक महत्व कझ्महों गया। सूत्र बद्पि

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(५) स्थति थे, श्रुति नहीं तथापि उन्हें स्वाध्याय के अन्तर्गत सम्मिक्तित किया गया। विभिन्न चरणों एवं शाखाओं में सूत्र साहित्य के विक्रास के संबन्ध में यह उल्लेखनीय है कि कभी-कभी कछपसूत्र शाखाओं के अन्तर्गत सिन्न होते हैं और कभी भिन्न नहीं होते | शाखाओं के भेद का एपुक कारण उनके स्वाध्याय के भेंद हैं और कुछ कारण सूत्र की भिन्नता भी है। अतः कई स्थानों पर जहाँ शाखा का हा का सून्न का भी भेद है यही बात महादेव ने हिरिण्यकेशिसूत्र की टीका कक

“सत्र कल्पसूत्र प्रंतिशार्ख भिन्नमभिक्षनपि कथित शाखाभेदेड्ष्ययनभेदाद सूत्रभेदाह्द आश्वकायनीय कात्यायनीय चव सूरत हि भिन्नाध्ययनयोंद्योंदयों शाखंयोरैकेकमेव तेत्तिरीयके समाझ्नाये समानाध्ययने नाना सूश्नाणि। अनेन सच सूत्रभेदे शाखाभेदः शाखाभेदे सूत्रसेंद इति पर॑म्पराश्रय इति वाच्यम्‌

इसी आचाय मे अर्वाचीन कहे जाने वाले सूत्रों की प्राचीनता के विषय में भी एक नवीन बात कही है' कि वे सूत्र भी जिनके रचयिता भर्वांचीन मालूम पढ़ते हैं वस्तुतः शाश्रत हैं और प्राचीन ऋषियों से निःस॒त हैं

“जत् हि सूत्राणां कतृसंबंधिसंज्ागतनी किन्तु नानाकक्पगतासु तत्तन्नामक-

षिव्यक्तिषु नित्या तत्मणीतसूत्रेषु च्च॒ तित्यां जातिमवर्लंब्य तिष्ठति यथा पुरुषना- मांकितशाखासु संज्ञा ।”

. कब्पसूत्र झुक्यतताः चार प्रकार के हैं ।-- हटा

श्रौलसृंश्र-+ओऔत अभि से होते वाले बढ़े यज्ञों का विवेचन करने वाले सूत्र

२. गृह्मसूत्र--गुह्मअप्नि में होने वाले घरेलू यज्ञ का तथा उपनयन, विवाह

आदि संस्कारों का विवेचन करने थाके सूत्र | | 3

३. धमंसूत्र--चारों क्ाश्रमों, चारों वर्णो तथा उनके धार्मिक ध्ाचारों का तंथाँ राजा के कर्तब्यों का वणन करने वाले सूत्र |.

शुल्वसूच्-यज्ञ. में बेदि आदि के निर्माण की विंधि का चं्णत करने

७. .. मकेत्र

वेदिक साहित्य के एक महत्वपूर्ण अंग हैं--धर्मसून्न। सामान्यतः वदिंक साहित्य के अन्य ग्रन्थों के समान धमसूत्र भी अस्येक शाखा में अलग-अलग होते हैं किन्तु अनेक शाखाओं के विशिष्ट घर्मसूत्र उपलब्ध नहीं हैं। धर्मसुत्र कल्प की परम्परा में जाते हैं और कल्प का अर्थ है “वेद में विहित कर्मो -का क्रमपू्वक व्यवेस्थित कल्पना कंरने वाला शासत्र”। “कल्पो वेदुविहितानां कमंणामानुपून्येण कर्पनाशासख्म”--विष्णुमित्र, ऋग्वेदप्रातिशास्य की वर्गहय्रवृत्ति, पए० १३। इस : प्रकार धमसूत्रों का अटूट संबन्ध यज्ञ-्यागादि बढ़े कर्मों, विधाद्द इत्यादि गृंहा कर्मों का प्रतिपादन करने वाले साहित्य के साथ दे और इस करप साहित्य के

( ६) सन्दर्भ में हमें श्रौतसूत्रों, गृंह्ासुत्नों और घमंसूत्रों का पारस्परिक संबन्ध ध्यान में रखना चाहिएं। अनेक शाखाओं के विद्धिष्ट सूत्र साथ-साथ मिलते हैं | आश्वकायन, शांखायथन तथा मानव ज्ञाखा के श्रोतसूत्र उपलब्ध हैं किन्तु इनके घर्मसूत्न का . अभाव है। जिन शाखाओं के सभी कल्पसूत्र उपलब्ध हैं उनमें प्रसुख हैं-- बौघायन, आपस्तग्ब और हिरण्यकेशि। सभी शाखाओं के धसंसूत्र उपलब्ध ने

होने का मुख्य कारण यह है कि कई शाखाओं ने पृथक धमंसूत्र रचने की .

आवश्यकता नहीं समझी और उन्होंने अन्य प्रमुख शाखा के धममंसूत्र को ही

::. झ्षपतां लिया। इसी बात का. स्पष्ट निर्देश “पूर्व॑मीमांसासुत्र” १, ३, ११ की तन्त्रवातिक व्याख्या में किया गया है, जिसके अनुसार सभी धर्मसूत्र और ससी

. ग्रह्मसूत्र सभी आायों के लिए प्रामाणिक और मान्य हैं। कल्पसूत्रों के रखयिता अपनी शाखा के नियमों का विधान करते हैं. किन्तु दूसरी शाखाओं के विकढ्प नियमों का भी अनुसरण करते हैं : अल

“स्वशाखाविहितेश्रापि शाखान्तरगंतान्विधीन्‌ कल्पकारा निबध्नन्ति स्व एवं विकल्पितान॥ सवंशाखोपसंहारो जमिनेश्वापि संमतः ॥” कुमारिक, १. ३।.

किन्तु यह बात भी कही गयी है कि कोई भी सूत्रकार अपनी ही शाखा से सन्तुष्ट नथा: 4 हे

“न सूत्रकाराणामपि कश्चित्‌ स्वशाखोपसंहारमात्रेणांवस्थितः ।”

घंमंसृत्रों के नि्मोण का काल

धमसूत्रों का विशेष महत्व इसछिए भी है कि वें. सामाजिक जीवन की रोचक झाँकी प्रस्तुत करते हैं इन ग्रन्थों के दीकाकारों के उल्केखों से परिकृक्तित होता है कि धर्मसूत्र श्रौत्त और गृहासूत्रों के पहले विद्यमान थे। उदाहरण के लिए श्रौतसूत्र में कद्दा गया है कि यज्ञोपवीत धारण करने के उपरान्त ही विशिष्ठ यज्ञों का संम्पादन किया जा सकता है, किन्तु यज्ञोपवीत धारण या उपनयन की विधि नहीं बतायी गयी है और संकेत दिया गया है कि इसकी विधि धंमंसूत्रों से ज्ञात हैं। इसी प्रकार मुखश॒द्धि ( आचान्त ) और सन्ध्यावन्‍्दन के नियमों के ज्ञात होने का संकेत है, किन्तु इस तक को निर्णयात्मक नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत धमंसूत्रों को बाद के समय का सिद्ध करने वाले अमाण अधिक पुष्ट हैं जिनके अनुसार धर्मसूत्र, भ्रौतसूत्र और गह्सूत्र के बाद के रचित ठहरते हैं। हे धमंसूत्र के अतिरिक्त किसी अन्य सूत्र में शूद् कीं स्थिति का स्पष्ट निर्देश नहीं है, ध्मंसूत्रों में शूद्ध की सामाजिक स्थिति पतित होकर उस अवस्था में

पहुँची हुई है जिस अवस्था में बह स्खतियों में दिखाई पंड्ती है

अनेक' स्थर्ों पर. धंमंसूत्र गृह्मसूत्रों के विषय का ही प्रतिपादन करले हैं किन्तु वे स्वतन्त्र रचनाओं के वर्ग में हैं और आ्रमाणिकता में गुझसूत्रों के समकतष हैं। धर्मसूत्रों का रचनाकार निश्चित करने के लिये जब हम इनके पू्नवर्ती साहिंव्य

रेड >4ी+०७०)े० ७७०२० २९2&रकू ४०२ भदन ४७-७२००

( ७) पर देष्टिपात करते हैं तो देखते हैं कि निरुक्त ३, ४, में .रिक्थाधिकार के. प्र पर अनेक मर्तों का उल्लेख किया गया है “अथर्ता जांभ्या रिक्थप्रतिषेध उदाहरन्ति ज्येष्ठ पुत्रिकाया इत्येके ।”. . यास्क ने इस विषय में वेदिक अंशों का संकेत तो किया ही है साथ हीं उन्हेंने' एक छोक का भी निर्देश किया है जिसमें धर्मंसंबन्धी ग्रंथों के यास्क के समय में विद्यमान होने का पता चकता है। “तदेसइ्क्श्कोकास्यामश्युक्तम्‌ | अद्गगववद्ञास्सम्भवसि'' 'स जीव शरदः इंतस्‌ + अविशेषेण पुत्रार्ण दायो भवति घमतः। मिथधुनानां विसर्गादों सह्ठुः स्वायस्भुवो5अवीत क्‍

इस प्रकार यदि यह स्वीकार कि यास्क के पहले धमंशास्त्र के ग्रन्थ विद्यमान थे तो धर्मसूत्रों की तिथि काफी पहले माननी पढ़ेगी। इंतना तो निश्चित है. कि धर्मंसूत्रों में प्राचीनतम--गौतम, बीधायन और आपस्तम्ब के धर्ससूत्न--ईसा पूर्व ६०० और ३०० के बीच के समय के हैं। इन सूत्रकारों ने धमंशार्त्रों के स्पष्ट उदलेख किये हैं। विशेषतः मौतमघमंसूत्र में जो आरचीनतम धमंसृत्र है, धर्मशाख और धमंशाखत्रकारों का निर्देश बहु ड़

“तस्य व्यवहारों वेदो धमशास्राण्यद्ञानि उपयेदाः पुराणम्‌ ।” १. ९. २६

“चत्वारश्नतुणा पारगा वेदानां प्रागुत्तमात्त्रय आश्रमिणः प्रुथग्धसविदेखय एतान्द्शावरान्परिपदित्याचछते ।? ३. १०. ४७, यहाँ पूृ० २५०

“त्रीणि प्रथमान्यनिदृश्यान्मलु ।” ३, ३. देखें ए० २१४।

... इसी प्रकार कई. धर्मशास्रकारों के मतों के उल्केख गौतम ने “इस्येके” कहकर .

कियां है जेंसे प्रथम प्रश्न में २. १७ में, २. ५८, ३. १, ४. २१, ७. २३ में मंज्रु तथा. आधार्यों का भी निर्देश दै

“ऐकाश्रम्यं त्वाचाया प्त्यक्षविधानाद गाहंस्थ्यस्य--१, ३. ३७ वर्णान्‍्तरगमनमुत्कर्षापकर्षाश्याँ सप्तमे पश्चमे वा55चार्या:--१. ७. १८

अन्य सूत्रकारों ने भी दूसरे धमंशास्षकारों का सामान्य अभिधान से या

नामतः उदलेख किया है। पतंजलि ने भी “धमंज्ञास्त्र तथा” एवं जमिनि ने भी “शूदश्ष धमंशास्त्रत्वात”--पूर्वमीमांसा ६. ७. ६. वाक्यों द्वारा ध्मसूत्रों का निर्देश किया है और जैसा कि डा० काणे ने इन प्माणों से निष्कर्ष निकाला है “घर्मशास्तर यास्क के पूवं उपस्थित थे, कम से कम ईं० पू० ६००-३०० के पूव तो वे थे ही और ईसा की द्वितीय शताब्दी में वे मानव आचार के लिए सबसे बढ़े प्रमाण माने जाते थे ।” क्‍ “-धमशारत्र का इतिहास, प्रथम खण्ड, अनु० जाचाय काश्यप, पृ० ८।

सूत्र अन्थों और श्छोकबद्ध धर्मगन्थों के आपेक्षिक कारक के विषय में विद्वानों में मंतमेद और विवाद हैं। ओ० माक्‍्स म्यूहलेर एवं दूसरे विद्वान यंथां डॉ० भण्डारकर यंद् मानते हैं कि सूत्रों की रचना के बाद अनुष्दुम्‌ छन्द धांले घममग्रन्धों

४4)

की रचना हुई डा० काणे को यह मत स्वीकार नहीं है, क्योंकि प्राचीन अन्थों के विषय में हमारा ज्ञान अल्प है तथा श्छोक छन्द वाले कुछ अन्ध जेसे मनुस्य॒ति कुछ घर्मसूत्रों यथा विष्णु-धर्मंसूत्र से. आचीन है और वशिष्ठधमंसूत्र के समय का : है। इसी मरकार कुछ बहुत पुराने सूत्रों यथा बौघायनघमंसूत्र में भी श्लोक उद्छत : हहैं। “इससे यह स्पष्ट हो जाता है. कि श्कोकबद्ध अन्य धमसूत्रों से पूर्व भी विध-

... स्ॉन थे”--काणे, वही; १० ९।

.... धर्मसत्रों में प्राचीनतम गौतमधमंसूत्र है। इसके विषय में आगे विस्तारपूर्वक . कहा जायगा। इसका रचनाकांछ ६०० वि० पू० और ४०० व्रि० पू० के बीच साना जाता है क्‍

बीधायन धर्मसूत्र....

बौधायन का धम्मंसूत्र चार अश्नों में विभक्त है, इनमें अन्तिम प्रश्न परिशिष्ट माना जाता है और उसे बाद के समय की रचना मानते हैं। यह आपस्तम्ब धर्मसूत्र से पहले के समय का है। इसमें दो बार गौतम के नाम का तथा एक बार उनके धमंसूत्र का उल्लेख आता है। बौधायन ने अनेक आचारयों के नाम गिनाये हैं तथा उपनिषदों के उद्धरण दिये हैं। कुमारिछ ने बौधायन को आपस्तम्ब से बांद के समय का माना है। बौधायन का काछ ई० पू० २००-७०० के बीच माना जाता है।... आह रस

आपस्तैम्ब धमसूत्र.... क्‍ इस धमंसूत्र में दो प्रश्न हैं जिनमें प्रत्येक में ग्यारह पटल हैं। सभी सूत्रों में यह सूत्र छोटा है. और इसकी शेली बड़ी छुस्त है, भाषा भी पाणिनि से बहुत पहले की है। अधिकांश सूत्र गद्य में हैं किन्तु यत्र-तंत्र श्कोक भी हैं इसका संबन्ध पूर्वमीमांसा से दिखाई पड़ता है। यद्द बहुत प्रामाणिक सानां जाता रहा है। इसका समय ६००-३०० ई० पू७ स्वीकार किया गया ह्वे।

हिरण्यकेशि धर्मसूत्र .... क्‍ : हिंरण्यकेशिकंत्प का २६ वां और २७ वां प्रश्न है। प्रायः इसे स्वलन्त्र धर्मसूत्र नहीं माना जाता, क्योंकि इसमें आपस्तम्ब धमंसूत्र से सेकड़ों सूत्र लिये गये हैं

लि बसिष्ठ धमसूत्र 9. ये हज इसके कई संस्करण हैं जीवानन्द के संस्करण में २० अध्याय हैं तथा ३५ वें अध्याय का कुछ अंश है। इसके अतिरिक्त इसके ३० अध्यायों, ६. अध्यायों एवं २१ अध्यायों के. अलग-अलूम संस्करण भी हैं। इससे पता चछता डे कि यह कालान्तर में परिब्ृंहित, परिवर्धित. और परिवर्तित . होता रद्दा है। इसका समय है0०-०२०० ई० पू० हे अं,

हक तक फल खेर न्टइ हे

( ९)

विष्णु रे के हे हे सत्र .. विष्णु घमस-

इस सूत्र में १०० अध्याय हैं, किन्तु सूत्र छोटे हैं। पहछा अध्याय और अन्त के दो अध्याय पद्य में हैं। शेष में गद्य है या गद्य और पद्य का सिश्रण। इसका संबन्ध यजुर्वेद की कठ शाखा से बताया गया है। इसमें भिन्न-भिन्न कार्खों के अंश इृष्टिगोचर होते हैं, जिससे इसका कोछ निश्चित करना कठिन होता है। इसके आरम्भ के अंशों का संमय ३००-१०० ईं० पू० के बींच माना जा सकता है। इसमें भगवद्दीता, मंनुस्य॒ति तथा याज्षवस्क्यस्मृति से बहुत सी बातें की गयी हैं

हारीत धस्मसूत्र. क्‍ इस सूत्र को ज्ञान उद्धरणों से मिंकता है। अनेक धर्मशासतरकारों ने इसका उल्लेख किया है। इसमें गद्य के साथ अजुष्द्रप्‌ एवं त्रिष्दप छुन्द का प्रयोग है।

. हारीत का संबन्ध कृष्णयजुर्वेद से है, किन्तु उन्होंने सभी वेदों से उद्धरण लिये हैं

इससे यह भी ज्ञात होता है कि वे किसी एक वेद से संबद्ध नहीं थे ्ि शंखलिखित घम्मसूत्र हे . यह शुक्लयजुवेंद की वाजसनेयि शाखा का धर्मसूत्र था। “तन्त्रवार्सिकः में

इस सूत्र के अजुष्द्प्‌ श्छोकों का उद्धरण है। याज्ञवल्क्य और पराशर ने इनका

उल्लेख किया है। “जीवानन्द के स्छतिसंग्रह में इंस धर्मसूत्र के १८ अध्याय एवं. शंखस्मति के ३३० तथा लिखितस्झृति के ९३ श्छोक पाये जाते हैं। यह धर्मसूत्र गौतम एवं आपस्तस्य के बाद्‌ के काछ का है और इसकी रचना का समय ई० पू०

३०० से ई० सन्‌ ३०० के बीच है। अन्य सत्र प्रन्थ

अनेक धर्मसूत्र धर्मविषयक ग्रन्थों में विकीर्ण हैं। उनमें इन जांचायाँ के सूत्र

ग्रन्थ गिनाये जाते हैं--अन्रि, उशना, कण्व एवं काण्व, कश्यप एवं काश्यप, शाग्ये, के

च्यवन, जातूकण्यं, देवछ, पठीनसि, बुध, बृहस्पति, भरद्वाज ऐंवं भारद्वाज,

शा

शातातप, सुमन्तु आदि धमंसत्रों का बर्ण्यविषय धमंसूत्रों का मुख्य वण्य॑विषय है आचार, विधि-नियम, एवं क्रियासंस्कार” ये इन्हीं का विधिवत्‌ विवेचन करते हैं। निश्रय ही, धर्मसूत्र कभी-कभी गुहयसूत्रों के अ्रतिपाद्य विषयों के भी ज्ेत्र में पहुँच जाते हैं, किन्तु ऐसा कम स्थर्ों पर हुआ है। गृह्मसूत्रों का ध्येय गृह्मयज्ञ, प्रांतः सायंपूजन, पके हुए भोजन की बढि, वार्षिक यज्ञ, विवाह, पुंसवन, जातकर्म, उपनयन एवं दूसरे संस्कार, छात्रों एवं

स्नातकों के. नियम, मधुपक और श्राकर्म का वर्णन करना तथा इनकी विधियों को . स्पष्ट करना है। इस प्रकार गह्सूत्रों का स्पष्ट संबन्ध घरेलू जीवन तथा व्यक्तिगत...

जीवन से है। ये कर्ंब्यों ( 000०७ ) और कानून ( 8फ98 ) को . अपना विषय

'नहीं बनातें। इनके विपरीत धर्मसूत्र मनुष्य को समाज में काकर खड़ा कर देता

$० )

है जहाँ उसे व्यावहारिक जगत्‌ में दूसरों के साथ रहते हुए अपने आचार-ब्यवहार को नियमित और संयमित करना है, उसे कुछ कतब्यों एवं दायित्वों का पाछन करना. होता है, कुछ अधिकार आआाप्त करने होते हैं और अपने अपराधों के किए दंण्ड भोगने होते हैं। इस प्रकार धमंसूत्रों का वातावरण अधिक सामाजिक और नेतिक है जेसा हम कद्द आये हैं धर्मसूत्रों में गह्ासूत्रों के कुछ विष॑यों पर भी विचार किया गया है जेसे विवाह्द, संस्कार, मधुपक, स्नातक का जीवन, श्राद्धकर्म आदि। संक्षेप में धमंसूत्रों के वण्यविषय की सूची इस प्रकार दी जा सकती है ।--धर्म और उसके उपादान, चारों वर्णों के आचार और कतंब्य एवं जीवन- . बृत्तियाँ, बढ्ाचयं, गृहस्थ, वानग्रस्थ, संन्यास आश्रमों के आचार, उपजातियाँ

. और मिश्रित जातियाँ, सपिण्ड और सगोत्र, पाप और उनके आयश्रित्त एवंबत, . अशौच और उससे शुद्धि, ऋण, ब्याज, साक्षी और न्यायव्यवहार, अपराध भर उनके दण्ड, राजा और राजा के क॒तंव्य, सत्री के कतंब्य, पुत्र और दत्तक पृत्र,. उत्तराधिकार, सख्रीधन और सम्पत्ति का विभाजन

धमंसूत्र और स्मृतियाँ

स्मृति! शब्द का अयोग श्रुति अर्थात्‌ बेद्‌ के ईश्वरप्रकाशित एवं ऋषिदृष्ट वाइमय से भिन्न साहित्य के लिए हुआ है। श्रुति और स्टति के विषय में आगे. धर्म के स्वरूप का विवेचन करते समय विचार किया गया है। उपयुक्त अर्थ के अनुसार धमंसूत्र भी स्टृति अन्थ हैः... का

. “आतिस्त॒ वेदो विज्ञेयो धमंशास्तर तु वे स्खृतिः ।” मनु० २. १०

किन्तु संक्ृचित अथ में स्छति से धर्शात्र की उन रचनाओं का तात्पय है जो प्रायः श्छोकों में हैं और उन्हीं विषयों का विवेचन करती हैं जिनका प्रतिपादन धमंसूत्रों में किया गया है। इन स्श्तियों में अप्णी हैं--सनु और याज्ञवस्क्य की स्सृतियाँ “मनुस्मृति” सबसे प्राचीन है और ईसा से कई सौ' वर्ष पहले रची गयी थी। अन्य स्घतियाँ ४०० से १००० ई० के बीच की हैं। स्मृतिकारों की संख्या विस्तृत है, मुख्य स्वृतिकार १८ हैं, इनके अतिरिक्त २५ अन्य स्मृतिकार हैं जिनके नाम वीरमित्रोद्य ने गिनाये हैं ््ि

डॉ० काणे ने अपने धर्मशासत्र के इतिहास में धमंसूत्रों एवं स्टूतियों के प्रमुख . लक्षण स्पष्टतः निर्दिष्ट किये हैं, जिन्हें यहाँ साभार उल्लिखित करना असंगत नहीं होगा हे

3. अनेक धमसूत्र किसी चरण के करप के अंग हैं, अथवा उन्नका गहरा संबन्ध गृह्मसूत्रों से है। कि २. धमसूत्रों में कभी-की अपने चरण तथा अपने वेद के उद्धरण विशेषतः दिये गये हैं।.... कक

३. प्राचीन धमसूत्रों के रचयिताओं को ऋषियों का ओहदा प्राप्त नहीं है और वे अपने को मानवीय घरातछ से ऊपर उठे हुए अलौकिक बताते हैं, इसके:

डक + ४प>>चल० कथा ब2क ४४35 श>8 लत ब्दः

( ११ 2)

विपरीत मनु और याज्षवल्क्य जसे स्थतिकारों को मानव से ऊपर देवी शक्ति से संपन्न दर्शाया गया है

४. धमंसूत्र प्रायः गच में हैं या कहीं-कहीं मिश्रित गद्य और पद्च में हैं, किन्तु स्मतियाँ श्छोर्कों में या पद्मब॒द्ध हैं

७५. भाषा की दृष्टि से धमंसूत्र स्थितियों के पहले के हैं और स्घृतियों की. भाषा अपेक्षाकृत अर्वाचीन है।

विषयघस्तु के विन्‍्यास की दृष्टि से भी उनमें भेद है। धर्मंसूत्रों में विषय

की व्यवस्था क्रम या तारतम्य का अनुसरण नहीं करती, किन्तु स्घृतियाँ अधिक व्यवस्थित और सुगठित हैं, उनमें विषयवस्तु मुख्यतः तीन शीर्षकों में विभक्त है-- आचार, व्यवहार और प्रायश्रित्त |. क्‍

७. बहुत बड़ी संख्या में धर्मंसूत्र अधिकतम स्मृतियों से श्राचीन हैं।

गोतम धमस्त्र

सभी धमंसूत्रों में गौतम धर्मसूत्र सबसे प्राचीन है। यह केवल गद्य में है तथा इसमें श्लोक का कोई उद्धरण नहीं दिया गया है, जबकि दूसरे धमंसूत्रों में श्छोक का उद्धरण जाता है। इसकी प्राचीनता के कई प्रमाण हैं क्‍

१. सर्वप्रथम इसका उल्लेख बौघायनधमंसूत्र में कई जंगह किया गया है। यहाँ

तक कि गौतमधमंसूत्र का उन्नीसवां अध्याय अल्प परिवर्तित रूंप में बोघायन-

धर्मंसूत्र में मिकता है और इन दोनों में बहुत से सूत्र एक दूसरे से मिलते- जुलते हैं। अनेक प्रमाणों से यह बात सिद्ध है कि बौधायन ने ही गोतमधमंसूत्र से सामग्री म्रहण की है 0.

२. इसी प्रकार वसिष्ठधर्मंसूत्र में भी गौतमधर्मसूत्र से सामग्री छी गयो है।.. इसमें दो स्थानों 9. ३४ एवं ४. ३६ में गौतमधमंसूत्र का उद्धरण है। इसके अतिरिक्त गौतमधमंसूत्र का उन्नीसवां अध्याय वसिष्टधमसूत्र में बाइसवें अध्याय के रूप में आता है। वसिष्ठधर्मसृत्र में कई सूत्र ठीक गौतमधर्मसूत्र में आये हुए सूत्रों के समान हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि गौतमधमंसूत्र वसिष्ठधमंसूत्र से पहले का है

३. मनुस्म॒ति २. १६ में गौतम का उल्लेख किया गया है और उन्हें उतथ्य का पुत्न बताया गया है

४. याज्षवल्क्यस्मृति १. में उन्हें धर्मशास्रकारों में गिनाया गया है

_ “परांशरव्यासशंखलिखिता दुक्षगौतमो”

बिन अपराक-ने भसविष्यपुराण से यह श्छोक उच्त किया हल 5 : “अ्तिषेषः सुरापाने मथस्य -नराधिप। द्विजोत्तमानामेवोक्तः सतत गो तमादिलिः ॥”?

ओर यह सुरापान के विषय में ठीक गौतस के सूत्र के अनुरूप है

क्‍ (१२ ) मनुस्झृति के टीकाकार कुक्छक़ ने गौतस के ३. ६. सूत्र को भी अविष्य- पुराण का बताया है।. ,

७, हन्त्रवार्तिक के छेखक कुमारिल ने गौतम के अनेक सूत्र उद्धृत किये हैं !

४, शंकरा चाय ने अपने वेदान्तसूत्रभाष्य ३. ५, में गौतम के २. २. २९ को

हर . कथा १, ३, ३८ में २. ३. को उद्धत किया है रा हक ४28 स्टृति के दीकाकार विश्वरूप ने गौतम के कई सुश्री का निर्देश है मनुस्मृति के भाष्यकार मेधातिथि ने गौतम का उद्धरण अनेक स्थलों पर

११. गौतमधमंसूत्र में हिन्दूधम पर बौद्धों द्वारा किये गये आज्षेपों की ओर

संकेत नहीं है

इन सब उल्लेखों से गौतसधसंसूत्र के काछ के विषय में यह निष्कष निकलता है कि यह सूत्र निश्चित रूप से उपयुक्त सभी रचनाओं से पहले का है गौंतमधर्मसूत्र का समय यास्क के “निरुक्त' के बाद आता है और जैसा कि म० म० काणे ने कहा है गौतम धर्मसूत्र की रचना के समय “पाणिनि का व्याकरण या तो था ही नहीं ओर यदि था तो वह तब तक अपनी महत्ता नहीं स्थापित कर सका था ।” इस प्रकार यह निश्चित होता है कि गौतमधर्मसूत्र ईसापूवें ४००-६०० के पहले रचा जा चुका था।

गौतम घमंसूत्र में अन्य साहित्य का उल्लेख

गौतम धर्मसूत्र सभी धर्मसूत्रों में आ्राचीनतम है इसका एक प्रमाण यह भी हैं कि इसमें किसी अन्य धर्मंसूज्ञ का या धर्मसून्नकार का निर्देश नॉम॑त! नहीं है किन्तु इसके पहले धर्मशाख और उसके रचयिता विद्यमान थे इस बात की ओर बहुशः उदलेख इसमें मिलता है। राजा के व्यवहार के साधन बताते समय २. ' १६ में कहा राया है...

“तस्य च॑ व्यवहारो वेदों धमंज्ञाख्राण्यज्ञान्युपवेदाः पुराणम्‌”। इसी प्रकार त्रयी के साथ आन्दीक्षिकी का भी उढ्लेख है :--

आह .._ “अस्यामान्वीक्षिक्यां वाउभिविनीतः” २, २.

क्‍ . अ्षन्‍्य धर्माचार्यों में केवल मज्नु के मत का महापातकों का -चर्णन करते समय

उल्लेख किया गया है। एके! 'इत्येके! 'एकेषाम! शब्दों द्वारा उस समय के तथा क्‍

पूर्ववर्ती धर्मशाखकारों के मर्तों का उल्छेख किया गया है।

वेदिक संहिता एवं ब्राह्मण साहित्य का उल्लेख तो किया ही गया है, उपनि- : घद्‌, वेदान्त आदि का भी हवाछा गौतमधमंसूत्र में कई जगद्द मिंछता है। यथा, ५... के $. $२। ,

कु

कं मल आय $$0-625 उरी 752 «व 7४5 ंए जा

(5-2 मोड ०: चित 7४ पक के 5 दूध उसे क्‍ हे 2 स्श्स्टोसि डे. जे 27 6 8 - डर" अल कर, ख्ज्थु थे रन पा स्ज्लर इुछुड. हू- 80 78 कक टन जा दर अर.

( १३ )

“उपनिषदो वेदान्तः स्वच्छन्दःसु संहिता मधून्यधमर्घणमथवंशिरों रुद्धाः पुरुषसूक्तं राजतरोहिणे सामनी बृहद्वथन्तरे पुरुषगतिमंहानाम्न्यों महावेराज महा- दिवाकीत्य ज्येष्साम्नामन्‍्यतमद्‌ बहिष्पवमान कूष्माण्डालि पावमान्यः साविश्नी चेति पावमाननानिं ।”

इसी प्रकार वेद्वेदांग और इतिहास पुराण का उल्लेख बहुश्रत व्यक्ति का छरक्षण बताते समय किया गया है

“छोकवेदवेदाड्रवित” १, ८. ७। “बाकोबक्येतिहासपुराणकुशकः?” १. ८, ६। गौतमधमंसूत्र ३. २. २८ में “दण्डो दुमनादित्याहु:” कहकर निरुक्त १. £ की ओर भी संकेत किया गया है। इस प्रकार गौतमधर्मसूत्र में इतर साहित्य की भी. पर्याप्त चर्चा है

गीतमधमंसूत्र का सामवेद से संबन्ध

गौतमधमंसूत्र का सामवेद से. घनिष्ठ संबन्ध दे इस विषय में कोई विवाद नहीं है। इस सूत्र का अध्ययन विशेषतेः सामवेद के अनुयायी करते थे। चरणव्यूह की टीका के अनुसार गौतम स्ामवेद की राणायनीशाख्रा के एक विभाग

. के आचाय या शाखा के संस्थापक थे सामवेद के श्रौतसूत्रों ( छाठ्यायन श्रोत॑सूत्र

१, ३, ३, १. ४. १७ तथा द्वाह्यायण श्रौतसूत्र १. ४७. १७, ९. ३. १५) में गौतम का.

.... उल्छेख है। सामवेद के ग्रह्मसूत्र गोमिलगृहासूत्र ३. १०. में भी गौतमधमसूत्र

के नियम को प्रामाणिक माना गया है।

.. इन उल्लेखों के अतिरिक्त गौतमधमंसूत्र का सामंवेद से गहरा संबन्ध इस बात से भी प्रमाणित होता है कि इस सूत्र में सामबेद के अनेक विषय ग्रहण किये गये हैं उदाहरण के किए गौतमधमंसूत्र के अध्याय २६ में कुछ सूत्र ऐसे

हैं जो शब्दशः सासवेद के सामविधांन ब्राह्मण से उद्छत किये गये हैं। इसी

प्रकार गौतमधघमंसूत्र के तृतीय प्रश्न, प्रथम अध्याय के १२ वे सूत्र में सामवेद के मन्तों का निर्देश किया गया है। ये मन्त्र किसी अन्य झाखा के धर्मसूत्र में नहीं उल्लिखित हैं जिससे गौतमधमंसूत्र का सामचवेद के प्रति पक्षपात स्पष्टतः दिखाई पढ़ता है। गौतमघमंसूत्र में प्रथम अध्याय के सूत्र ५२ में पाँच व्याह॒लियाँ गिनायी गयी हैं और ये व्याहृति साम से उद्छत हैं, गौतमधमंसूत्र के अतिरिक्त अन्य शाखा के सूत्रों में पाँच के स्थान पर तीन या. सात व्याहतियों का

- ही उल्लेख है। गौतमधमंसूत्र की यह विशेषता भी सामवेद के साथ इसका

घनिष्ठ संबन्ध प्रकट करती

अतः यह प्रतीत होता है कि गौतस की शाखा का संबन्ध सामवेद से था... यथ्ंपि चैंदिक कार की इस प्राचीन शाखा के विषय में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्राचीन साहित्य में क्षेपकों के लिए पर्याप्त अवसर था जोर किसी: ग्रन्थ का विशुंद्ध रूप निर्धारित करना असंभव सा ही है क्‍ धन

....... (५१४) धम्मसूंत्र के रचयिता-गौतम कप गौतमधघर्मसूत्र के रचयिता का नाम सूत्र के नाम के अनुसार गौतस है ऊपर यह निर्देश किया जा चुका हैं कि सामवेद के छाव्यायन श्रौतसूत्र और

द्राह्मयायण श्रौतसूत्र में गौतम का उल्लेख प्रायः आया है। इसी प्रकार गोमिंक

गृछासूत्र में भी गौलम को प्रमाण माना गया है। वस्तुतः गौतम नॉम॑ एक जातिंगत नाम है और अनेक व्यक्तियों के नाम के साथ इसका प्रयोग उपलब्ध

होता है, उदाहरण के लिए कठोंपनिषद्‌ २. ७. ५० और २. ५. में इसका प्रयोग .

नचिकेता के साथ तथा उसी उपनिषद्‌ में १. १. १० में इस नाम का प्रयोग उसके पिता के लिए हुआ है छान्‍्दोग्योपनिषद्‌ ४. ४. 8 में दारित्रुम गीतम नाम के एक आचाय॑ का नाम आता है। गे

कुछ अन्य धर्मंग्रन्थों के साथ भी गौतम नाम जुड़ा हुआ मिलता है। जेसा कि 'म० म० काणे ने बताया है मिताक्षरा, स्छृतिचन्द्रिका, देमादि, माधव भादि ने किसी शोक-गौतम के उद्धरण दिये हैं। वृद्ध-गोतम नाम के धर्मशास्र का उत्लेख अपराक, हेमात्रि तथा माधव ने किया हैं। वत्तकमीमांसा में वृद्ध गौतम के अतिरिक्त बृहदू गौतम से उद्धरण दिया गया है। किन्तु गौतम नाम की ये रचनायें गौतसधमंसूत्र से बहुत बाद के समय की हैं और गौतम धमंसूत्र से

_ इनमें काफी अन्तर है

* . , सामवेद के वंशआह्यण में गौतम गोत्र नाम वाले चार सामबेदी आाचार्यों के नाम आये हैं :--गातू गौतम, सुमन्त्र बाश्नव्य गौतम, संकर गौतम तथा स्थव्रिर गौतम श्रोतसूञ्रों और ग्रश्मसृत्रों में गौतम तथा स्थविर गौतम के मत उद्श्त किये गये हैं।

गोतमधमंसूत्र के संस्करण और टीकाकार

शगौतमधमंसूत्र का कई बार प्रकाशन हुआ है। डा० स्टेन्जलर ने इसका सम्पादन दि इंस्टीव्यूटस आफ गौतम नांम से लन्दन से १८७६ में किया और कलकत्ता से भी ३८७६ में एक संस्करण प्रकाशित हुआ। आनन्दाश्रम ग्रन्थावछली के अन्तर्गत 'इसका सस्करण हरदत्त की 'मिताक्षरा' टीका के साथ १९१० में प्रकाशित हुआ दस के करे संस्करी इसका एक संस्करण मंसूर से. भ्री निकला है। मसूर संस्करण में मंस्केरी का भाष्य है। डा० व्यूहूलेर कृत अंग्रेजी अनुवाद 'सेक्रेड डुक्स आफ दी ईष४ट' सीरीज़ : की दूसरी जिलद में प्रकाशित है हु

'इस धमसूत्र के टीकाकारों में मुख्य हैं हरदत्त और मस्करी हरदृत्त का समय ११०००४३०० के बीच माना गया है.) इनके अतिरिक्त कुछ कम्य टीकाकारों का भी उल्लेख पाया जांता है। अद्भुत सांगर के लेखक अभिरुद्ध ने तथा साप्यकार डे ने गौतमधमंसूत्र पर असंहाये नाम के आचार्य की टीका का भी निर्देश

व्यस्त ८६

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5 7 ला 5 २-६ रच ३५७५ # के ८८ 3 जमज पे (, छू 5.० - ५4५

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-( १७)

गौतमधमंसूत्र में वर्णित विषय क्‍ टीकाकार हरदत्त के अनुसार गौतमधमंसूत्र में कुल २८ अध्याय हैं। 'कलकत्ता से प्रकाशित संस्करण में एक अध्याय 'कमंविपाक! १९ वें अध्याय के बाद आता है। आनन्दाश्रम ग्रन्थांचली से प्रकाशित इस भ्रन्थ सें तथा वर्तमान संस्करण में भी इस धंमंसूत्र कां विभाजन तीन अश्नों के अन्तर्गत है और प्रथम प्रश्न में अध्याय, द्वितीय प्रश्न सें अध्याय तथा तृतीय प्रश्न में १० अध्याय हैं। इसमें वर्णित विषयों की सूची संक्षेप में इस ऋ्रम से है। |

प्रथम प्रश्न

प्रथम क्ध्याय-धर्म, उपनयन, शुद्धिम्रकरण, छात्र के नियम | द्वितीय अध्याय- ब्रह्मचारी के नियम, आचरण और निषेध तृतीय अध्याय--गद्स्थाश्रम, संन्यास ओऔर वानग्रस्थ के नियम | चतुर्थ अध्याय--ग्रहस्थ का धर्म; विंचाह और पधुत्रों का अकार पंचम अध्याय--पंच महायज्ञ और मधुपक्त। षष्ठ अध्याय--अभिवादन के नियम, और श्रेष्ठ व्यक्तियों के प्रति आचरण सप्तम अध्याय--गुरु सेवा और

आह्मण के कतंब्य अष्टम अध्याय--राजा और बहुश्न॑त संस्कार नवम अध्याय-- अत और आचरण के देनिक नियम

द्वितीय प्रश्च॒. . वी 9 प्रथम अध्याय--चारों वर्णों के कतंव्य। द्वितीय अंध्याय--राजा के कतंव्य और धर्मनिर्णय कीं अफ्रिया तृतीय अध्याय--श्रपराध॑ और उनके दण्ड, व्याज, ऋण चतुर्थ अध्याय--विवाद और उनके निर्णय, साक्षी और व्यवहार, सत्यभाषण, न्‍्यायकर्ता | पंचम अध्याय--स्॒त्यु और जन्मविषयक अंशौच | षष्ठ अध्याय--श्राज्धकर्म सप्तम अध्याय--वेदाध्ययन की विधि और अनध्याय। अष्टम अध्याय--भचय ओर पेय पदार्थ। नवभ अध्याय--स्री के धर्म |

ततीय प्रश्न ल्‍ प्रथम अध्याय--प्रायश्रित्त | द्वितीय अध्याय--त्याज्य व्यक्ति | तृतीय अध्याय-

पातक और महापावक। चतुथ अध्याय से सप्तम अध्याय--प्रायश्रित्त अष्टम अध्याय--कृच्छू बत। नवस अध्याय--चान्द्रायण बत और दशम अध्याय---

सम्पत्ति का विभाजन | (्‌ धर्म धमं शब्द का वास्तबिक अर्थ जानने के लिए जब हम अपने आंचीनतम

: साहित्य ऋग्वेद! का अवछोकन करते हैं तो हम देखते हैं कि इस शब्द का.

प्रयोग विंशेषण या संज्ञा शब्द के रूप में हुआ है। आयः यह इाब्द “धर्मन' हैं और इसका अयोग नपुंसंकर्किम में हुआ है 'घर्मन” शब्द का अयोग निरनलिखित स्थछों पर हुआ हैं--ऋग्वेद--१. २२. १८, १. १६४. ४३, ५०, ३, ३. १, ३. १७,

( १६ » १, ३, ६०, ६, ७५. २६. ६, ५. ६३. ७, ५. ७२ २। अथववेद में ३8. 4. ५१ बाजसनेयिसंहिता में १०. २५ और धर्म शब्द का अयोग अथवंबेद में ११, ७: १७ और 9२ ५, ७, 3. ३: 4 तेत्तिरीयसंहिता ३, ५. २. वाजसनेयिसंह्ििता ३५, ६, २०, ५. ३०,.६। अधिकतर -बेदिक साहित्य में धर्म का अर्थ है धार्मिक विधि' धार्मिक क्रिया), “निश्चित नियम!, आचरण निग्रम! जेसा कि इन भयोगों से स्पष्ट है

भपितु स्तोष महो धर्माण तविषीस्‌” १. १८७. “इममअस्मामुभये अक्ृण्वत धर्माणमर्शि विदथस्थ साधनम “आ प्र रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्छोक देवः कृणुते स्वाय धमणे ।” . .. #धर्मणा मिन्नावरुणा विपश्चिता वब्रता रज्षेथे असुरस्य मार्येया ।” ५. ६३, . . “द्ाावापृ्थिवी चरुणस्य धर्मणा विष्कमित्रे अनरे भूरिरितसा।” ६. ५४०, . “अचिक्ती यत्तव धर्मा युयोपिम मा नस्तस्मादेनसो देव रीरिषः ।? ७, 2१. ७. -'. “खनता धर्माणि” ३. ३. हे हु “अथमा धर्मा”? ३. १७, ' “तानि धर्माणि अथमान्यासन्‌” १०. ९०. १६

.... अंथववेद के निम्नलिखित मन्त्र सें धर्म का अर्थ 'पुष्प फक' प्रतीत होता है :-- क्‍

ऋतं सत्य तपो राष्ट्र श्रमो धमंश्र कम च। | . भूत भविष्यदुच्छिष्ट वीय छच्मीबरू जले ९. ९. १७।

. किन्तु आगे चलकर घम वर्णाश्षस की विधियों के समीप जाता है। उपनिषद्‌ काल में. घर्म द्वारा वर्ण और आश्रमों के आचारों एवं संस्कारों का स्पष्ट बोध

होता था यह तथ्य छान्दोम्यो पनिषद्‌ २. २३ से सिद्ध होता दै--

. म्रयों धर्मस्कन्धा यज्ञोअ्ध्ययनं दानमिति प्रथमश्तप एवँति द्वितीयों अह्यचा- याचायकुछवासी वृतीयोवत्यन्तमाव्मानमाचायकुलेड्वसादयन से एते पुण्य- श्कोका भवन्ति ब्रह्मसंक्यो 5म्नतत्वमेति ॥”

धर्म को जिस रूप में धर्ंशास्त्रों में--धमंसूत्रों ओर स्टतियों में वर्णित किया गया है उसके अन्तर्गत चार प्रकार के धार्मिक नियमों का निर्देश किया जा सकता

हैं; $. वर्णधर्म, २. आश्रमधर, ३. नेमित्तिकधर्म जेसे प्रायश्रित्त, ७. गुणधर्म, राजा के कत्तव्य

धरम की कुछ परिभाषाएं बहुत प्रचलित हैं जिनका यहाँ उल्लेख करना उचित होंगा। .._ “जोदनाछूक्षणो<थों धर्म” अर्थात्‌ वेद में बताये गये प्रेरक नियम और छक्षणश धर्म हैं, उन नियमों का आचरण ही धर्म का आचरण है। “>जेमिनि, पूर्यमीमांसासूत्र 3. ९:

20४ पा धर ५, पु 44 ' + ' १2 5 हा स्पि म्क हि] रे

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( १७ )

वशेषिकसूत्र में धर्म उसे माना गया है जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि होती हे--“यतोअभ्युदय निःश्ेयस सिद्धि घर: श्रुतिग्रमाणकों धर्मः हारीत, कुर्छूक, मनु० २. की टीका। श्रुतिस्मृतिविहितो धर्म:--श्रति और स्मृतिद्वारा विदित आचरण धर्म है ।--वसिष्ठघमंसन्र १. ७. ६। इन कतिपय परिभाषाओं से यही ज्ञात होता है कि सारतीय धर्म का मूल है बेद और स्मृति, ओर इनको प्रमाण मानकर विहित नियम यथा झाचार ही धर्म हैं। धर्म के हन उपादानों और आधारों पर विचार करना आवश्यक है

धर्म के उपादान--

धरम के उपादानों या स्रोतों का उल्लेख प्रायः नियमपू्॑क प्रत्येक धर्मसूत्र ओर स्मृति में किया गया है। गौतमधरमंसूत्र में यह स्पष्टलः कहा गया है कि वेद धर्म का मूछ है--“वेदों धर्ममूछम्‌॥। तद्विदा” स्मृतिशीले। आपस्तसम्बधम॑सूत्र-- “प्रमंसमयः प्रमाण वेदाश्च” १, १, १. २। धर्म को जानने वाले वेद्‌ का मम समझने वाले व्यक्तियों का मत ही बेद का प्रमाण है इसी प्रकार वसिष्ठधर्मसूत्र में भी, जिसकी धम की परिभाषा का ऊपर उस्लेख किया गया है, श्रुति और स्मृति द्वारा विहित आचरण-नियर्मों को धर्म माना गया है तथा उसके अभाव में शिष्ट जनों के आचार को प्रमाण माना गया हैं--

“श्रुतिस्मृतिविहितों धर्म'। तदलाभे शिष्टाचारः प्रमाणम्‌ | शिष्टः पुनरका- मात्मा | इसी प्रकार सुस्मति में वेद, स्मृति, वेदज्ञों के आचरण के अछावा अपनी आत्मा की तुष्टि को भी धर्म का मूल कहा गया है-- वेदो5खिलो धमंमुरू स्मतिशीले तद्टिदाम आचारश्चेब साधनामाथ्मनस्तुश्रिव च॥” २, याज्ञवल्क्यस्छृति! में उपयुक्त के साथ-साथ उचित संकल्प से उत्पन्न अमिकाषा या इच्छा को भी धर्म का भूछ स्वीकारा गया है :-- “अति: स्मृति: सदाचारः स्वस्थ प्रियमात्मनः सम्यक्संकल्पजः कामी धर्ममूलमिद स्खतम्‌ १. इस प्रकार धर्म के उपादान, स्रोत, मूल या प्रमाण स्वयं धमशास्त्रों की दृष्टि में ये हैं : १--वेदू, २--वेद से सिन्न परम्परागत ज्ञान अर्थात्‌ स्मृति, ३--श्रेष्ठ छोर्गों के आचार-विचार, ४--अपनी विवेकबुद्धि से स्वयं को रुचिकर छगनेवाला भाचरण और उचित संकल्प से उत्पन्न इच्छा

वेद और धमशास्त्रों पर इष्टिपात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्मशार्त्ों ..: में जो कुछ भी कहा गया है उसका आधार वेद ही है और वेद्‌ की मान्यताओं के...

अनुखार ही धर्मंसूत्रों के नियमों की रचना हुई वेद की संहिताओं में और ब्राह्मण-

ग्रन्थों में धर्मसूत्रों के विषयों का प्रसंगतः उल्लेख पचुर मात्रा में मिलता है, जसे

विवाह, उत्तराधिकार, श्राद्ध, स्ली की स्थिति आदि संहिताओं ओर ब्राह्मणों में गौ० भू?

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जिस समाज ओर सभ्यता का दर्शन होता है वह घर्मशासत्र की व्यवस्थाओं की व्यावहारिक पृष्ठभूमि है। आख्यानों सें भी नियमों का पोषण हुआ दिखायी पड़ता है, जिनका उपदेश धर्मशास्त्रों ने दिया है। ब्ह्मचर्य का महत्व, उत्तराधिकार और सम्पत्ति का विभाजन, यज्ञ और अतिथिसत्कार ऐसे ही विषय हैं, जिन पर धर्म॑सूत्रों खे पूव॑वर्ती बॉदक साहित्य में भी अनेक स्थरों पर विचार हुआ है। जेसा कि स० म० काणे ने कहा है: “कालान्तर में धमंशार्त्रों में जो विधियाँ बतलायी गयीं, उनका मूल बेदिक साहित्य में अच्षुग्ण रूप में पाया जाता है घर्म शास्त्रों ने वेद को जो धमं का मूठ कहा है वह उचित ही है ।”--धर्मशास्त्र का इतिहास, ४० ७, अनु० अ० काश्यप।

भारतीय धर्म का स्वरूप

भारतीय संस्कृति और विशेषतः धर्म पर सिन्न-भिन्न विचारकों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से दृष्टिपात किया है। कुछ ने इसके मर्म को समझा है तो कुछ ने इसके व्रास्तविक तत्त्व को जाने बिना अपनी आलोचनात्मक प्रतिभा का दुरुपयोग मात्र किया है।. वस्तुतः भारतीय धर्म या हिन्दू धर्मं को किसी एक विशेष शब्द द्वारा नहीं व्यक्त किया जा सकता। जान मेकेजी ने यह परामर्श दीक ही दिया है कि धर्म में 'रिंलीजन', 'वरच्य', छा, और डयटी, अंग्रेजी के इन चारों पर्दों का अर्थ समाहित समझना चाहिए। हिन्दू एथिक्स' नामक पुस्तक के प० ३८ पर वे कहते हैं :

-.. *गुह [09 0056 0898 ॥0 ०6४० तीडां[]दत0ण) ज़8 ता॥एा 8- फ़ह0ा) गराणबा बात जलीशंणाड तंप्राए, ए४82९, 0आा४0077"9 00$2"ए६॥९९ - बात ]8छ थांत तीक्षा& छ॥8 6 या जारंदा ए8४ 299॥60 ६0 ॥॥6 ए068 007०5 0 ड़ णी .ठग्रावाएं ही ज़रा उलाल्त 07 €8/89960.7 क्‍ ... परन्तु मेकेजी साहब का यह कथन अमपूण है कि हिन्दू ने धर्मं को अन्य सभी व्यवस्थित नियमों से प्रथक्‌ नहीं किया, मानो. ऐसा अज्ञानवश किया गया हो वस्तुस्थिति तो यह है कि हिन्दू धर्म में धर्म बहुत व्यापक रहा है। वह जीवन के विविध पत्तों के पार्थक्य को ज्ञानपूर्वंक समाप्त करता है। समन्वय उसका मूलमन्त्र है। मानवजीवन के चार पुरुषार्थ समन्वित होकर ही उपयोगी बनते हैं अछग- अलग नहीं हिन्दू धर्म कोरा आदरशंवादी नहीं है, अपितु वह व्यावह।रिक जीवन में वास्तविक और आदर्श का संमनन्‍्व॒य करता है। यह धर्म मनुष्य से भिन्न नहीं है, अलग नहीं है। यह उसकी मौलिक अहंता है, जिसके अभाव में मनुष्य मनुष्य नहीं रह जाता। पशु में ओर धर्महीन मनुष्य में कोई सेद नहीं रह जाता, अतः भारतीय धर्म मनुष्य के समूचे व्यक्तिश्व से सम्बद्ध है। वह उसके छोटे-छोटे कार्यों पर भी दृष्टिपात करता है और उनका नियमन करता है। मलुष्य को अस्थेक स्थिति ओर अवस्था के परिप्रेचय में देखता है--सुख में, दुःख में, समृद्धि में और विपत्ति में भी। उसके सामाजिक, पारिवारिक, वेयक्तिक और पारछौकिक जीवन

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पर विचार करता है। भारतीय घर्म मनुष्य से संबद्ध सभी बातों पर इस प्रकार इृष्टिपात करता है और उन्हें इस प्रकार व्याप्त करता है कि सम्पूर्ण जीवन धमंमय प्रतीत होता है। संस्कारों की शछ्ुुछा रेलगाड़ी की पटरी की तरह बनायी गयी है, जिससे जीवन की गाड़ी उतरने पर अनर्थ ही होता है। मानवजीवन की अवधि में भिन्न-भिन्न अवस्था में उस अवस्था के उपयुक्त आश्र्मों का विधान संस्कारों की व्यवस्था को और भी पुष्टि म्रदान करता है

धर्म का जीवन के साथ तादाक्‍््य इतना स्पष्ट है कि पाश्राव्य विद्वान भी भारतीय धर्म के इस अनूठे स्वरूप से प्रभावित होते हैं। ओ० माक्स म्यूहलेर ने इस रूप को सही ढंग से समझा है और अपना विचार व्यक्त करते हुए छिंखा है “आचीन भारतचासियों के छिए सबसे पहले धर्म अनेक विषयों के बीच एक रुचि का विषय नहीं था, यह सबका आदस्सापंण करने वाली रुचि थी | इसके अन्तर्गत केवछ पूजा और प्रार्थना जाती थी, परन्तु वह सब भी जाता था जिसे हम दर्शन, नंतिकता, कानून और शासन कहते हैं--सभी धर्म से व्याप्त थे उनका सम्पूर्ण जीवन उनके लिए एक धरम था और दूसरी चीज़ें मानो इस जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के लिए निर्मित सुविधा मात्र थीं ।”? --ह्वाट केन इण्डिया टीच अस, प्रू० १०७।

“धर्मो रक्षति रक्षित:” घर की रक्षा करने पर धर्म मनुष्य की रक्षा करता है। धर्महीन उच्छुछुछ जीवन विनाश ओर विक्रिया की ओर ही ले जाता है। जीवन को एक उद्देश्य प्रदान करता है, उसे एक सुनिश्चित मार्ग प्रदान करता है, जिस पर चलकर आदमी अपना विकास कर सकता है, जीवन के कतंथ्यों का पान कर सकता है साथ ही इस जीवन से परे दूसरे जीवन को स्पृद्या से प्रेरित होता है परलोक की यह स्पृह्य कल्पना की तरंग में बहते हुए कवि की कृति नहीं, वास्तविक जीवन की अनुभूति की अभिव्यक्ति है। इसी पारकौकिक स्पृह् को कवि वर्डस्वर्थ ने इन शब्दों सें व्यक्त किया है--

“(8086 658४778 तृप्घ०४४०7रा7 88 (2 82086 870 0प्रा्च॥&6 28, ' #शप्2्र 000 05, ए887स्‍725, - खवाएर ऐरांइशाएा 28 0 8 268प2 ०ए॥8 89006 श0]05 ॥0॥ ए०848९0.”

माक्स स्थूल्लेर ने भारतीय चरित्र की विशेषता यह बतायी है कि वह पार-

लछोकिक होता है: “यदि मुझसे एक शब्द में भारतीय चरित्र की विशेषता बताने... को कहा जाय तो मैं यही कहूँगा कि वह पारलोकिक था ।"--“भारतीय॑ चरित्र में... इस पारलोकिक मनोक्ृत्ति ने अन्य किसी देश की अपेक्षा अधिक प्राधान्य प्राप्त

किया ।”--हाट कैन इण्डिया टीच अस, एृ० १०४, १००। भारतीय घम और दर्शन एक दूसरे से एथक नहीं हैं अपितु एक हीं चस्तु के... दो पहलू हैं यद्यपि इन दोनों में इतना अन्तर अवश्य होता है कि धर्म में विश्वास

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और भावना मुख्य होती है जबकि दशशन में विचार और तक प्रमुख होते हें। भारतीय धर्म का दर्शन एवं नीति से कितना अनोखा सम्बन्ध है इसे हम आचार की महत्ता पर विचार करते समय देखेंगे। धर्म के साथ अर्थ, काम, मोक्ष का समन्वय भारतीय जीवन का उद्देश्य है और इस कारण यह धर्म सन्तुलित रूप में आदर्शंवादी है और यथार्थवादी भी, छौकिक है और पारलीकिक भी, आध्यात्मिक है और भौतिक भी। वह आचरण की वस्तु है। आधार उसका मुलाधार है। उसकी नींव गहरी है और उसके कुछ मौलिक तत्त्व हैं जो उसे स्थाग्रिव्व अदान करते हैं। एक पाश्चात्य आछोचक ने इसी बात का संकेत इन वाक्यों सें किया है :--“भारत का आध्यात्मिक इतिहास उसके अत्यन्त मौलिक विचार से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध है ओर यह बात सोची भी नहीं जा सकती कि इस प्रकार की संस्कृति जो हजारों वर्षों से भारत में फूछती-फलती रही है, इतनी गहरी जड़ों पर आधारित होती और स्वयं को इतनी दृढ़ता से बनाये रखती अगर इसमें महान्‌ एवं चिरस्थायी मय वाले तत्व निहित होते ।”

भारतीय धर्म में मानवीय प्रतिभा के एक विकसित रूप का उपयोग दिखायी देता है, उसमें मानजीवन की अनेक समस्याओं पर भमलीभाँति विचार करके

व्यवस्था दी गयी है। माक्स म्यूह्लेर ने भारतीय धर्म और संस्कृति की उपलब्धियों

का इन शब्दों में उल्लेख किया है :--

“ग/] एल 4४:०० प्रातः जाता ह८ए 8 गिगागलक्षा गर0 ॥98 7 56९ए९०७९७१ 8४०गा6 7ती 78 ीठा66४ 288, 88 7090 6९९७ए 9000067८व९ँं 07 !6 शादवा8०४0 970)ाशार ०ी 86, 8200 ॥8$8 शग्रात॑ इ0ीप्रांणा३8 0 806 0फाशा ज़ाांगी ज़छ (65९०"ए82 ही8 (ए000ा, 6ए९७॥ (098 ए0 ॥8ए०#प्ठ€त ए]॥० बात 787--ं ॥ञ०णव एज! 0 ॥0ा4.7

“ीत9/ 087 7709 7९७४० 08 7-0: आचार इस धर्म का मल है और धर्म के ज्ञान के साथ उसका अनुष्ठान और व्यवह्दार ही उसके वास्तविक प्रयोजन को सिद्ध करते हैं। गोतमधमसूत्र के शब्दों में--

“धरम्मिणां विशेषेण स्वग छोक धर्मविदाप्नोति ज्ञानाभिनिवेशाभ्याम” इस धर्म का शाश्वत सन्देश है

“घर्म॑ चरत मा धर्म सत्यं बदत मानृतम्‌

दी्घ॑ पश्यत मा हस्व॑ पर पश्यत मापरम्‌ वसिष्ठ ध० सू० धर्म का आचरण करो, अधर्म का नहीं। सत्य बोलो, झूठ मत बोछो दूर तक देखो, संकुचित दृष्टि मत रखो, हीन वस्तु देखकर अपना विचार हीन मत बनाओ श्रेष्ठ वस्तु को देखो ओर जीवन का रूच्य सदा ऊँचा से ऊँचा बनाये रखो

आचार ओर नतिक भावना

. भारतीय संस्कृति का मछ भाधार है आचार। आचार के आधार पर ही हिन्दू समाज का निर्माण हुआ था और जब तक व्यावहारिक जीवन में इस आधार को

्ध कम तु के 5: ध् कर: अंक -क अ+ 3 | 8 इस जा 5 0५ न्‍् छाप बज, >डोढे जब 5 30 >-- ७5: + 8:७८ ४४४ ४५४४४४३255२#-+ ५७३.४-६७ ४७ ०--०४5६५ ५८ ०८.२... ७-5 «5

सडक अ-स ६)

7 यारा यार सार जाए शत कार पमिदयाकात पका, क? सता सा मारपम्यााागाईी विज नयोनार मदन पाया पी शक या ययपामकग पद ्ााापमलपुपमपभापगाधी या ४०० मय परम णपभभपपममाार पाप रु०॥७७/४१९७७७६३३४००४एकिनियेकननकी कक कर करे: जज %

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( २३ 2

प्राधान्य सिला तबतक सम्ुन्नति तथा समृद्धि का समय बना रहा। धर्म का व्या- वहारिक पहलू है आचार और इसी कारण इसे परम धर्म भी कहा गया है, धर्म की आधारशिला कहा गया है :

“आचारः परमो धमः सर्वेघामिति निश्चयः

हीनाचारपरीतात्मा प्रेत्य चेह नश्यति ॥--वसिष्ठध्मसूत्र ६।

आचार से हीन व्यक्ति के किए छोक में कोई सुख नहीं है और उसे दूसरे लोक सें भी सुख की प्राप्ति नहीं होती कोई व्यक्ति वेद और शास्त्रों के ज्ञान में भछे ही पारंगत हो यदि भणाचार से भ्रष्ट है तो सम्पूण धर्मज्ान उसे कोई छाभ नहीं पहुँचाते और आनन्द ही देते हैं जेसे जन्धे के हृदय में उसकी सुन्दर प्रियतमा भी कोई सोन्दर्यानुभूति का सुख उत्पन्न नहीं करती

आचारहीनस्य तु ब्राह्मणस्य वेदाः षडद्भास्व्वखिलाः सयज्ञाः

का प्रीतिमुत्पादयितुं ससर्था अन्धस्य दारा इव दशनीयाः वही, ६।४ इस प्रकार धर्मशासत्रकारों का आग्रह आचार के श्रति बराबर रहा है ओर वे आचार को सम्मान, दीघ जीवन और सुख का कारण मानते हैं। *

आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः

आचाराद वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम्‌ ॥। और आचार की इसी महिमा के कारण ही सदाचार को धर्म का साधन माना गया है, जेसे वेद और स्मृति को। “वेदः स्थृतिः सदाचारः. स्वस्य प्रियमात्मनः ।” सम्पूर्ण ज्ञान का' उपयोग है उस ज्ञान को आचार में परिणत करना। इसी कारण भारत का दाशनिक कोरे चिन्तन में समय नहीं गंवाता। वह अपने जीवन को अपने दर्शन के अनुरूप ढाछता है और आदर्श प्रस्तुत करता है। दर्शन और आचारशासत्र था नीतिशासत्र का परस्पर अन्योन्याश्रय संबन्ध रहा है और यह संबन्ध वेसा ही रहा है जेसा कि “विज्ञान और अयोग का, ज्ञान और ,योग का ।” एक ओर धर्म का मूल आधार है नीति और दूसरी ओर नीति दर्शन का व्यावहारिक पक्ष है, इस प्रकार धमं, दर्शन और नीति एक दूसरे से अप्रथक्‌ हैं, वे एक दूसरे पर निभर हैं और एक दूसरे के पूरक भी हैं। इसी बात का उक्लेख जान केभड ने 'एन इण्टोडक्शन टू फिलासाफी आफ रिलीजन' पुस्तक सें किया है ;-- | ष्

“पताबा 99080एगी08 क्षा्व पतएशर$ व4ए8 ०एला १6टीबास्य शिक्षा

पल 9॥05079॥7ए ॥ाव॑ €फ्ांट४ 7200 378 गरा।शः-7०फुथआत०70, ढा6 ढद्ा 56 ४80 7शा[€०पधा!ं 87096 ज़रांगिणएा 8 709ए ०0०ए॥४०१ ]86. 470 58 8 2009 कृचा08०कश' & 7870 शा0प्रोा6 98 72808, ग्रणाव बात 8000 ०076 प6.7 मा भारतीय धर्म या दर्शन में केवल नेतिक भावनाओं का. प्रतिपादन ही नहीं.

किया गया है, अपितु वास्तविक जीवन सें उनकी अभिव्यक्ति प्रस्तुत की गयी है...

ये ति है हे हर हरे | और इस अभिव्यक्ति का मनौवेज्ञानिक जाघार भी गतिस्थापित, किया. गया हैं॥

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इन्हीं नतिक भावनाओं के सन्दर्भ में मेकेजी जसे आलोचनाव्मक इष्टि वाले ठेखक ने भी यह स्वीकारा है कि इनमें ऐसे तत्त्व निहित हैं जो स्वतः इतने मूल्य के हैं कि वे विश्व के विचार और संस्कृति को सम््धू कर सकते हैं

“जाल 799 ठंक्याए 70 ता एप 679 ०00ग्राधथा। लैुढागालाड ज़ए 878 0 शाल्या ए!व6 था श४7820ए6०3, 2706 ज़रांएा 7789 ४४००४ [0 ०70०7

॥6 ॥002९॥/ 870 ०0॥रपा8 6 ए०१0,7 “>> गया।!।ता 800708, 9 247,

वस्तुतः आचार वह कसौटी है जिस पर व्यक्ति की योग्यता और अरहां को आकलन होता है। चरित्रहीन विद्वान की विद्वत्ता फीकी होती है और शीलहीना सुन्दरी का सोन्दर्य केवक निम्नकोटि के विचारों को उत्तेजित करता है, आत्मिक सन्‍्तोष का बोध नहीं कराता ऊँचे पद पर आसीन और परो पदेश में कुशल व्यक्ति का छुल्नव्यापार एवं अनेतिक आचरण जब शकाश में आता है तो दुनिया की आँखों में धूछ झोंकने की उसकी सारी चारों पर पानी फिर जाता है। आचार और ज्ञान का समन्वय तथा परस्पर समायोजन ही हमारी नेतिक भावना का पहला सूत्र है, जिसने महान्‌ दाशनिकों एवं अलौकिक अतिभा और प्रभाव वाले पुरुर्षो को जन्म दिया है। भारतीय नीतिशास्त्री जब किसी नियम का विधान करता है तब वह उसे मानव के यथार्थ जीवन के सन्दर्भ में परख लेता है और मानव की स्वाभाविक कमजोरियां को भी ध्यान में रखता है। हरेक अवसर पर वह मनोविज्ञान के अनुसार मनुष्य के आंचरण में उत्कर्ष छाने की व्यवस्था करता है। वह जानता है कि गरूती मनुष्य से होती है, मनुष्य पतनोन्मुख होता है, यह स्वथा स्वाभाविक है किन्तु इन अवृत्तियों से दूर होने में ही वह मांनवकल्याण की संभावना देखता है और इसी लिए धर्म की व्यवस्था करंता है, जिसके अभाव में मनुष्य और पशु में कोई भेद नहीं रह जाता। मनु ने इसी का संक्रेत किया है

' “न मांसभक्षणे दोषोन मद्ये मथने। प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला।”

यंही नहीं भारतीय धम में केवल मनुष्यों को अपितु देवताओं तक को अनतिक आचरण की ओर उन्मुख दिखाया गया है ओर उनके लिए भी आचार की पवित्रता को सर्वोपरि बताया गया है। भारतीय आख्यानों में इस बात को सवतन्र प्रमाणित किया गया है कि सारी बातें एक ओर हैं और मनुष्य का आचार एक ओर, इसी आधार के कारण निम्नकोटि का व्यक्ति भी ईश्वर के तत्त्व का दरशन कर सकता है, *उच्चवर्ण के व्यक्ति को शिक्षा दे सकता है। इसी आचार के अभाव में महर्षि की तपस्या भी व्यर्थ हो जाती है और वह सामान्य व्यक्ति की तरह पाप का भांगी होता है। जिस वण्णव्यवस्था की सम्प्रति मुक्तकण्ठ से निन्‍्दा करना हमारा कतंव्य है और 'जो निरंचय अच्छी नहीं है, वह भी मूल रूप में आचार के आधार पर ही थी।

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जिस समय उसने आचार का विवेक छोड़कर केवल पद और कुछ को आधार बनाया तब से वह अपनी अच्छाइयों से वियुक्त हो गयी। जब पद के अनुसार सम्मान प्राप्त होने रूमता है, आचरण और योग्यता के अनुसार नहीं तब स्वाभा- विक है कि उस पद पर पहुँचने के लिए तो योग्यता की कोई इच्छा या प्रयत्न करेगा और उस पद को प्राप्त कर छेने पर अयोग्य या आचारहीन व्यक्ति योग्यता की चर्चा होने देगा, उक्टे वह ऐसी व्यवस्था करेगा कि उसका पद सेव सुरक्षित रहे इसके छिए वह धर्मं के नाम पर अपने चारों ओर कटीछे तारों की दीवार खड़ी करेगा ऐसी ही व्यवस्था का रूप वर्णब्यवस्था ने छे छिया।

धमंशासत्र की दृष्टि में आचार का इतना महत्व है कि आचारह्दीन पिता तक का परितध्याग करने का आदेश दिया गया है : |

“स्यजेत्पितर' राजघातकं शूद्रयाजक शूद्राथयाजक वेद्विप्नावक अणहन यश्रान्व्यावसायितिः सद्द संवसेदन्त्यावस्रायिन्यां वा।” ३, २. १. 9० २०७

ऐसे व्यक्ति के सामाजिक अपमान का विधान भी इसी बात का संकेत करता है कि आचार से च्युत व्यक्ति को समाज में सामाजिक जीवन व्यतीत करने का अधिकार नहीं है। उससे भाषण या संबन्ध करने वाले व्यक्ति को भी दुराचार सें प्रोत्साहन देने के छिए द॒ण्ड की व्यवस्था की गयी है, किन्तु उसके ग्रायश्रित्त कर छेने पर तथा अपना आचरण सुधार लेने पंर पुनः समाज में प्रवेश करने का द्वार खोल दिया गया है। _ क्‍ पाप और प्रायश्रित्त की धारणा के पीछे भी आचार के अतिरिक्त और क्या हो सकता है? समाज में जीने ओर दूसरों को जीने देने का मन्त्र ही इस लोक में कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है हमारे घमंसूत्र में व्यक्ति को पर्याप्त महरंव मिला है। किन्तु इस महत्व की शर्त है कि वह आचार या धर्म का पान करे। यदि वह आचार का उल्लक्ून करता है तो उसे जीने का अधिकार नहीं, उसे पाप से तभी भुक्ति हो सकती दै जब वह ग्रायश्रित्त करे, अर्थात्‌ पाप गम्भीर हो तो जीवन का अन्त कर दे, क्योंकि ऐसा व्यक्ति समाज के अन्य लोगों के लिए एक बुरा उदाहरण शस्तुत करेगा। हमारा धमंसूत्र कहता है कि इस संसार में मनुष्य बुरे करई्मो से पाप से सन जाता है: “अथ खल्वय पुरुषो याप्येन कमंणा लिप्यते' ** ३. १. २. | और तब मनुष्य के ये कम स्थायी फल उत्पन्न करते हैं। पाप और प्रायश्वित्त का विचार धमंसूत्र में नितान्त भौतिक या व्यावहारिक है इनका सीधा

संबन्ध शरीर की यातना से है किन्तु पाप करने वाला साधन भी तो शरीर ही है।

साथ ही साथ ग्रायश्रित्त की मनोवेज्ञानिक पृष्ठभूमि यह है कि जप और दान तो

साज्षात्‌ उत्तम विचार और परोपकार की शरणा देते हैं। पाप का अकाशन और पश्चाताप भी हो जाता है। तप, उपवास और होम धर्म में आस्था उत्पन्न: करके पुनः उत्तम आचरण की प्रेरणा देते हैं किन्तु यह मानना पढ़ेगा कि -धर्म- सूत्रकार का प्रायश्रित्त का विधान करते समय साक्षात्‌ प्रयोजन है लोक और

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'प्रछोक की प्राप्ति। वह छोक की अपेक्षा परछोक की अधिक परवाह करता है और सभी छौकिक कर्मो को इस किए करने का आदेश देता है कि उनसे परकोक मिलने की संभावना है। यह घर्मभीरुता और ईश्वर या परकोक का भय मनुष्य के जाचरण को निरन्तर सही दिल्ञा की भोर प्रेरित करता रहा है, किन्तु हम धर्मसूत्र में देखते हैं कि पाप-प्रायश्रित्त और अपराध-दण्ड की नेतिक भावनाओं के ऊपर भी वर्ण का विचार हावी हो जाता है। यदि कोई फ्रोध में जाकर ब्राह्मण के ऊपर हाथ या हथियार उठाता है तो वह सौ वर्ष तक स्वर्ग नहीं पाता, यदि उस पर अहार कर देता है तो वह एक हजार वर्ष तक स्वर्ग पाने से रह जाता है। उसके प्रहार से ब्राह्मण का खून बहे तो उसके खून से जितने रजकण भींगते हैं 'उतने वर्षों तक वह स्वर्ग नहीं पाता “अमिक्रुद्धावगोरणं बआह्मणस्थ वर्षशतमस्वग्यम्‌ निधाते सहखम्‌ लोहितंदर्शने यावतस्तप्पस्कन्ध पांसून्संगह्लीयात्‌॥ ३. ३, २०-२२

जानबूझकर ब्राह्मण की हृप्या करने वाला झृत्यु का भागी होता है। उसे कठोर : झ्रायश्रित्त करना होता है। किन्तु यदि वह ब्राह्मण की प्राणरक्ञा करे या उसके धन की रक्षा करे तो वह पाप से छूट जाता है: “प्राणछामे वा तक्निमित्ते ब्राह्मणस्य” ३. ४७. ७। ब्राहण की हत्या का असफल प्रयत्न करने पर भी वह्दी पाप और आयश्चित्त होता है जो उसके वध का तथा ब्राह्मण की पत्नी के गर्भ का नाश करनेपर 'भी वही पाप होता है। किन्तु दूसरी ओर अन्य वण के व्यक्तियों के वध पर पाप कम होता है। शूद्ध की हत्या का तो यही प्रायश्रित्त है कि साल भर ब्रत करके दश गाय और एक सांड का दान कर दे बस पाप से छुटकारा मिल जाता है। जितना “पाप एक गाय-के वध का होता है उससे भी कम पाप शूत्र के वध का होता है। -शाय का वध वेश्य के वध के बराबर बताया गया है और इसी प्रकार मेढक, नेव॒ला, कौआ, कृकलास, चूहा; छुछुन्द्र के पंक साथ वध का पाप भी शूद्व के वध के पाप से बढ़कर होता है। विना अस्थिवाछे एक सहख्र जीवों का वध भी शूद्ध के बध से अधिक पापयुक्त होता है। ३. ४. १८-१९ |

इसी प्रकार. अन्य पापकर्मों और उनके आयश्वित के विषय में भी घारणाएँ ' कुछ असंगतिएुर्ण हैं। कुल मिलाकर पाप से विरक्ति का ध्येय बनाया गया है और निरन्तर इस बात का ध्यान दिया गया है कि आयश्रित्त का भय दिखाकर पाप से .दूर करने का उपाय किया जाय , अपराध ओऔर दण्ड की नंतिक भावना भी धरममसूत्र सं सत्र व्याप्त द्वे और उसके सन्दर्भ में भी बहुत कुछ वेसी मान्यतायं हैं जेसी पाप और आयश्नित्त के विषय में | समाज में राजा इसी लिए होता है कि वह धर्मंभ्रष्ट छोगों को दण्ड देकर “उन्‍हें सही मार्ग पर ले आवे : “चलतश्चेतान्स्वधमे स्थापयेत्‌” २. २. १० घ्मसूत्र में आयः विवेचितं अपराधों सें अधिकतर सामान्य व्यवहार, चोरी, दूसरे के साथ “छुछ, और व्यभिचार के अपराधों का उद्लेख है। अपराध के लिए दण्ड की ध्यचस्था -में भी अपराधी के वर्ण का विचार सर्चोपरि जाता है, यद्यपि धर्म या कानून के

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सामने सभी बराबर हैं तथा अपराध, अपराधी की शक्ति ओर अपराध में उसकी प्रवृत्ति का विचार करके दण्ड देना चाहिए; इस बात का उद्धोष सिद्धान्त के रूप सें किया गया है: “पुरुषशक्त्यपराधानुवन्धविज्ञानदण्डविनियोरः ।”? २. ३. ४८। यही नहीं यह भी कहा गया है कि उच्चवण का व्यक्ति यदि अपराध करता है तो उसे अधिक दण्ड देना चाहिए, यह स्वाभाविक भी है। जेसा कि हरदत्त ने अपनी टीका में कहा है, यदि अन्धा व्यक्ति कुए में गिरता है तो वह दया का पान्न होता है दण्ड या ताड़ना का भागी नहीं होता इसी प्रकार धर्म के मम को समश्नने वाला अपराध करता है तो स्वश्ावतः उसका दोष गुरु होता हे। “निषेधदोप॑ जात्वाउपि प्रव्तमानस्य दोषाधिक्य भवति अजानतस्त्वन्धकूपपतनवदलुग्रद्दी 5- स्त्रि!"इसी कारण धमंसूत्रकार गौतम ने यह कहा है कि शूद्र यदि चोरी करे तो उस घन का आठ गुना दण्ड होता है और उससे उच्च वर्ण का व्यक्ति उत्तरोत्तर दुगुना दफ्ड का भागी होता है “द्विंगुणोत्तराणीतरेषां अतिवर्णस्‌ ।” किन्तु यह विषय का केवल एक पहल है। दूसरी ओर वर्ण की विचारणा इतनी प्रमुख हो जाती है कि एक ही अपराध के लिए ब्राह्मण को कोई दण्ड नहीं मिलता जब कि शुद्ध को अंगर्भंग और म्त्य तर का दण्ड भोगना पड़ता है। उदाहरण के लिये यदि शूद वाणी से किसी उच्चवर्ण वाले अर्थात द्विंत्ञाति का अपमान कर लेता है तो उसकी जीभ काट लेने का दण्ड बताया गया है और यदि शरीर के किसी अन्य अंग से प्रहार करता है तो उस अंग को काट लेने का दण्ड है।

.. “शुद्रों द्विजांतीनमिसंधायासिहत्य वाग्दण्डपारुष्याभ्यामंगमोच्यो येनो- पहन्यात” २. ३, १.

इसी प्रकार यदि शुद्ध किसी उच्चवर्ण वाली स्त्री के साथ व्यभिचार करता है तो उसकी जननेन्द्रिय कटवा लेने का दण्ड है और यदि वह उस ख्त्री का रक्षक नियुक्त किया गया हो तो इस अपराध के लिए उसको वध सी हो सकता है | आगे हम देखेंगे कि इसके विपरीत इस प्रकार के दण्ड के लिए उच्चवर्ण के व्यक्ति के लिए कोई दण्ड नहीं था, कुछ मामूली प्रायश्रित्त ही थे दण्ड के विषय में सबसे बढ़ा अन्याय तो वहाँ दिखाई पड़ता है जब शूद्ध के कान में वेदसन्त्र पड़ने के अपराध में उसके कान में शीश्ा और जस्ता भर देने का नियम है. और यदि वह वेदमस्त्र का उच्चारण करता है त्रो उसकी जीभ काटने का दण्ड है। यदि वह मन्त्र घारण करता है तो उसके शरीर को काट लेने का दण्ड बताया गया है। “अथ हास्य वेदसुपश्वण्वतस्त्रपुजतुम्यां श्रोत्रप्रतिप्रणमुदाहरणे जिह्नाच्छेदो घारणे शरीरभेंदः ।” इसके विपरीत यदि बाह्मण शूद्र का तिरस्कार करता है तो कोई दण्ड उसे नहीं मिलता ब्राह्मण के बारे में तो यह घोषणा कर दी गयी है कि, “न शारीरो' ब्राह्मणदण्ड:ः २, ३, ४३ ब्राह्मण को कोई शारीरिक दण्ड नहीं मिरूना चाहिए बड़े से बढ़े अपराध, गुरुपल्लीगमन और सुरापान जेसे महा अपराध के लिए सी _ उसे देश से निष्कासित करभे का दण्ड सात्र है। धर्मसूत्र में अपराध और दण्ड विषयक इन मान्यताओं के सन्दर्भ में मेकेंजी का यह कथन ठोक ही प्रतीत होता

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है कि दण्ड का निर्णय अपराध के बाहरी पहलू के आधार पर किया गया है, आन्तरिक पहलू के आधार पर नहीं

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+>ग्रागविप 78708, (0. 56 चोरी एक बहुत बड़ा अपराध है और उसके लिये झूत्यु भी दण्ड के रूप में मिलती है। चोर के लिए यह प्रायश्रित्त बताया गया है कि वह मूसक हाथ में लेकर राजा के समीप जाकर अपना अपराध बतावे और राजा उसी मूसल से मारे, यदि उससे उसकी रूत्यु हो जाती है तो वह पाप से छूट जाता है। २, ३. ४० और राजा चाहे तो छोड भी सकता है. किन्तु ऐसी स्थिति में राजा स्वयं पाप का भागी होता है। अतः यह स्पष्ट कहा गया हैं कि अपराधी पर दया नहीं करनी चाहिए। यहाँ एक बात उल्लेखनीय है कि धमंसूत्र में अपराध के निर्धारण में संगति और.एकरूपता नहीं है जेसे चोरी के लिए दो प्रकार के दण्ड बताये गये हैं एक तो आर्थिक दण्ड है और दूसरा प्रायश्रित्त के रूप में मृत्युदण्ड। चोर को सहायता देने वाछा भी चोर के समान अपराधी होता है! “चोरसमः सचिवों मतिपूवः” और अधम से धन ग्रहण करने वाला बेईमान व्यक्ति भी चोर के समान अपराधी होता है। अपराध और दण्ड के सन्दर्भ में घर्मसूत्रकार कभी तो अपराध से घृणा के सिद्धान्त से चलता है तो वह कभी अपराधी से घृणा को अपने निर्णय का आधार बनाता है। कुछ मिलाकर वह नेतिकता के एक सेद्धान्ति और व्याव- हारिक विचारभेद के संघर्ष में पढ़ा हुआ प्रतीत होता है

.. सत्यभाषण और सत्य आचरण का नेतिक नियंम भी पांप और प्रायश्रित्त एवं अपराध और दण्ड के समान धर्मसूत्रकार के विवेचन का विषय है.। सत्यभाषण के महत्त्व को धमंसूत्र अत्येक अवसर पर जोर देता है। संत्यभाषण अह्मचारी का प्राथमिक नियम है “सत्यवचनम्‌” १. २. १३। सामान्यतः मनुष्य को सत्यवचन वाला और सत्य स्वभाव वाला अर्थात्‌ ईमानदार होना चाहिए। “सत्यधर्मा” १, ९५. ६८। संव्यभाषण से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और असत्य बोलने से नरक मिलता है : “स्वर्ग: सत्यवचने विपयंये नरकः” २. ४७. ७। सत्यभाषण एक महान्‌ तप है, वेसे ही जेसे अह्चयं एक महान्‌ तप है। ३. १. १५। असत्यभाषण से होने वाले पार्षों के विषय में भी धमंसूत्र का विवेक विछक्षण है। असत्यभाषण का पाप उस व्यक्ति या वस्तु के अनुसार होता है जिसके सम्बन्ध में झूठ बोछा जाता है। यहां भी वस्तु या व्यक्ति की योग्यता के आधार पर या उपयोगिता के आधार पर पाप बताये गये हैं। छोटे पशुओं के विषय सें न्‍्यायव्यवहार होने पर झूठ बोलने से पाप नहीं होता। यदि साक्षी के झठ बोलने पर किसी व्यक्ति का वध होता हो तो साक्षी को उस जाति के एक हजार मनुष्यों के वध का पाप लगता है २. ४. १५। भूमि के विषय में असत्य बोलने पर तो सम्पूण मानव जाति के वध का पाप होता है। इसी प्रकार जल के और मेथुन के विषय में असत्य बोलने पर भी

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पाप लगता है। किन्तु इन सब नियर्मों के बावजूद यदि असत्यभाषण से किसी प्राणी की रक्षा होती हो तो झठ बोलने का दोष नहीं होता--“न तु पापीयसो जीवनम” २, 9. २५। इसी प्रकार विवाह, मेधुन और उपह्ाास में तथा रोगी व्यक्ति को सान्व्वना देने के लिए झूठ बोला जाय तो कोई पाप नहीं होता--“विवाह- मैथुननर्मातसंयोगेष्चदो षमेकेडनृतम्‌”” ३. ७. २९। किन्तु गुरु के विषय में तो कदापि असत्यभाषण नहीं करना चाहिए। असत्यभाषण के छिए तीन दिन-रात के बत का भी नियम है ३. ७, २७। इसी प्रकार क्रोधी, अत्यन्त प्रसक्ष, भय से आकुछ, रोगी, छोभी, बाकक, अत्यन्त बुद्ध, मूढ, मत्त और उन्मत्त व्यक्ति के बचन यदि असत्य हों तो भी उनसे कोई पाप नहीं होता १. ५. २०१ संभवतः धर्मसून्नकार मनो- वेज्ञानिक कारणों को दृष्टिगत करके ऐसी स्थिति में असत्य भाषण को अपराध नहीं मानता। सत्यभाषण की यह नेतिक भावना भी सन्‍्तुलित दिखाई पढ़ती है, भले ही उसके तुलनात्मक अपराधों के विषय में कुछ असंगति इृष्टिगोचर होती है।

सत्यभाषण के साथ-साथ शुभवचन एवं दूसरों को कष्ट देने वाले वचन बोलना आचार का एक अनिवारय जद्भ है। वाणी का संयम आवश्यक है: वाकचच्षुः कमंसंयतः ९. ३. १६। शुद्ध के लिए भी सत्यभाषण का आदेश है: “तस्यापि सत्यमक्रोधो शौचम” २. १. ५२।

सत्यभाषण की तरह अहिंसा की धारणा भी धमंसूत्र में कुछ नये रूप में आती है। भारतीय संस्कृति के “जिओ ओर दूसरों को जीने.दो” या “आत्मनःप्रतिकूछानि परेषां समाचरेत” की भावना ही अहिंसा की नेतिंक व्यवस्था को धर्मशास्त्रीय आचारव्यवस्था में बार-बार दुहराती है, किन्तु साथ ही साथ घर्मसूत्र में अहिंसा के विषय में भी कुछ विलक्षणता पायी जाती है | वेदिक कार्यों के लिए तथा अतिथि के लिए पशु का वध धर्मं्समत है--वध्याश्च धर्मार्थे ९. ८. ३७। इसी प्रकार युद्ध में की गयी हिंसा का कोई पाप नहीं होता : “न दोषो हिंस्यामाहवे” किन्तु युद्ध में भी दुबंछ, भीरु, कमजोरी बताने वाले विपक्षी का वध करने का आदेश है। युद्ध की हिंसा छोक की रक्षा के लिए होती है अतः वह विहित है, पाप का कारण नहीं है। गौतमधर्मसूत्र १. ९. ७३ में कहा गया है कि मनुष्य को नित्य अहिंसाशील, झदु, अर्थात्‌ सहिष्णु, या क्षमाशील होना चाहिये, दढ़निश्चयी, संयमी और दानशील होना चाहिये। मनुष्य के ये प्रमुख गुण हैं और उनमें अहिंसा मुख्य है “नित्यम- हिंखो मदुृद॒ढकारी दमदानशीलः बह्मचारी के लिए हिंसा करने का स्पष्ट आदेश है १. २. २३ अहिंसा के प्रति धर्मसूत्र के विछत्षण दृष्टिकोण का आभास पाप और आयश्वचित्त के सन्दर्भ में मिलता है। मनुष्यों की हत्या से पाप होता है किन्तु उस पाप का अनुपात हत व्यक्ति के वर्ण के अनुसार होता है। सामान्यतः पशुओं का वध करना पाप का कारण बताया गया है किन्तु बह पाप उनकी उपयोगिता और आकार के अनुसार कहा गया है। सबके लिए प्रायश्रित्त का विधान है। धमसूत्र की दृष्टि में वेश्या के वध का कोई पाप या प्रायश्चित्त नहीं होता और इसी प्रकार नपुंसक की हत्या का पाप केवछक एक आदसी से चलने छायक पुआल का दान कर देने पर छूट जाता है। मांसभक्षण का भी पूर्णतः निषेध नहीं किया गया है, परन्तु

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मांसभक्षण के लिए हिंसा निन्द्ति बतायी गयी है। अनेकानेक पत्षियों एवं मछलियों के भक्षण को विहित किया गया है ( २. ३. ३५) जिनके भक्षण के लिए हिंसा आवश्यक है इसमें सन्देह नहीं। मांसभज्षण तो संन्‍्यासी भी कर सकता था। १. ३. ३० इस प्रकार धर्मसूत्र में अहिंसा की नेतिक भावना मांसभक्षण के निषेध तक सीमित नहीं है। हिंसा सामान्यतः निन्दित है किन्तु व्यवहार में उसका कठोर पाकन नहीं दिखाई पड़ता दया, परोपकार, क्षमा आदि उत्तम मानवीय गुर्णों की प्रशंसा धर्मसूत्र सें आचार और आश्रमधम के सन्दर्भ में अनेकशः की गयी है। “दया सर्वभूतेषु क्षा- न्तिरनसूया शौचमनायासो मंगलमकापंण्यमस्प्द्देति” १. ८. २४। ये आ5 भ्षाव्मगुण बताये गये हैं : दया, क्षमाशीलता, दूसरों की सम्रद्धि में जलूना, जिस कार्य को करने में अपनी हानि हो वहन करना, मंगछ का आचरण करना, दीनता दिखाना और छाछूच करना। इन गुर्णो को प्राप्त करना छो किक तथा पारलोकिक दृष्टि से आवश्यक है। इसी प्रकार १. ९. ७३ में सहिष्णुता, क्षमाशीलता, दृढ़ निश्चय एवं संयम को आवश्यक गुण बताया गया है। समथ होने पर भी किसी मारे जाते हुए दुबल व्यक्ति की रक्षा करने पर उतना ही दोष होता है, जितना उस व्यक्ति को मारने वाले का होता है। “दुबंछहिंसायां विमोचनशरक्तश्चेत” ३. ३. १९। संन्यासी के लिए तो यह अनिवाय आचार है कि वह छोभ का व्याग कर दे, संयम रखे और कष्ट देने वाले तथा अनुग्रह करने वाले दोनों पर समान दृष्टि रखे “समो भूतेषु हिसानुग्रहयोः”। यह समदृष्टि भारतीय दश में महत्व रखती है ओर जीवन में इसका व्यवहार दाशनिक एवं तत्वज्ञ की महान योग्यता समझी जाती है ।. इन्द्रियों के अ्रवाह सें पढ़कर उन पर विजय प्राप्त करना और उन्‍हें ऊँचे आदर्शों ओर लच्यों की ओर उन्मुख करना ही अक्वचयं का और सामान्य भारतीय धर्म का मुख्य रूच्य है, दर्शन का मूलमन्त्र है। नेष्टिक ब्रह्मचारी इसी लूचंय की प्राप्ति में रत तपस्वी है, जिसके नियम घर्मसूत्र में मिलते हैं स्वाभाविक मल्प्रवृत्तियों को. नियन्त्रित करके उन्हें धर्म की सिद्धि सें नियोजन ही धर्मग्रन्थ का उपदेश और आदेश हे क्‍ | क्‍ परोपकार के साथ-साथ दुःखी और रोगी को दान देने का भी आदेश है।

दानविषयक व्यवस्था के मूल में एक उत्तम धार्मिक भावना है, सत्कर्म में अध्ययन में छगे हुए.का एवं दुःखी व्यक्ति की सहायता | आगे चछकर दान केवल गआयश्रित्त का अड्ग हो जाता है और पाप से मुक्ति पाने का आडम्बरपू्ण साधन बना लिया . जाता हे किन्तु हमारे धमसूत्र में १. ७, १८ दानपातन्र की योग्यता पर विचार . किया गया है और गुरु के छिए, विवाह कर्म के लिये, रोगी को, हीनवृत्ति वाले

को और अध्ययन में रत व्यक्ति को दान देने की व्यवस्था की गयी है। अधार्मिक

कार्य हे लिए कदापि दान नहीं देना चाहिए, यह भी गौतमधमंसूत्र में स्पष्ट कहा गया है। क्‍ | स्वाभिमान और व्यक्ति की अतिध्ठा पर भी इस धमंसूत्र में यत्रतन्न प्रकाश

पड़ता है, हाल कि सामान्यतः व्यक्ति को उसके आचरण के आधार पर तथा अनेक

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प्रसंगों में वर्ण के आधार पर या कुछ के आधार पर सम्मान का पान्न ठहराया गया हछै। विद्याध्ययन करने वाले, सदाचारी एवं धार्मिक व्यक्ति का सवॉपरि स्थान है और उसे विशेषाधिकार भी दे दिये गये हैं जो दूसरों को नहीं मिल पाते हैं। गुरु की सेवा में व्यक्ति के अपने स्वाभिमान का विचार नहीं किया गया है, उसकी पूजा देवता की तरह करने, उसका जूठा खाने, शरीर दबाने आदि का नियम भी विद्यार्थी के लिए बताया गया है ( ५० २६ ) किन्तु ये काय गुरु के अतिरिक्त अन्य के लिए विहित नहीं हैं। निम्न व्यक्ति की सेवा गहित है। अतिथि सत्कार एक मानवीय धर्म है तथा प्रत्येक आश्रम में मजुष्यपूजक होने का आदेश है किन्तु दूसरी ओर वर्ण का विचार इतना अ्बल है कि शूद्व को मनुष्योचित ब्यवह्दार भी नहीं मिलता ओर उसे दास बनकर सब अकार से पददुलित जीवन व्यतीत करना पड़ता है। आगे आश्र्ों की व्यवस्था एवं वर्ण के विषय में विचार करते समय धमंसूत्र के समाज में व्यक्ति का क्या स्थान था इस पर और प्रकाश पड़ेगा

मनुष्य का अपना जीवन महत्वपूर्ण है। सभी प्रकार से अपनी रक्षा करना धर्म है। अतः धर्मसूत्र आदेश देता है कि जिस कार्य में हानि हो, प्राणसंकट हो वह कार्य करो १. ९. ३२, और सभी उपायों से अपनी रक्षा करो “संत एवास्मानं गोपायेत” १. ९, ३४. जीवन रक्षा के लिए वर्णाश्रमधर्म का भी उल्लंघन करके कोई भी चृत्ति ग्रहण की जा सकती है. और नेतिक नियर्मो का बन्धन तोड़ा जा सकता है इस पकार धर्मसूत्र की व्यवस्था से धर्मप्रधान होते हुए भी व्यक्ति को भी बहुत कुछ महत्व प्राप्त है। उसे जीने का भी अधिकार दिया गया है और इसी कारण यह विचार किया गया है. कि पापों के लिए आयश्रिंत्त नहीं भी किया जा सकता है। सामान्य नियम भी बताया गया है कि समर्थ व्यक्ति आश्रितों की, असहायों, दुबंछों और शारीरिक विकार वाले मनुष्यों की रक्षा करें, उन्हें भोजन, वस्त्र और सुरक्षा अदान करे

यौनविषयक नेतिकता के विषय में धर्मसूत्रकार की दृष्टि बड़ी कड़ी है, किन्तु अन्य नेतिक भावनाओं के समान ही इस विषय में भी सिद्धान्त और व्यवहार के बीच प्रचुर अन्तर दिखाई पड़ता है। धमंसूत्र में नारी की स्थिति पर विचार करते हुए हमने इस बात को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। स्री-पुरुष के सरबन्ध की स्वेच्छा- चारिता हमारे धमंसून्नकार को निश्रय ही अभीष्ट नहीं है, किन्तु उसे सबसे बढ़ी चिन्ता इस बात की है कि उच्चकुर्छों की «मर्यादा और पविन्नता सुरक्षित बनी रहे ओर वर्णों में उच्च और निम्न का भेद ख्री-पुरुष के सम्बन्ध"का नियमन करे। अपने से निम्न वर्ण के पुरुष के साथ सम्बन्ध रखने वाली स्त्री के छिए तो सरेआम कुत्तों से कटवाकर मार डालने का नियम बनाया गया है। “श्वभिरादये- द्वाजा निहीनवर्णगमने ख्रियं प्रकाशम्‌ ।,३. ५. १४।

किन्तु हमारे धरंसूत्रकार को यह पता है कि मनुष्यों की स्वाभाविक कमज़ोरियाँ समय पाकर उसे अभिभूत कर लेती हैं। महापुरुष भी अपने आचरंण . . में चूक जाते हैं ्् ि हा

“इृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं महताम।”

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यही नहीं एक आधुनिक मनोवेज्ञानिक की तरह धमंसूत्रकार कामभावना के विकारों एवं असामान्य यौनाचारों का उल्लेख भी करता है और यह्द संकेत करता है कि अप्राकृतिक यौनाचार भी समाज में प्रचलित था काममनोविज्ञान का वैत्ता इसे दमित भावना की विक्रृत अभिव्यक्ति की कहेगा गौतमधमसूत्र में ऐसे स्थलों के लिए देखिए : ३. ४. ३६ एू० २३४, ३, ५. १२ ए० २४०, हे. ६. ए्‌० र२ण० तथा ३, ३. पृ० २६०

बह्ाचर्य की महत्ता सर्वोपरि है, किन्तु उसके भंग होने पर प्रायश्रित्त द्वारा पाप से मुक्ति हो जाती है। धर्मसूत्र की दृष्टि में काम की मूछभावना का उपयोग केवल सन्‍्तान प्राप्ति के लिये, सदाचारी पुत्र की प्राप्ति के किए होना चाहिए। इसी छिए इसके नियमन की आवश्यकता है और विवाह्द की व्यवस्था को भपूर्व महत्ता दी गयी है। गौतमधमंसूत्र का तो यही सन्देश है कि निरन्तर धर्म, अर्थ और काम को सफल बनाना चाहिए. और इसमें धर्म प्रधान है, उसी के अनुकूछ अर्थ और काम भी होने चाहिए

“न पूर्वाह्ममध्यंदिनापराहुणानफलान्कुर्याद्यथाशक्ति धर्माथकामेम्यः” .... 4. ९.७४

्े गोतमधर्मश्त्र में वर्णो भ्रमधम

भारतीय धर्म में मानवजीवन सुव्यवस्थित है और उसके उद्देश्य निर्धारित

हैं, जीवन का मार्ग स्पष्टतः अनुरेखित है इस धम में जीवन जी लेने का ही नाम नहीं है, अपितु उसका आकलन तो ब्यक्ति के धर्म से है, कर्म से है ।:केवल यथा- संभव सुख के साधन जुटाकर पार्थिव जीवन को और वर्तमान को सुखी बना लेना उसका उद्देश्य नहीं। इस धर्म में जीवन कर्म का जीवन माना गंया है, एक पार- 'लौकिक जीवन की आप्ति के रिए दीक्षा का काछ माना गया है। सम्पूर्ण भौतिक जीवन आध्याध्मिक जीवंन की तेयारी है। इसी कारण तो जीवन को धर्ममय, दर्शनमय कहा. गया है। आध्यात्मिक जीवन की तेयारी तो इस जीवन के आरम्भ

से ही चलती है, परन्तु उसके लिए विशेष समय भी निर्धारित किया गया है।

हिन्दू धरम में प्रत्येक व्यक्ति के, प्रव्येक अवस्था के और प्रत्येक अवसर के कतंव्य निर्धारित हैं जिससे उनके विषय में अम या स्वेच्छाचारिता की गुझ्लाइश नहीं, हालाँ कि सांथ ही साथ मनुष्य के हित “स्वस्थ प्रियमाव्मनः” को भी महत्व दिया गया है। अभ्युद्य और निःश्रेयस्‌ की- सिद्धि के किए हिन्दू धर्म में जीवन की जो “प्लेनिंग” की गयी है उसी का नाम आश्रम है। उचित समय पर उचित कम करना और दृत्तचित्त होकर कर्म करना लच्ष्य की श्राप्ति का मूलमन्त्र हैं। सम्पूर्ण जीवन कतंव्यमय है, श्रममय है। आश्रम शब्द का ही अथ है: श्रम का जीवन आश्रस्यन्ति अस्मिन्‌ आश्रमः व्यक्ति के अतिदिन के कार्य का मानो एक “टराइमटेबुल” ही आश्रम की व्यवस्था के अन्तर्गत बना दिया गया है जिसके अन्तर्गत एक निश्चित समय तक एक निश्चित काय किया और फिर दूसरे कार्य में लूग गये एक काछावधि में भोतिक जीवन का रसास्वादन किया तो दूसरे में

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भौतिक सुर्खो का व्यागकर अक्षय शान्ति की खोज में निकल पड़े एक पीढ़ी ने अपना एक कार्य पूरा किया, उसके आनन्‍्दों और फर्ों का भोग किया और वह आगे बढ़ गयी उसने दूसरी पीढ़ी को स्थान दिया इस विभाजन और व्यवस्था से तो कहीं असन्तोष उत्पन्न हुआ, तो उनसे कोई संघर्ष हुआ। इस व्यवस्था के अभाव ने वर्तमान समाज में कितनी बुराइयाँ उत्पन्न की हैं सर्वविदित है। जीवन के अन्त तक पद का छोभ और उस पद को बनाये रखने के छिए. होनहार छोगों का दमन एवं शोपण पुराने छोर्गों का एक खास हथकंडा बन गया है। ऐसे लोग जितने पुराने हैं, इस चाल में उतने ही कुशल हैं ओर वे उतने ही दीघंकाल तक पद के साथ-चिपटे रहने में सफल होते हैं अधिकार और पद के छोभी बुजुर्ग एक लंगडी और असन्तुष्ट पीढ़ी का निर्माण करेंगे, जिसे योग्यता के विकास का अबसर नहीं मिल पायगा और जो उन पुराने ठेकेदारों के हाथ में खिलौना होगी, जिस पर वे मनमानी कर सकते हैं, प्रछोभन देकर अपना अधिक से अधिक काम निकाल सकते हैं। धमंशा्त्रों की मौलिक आश्रमव्यवस्था में*इन बुराहयों के लिए जगह नहीं थी आश्रमव्यवस्था के पीछे जो उदात्त भावना है वह सावंभौम है। भारतीय संस्क्रति की यह विशेषता अद्वितीय है और धमंशाखत्रकारों की दूरदर्शिता, व्यावों हारिकता, बोध और चिन्तन कीं स्पष्टता का प्रमाण है। . इस आश्रमव्यवस्था को धर्मसूत्रकारों ने स्पष्टतः गौरव प्रदान किया है। वर्णा- श्रमधर्म से हीन व्यक्ति पतित होताहै और ऐसे पतित के साथ बोलना भी निषिद्ध है। वर्णाश्रम धर्म से हीन व्यक्ति का समाज में कोई स्थान नहीं है, वह किसी प्रकार का सम्मान ग्राप्त करने का अधिकारी भी नहीं होता। ३. ९. १७ | कर्मों के विभाजन का अनुशीलन किया जाय तो आय॑ और अर्नाय में कोई भेद नहीं रह जाता सभी चण समान हो जाते हैं और सबके समान होने पर लोकव्यवस्था नहीं चछ पाती, अस्तव्यस्तता उत्पन्न हो जाती है। “आर्यानाययोव्यतिक्षेपकर्मणः साम्यम्‌” गौतमधमंसूत्र ५. ६९। इस आश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत विहित कर्म को करना कतव्य है और जो व्यक्ति उस आचरण का पालन नहीं करता वह राजा द्वारा दृण्ड का भागी होता है। उसे किसी प्रकार की सम्पत्ति का अधिकार नहीं रह जाता और वह केवछ जीवन चलाने योग्य भोजन ही राजा के यहाँ से ग्राप्त करता है _ भशिष्टाचरणे प्रतिषिद्सेवायां नित्य चेलपिण्डादूध्व॑ स्वहरणम्‌”। २. ३. २४। धंशार्त्रों में मंनुष्यजीवन चार आश्रर्मो में विभक्त किया गया है--बह्मचय, गृहस्थ,(वानप्रस्थ और संन्‍्यास। गौतमधमंसूत्र में इन आश्रमों को इस क्रम में और इन नामों से गिनांया गया हे--अह्यचारी, गुंहस्थ, भिज्ञ, वेखानस | आश्रमसों का इतिहास देखकर यह ज्ञात होता है कि आश्रम के विषय में धर्मशाखकारों के विचार एक से नहीं हैं। इसे अछूग-अछंग नाम- दिया गया है और इन आश्रर्मों का आपेक्तिक महत्त्व भी भिन्न-भिन्न दृष्ट्कोण से किया गया है। उदाहरण के लिए कुछ

आचार्यों ने एक ही आश्रम-गृहस्थाअ्रम .को वास्तविक बताया है। बोघायन. ..

की दृष्टि में भी अन्य सब आश्रम कारुपनिक हैं २. ६. १७। हमारे घमंसूत्रकार.' गौतम ने भी गृहस्थाश्रम को ही महत्त्व दिया है और उसे ही प्रथम स्थान दिया.

( मे२ )

है। धमशा्त्रों के पूर्व उपनिषदों में यह बात स्पष्ट की गईं है कि मोक्ष प्राप्त करने के लिए वेराग्य या निवंद्‌ धारण करना चाहिये | बृहदारण्यक ५।१ और मुण्डक० १२१२ इस प्रकार ये आश्रम स्वाभाविक रूप में थे इसमें सन्देह नहीं। इन्हें व्यवस्थित रूप धर्मशासत्रकारों ने दिया और प्रत्येक आश्रम के देनिक कर्मों विस्तार से गिनाया। सारे समाज के लिए वर्णाश्रमधर्म के नाम से संविधान तेयार

किया।

सभी आश्रमों में गृहस्थाश्रम को स्वाभाविक रूप में अधिक महत्व प्राप्त है यह आश्रम वास्तविक लौकिक कर्म और श्रम का जीवन है और अन्य आश्रम इसी पर आश्रित होते हैं। जद्यचय इसी जीवन की विशेष तेयारी है जिसमें ज्ञान के साथ संयम ओर आचार की शिक्षा दी जाती है। बरह्मयचयं अनुशासन और ज्ञानार्जन का जीवन है। गृहस्थाश्रम की उपक्रमणिका हैं। गौतमधमंसूत्र में $. ३. और १. ३. ३५ में इस आश्रम की अधानता को स्वीकारा गया है किन्तु साथ ही साथ यह भी कहा गया है कि जीवन की शिक्षा पाकर ब्रह्मचारी कोई भी आश्रम ग्रहण कर सकता है। अह्यचय जीवन से वास्तविक आचार और घम का जीवन प्रारम्भ होता है। उसके पूर्व के जीवन में कोई आचार का नियम नहीं है और छूट है ब्रह्मचय के बाद ग्ृहस्थजीवन स्वीकारने का कारण यह है कि यह आश्रम ही सन्‍्तानउत्पत्ति का आश्रम है और सन्‍्तान का महत्त्व धमंसूत्र में सवोपरि है। इस कारण गृहस्थाश्रम का वरण करना धर्म की दृष्टि से आवश्यक है किन्तु अक्षचारी इस आश्रम का त्याग कर नेष्ठिक बह्मचारी का जीवन भी व्यतीत कर सकता और सारा जीवन ज्ञानाज॑न तथा तत््वचिन्तन सें गा सकता दै। ब्रह्मचारी को भोग- ' विछास की वस्तुओं की “और बाह्य अलूकरणों से दूर रहने का आदेश है, यहां तक कि स्वच्छुता के नियर्मों सें भी अनेक को वर्जित किया गया है। संभवतः इस कारण कि इस जीवन का मुख्य लूचय है भोगविकास और भौतिक जानन्द्‌ की करपना करना, केवक विद्याजन में ही तह्लीन रहना। मन को अपने रूचय में छगाने के लिये मनोवेज्ञानिक पृष्ठभूमि जीवन के प्रत्येक कार्य से बनती है इन्हीं भोगविास ओर सुखदायी उपकरणों को, वस्रादि के अलंकरण को गृहस्थ के किए विहित किया गाया है, क्‍योंकि वहां यह आवश्यक मनोवैज्ञानिक वातावरण प्रस्तुत करने में सहायक है। इस श्रकार के बह्मचारी को समाज में सम्मान का स्थान मिला है और वेसे बह्मचारी की राजा प्रत्येक तरह से रक्षा करता है। उसकी सहायता और भरणषोषण समाज के सभी अंग करते हैं।

_ ऊपर कहा जा चुका है कि गौतमधमंसूत्र में गृहास्थाअरम को अन्य आश्रसों से अधिक महत्त्व दिया गया है। यह स्पष्टतः कहा गया है*कि ऐक्याश्रम्यं व्वाचार्याः अत्यक्षविधानाद गाईस्थ्यस्येव”। १. ३. ३५.। प्रायः सभी संस्कार इसी आश्रम में सम्पादित होते हैं और यही आश्रम मानवजाति के विकास के छिए उसकी प्रजनन की अवृत्ति को सन्तुछित और संयमित करने का आश्रम है। गृहस्थ का धर्म है : “देवपितृभनुष्यर्षिपूजकः” हो अर्थात्‌ सभी उस पर आश्रित होते हैं धहस्थाश्रम समाज की पहली इकाई है और समाज का सही निर्माण इसी जीवन में

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होता है। इसमें आचार के नियम बहुत व्यापक हैं | दान देना और अतिथि सत्कार करना तो ग्रहस्थाश्रम का मुख्य धर्म है। दुःखी, रोगी, निर्धन और विद्याध्ययन में रत व्यक्ति की सहायता करना इस आश्रम का परम मानवीय कर्तव्य है। गृहस्थ अपने आश्रितों का भरणपोषण करता है चह अतिथि, बारूक, रोगी, गर्भवती स्त्री, घर में रहने वाली पुत्रियों और बहनों तथा बृद्धों और सेवकों को भोजन देकर स्वयं भोजन करता दे १. ५, २३ और इस प्रकार वह एक महान्‌ पारोपकारसय जीवन जीता है। घममसूत्र में गृहस्थ के लिए शुद्धता के अनेक नियम दिये गये हैं उसे स्नान और सुगन्धि के छेप से स्वयं को पविशत्र रखने का आदेश दिया गया है। उसे दूसरों के बद्ध आदि का उपयोग नहीं करना चाहिए। अभावग्रस्त द्वोने पर वह शुद्ध करके उपयोग कर' सकता है। सामान्यतः उसे संयम का जीवन बिताना चाहिए और घर्म के अनुकूछ अर्थ और काम का सेवन करना चाहिए

मानसिक पविन्नता रखनी चाहिए आश्रमव्यवस्था के अन्तर्गत व्यक्ति का एक सासान्यधर्म है अतिथि का सत्कारः

और गुरु आदि श्रेष्ठ जनों का आदर अतिथि की सेवा संन्‍्यासी को भी करनी चाहिए १.३.२८ श्रोत्रिय अतिथि को अपने समान शय्या ओर आसन देना चाहिए अपने से हीन अतिथि का भ्री अपने संसान आदर करना सामान्य धर्म है। केवल अपने छिए पकाया हुआ भोजन धमंसूत्र की दृष्टि में भभोज्य है। एक रात्रि रुकने वाला और मध्याहृकाल में विश्राम के किए आनेवाछा व्यक्ति अतिथि होता है। श्रेष्जनों को. आदर देना भी सामान्यधघर्म है। माता-पिता का तो किसी भी दशा में अपमान नहीं करना चाहिए “न कहिचिन्माता-पिन्नोरबृत्ति” ३. ३. १५।

गुरुजनों के निकट किसी प्रकार की चपरता नहीं करनी चाहिए १. २. २२ इसके

अतिरिक्त गुरु की सेवा का भी नियम बताया गया है। अभिवादन, संभाषण

और शिष्टाचार के छोटे-छोटे दुनिक नियम भी धमंसूत्रों ने बताये हैं। वृद्ध जनों का आव्र उनके आचार के आधार पर करने का आदेश है और उनके अंनुकूछ

आचरण करने को बताया गया है। “यच्चास्मवन्तो बुद्धाः सम्यग्विनीतां दर्ेस-

छोभमोहवियुक्ता वेदविंद आचक्षते तत्समाचरेत्‌ ।”

आत्मसम्मान को बनाये रखना और आतव्मकक्यांण के लिए उद्योग करना

'शहस्थाश्रम में अंनिवाय कर्तव्य है। इसी लिए गृहस्थ की हमारे ध्मसूज्न में यह संछाह' दी गयी है कि वंह' उत्तम और उद्यमी व्यक्तियों के साथ निवास करें,. जहाँ जीवनो पयोगी वस्तुएं उपलब्ध हों वहां निवास करे १. ९. ६५ | आत्मसंम्मान

की दृष्टि से बराबर दूसरें का अन्न ग्रहण करे “नित्यमभोज्यम्‌” २. ८. और ही तिरस्कारपू्वंक या विना मांगे दिया हुआ अन्न अहण करे “भावदुष्टम” अयाचितम्‌ च।” २. ८. १२। अपने को पीडित नें करें और अपनी प्रतिष्ठा के. निरन्तर ध्यान रखे | यह धम्मसूत्र का शृहस्थ के लिए सामान्य आदेश है हर अन्य आंश्रर्मी के अन्तंगर्त संन्यास या भिक्ु को गौतमधमंसूत्र में महत्व॑पू्ण ...

माना गया है। वानग्रस्थे थां वेंखांनंस को' केवक .गहस्थ ओर संन्यास आश्रमों के बीच की कड़ी “कहा जा सकता है ।: जिंस प्रकार गृहस्थाश्रंम के किएअक्मन चर्याश्रस विशेष तेयारी का:समय है: उसी. अकार संन्यास के लिए लेथारी और

गो भू?

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दीक्षा का समय है वानप्रस्थ। संन्यास नितान्त आध्यात्सिक उद्देश्य का आाश्वम है। जिसका रच्य है. भौतिक जगत्‌ के ऐन्‍न्द्रिक सुखों से विश्ुत्न होकर ड्र्द्रियों और मन. को वश में करके निर्वेद्‌ की प्राप्ति। जीवन में भोतिकता और इन्द्रियसुख की प्रधानंता का कहीं तो विशम होना त्वाहिए कहीं सीसा होनी चाहिए क्योंकि थे चिरस्थायी सनन्‍्तोष नहीं देते और तब यथार्थ तथ्य का बोधकर परस झ्ञान्वि की प्राप्ति ही जीवन की सार्थकता है। अतः इस आश्रमव्यवस्था में संन्यास जीवन का आध्यात्मिक महत्व है, दार्शनिक महत्व है

इस सुन्दर व्यवस्था के होते हुए भी धर्मशास्त्रियों के समग्र में इनका सही रूप से पान होता था, इसमें सम्देह है, क्योंकि इन आशभ्र्ों के विषय में धर्मशाखकारों में मतभेद है, जो निश्चय ही व्यावहारिक कारणों से है। किसी भी स्थिति में संन्यास आश्रम सामान्यतः सभी व्यक्ति. अपनाते हंगे, ऐसा भी नहीं माना जा सकता। वह तो दाशंनिकों का आश्रम है, तपरिवियों का श्ाभ्रस है। संन्यास के नाम पर जकमंण्यता का जीवन धमेशाख को अभीष्ट नहीं है वर्णव्यवस्था-- ... . . हे :- भारतीय धर्म या संस्कृति की एक अद्वितीय विशेषता है वर्णव्यवस्था, इसके विषय में बहुत कुछ कहा गया है कुछ विद्वानों ने तो इसकी प्रशंसा की दै और कुछ ने इसके दोषों के ऊपर दृष्टिपांत किया है। यह सभी मानते हैं कि मूछतः यह व्यवस्था बुरी नहीं थी। उसके पीछे मनुष्य के आचार और कर्म का विवेक था। इस प्रकार की सामाजिक विभाजन की व्यवस्था किसी किसी रूप में सभी संस्क्ृतियों और देशों में मिल सकती है। समाज में भिन्न वर्गों का द्वोना आवश्यक है किन्तु सभी मनुष्य समान उत्पन्न नहीं होते, सभी समान प्रतिभा और समान आदतों के साथ पेदा नहीं होते और समान कार्य नहीं करते। डा० राधाकृष्णन के शब्दों में मानव समाज भिन्न प्रकार की श्रेणियों से बना है .. और उनमें सबका अपना महत्व है। वे. सभी एक सामान्य छचय को सिंद्ध करने _ मेंलगेहुए हैं।.... सा

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- बुब्ूपंएक 4० ०क्ाधाकुकअधिक्ंटड,ा.. ५... फक्रिल्तु आरतीय धर्म के इतिहास में समाज के विभाजन का यह स्वाभाविक भाधार झीघम ही रूप हो जाता है और यज्ञिय विधानों के विकास के साथ ही साथ एक वर्ग:को जो झुख्यतः यज्ञ के सर्पादन और विद्याध्ययन में रत दे बहुत

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समाज में एक असन्तुरून का जन्म होता है और यह उच्च वर्ण अपने अधिकारों तथा उच्चस्थान के प्रति छोभी हो जाता है। वर्ण का आधार जन्म हो जाता है जिस विशाल भव्य संस्कृति के आसाद की नीव सुदृढ सिद्धान्तों के ऊपर पढ़ी थी उसमें शीघ्र ही दरारें पढ़ जाती हैं और आगे चलककर उसपर जो भवन बनता

. है उसमें कुछ मिलाकर परस्पर विरोधी बातें सर्वत्र ही भरी पढ़ी दिखाई पड़ती हैं

एकरूपता नहीं हो पाती शायद्‌ समाज के पअ्षग्मणी बुद्धिजीवी लोगों का सबसे बड़ा अपराध यह था कि मानव के व्यक्तित्व को मन पहचानकर उसके किसी एक वर्ग के व्यक्तित्व का विकास होने देना और अपने पद्‌ का साजायज फायदा उठाकर किसी दूसरे के व्यक्ति्व को पंगु बनाकर अपने अधिकार को कायम रखने से बढ़कर कोई सामाजिक पाप नहीं। हिन्दू समाज की बुराइयों का कारण मानव के भाग्य के साथ मानव का यद्द खिलवाड़ ही है। सभी अपने अपने कतवब्य का ही ध्यान रखते तो शायद कोई बुराई होती परन्तु यहाँ तो अधिकारों पर

'ही दृष्टि जम गयी जौर उन अधिकारों के किए अपनी योग्यता को बनाये रखना जरूरी नहीं रह गया। “सर्व भवन्तु सुखिनः सर्व सन्तु निरामथाः” की

शुभकामना को व्यवहार में कम स्थान मिछा। वर्णव्यवस्था की बुराइयोँ यहीं से आरम्म होती हैं। यह सही है. कि मलुष्य अपने वंशपरम्परा और वातावरण का गुणनफल होता है, किन्तु इसका अथ यह नहीं कि उसे वातावरण का परिवर्तन करके अपने व्यक्तित्व का विकास करने का अधिकार ही रहे ।. एक विशेष कुल में जन्म लेने के कारण उसे पशु से भी निन्दितं' समझा जाय अंपने कुछ या वेशपरम्परा की शुद्धता के लिए अपने योग्य व्यक्तियों से संबन्ध करना अच्छी और छाभदायक बात है किन्तु व्यक्ति को एक घेरे के भीतर केद्‌ करना, उसमें हीनता की भावना भरकर उसे आश्रित और परतन्त्र बनाकर सानवीय अंधिकारों से वंचित कर देना ईश्वर की सृष्टि के प्रति अन्याय है, घोर अपराध है,

सामूहिक नरसंहार जसा पाप है। भारतीयधम के अन्तर्गत वर्णव्यचस्था की कुछ .. झुराइयाँ ऐसी हैं जिन पर पर्दो नहीं डाछा जा सकता और जिनके विषय में निश्चित

रूप से कतिपय सुधार और पंरिवर्तन वांछुनीय हैं। समय के सांथ-साथ ये

._परिवतन हो भी रहे हैं और सामाजिक जीवन की समानता का बोध उत्तरोत्तर

बढ़े रहा है स्थ अपनी: आरम्भमिक अवस्था से चलकर पूर्णावस्था

में इसी व्यवस्था. का अन्तिम रूप दिखाई पड़ता है। कुर्छों की पविन्नता के ध्यान से घमशास्त्रीय ग्रंथों में इस वर्णब्यवस्था के कठोर पाछन करने का आदेश दिया गया है और प्रत्येक वर्ण के कर्म निश्चित कर विये गये हैं जिनसे भ्रष्ट होना सामाजिक पतन का कारण होता है और पेसा व्यक्ति सम्पत्ति आदि के अधिकार से वंचित द्वो जाता है। पिछले पृष्ठों में हम देख चुके हैं कि इस घर्णव्यवस्था का कितना व्यापक प्रभाव है। छोटे-छोटे कर्मों में भी वर्णव्यवस्था के आधार पर

: पाथक्य स्थापित किया गया है, जिसका कोई ओऔदचित्य नहीं दिखायी पढ़ता है

( ३१६ )

उदाहरंण के लिए यज्ञोपवीत के समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, वेश्य को आयु, दण्ड, आदि के अलावा भिक्षाचरण के लिए संबोधन का भी अलग-अलग नियम बताया गया है। ओर प्रायश्रित्त, अपराध और दण्ड, मृत्यु या जन्मविषयक अश्ौच भी वंर्णानुसार निर्धारित किया गया है। वर्ण का विचार नंतिक भावना के ऊपर भी - हावी होता दिखाई पड़ता है। भोजन और संभाषण के शिष्टाचार आदि में भी वर्ण के विचार को आ्राथमिकता दी गयी है। वर्णब्यवस्था की इस कठोरता के बावजूद प्राणरक्षा और जीविका निर्वाह के लिए इसके उछछून की भी अनुमति गयी है, किन्तु इस बात की चेतावनी दी गयी है कि दूसरे वर्ण के कर्म करते हुए भी उस वर्ण के निनिदृत आचरण अपनाये जाये साथ ही वण के उत्क्ष का भी सिद्धान्त बना दिया गया है जिसके अनुसार असबर्ण यौनसंबन्धों या विवाहों से उत्पन्न वर्णसंकर सनन्‍्ताने निरन्तर कईं पीढियों तक उत्कृष्ट वण के कम करते हुए उस उत्कृष्ट वर्ण की हो जाती हैं यह तथ्य जीवविज्ञान और आणिश्चाखत्र के सिद्धान्तों से सिद्ध किया जा चुका है कि किस प्रकार कुछ पीढियों में, विशेषतः सात पीढियों में रक्त में परिवर्तन जाता है ओर मनुष्यजाति नयी हो जाती . है; जिसमें अपने विशिष्ट छक्षण भी होते हैं। वर्ण के उत्कष के पीछे कुछ इसी. प्रकार का सिद्धान्त कितना चेज्ञानिक प्रतीत होता है। इस प्रकार यह भी देखने को मिलता है कि वर्णव्यवस्था का मूछ आधार अब भी विचार में रखा जाता था और कम या आचार के अनुसार वर्ण के उत्कष या अपकर्ष का नियम भी प्रचलित था, परन्तु इसे उतना महत्व नहीं था, जितना वर्णविषयक रूढियों का | 5 इसी अकार परण्णविषयक सहिष्णुता जीवनोपयोगी वस्तुओं के आदान के संबन्ध में भी है। आत्मपीषण के लिए . भावश्यक वस्तुएँ किसी भी वर्ण से भी ग्रहण की जा. सकती थीं | संन्यासी सभी वर्णों के यहाँ. से... भित्ता अहृण कर सकता था। इंसी प्रकार बह्मचारी भी भिक्षा सभी वर्ण के गृहस्थों से छे सकता था। किन्तु इससे यह भी लगता है कि ऐसे उज्लेखों में शुद्ध वर्ण धर्मशास्तरो में अभिग्नेत नहीं है। दूध; दही, फ़छ, मधु; :रुगमांस, शाक, भुंना हुआ अन्न, आदि:किसी भी चण:के व्यक्ति से . लिया. जा-सकता है, शूद्ध से भी थे वस्तुपुं लींजा सकती- हैं, -ग्ौ०-घ॒० सू० २५ हे. यदि किसी अन्य प्रकार-से वृत्ति त्त चले तो शूद्ध से जीवननिर्वाह की वस्तु ली जा सकती है: “बृत्तिश्नेत्ना- न्तरेण शूद्रम”। में भी कुछ देनिक जीवन में संबन्धित रहने वाले शुद्ध के घंरें भोजन किया जा संकंता है: जेसे नाई, चंरवाहा, कुछपरम्परा के मित्र, हलवाहा; परिचारक, आदि: . “पशुपालल्षेत्रकंषककुलसंगतंकारथितृपरिखारका भोज्याज्ञा:।” २. 4. ६। यज्ञ के समग्र अब्राह्मण को भी अतिथि के समान संत्कार का अधिकारी माना गया है। इन उल्लेखों से धर्मसूत्रके समय में भी थोड़ी

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धमशास्त्रों का. अवकोकन करते समय वर्णव्यवस्था के .संबन्ध सें जो बात

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से भरा हुआ दृष्टिकोण | वंदिक काल में धमसूत्रों से पूष ही शूद्व इच्छानुसार पीटा ओर मारा जाने वारा तथा केवल सेवाबूत्ति में नियुक्त किया जाने वाला (यथाकासवध्यः, कामोत्ताप्यः, अन्यस्य प्रेष्यः) | बताया गया है। उसके जीवन की यह नगण्य स्थिति धमंशस्त्रों में और भी अधिक तुच्छु बन जाती है. और वह अपने समूचे अधिकारों से वंचित होकर दास मात्र बन कर रह जाता है। पिछले पृष्ठों में इस बात पर प्रकाश डाला चुका है कि पाप और प्रायश्रित्त, दृण्ड और अपराध, अशौच तथा थौनविषयक नेतिकता के संबन्ध में शूद्ध के प्रति किंतना अन्याय बरता जाता था। गीतमधमंसूत्र २. १. ६९ में शुद्ध का यही धर्म बताया गया है कि वह उच्चवर्णों के छोगों की सेवा करे, द्विजातियों का जूठा भोजन करे और उन्हीं के छिए घन का संचय करें। “तदर्थो5स्थ निचय!ः स्यात।” वह कभी भी उच्चवर्ण के समकक्ष होने का साहस करे। उनके समान मार्ग पर चछे और उनसे वात भी करै। उनके समान आसन पर बेठने के लिए उसे कठोर दुण्ड मिलने का विधान है। इसी प्रकार वह यदि ब्राह्मण का अपमान करता है तो उसकी जीभ, या प्रहार करता है. तो शरीर का अंग ही काट देने का दण्ड है। जब कि इन्हीं अपरार्धों के लिए ब्राह्मण को कोई दण्ड नहीं शूद्र की पत्नी के साथ उच्चवण के छोग व्यभिचार करे तो उससे केवछ कुछ प्रायश्वित्त करना था किन्तु

-शूद्र को ऐसा व्यभिचार उच्चवर्ण की स्ली के साथ करने पर जीवन से द्वाथ धोना

पड़ता था। इस्री प्रकार वेद का अध्ययन तो दूर रहा, उसका श्रवण भी निषिद्ध

और सुन लेने पर उसका कान सीसें ओर . ज॑स्ते से भर दिया जाता था शूत्र के बंध के प्रायश्वित्त पर दृष्टि डाली जाय तो ज्ञात होगा कि धर्मसूत्र की देष्टि में शूद्र का महत्व पशु से भी कम है। उच्चवर्ण के व्यक्तियों के साथ किसी भी अकार समानता. प्राप्त करने की इच्छा करने पर वह दण्ड का ही भागी होता था: “आसनशयनवाक्पथिषु समश्रेप्सुदंण्ड्यः ।”

अस्पृश्यता का बहुत कुछ विकास धर्मंग्रन्थों में मिलजाता है, यद्यपि उसका अपवाद भी यत्रतत्र मिलता हे गौतमधमंसूत्र के अनुसार शुद्ध का छाया हुआ 'जर दूषित हो जाता है और आचमन जावि के योग्य नहीं रह जात्वा। १.९. १२. किन्तु ऊपर के कुछ उदाहरणों से वर्णविषयक सहिष्णुता का. निर्देश श्री किया जा

चुका है।. अन्य कतिफय आचार्यों ने सामान्यतः शूद्ध का भोजन अहण करते को

बुरा नहीं माना है. मनु ४२११। प्रायः अस्पृश्यता. का कारण पतित होना या महापातक कर्म करना होता था। चाण्डाक जाति के . अस्वृश्य होते का. उल्लेख

'है। इसी प्रकार शूदा से उत्पन्न पुत्र अस्पृश्य माना गया है। उनका दशन, स्पश और ; अतिग्रह. वर्जित है $..४. २९-२३ इसी प्रकार प्रतिकोम विवाह से -उत्पत्ष . 'निम्नवर्ण के, पुरुष और उच्चवर्ण की स्त्री से उत्पन्न पुत्र धमंहीन और पतित

पव॑ंअस्प्ृश्य कहे गये हैं : “प्रतिकोमास्तु धमदीना*।” . ..... .. न, विद्वित नहीं है, ओर केवल एक आश्रम मर

प्रायः शूद के छिए धार्मिक संस्कार गंहस्थाश्रंम ही विद्वित है। अतः कुछ आचार्यों ने उसके लिए .पद्चममद्दायश्ञ का विधान किया है। “पाकयज्ञेः स्वयं यजेत्‌” गौ०घ० सू० २. $:६०॥ किन्तु श॒ुढ्र ...

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के लिए भी आचार का विधान है। वह भी आश्रित जनों का भरण-पोषण करे सत्यभाषण करे और क्रोध करे पवित्रता के नियम का पालन करे। “तस्थापि सत्यमक्रोधः शौचम”। २. १. ५५। इसी प्रकार शूद्ध श्राइकर्म भी करे | “ग्राद्ुकम” २. १. ५७ अपनी ही पक्नियों में अनुरक्त हो और एक पत्नीत्नत का 'पाछून करे। “स्वदारबृतक्तिः” २. १. ५६। शुद्ध, की स्थिति में दासप्रथा का पूरा संकेत मिलता है। शूद्र परतन्त्न है, उसे स्वामी की हर हाछत में सेवा करनी है उसके छोटे वर््र आदि का ही उपयोग करना है। वेश्वदेव आवि पूजाकम में देवता का नाम छेकर नमोनमः कहना ही मन्त्र है। उसे जनाय॑ कहा गया है, जब कि उससे उच्चवर्ण को आर्य नाम से अभिहित किया गया है, इनके कार्यों में किसी प्रकार की उल्टफेर नहीं होनी चाहिए | २. १. ६५।

ब्राह्मण के विशेषाधिकार-- .

... राज़ां और विद्वान्‌ ब्राह्मण ही बर्तों के कर्म को धारंण करने वाले हैं। 'छोककंल्याण और अनुचित कर्म का दण्ड देने के छिए सबकी इनके अधीन कर दिया गया है। ब्राह्मण का स्थान राजा से भी बढ़कर है और वह सभी द्वारा पूज्य है। अन्य व्यक्तियों के समान उसे दण्ड नहीं मिलते वही शारीरिक दण्ड से मुक्त है। राजा उसे छः प्रकार के द॒ण्डों से मुक्त रखता है। वह पीटा नहीं जा सकता, वह हथकड़ी-बेड़ी से बाँधा नहीं जा सकता, उसे घन-दंण्ड नहीं मिलना चाहिए, आम या देश से निकाला नहीं जाना चाहिए, उसकी भर्त्सना नहीं होनी चाहिए और उसका त्याग नहीं. किया जाना चाहिए “अवध्यश्चाब- नध्यश्रादण्डयश्चाबहिष्कायश्चापरिवाद्यशचाप रिहायश्चेति ।” गौतमधर्मसूत्र $. ८- १३ किन्तु यह सब छूट या विशेषाधिकार क्यों ? इसे प्राप्त करने के छिए उस बाह्मण की योग्यतायें विचारणीय हैं। ये सारी सुंविधायें और विशेषाधिकार नियमतः उस आह्ण को मिलनी चाहिए जो अपने कम में रत हो और सभी . » संस्कारों से संस्कृत, हो उत्तम एवं आदर्श आचरण वाला हो, केवल धर्म का ज्ञान ही रखता हो, उसका आचरण करता हो “तदपेक्षस्तदवृत्ति:” १. ८८ ७। जिस ब्राह्मण को राजा अपने से श्रें्ठ आसन पर बेठाता है वह वस्तुतः अपने आचरण और विद्या (22६४ से उसके योग्य होना चाहिए। अपने मन्‍्सत्री या पुरोहित

के. रूप में वह केसे ब्राह्मण का चयन करता है; “विद्यामि जनवाग्रुपतयः शीलसंपन्न न्‍्यायक्रतं तपस्विनम्‌ विद्या में निष्णात, धर्म के ज्ञाता, शीरूंवान, . न्‍्यायप्रिय और तपस्वी यदि ऐसे ब्राह्मण को विशेषाधिकार मिलते हैं तो किसी

को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। समाज - की व्यवस्था करने वाले और

सबको सही मार्ग पर प्रेरित करने वाले चिन्तक और विचारक को सबसे बढ़कर

सम्मान मिलना ही चाहिए, मिलता ही है। ऐसे ब्राह्मण को किसी के अधीन रखना कोककल्याण की दृष्टिंसे बुरा होगा ओर बह उसको पूरा. उपग्रोग नहीं

हो पायगा, क्यों कि. उसे धर्मकाय करने कराने की सुविधा नहीं होगी इसी .

लिए: आह्वाण, - उपयुक्त प्रकार का. ब्राह्मण राजा के, अधीन नहीं होता और “करें.

ऊँ उप बल, च3ड 78 इहरिप पी २७ पक पक; + सत्य --

( रे६ )

आदि से मुक्त होता है, क्‍यों कि वह जो भी पुण्यकर्म करता है उसका लाभ राजा: को भी मिलता है

वास्तविक बाह्यण की योग्यता पर श्राद्धकालीन भोजन के प्रसंग में भी विचार किया गया है। उन योग्यताओं और अयोग्यताओं की विस्तृत सूची देखने से यह स्पष्ट हो जायगा कि ब्राह्मण वही है जो उत्तम आचरण करता है आचरण से च्युत होने पर वह आह्वाण भोजन का अधिकारी भी नहीं है। सम्मानपुर्ण जीवन व्यतीत करने वारछा और सदाचार का पाकन करने बाछा ही ब्राह्मण समझा जाना चचहिए। यदि हम धर्मशार्त्रों की या भारतीय संस्कृति की ब्राह्मण की इस परिभाषा और अहँता पर विचार करें तो ब्राह्मण से, विद्वान और सदाचारी, संयमी और गुंणवान्‌ से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए। श्रोत्रिय बाह्यण को तो सबसे उच्च स्थान दिया गया है जो स्पष्टतः उसकी योग्यता और सामाजिक जीवन में महत्ता के कारण है

किन्तु मौकिक रूप से ब्राह्मण को जिन कारणों से सर्वोच्च स्थान और अनेक विशेषाधिकार दिये गये थे, वे काछ्यन्तर में वर्णव्यवस्था के रूढ़ और कठोर द्वोने के साथ ही कम विचारणीय होते गये और ब्राह्मण केवल ब्राह्मण कुछ में जन्म के आधार पर. सम्मान और विशेषाधिकार के छोभी हो गये जिससे समाज में अन्याय और विषमता को स्थान मिछा। बड़े से बड़ें अपराध के लिए केवल वेशनिष्कांसन भौर प्रायश्वित द्वी उसके कछिएु दण्ड थां, जब कि उसके विद्वान्‌ होने के कारण अधिक दण्ड मिलना ही उचित ठंहरायां गया हैं। महापातक कर्मों के लिए केवक शरीर पर चिह्न छगाकर उसे बहिष्कृत किया जाता था। समान ही अपराध के लिए उससे निश्न वर्ण वार्कों को उससे अधिक दण्ड मिलता था।. उसके वध का पाप सबसे बड़ा पाप था उसे मिछा हुआ धन उसकी सन्‍्तान का हो जाता था | उसके बिना उत्तराधिकारी के मरने पर उसका धन श्रोत्रिय ब्ाह्मर्णो. को मिऊता था ३, १०, १९५ और उसे कोई अ्षत्राह्षण साक्षी के रूप में नहीं बुछ। सकता था। इनके अतिरिक्त भी ब्राह्मण को नेतिकता के नियमों की अवहैलना करके भी अनेक विशेषाधिकार केवक ब्राह्मण होने के नाम पर मिलके का संकेत भी घमंसूत्र में दिखाई पढ़ते हैं। का कर राजा और लोकठ्यवस्था--.....* मी

घंमसूत्र के अनुसार राजा का को है न्‍्यायपूर्वक दण्ड देंना ३. $. और

दण्ड देकर पथ से विचलित लोगों को -पुनः पंर्थ पंर लछाना। घह विपरीत . आचरण काछे को संभालता है:। और गुरु भी धर्म के विपरीतः कांय करें तो वहें .

_ उसे मार्ग पर चलने का आदेश दे सकता है। किन्तु राजा ब्राह्मण के ऊपर शासन नहीं करता वह उसकी सहायता से शासन करता है और उससे परामर्श लेकर

धर्म का विधान जानकर न्याय करता है राजा ब्राह्मण के अतिरिक्त सबका स्वामी होता है “राजा स्व॑स्थेष्टे ब्राह्मणवर्जम्‌ !? २. २. १। ब्राह्मण की प्रेरणा से कार्य करने वाला राजा समद्धिशाली होता है

(४० )

“बह्मप्रसूत हि. चत्वस्ूध्यते व्यंथत इति विज्ञायते ।” २. २, १४। राजा सबका रक्षक होता है और सबकी रक्षा के लिए वह युद्ध करता है। ब्राह्मण यदि धर्म का विधान करने वाला है तो राजा उसका पारून कराने वाला है इन दोनों के समन्वय से ही छोक की रक्षा होती है और सभी अपने उचित मार्ग पर चकछते

हैं। यदि राजा अपने कर्म में अयोग्य है और धर्म का पालन नहीं करता तो वह पाप

का भागी होता है। दण्ड देने पर राजा ही पापी होता है। इसी प्रकार यदि व्यवहार में राजा अन्याय फरता है तो धर्म की हानि होने से सभी को पाप लगता है--साज्षियों को, न्‍्यायकर्ता को, सभासदों को और राजा को भी। साहिसभ्यराजकर्तृघु दोषो धर्मतन्त्रपीडायास। २. ४. ११। राजा को समाज में बहुत सम्मान प्राप्त है और वह मधुपक द्वारा पूज्य होता है। ब्राह्मण भी उसे उचित सम्मान प्रदान करता है।

धमशास्त्रों की छोकव्यवस्था जनतांत्रिक प्रतीत होती है। राजा निरंकुश नहीं है, अपितु वह धर्म के लिए बाह्मण पर था योग्य विधिवेत्ताओं पर निर्भर है न्याय व्यवहार की व्यवस्था और प्रक्रिया तो बहुत ही जनतांञ्िक है और दण्ड देने के पूर्व अपराध के प्रत्येक पहलू पर विचार किया जाता है। न्याय हो, अन्याय हो यही दृण्डव्यवहार का मुख्य रूचय बारबार दुहराया गया छगता है। साक्षी के सत्य भाषण पर बहुत महंत्व दिया गया है और उसके असत्यभाषण का पाप और 'बहुत अधिक बताया गया है। इसी प्रकार परिषद्‌ के निणय मान्य ठहराये गये हैं जो एक की प्रकार पंचायत थी। अपने-अपने कम में उस कार्य के करने वाले संदांचारी व्यक्तियों के निंणेय को मान्य ठहराया गया है

“कषकवणिकृपशुपालकुसी दिकारंवः स्वे-स्वे वग !? २२. २३। इसी प्रकार राजा को परामंश दिया गया है कि पेचीढे मार्मछों में वहअंनुभवी और जानंकार छोर्गों की राय लेकर त्रिणय करे: “विश्रतिपत्तो त्रेविश्वे्रद्धेंभ्यः अत्यवह्ृष्य, निष्ठां 'गमयेत्‌”:२, रू रछ॥ |: ४०

इस प्रकार कुछ मिक्ाकर धमसूत्र की छोकव्यवस्था बहुत -ही समन्वयपूर्ण है। समाज के विसिन्न वर्गों में जिस सहयोग का विधान किया गया है वह एक उत्तम उद्देश्य की सिद्धि में सहायक है बाह्मण के अतिरित्त अन्य वर्ण के छोंग जत्रिय और: वेश्य अपने-अपने कम में.छूगकर धर्म, अर्थ, काम की साधना करें यही सबके लिए धर्मशाख को अभीष्ट है। सभी अपने कंम॑ में रत हों ओर सभी अपने योग्य काय करें। समाज में सामंजस्य हो और सब मिलकर एक पूर्ण समाज का निर्माण, विंकास करे और यही घर्म के अन्तर्गत की गयी चर्णव्यवस्था का मूछ उद्देश्य है।. परस्पर सहिष्णुता, समन्वय" और सहयोग की -तथा मानवता की सावनायें ही समाज का उंद्धार कर सकती हैं। भारतीय घम के इस कल्याणकारी... सन्देशों को ग्रहण करके बुराइसों को. दूर करके उन्‍हें भूछ जाना ही घम को . वत्तमान रूदय होना चाहिए हे

( ४३ )

गोतमधमंसत्र में नारी

“अस्वतन्त्रा घमम स्त्री” २.५.१ अर्थात्‌ पति का अनुसरण करना ही ख्री का धर्म है, वह धर्म में स्वतन्त्र नहीं होतीं। धमसूत्र में नारी के धर्म का मूलमन्त्र यह सूत्र ही है। सत्री पति पर आश्रित रहे और उसका अनुसरण करे इस कथन में धर्मसूत्र कोई नवीनता नहीं प्रस्तुत करते | बार-बार ओर विशेष बरू उसके पुरुषसंबन्ध- विषयक आध्चरण पर दिया गया है। स्ुह्मकर्म में और धार्मिक क्रियाओं में गृह्िणी की हैसियत से, सहधर्मिणी की दैसियत से, वह गौरचपूर्ण पद पर प्रतिष्ठित है किन्तु उसके इस रूप के विषय में कोई उदलेखनीय विशेषता नहीं है। जहाँ तक पारिवारिक या सामाजिक जीवन में नारी के स्थान का प्रश्न है उसके जीवन का रूचय है पुत्र या सन्‍तान की उत्पत्ति | पुत्र और सुयोग्य पुत्र की कामना ओर उसकी अनिवायंता धमंशासत्र की दृष्टि में केवल छोकिक या व्यावहारिक. दृष्टि से ही नहीं व्यक्त की गयी है. अपितु एक पारमार्थिक या पारछोौकिक दृष्टि से भी पुत्रपराप्ति ग्रहस्थाश्रम का छचय बतायी गयी है, क्योंकि सुयोग्यपुत्र वंश की कई पढ़ियों के पाप धो डालता है और अपने पूवर्जों को भी स्वर्ग की प्राप्ति कराता है। “पुनन्ति साधवः पुन्राः”ः आदि गौ० घ० सू० १. ७. २४-२७ यह धमसूत्र की अपनी कथनशेली है। वस्तुतः इसे यही कहना है कि कुछ की पविन्नता और मर्यादा सवोफरि है हा

धर्मसूत्र की दंष्टि में श्री का महत्व इसलिए है कि वह माँ है, सम्तान की जननी है ओर तभी तो धंमंसूत्र इस का स्पष्ट संकेत करता है कि सभी श्रेष्ठ जनों में माता सबंसे बढ़कर है। “आचारयश्रेष्ठो गुरू्णां मातेत्येके” १. २. ५६।

पवित्र सनन्‍्तान के छिए खत्री की पविन्नता अनिवाय है और इस पवितन्नता का संबन्ध कुछ की शुद्धता, वंवाहिक संबन्ध की धमसम्मतता, और आचरण की श्रेष््ता से है। सनन्‍्तान के जीवन विकास में माता का प्रभाव और योगदान सबसे स्रधिक होता है और इसी कारण घमंसूनत्र नारी की पविन्नता पर बहुतः गौरव देते हैं। गरृहस्थ के लिए, धम की रक्षा के लिए तथा जीवन एवं समाज के सन्तुरून के लिए विवाह एक अनिवाय और श्रेष्ठ व्यवस्था है, अतः घमंसूत्र विवाह, के प्रकोर, योग्यता, और वेधता पर विस्तार से विचार करता है। गौतमधर्मस्‌त्र में भी पत्नी की योग्यता, उसके भिन्न प्रवर के होने, मातृ एवं पितृपंच से रफक्तसंबध से दूर होने का विचार करके विवाह के भिन्न भेदों पर दृष्टिपात किया गया है और ब्राह्म, प्राजापत्य, ' आष और देव विवाहों को धर्मसंमत ठहराया गया है। .

चत्वारो धर्म्याः प्रथमाः ५१.४. १२ 'अर्थात्‌:बेद के विद्वान, उत्तम आचरणँ.वाले .

और एकपंटनीवत का पालन करने चाछे, अभ्निभावक द्वारा छुने गये या ऋत्विज्ञ .. 'बरः के साथ कन्या का-विवाह श्रेष्ठ है किन्तु अन्य प्रकार के भी विवाहँ प्रचलित थे और छनसें या तो युवक और युवती के पारस्परिक प्रेम संबन्ध को या वर एवं कन्यों- पक्षों के: बीच घन का आदान-प्रदान को अथवा पुरुष द्वारा कन्या आधछि. के किए बलंग्रयोग को निमित्त ब॒तांया गया है धमंसूत्र विवाह में इस प्रकारं की .

४२ 2)

स्वच्छुन्द्ता की अनुमति नहीं देते। हां, कुछ धर्मशास्त्रों में प्रेम या धनदान के: निमित्त द्वारा कन्या श्राप्त करके किये गये विवाह को उचित ठहराया गया है इसका संकेत गौतमधर्मसूत्र में किया गया है १. ४. १३

: विवाह की अनिवायंता पर धर्मसूत्रकार ने इतना बल दिया है कि वह अपनी सभी वर्णविषयक कठोरता को भो भूछ जाता है, वह व्यवहार और सिद्धान्त के बीच उलझ्ा सा दिखाई पड़ता है और विधाह के लिए काफी स्वतन्त्रता दे देता है। सवर्णविवाह को श्रेष्ठ बताने के साथ ही वह अनुलोम विवाहों भर्थात्‌ वर से निश्न वर्ण की कन्या के विचाहों को धर्मसंमत करता है, जिससे स्पष्ट है कि वेवाहिक संबन्ध में वर्ण अभी उतना अवरोध नहीं बना था। ब्राह्मण का शुद्ध वर्ण की कन्या को पत्नी के रूप में अहण करना धघ्मसूत्र को स्वीकार है। १. ४. १४। प्रतिकोम विवाह भी समाज में चलते दिखाई पढ़ते हैं, घर्मसूत्र को केवक इस प्रकार के विवाहों से उत्पन्न पुत्रों के ही प्रति सहानुभूति नहीं है वह उन्हें कोई धार्मिक स्थान संमाज में नहीं देता, किन्तु इस बात का मार खुला रखता ह्वेकि धर्मांचरण से वे अपनी उन्नति करें, उनके वर्ण का उत्कर्ष श्री हो सकता है। गोतमधघमंस्‌त्र प्रतिकोम विवाह. पर आघात करने के विचार से ही इस प्रकार से उत्पन्न पुत्र के विषय में कहता हैं : “प्रतिकोमास्तु धमेहीनाः” और यह भी कहता है कि शूद्रा ख्री से उत्पन्न पुन्न धर्महीन होता है और शूद्ध से उत्पन्न पुत्र पतित होते हैं उनका दशन, स्पश और प्रतिग्नह वर्जित है। १.४७,२२-२३। किन्तु सम्पत्ति में ऐसे घुत्र को भी अंश मिलता था ३. १० ३७। तथा ब्राह्मण के चारों वर्णों की : पत्नियों से उत्पन्न पुत्रों में. वर्णानुसार सम्पत्ति का विभाजन. द्वोता था। ये बातें इस तथ्य की ओर स्पष्ट संकेत करती हैं कि विवाह के किए वर्ण के अचरोंध की कठोरता में मी नरमी आसकती थी 5 हे _ इस विवाह की अनिवाय॑ता के कारण ही हमारों घर्मसूत्र विवाह योग्य छड़की को यह सुझाव देता है कि यदि उसके माता-पिता उसका विवाह यथासमय नहीं कर देते तो वह स्वयं पिता से प्राप्त अलंकारों का परित्याग करके अपने अमुकूछ ' युवक से विवाह कर छे। 9 “ब्रीन्कुमायंतनतीत्य स्वयं थुज्येतानिन्दितेनोत्सज्य 'पिश्यानलूकारान” ३. ९.. २०-विद्ाह कम के किए समाज़ के निश्नतम बर्ण से भी, शूद् वर्ण से व्यक्ति के भी और अपने वंण के अनुरूप कार्य-त्. करने वाले से भी धन लिया जा सकता है: : अव्याद्ात विव्ाइसिड्बर्थ ध्म्न॑तन्त्रसंयोगे शुद्वात्‌” २९ २७।.... गौतमधमंसूत्र की दृष्टि में श्री के लिए विवाह इतना अनिवाय है कि सूत्रकार क्रा तो यह मत है कि लड़की जब-छज्जा का. अनुभव करके बस पहलले की ओर ध्यान देने छगे. तभी उसका विवाह कर-देना चाहिए.) .. .' विंवाहें के असुंख छचय सन्तानग्रासति के लिए जिस स्त्री को घेम॑सूत्र यह आदेश

देता है कि वह' अपने पति के अतिरिक्त किसी दूसरे के विषय में सोचे भी नहीं।.

क्‍ “नातिचरेद्धर्तारम्‌” गो घमं० स्‌० २, ९, २। और वाणी, भेत्र और कर्म का संयम

।..,2॥ है

( ४बे 2

रखे, उसे पति की सत्यु पर, उसके सन्तानोप्पत्ति के लिए अयोग्य होने पर दूसरे पुरुष से योवनसंबन्ध से पुतन्न उत्पन्न करने का विधान करता है। अपतिरपत्य लिप्सुदंचरात्‌ २. ९. सन्‍्तानोच्तपत्ति एक पुण्य कम है, धर्म है और धर्मसूत्र की दृष्टि में नेतिकता की भावना इस धर्म के अधीन है। धसंसूत्र की दृष्टि में स्त्री ओर पुरुष के संबन्धों का मुख्य प्रेरक धर्म होना चाहिए काम नहीं। इस धम की छाया में नारी को धर्मसूत्र ने यथोचित गोरव विया है, परिवार ओर समाज में महत्वपूर्ण स्थान विया है। आचार्य क्री पत्नी आचार्य के समान पूज्य है और उसका नाम लेने का आदेश दिया गया है

“आचायतत्पुत्रदी कितनासानिं? $. २. २५। एवं उसका चरणस्पश शिष्य के लिए विहित है | विप्रोष्योपसंग्रहण गुरुभा्याणाम” १. २. १५९

किन्तु हमारे धर्मसूत्र सें नारी का एक और भी रूप आता हैं, जब वह्द किसो भी प्रकार के सम्मान की अंधिकारिणी होकर केवर मनुष्य की एक सम्पत्ति बना दी गयी है। विवाह के पवित्र बन्धन के अछावा उसका एक और भी रूप है. जिस रूप सें वह सामान्य मानवोचित न्याय भी पाने की अधिकारिंणी नहीं रह गयी है। उदाहरण के लिए सेंवाबूृत्ति करने वाली निम्नवर्ण की दासीं एक चल सम्पत्ति दिखाई देती है, उसे खरीदा और बेचा जा सकता है, बन्धक रखा जा सकता है. और उत्तराधिकार में प्राप्त किया जा सकता है। इन बातों का संकेंत गौतमधमंसत्र १. ७. १४ 'पुरुषवशाकुमारीवेहतश्च नित्यम! तंथा १. ७. १६ 'निरयमस्तु' में मिंछता है। दासी के विषय में विवाद का अश्न शीघ्र हल होना चाहिए २:४७, २५९ इससे ऐसा पता चलता है. कि दासी को लेकर उस समय झगड़े खड़े हो जाते थे और उसका न्यायालय द्वारा निर्णय होता था। बन्धक रखी हुईं दासी के विषय में तो बडी रोचक बात यह है. कि वह जिसके पास बन्धक रस्त्री गयी हो उसके द्वारा भोगी जा सकती है--'पशुभूमिस्लीणामनतिभोगंः पृ० २. ३. ३६-। इस सूत्र की टीका में हरदत्त ने इसका औचित्य यह कह कर ठहराया हैशक्षि.अपने घर में रखी हुई काम आने योग्य वस्तु रोज-रोज़ दिखाई पढ़े तो कोई कब तक

परहेज ओर संयम करेगा . “कथमनन्‍्तंरगृहे रश्यमानां गाँ स्वर ,तक्रादि क्रीव्वो पयुज्ञान उपेक्षेत, कर्थ वा बहुफलमारामं, केथं वा दासीं यौवनस्थामन्वहं परिचारिकाम ।” दूसरा उदाहरण दे. वेश्या. और व्यभिचारिणी ख्री का, जिनका उल्लेख भी

धर्मसूत्र में. मिक्तता है धर्ससूत्रकार की दृष्टि में ऐसी स्री के जीवन का कोई मूल्य नहीं उसका वध कर देने पर भी कोई ग्रायश्चित्त करने की जरूरत नहीं पढ़ती,

. अधिक से, भ्ष्निक एक. नीछवृष का. दान दे दिया और उसके वध के पाप से छुट्टी...

मिकत गयी बरद्धाबन्ध्वां.चकनायां नीलः | वेशिकेन्र.किंचित्‌ ३. ४.. २६, २७। धर्मसूत्र की दृष्टि में नारी को जो कुछ संमान आप्त है उसके दो आधार हैं--

वंण ओर आचरण. :निम्नवर्ण की. स्त्री. के साथ संवनन्‍्ध की मनमानी बरती जा

सकती हैः किन्तु उच्चवर्ण की स्री के साथ संबन्ध रखने पर उसके भीषण और

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'रोमांचकारी परिणाम बताये गये हैं। और कठोर प्रायश्चित्त का विधान किया गया है। जिस बात पर धर्मसूत्र बार-बार जोर देता है वह है स्री का आचरण कौर आचरणहीन सत्री. की अत्येक अवसर पर निन्दा की गयी है। ऐसी स्री का अज्न अभचय होता है २. ८० १७ पृ० १८३ पति के अतिरिक्त अन्य पुरुष से संबन्ध रखने वाली ख्री को एक वर्ष तक कठोर व्रत का जीवन बिताने का नियम है, जिस समय में उसे निन्दित और बहिष्कृत सी होकर अपने पाप का प्रायश्रवित करना होता है। जानबूझकर गर्भपात करना भी एक ऐसा कर्म है जोख्लरी को पतित बना देता है और ऐसी खी की दृष्टि यदि भोजन पर पढ़े तो भोजन खाने योग्य “नहीं रह जाता २. ८. ११। और अणहत्या करने वाली एवं अपने वण से निश्चवण्ण के पुरुष के साथ संबन्ध वाली स्री घोर पातकी होती है: “अणहनि हीनवणसे वायां चसत्रीपतति” ३. ३. ९।

किन्तु धमंसूत्रकरों की अभंगपूर्ण कठोर दृष्टि के बावजद्‌ भी. समाज में स्ली पुरुष संबन्ध की स्वच्छुन्दता चलती रहती हैं, इसे भी.स्वीकास गया है और नाजायज संबन्ध से उत्पन्न-पुत्नों का उल्लेख. अनेक स्थलों पर किया गया है। सम्पत्ति के उत्तराधिकार के सन्दर्भ में गूढोत्पन्न पुत्र, जो स्पष्टतः चोरी-छिपे अनुचित संबन्ध से उत्पन्न होता था तथा अविवाहिता स्त्री के पुत्र कानीन को भी सम्पक्षि में अधिकारी बताया गया है' इसी प्रकार विवाह व्यवस्था की कोठरता ओर पविन्नता के नियर्मो'के बावजद भी विवाह में स्वच्छुन्द्रता थी, एक पति का परित्याग कर खसत्री दूसरा विवाह कर सकती थी ३. १० ३१। पूृ० २८५। पर दो चार और गर्भवती के भी दूसरे पुरुष से विवाह करने का उद्लेख है। कुछ “सिल्वाकर यह स्पष्टतः प्रतीत होता है. कि धमंसूत्र एक पुरुष का एकःसत्री के साथ ही और एक ख्री का एक ही पुरुष के साथ संबन्ध को सीमित, करने पर हा देता 'है, हलछां कि समाज में उसके मान्य विचारों के. विपरीत स्थिति भी व्याप्त

. : / नारी पर सर्वाधिक इृष्टिपात यौनविषयंक नेतिकता के सन्दर्भ से किया गया . “है। ख्री-पुरुष के योनसंबन्धों के विंषय में नेतिक-अनेतिक का विचार तो इतना किया गया है कि कहीं-कहीं धर्म का एक यही नारा: सुनाई पढ़ता है “'ख्रींसे बचो”। धर्मंसूश्नकार की मनोवेज्ञानिक दृष्टि कभी-कभी तो फ्रायड जेंसी छगती है ओर ब्रह पुरुष के असामान्य योनाचारों पर भी नियम बनाने की आवश्यकता _ अनुभव करता है। ३. ७. ३६ ए० २६४४। यह ठीक है कि धर्माचरण के किए कार्मभांवना को संयमित करना आंवंश्यक है, पंरन्तु प्रत्येक अवसर पर कामुकता का भय उस प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जिससे समाज में दूसरी ओर धर्म 'की अपेक्षा काम को ही अंभ्रय मिलता है ओर कामसूत्र जसे ग्रंथों की रचना की पृष्ठभूमि: बनती है 'धर्मसूत्र बह्मचर्य को बड़ा तंप॑ मानता है. २०४। और बंहचर्य धर्मांचरण का- आवश्यक अंग हैं। विद्यार्थी जीवन में इस घत का बड़ी 'कृठोरतों से पान करने का. आदेश बार-बार दिया गंया है हमारे धमंसूत्र में कंहा गया है कि अंह्मचारी को किसी स्लरी पर दृष्टिपात नहीं करना चाहिए, इससे कामंआवं ना के उंत्तेजन की आशंका रहती है--

+>+५ ह९20५24र ७४850 07803 800 2%0मश २३१७-३८ आकर सपा नया तपाद52 करत" शानाह-याक्‍शाननत0२५०७३५७०«>+इ२०क “५५५. जूही सताअनसज«वामानप-+मलास--८सकइस०++न+ है श्

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“ख्रीग्रेक्ञणोल्म्भने मेथुनशंकायाम” १. २. २२ यहां तक कि यदि गुरुपत्नी भी- युवती हो तो उसका चरण नहीं छूना चाहिए “नेके युवतीनां व्यवहारप्राप्तेन” १. २. ४० ब्रह्मचय में ख्लीसंबन्ध के व्याग पर इतना बल दिया गया है कि त्रह्मचर्य- मंथुनत्याग का पर्यायवाच्री हो जाता है और उसके अन्य आचरण गौण हो जाते. हैं। सामान्यतः कुमारी छड़की पर दृष्टिपात करना निषिद्ध बताया गया है और उनके आलिंगन का स्पष्ट निषेध किया गया है।

ख्री के साथ अनुचित संबन्ध के छिए प्रायश्रित्त एवं दण्ड का विधान भी उस ख््रीके उच्च वर्ण के होने के आधार पर किया गया है। शूत्र की स्री के साथ कोई अनुचित यौनसंबन्ध रखे तो वह कोई बड़ा पाप नहीं हैं, किन्तु साथ ही साथ सामान्य रूप में परसख्ीगमन के छिए दो वर्ष के प्रायश्रित्त का विधान

| है तथा भोत्रिय ब्राह्मण की पत्नी के साथ व्यभिचार के किए तीन वर्ष

का बह्ाचरय बताया गया है। ३. २. २९५, ३०। समाज में सबसे ऊंचा. स्थान गुरु का है और गुरुपत्नरीगमन सबसे बढ़ा पातक , है। उसके लिए घोर प्रायश्रित्त करने का नियम बताया गया है। और ऐसे पातकी के पाप तभी दूर होते हैं जब्र वह छोड़े की अप्नि में तपने से छाछू बनी हुई ख्रीमतिमा का आलिंगन करके या अपनी जनेन्द्रिय आदि का उच्छेद कर: नेत्रटव्य दिशा में चकते-चलते रूत्यु प्राप्त करते हैं। निकटसंबन्धवाली स्त्री के साथ व्यभिचार के लिए भी इसी प्रकार का आयश्रित्त बताया गया है। किन्तु दूसरी ओर कुछ आचार्यां के इस मत का उद्लेख भी किया गया है क्रि गुरुपत्नी के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों के साथ अनुचित संबन्ध होने पर महापातक नहीं होता स्रीष्वगुरुततूपं पततीत्येके। वर्ण के अतिरिक्त रक्तसंबन्ध स्त्री के श्रति योनाचार के पाप का निर्णायक आधार है। बत्रह्मचय मंग करने वाले अवकोर्णा के लिए भी कठोर आ्रायश्रित्त बताया गया है। इन सब उल्लेखों से यह स्पष्ट होता है किसी की पवित्रता, धर्मंसूत्र के समाज में सर्वोपरि थी, किन्तु साथ ही साथ जनेतिकता स्वाभाविक रूप में थी। नारी मां के रूप में पृज्य भी थी, किन्तु किसी बस्तु के समान केवछ भोग की सामग्री भी थी। समाज और परिवार के भीतर उसे कुछ महत्व तो प्राप्त अवश्य था, किन्तु उसके व्यक्तित्व को कोई विकास की स्वतन्त्रता नहीं थी। स्लीसंबन्ध विषयक नेतिकता के विचाराधिक्य ने अवश्य ही नारी की

प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाया और कुछ मिकाकर उसका वह स्थान नहीं था, जो उसे...

वेदों और उपनिषदों की परम्परा में श्राप्त था। सूत्र के समय में नारी की इस हीन' दशा का मुख्य कारण था उन्हें निन्दित, अपविन्र, मानने की अवृत्ति तथा बह्मचर्य की रक्षा में उन्हें शत्रु समझने की घारणा। साथ ही साथ पृत्रप्राप्ति मात्र को सुख्य आध्यात्मिक लूचंय मानकर विवाह एवं पति पर आश्रित होने को ही नारी का...

... अन्तिम अयोजन ठहराने से धमसूत्रकाछ की नारी मानवीय अधिकारों से वंचित .. * - और पंद्वुलतित भी दिखाई देती है, परन्तु सारा दोष धमंसूत्रों का नहींहै। ... 'धर्मसूत्र की मौछिक व्यवस्था में अच्छाइयां भी हैं किन्तु उसकी दृष्टि तो भविष्य

पर है और अतीत पर, एक के विषय में उसकी दृष्टि संकुचित है और दूसरे को वह बहुत-कुछ भूछा सा छूगता है। यौन विषयक नेतिकता के सन्दर्भ में धर्मंसूत-

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कार भी वही कहता हुआ प्रतीत होता है जो शेक्सपियर ने कहा है- “हे नेतिक दुबंछते, तुम्हारा ही नाम नारी है ।” अथवा महाभारत की तरह वह भी यही कहना चाहता है कि नारी दोषों की खान है, उसको कोई स्वतन्त्रता नहीं मिलनी चाहिए:

स्रीभ्यः किंचिदन्यत्‌ पापीयस्तरमस्ति थे ।'**

कुरधारा विष सर्पो वह्िरित्येकतः स्तियः

धर्मशाखकारों से छेकर भागे के समूचे साहित्य में भी यह अधृत्ति हमेशा के लिए जाती है कि नारी झूठ बोलने वाली, अविश्वसनीय, भविबेकी, घूते, मूर्तर, छोभी, अपविश्र और निर्दंय होती है, पथअष्ट करने वाली द्वोती है

नारी के प्रति यह अन्याय की दृष्टि और नेतिकता.. को आडम्बरसरा आग्रह समाज के एक महत्वपूर्ण, अधिक प्रभावशाली और स्रधिक़ मानवीय अंग को चिरकाल के लिए पंगु बना:देता है और वह अपनी सही दिला भूछ जाती है। धर्म के. साथ कास को समन्वय और अखेंद के सद की ओर प्रयाण का भारतीय सन्देश समाज की वर्तमान मोहनिशा के. लिए सुमतिदायी सविता है, भावी जीवन की आशा है।

--उमेशचन्द्र पाण्डेय

ध्तािदधतन अष्उप्क 5 सा |. पे पक शत

3:90: 200//200८ 2४ ४७७४७७४०४ अं ०७ शक भेज

विषयालक्रम ( भूमिका )

सूत्रसाहित्य

धममसृत्र

बोौधायत- पससूत्र आपरस्तम्बन + हिरिण्यकेशि- » वसिष्ठ- |; विंध्णु- >> हारोत ; 2२ शंखलिंखित-

अन्य सूच्नग्रन्थ अमेसत्रों का वण्ये विषय घमसूत्र और सरुमृतियाँ गौतम धर्मसृत्र ,

गौतम धम्मसूत्र में अन्य साहित्य का उल्लेख

गौतम घम्सत्र का सामवेद से सम्बन्ध धर्मसूत्र के रचयिता : गौतम

गौतम धर्मसत्र के संस्क्रण और टीकाकार गौतम धमसत्र में वर्णित विषय

धर्म

बर्म के उपादान

भारतीय धर्म का स्वरूप

आचार और नेतिक भावना

गौतम घर्मसज्न में वर्णाश्रम धर्म वर्ण-व्यवस्था

शूद्र की स्थिति

ब्राह्मण के विशेषाधिकार . राजा और छोकव्यंवस्था गौतम धमसूत्न में नारी

| >नशऔधक.

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2 १७ पृ २० 99 ३४ शई्‌ ३८ ३९

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विषयानुक्रम प्रथम प्रश्न प्रथम अध्याय धर्म का प्रमाण 3

अति और स्मृति के विरोध की स्थिति में निर्णय “"* आह्ाण के उपनयन का समय ४4५

क्षत्रिय और वेश्य के उपनयन का काल »०० आपद्यपनयन का समय ०५० उपनीत ब्रह्मचारी की मेखला *** उपनीत ब्रह्मचारी का दण्ड *+* द्रव्यशुद्धि ., 8 रस्सी आदि की शुद्धि हे शौच का नियम हा आचमन की विधि ००० दो बार आचमन का निमित्त दांत में लगे उच्छिष्ट के विषय में विचार ््दं दूषित पदार्थों के लेप की शुद्धि 22 गुरूपसदत की विधि *»* प्राणायाम बा गुरु के चरण छूने का नियम **- गुरु और शिष्य के बीच किसी प्राणी के आने पर नियम. द्वितीय अध्याय.

ब्रह्मचारी के नियम ४5

अनुपनीत के लिये आचमन कां विधान नहीं है

अनुपनीत के विषय में शौचनियम, का,अभाव . ' अनुपनीत के लिये पिञ्य कर्म और वेदोच्चारण का निषेध, . उपनीत व्यक्ति के लिये ब्रह्मचय का विधान.

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.. संध्योपासन की विधि

( )

उपनीत के लिये होम और भिक्षाचरण का विधान सत्यभाषण का आदेश हे : सतान का आचार

-सुय को देखने का निषेध ५५ : त्याज्य वस्तुयें तथा सुख

गुह् के निकट बेठने का आचार जुआ, निम्नकोटि की सेवावृत्ति और हिंसा का त्याग आचार्य आदि का नाम छेने का निषेध हा

अदलील तथा कष्टकारी वचन एवं मादक द्रव्य का त्याग जे गुरु के निकट सोने/का नियम आम

शुरुकुंछ में निवास के नियम . गुरु के पारिवारिक जनों के साथ ब्यवहार

यात्रा से वापस आने पर गुरु के चरण छूने का विधान भिक्षा के विषय में नियम भोजन करने का ढंग दिष्य को दण्ड देने का नियम

.. ““शुरुकुल में निवास की अवधि 5 अचार की श्रेष्ठा... तृतीय अध्याय आंश्रम का विधान... ००० गृहस्थाक्रम का महत्व | ४४ नेष्ठिक ब्रह्मचारी पु सनन्‍्यासी के द्रव्य-संग्रह की निषेध 0

संन्यासी के नियम संन्‍्यासी के लिये भिक्षा का नियम ) णी, नेत्र और कम का संयम

,कौपीनधारण का आदेश ६... ... . ४:

. स्व्रेत: गिरे हुए फल आदि का भोजन. 5... !*! 'भ्राम में निवास कां तियम 0 9 9. हल

]

प्राणियों के प्रति दया... . ..,

१९ १९. १९. १९ २० शा 3 नर हक

.रर 6 र्३

श्र श्र २६ २७ २७ र्ष २९

३७

३१

३९ ३२ ३२ ३३े ३९ऐे ३३ ३४ ३४ ३४

( ४3 )

खानप्रस्थ के नियम

वानप्रस्थ में भोजन का नियम चतुर्थ अध्याय गृहस्थका धर्म 3४ विवाह में प्रवर का विचार कक ब्रह्म विवाह आर्ष विवाह ३३ देव विवाह है गान्धर्वं विवाह 5 आसुर विवाह राक्षस विवाह हा पंशाच विवाह कं

धमंसंगत विवाह अनुलोम विवाह का नियम

प्रतिछोम विवाह से उत्पन्न पुत्र... 77...

वर्ण का उत्कर्ष और अपकर्ष क्‍ प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न पुत्र के धर्म का अभाव सदाचारी पुत्र. का

पंचम अध्याय _

गर्भाधान का समय

पंच महायज्ञ क्‍

स्वाष्यायं का नियम *** पितयज्ञ. अं

. अम्मिक्र्म की अवधि अंक 3 2

'.. / अभिक्षा देते का नियम

दान देने की विधि हल गृहस्थाश्रम में भोजन करने का नियम *-* मधुपर्क का समय *.... उडरे

'मधुपक के अधिकारी " . ++«

३४ ३३६

४६

४७ ४७ ४प८

४९ ५१ २१

हे

प्३ ५४

४४८ 5 बैठने और संभाषण' में पविश्रता का विचार 53%: ', ण०

(9)

अतिथि का सत्कार का नियम है प्र्फ कुदल पूछने का ढंग ३५ पद पषष्ठ अध्याय क्‍ माता-पिता की पूजा 522 ५७ अभिवादन का ढंग की श् यात्रा से लोटने पर अभिवादन का नियम ६५ ५९ विभिन्न व्यक्तियों के प्रति अभिवादन का तियम' ''* ६० क्‍ वेद के ज्ञाता की श्रेष्ठ. जी ६२ "| सप्तम अध्याय | _ विद्याग्रहण करने में आपत्कालीन नियम रे ६५४ हे गुरुसेवा नहर छः ॥। गुरु ब्राह्मण ही हो सकता है हक ६४: क्‍ ' वर्णातुसार कर्म के नियम में छूट हे ६५ हे ७३ ; ५! ब्राह्मण द्वारा अविक्रय वस्तुय कर ६५ ब्राह्मण द्वारा वस्तुओं के विनिमय का निषध *'* ६७ आपत्काल में शुद्रवृत्ति कक ६८. क्‍ अष्टम अध्याय समाज में राजा और ब्राह्मण का स्थान. है छ७ ... : बहुश्नुत व्यक्ति ६०... 8 कज 8 2 ली हे '... बहुत ब्राह्मण के विशेषाधिकार न, ७२ .. संस्कारों की गणना | कक ७३ आठ भात्गुण. सर छ्प्र्‌ पी क्‍ . 'संवम अध्याय ल्‍+ अत्ों के पालन का आदेश ७७ . पैविश्नता का नियम... १28७ |: छ्य हे ... वस्त्र-धारण के विषय में नियम हू, 6 १, . एप .. जल पीने और आचमन करने के विषय में नियम... . ७९

मे # अंडकिकलय .

ञज्फ हिल जम

ही के 2९००७ न-कअन>मन जप ४५ ८4

शाँद्र के लिये आचमन और श्राउइचकर्म

( £ 9) अशुभ शब्दों के प्रयोग का निषेध संभोगोपरान्त शुद्धि संभोग के लिये वर्जित र्री निषिद्ध आचार

आत्मरक्षा का आदेश मूत्र और मल त्याग के शौचाचार

धर्म, अर्थ और काम के सेवन का काल *** दारीरिक चपलता का त्याग * बट भोजन के विषय में आचार +«० सोने का नियम हक

स्तान का नियम है योगक्षेम का प्रयत्न हु प्रदक्षिण के योग्य वच्तु तथा स्थान

वचन और स्वभाव की सत्यता

वेदाध्ययत और सदुगुण

द्वितीय प्रश्न प्रथम अध्याय

आश्रम धर्म, ब्राह्मण के कर्म

राजा या क्षत्रिय का कर्म

युद्ध में जीती गयी सम्पत्ति का स्वामित्व

राजा को दिया जाने वाला कर

राजा की वृत्ति की व्यवस्था राजा के लिये कार्य करने वाले श्रमिक हा खोई हुईं वस्तु के मिलने पर स्वामित्व चोरी गये हुये धन के राजा द्वारा दिये जाने का नियम नाबालिग की राजा द्वारा रक्षा वेदय का अधिक धन

शुद्र, चतुर्थ वर्णं

शुद्र के लिये भी सदाचार का विधान मम

49% को

दाद के छिये उच्च वर्णो की सेवा का तियम हे

८९ पर प्र्२्‌ः परे प््द प्र्थ पद प्र्छ ध््पः य्प ८९. ६०- 0८ ९६

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( ६)

जद्र की वृत्ति 'शुद्र के लिये यजन की व्यवस्था पर विचार

द्वितीय अध्याय

राजा का स्वामित्व

राजा के गुण

ब्राह्मण द्वारा राजा का आदर

वर्णो' एवं आश्रमों की राजा द्वारा रक्षा

'पुरोहित की योग्यताये राजा के लिये ब्राह्मण का महत्व... कर ज्योतिषी का महस्व .. .. ' अभिचार कमे हिल गृह्मय और श्रौत कम

राजा के व्यवहार के साधन धर्म का निर्णय करने की प्रक्रिया दण्ड का विधान

तृतीय अध्याय

शुद्र के लिये वाणी आदि के अपराध में अंग कटवाने का दण्ड शद् के लिये वध का दण्ड... हक

क्षत्रिय को कठोर वचन के लिये दण्ड वैश्य को उसी अपराध के लिये दण्ड उसी अपराध के लिये ब्राह्मण को दण्ड है अत 'हाद के लिये धन चुराने पर दण्ड वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण के लिये चोरी का दण्ड पशु द्वारा खेत का नुकसान होने पर दण्ड...

धर्मातुसार व्याज का नियंम गे. बन्धक रखी गयी वस्तु के विषय में नियम ४. क्‍ व्याजं॑ की थृद्धि के प्रकार हक बन्धक रखी गयी वस्तु का उपभोग... ... ६...

उत्तराधिकारी द्वारा ऋण का भुगतान

१०६ १०७

र०ण्् १०८ १०९ ११० ९१० १११

१११

११२ पे १६११३ ११४ ११५

११७ श्श्छ ११८ ११९ १५९ १२० १२० १२१ १२३ १२४ १२५ १२६ १२७

( )

उत्तराधिकारी द्वारा दिये जाने वाले ऋण 'धरोहर के नष्ट होने पर अपराधी होना घोर द्वारा अपने अपराध की घोषणा इस प्रकार के चोर के छिये राजा द्वारा दण्ड बाह्यण के लिये शारीरिक दण्ड का मिषे . ब्राह्मण के छिये विशेष प्रकार के दण्ड

चोर को सहायता देने वाले का अपराध

पुरुष की दाक्ति और अपराध के अनुरूप दण्ड ४5.

चतुथे अध्याय जटिल विवाद में साक्षियों की सहायता से निर्णय साक्षी के गुण साक्षी के लिये दोष या दण्ड का विचार धंम की हानि का परिणाम 4९%

साक्षी को असत्य भाषण से लगने बाला पाप “४

_असंत्यभाषण से प्राणरंक्षा होने पर दीष का अभाव न्यायकर्ता. ६... क्‍ विवाद के निर्णय की अवंधिसीमा

. पंचम अध्याय मृत्युविषषक आशौोच गा क्षत्रिय के लिये आशौच की अवधि बैदय के लिये आशोच की अवधि

शूद्र के लिये आशौच की अवधि... दो आशौच लगने पर शुद्धि की अवधि अल्पकालीन आशोौच

जन्म. का आशौच

गर्भपात. का आशोच

मृत्युविषयक आशोच की कुछ अन्य दशाय 'पक्षिणी आशोच विभिन्न आशौच

अह्याहत्याके दोषी आदि के छूने पर शुद्धि का नियम

श्श्८ श्श्८ १२९ १२९ १२९ १२९ १३० १३१

१३२ १३२ १३४ १३५ 3.

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श्श्८ १३५

१४९ श्र ... (४२ चर शछ३ १30 की

१४५८ १४७ श्ड्घ १४९ १४९ १५१

( )

शवयात्रा में जाने पर शुद्धि का नियम हक १४२ कुत्ते को छूने पर शुद्धि का नियम ही १५३ उदकदान्‌ १५४ « राजा सदेव पवित्र होता है कर १५६ षष्ठ अध्याय श्राद्ध का विवेचन 0 ९५७ & श्राद्ध की तिथि शक श्श् ब्राह्मगभोजन' का नियम 82 १५९ निमंत्रित ब्राह्मण की योग्यता गा १६० श्राद्ध करने का अधिकारी... « ./*.... .. १६९ किन ब्राह्मणों को भोजन करावे कक्ष . १६२ श्राद्ध के दिन-रात में संभोग का निषेध १६४ दृषित भोजन हक... +%+. 5, भोजन कराते योग्य स्थान हल १६५ पंक्ति को पवित्र करने वाले ब्राह्मण के .. १६६ क्‍ वेदाध्ययत आरम्भ करने की वाषिक तिथि *'** १दृ८ अध्ययन का सत्र 935) 9. पुद्क |, अध्ययनकाल में किये जाने वाले आचार, : ** ४.६९ हु ही, नध्याय के अवसर... &ञअ४ | (१७० है वेदाध्ययन के लिये अनुपयुक्त स्थान... लग बन मी ७१ की अनध्याय की अवधि हक «आऋ .... १७२ हा नगर में वेदाध्ययत का निवेध..... ४... १७७ | 25 अष्टम अध्याय क्‍ . ब्राह्मण द्वारा द्िजाति के घर में ही भोजन का नियम १७९, दान के विषय में नियम और अपवाद हक १७९ " अन्न ग्रहण करने और भोजन के नियम के अपवाद ' श्दरै . अभीज्य अन्न श्८र अपेय दुःघ कब डक श्प्प्‌,

अभक्ष्य पशु और पक्षी. .- /*+ १८

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अभक्ष्य पदार्थ अभक्ष्य पक्षी हा क्‍ नत्रम अध्याय स््रीके धर्म स्वी के रिये स्वतन्त्रता वर्जित *** धंयम का आदेश 24 नियोग का विधान ***

5.4

नियोग से उत्पन्न सन्‍्तान के विषय में निर्णय पति के प्रश्नजित होने पर स्त्री के करतंव्य

बड़े भाई के विदेश जाने पर छोटे भाई द्वारा कन्याग्रहण कन्या द्वारा स्वयं पति का वरण शक ऋतुकाल के पूर्व कन्या का विवाह 2 कन्यादान की अवस्था हक विवाह के निमित्त द्रव्य लेने के विषय में विचार

भोजन के अधिक संचय का निषेध

. ततीय प्रश्न प्रथम अध्याय

प्रायश्चित्त के निमित्त 4; प्रायश्चित्त की आवध्यकता के विषय में विवाद पाप से शुद्धि के साधन ३५ जप और उनके प्रकार जप करने वाले व्यक्ति का आहार जप आदि के स्थान तप और उनके प्रकार दान में दी जाने वाली वस्तुयें

प्रायश्चित्त की अवधि पाप के अनुसार प्रायश्चित्त

..... द्वितीय अध्याय

: त्याज्य पिता

त्यांगे का प्रकार...

श्द्फ़ श्प्प

१९० १९० १५९० १९१ १५९४ १९३ १९३ १९४ १९४ १९५ १५४ १९६

हल कं * ] 9 दर है | 4 ्ः + + / हक हे हर ; |] हर ५8 + 59 ॥4

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२०५०. २०२

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२०२७७ २०५७ .

( १० ) 'स्यक्त व्यक्ति से संबन्ध रखने वाले का प्रायश्चित्त 'परित्यक्त को पुनः शुद्ध करने की विधि हद तृतीय अध्याय बाह्यण की ह॒त्या करने वाले का त्याग पावक कम में प्रेरित करने वाछे का पाप. '** 'पंतित का द्विजाति कर्म से बंचित होना डे नरक को अवस्था हक 'परस्त्रीगमन के विषय में पतित होने का विचार स्‍त्री के पतित होने के निमित्त डक महापातक के समान पापकर्म | कक उपपातक कक 2. बज

.. ऋत्विज़ और आचार्य के त्याग की अंवस्थां "*'*

“माता-पिता के साथ अनुचित व्यवहार का निषेध

"पतित माता-पिता की सम्पत्ति का उत्तराधिकार ब्राह्मण को दोष मढ़ने वाले का दोष के 'बआह्यण के ऊपर हाथ या हथियार उठाने वाले का पाप

चतुर्थ अध्याय | प्रायश्चित्त का वर्णन

अम्िमें कूदकर प्रायश्वित्त करना... ७४

युद्धमें लक्ष्य बनकर प्रायश्चत्त.. / . ४४: 'पतित का जीवन

पापसे मुक्त होने की स्थितियाँ क्‍ ०० का ; क्षत्रिय के वध का प्रायश्चित्त पक हब

बे रथ क्रे ' 9 के .: प्वदय के वध का प्रायश्चित्त .. के

) न्‍ हल! शुद्र के वर्ष है का प्रायश्चित्त |क्‍ ) शा *भक

,. अनात्रेयी के बध का प्रायश्चित्त गाय के वध का प्रायश्चित्त .. . हः छोटे जीवों की हत्या का प्रायश्चित्त हब

... नपुसंक की. हत्या का प्रायबिचेत .. - ८. हे *

सं की हत्या का प्रायश्चित्त बे

:. .. “्यक्निचारिणी स्त्री के वंध का प्रायश्चित्त ही

२०६

२०५६

33 ६330 २१३ २१४ २१४ २१४

११५

२१५ २१६ २१७ २१७ श्श्८ श्श्द

२१९

२१९ २६२०

र्‌ . २२४

२२५ २२५ ११ २२६ श्य्द २३० २३० २३०

हब 2,०७५ इभिजेकलकजनक एस ब्एूथ पद शती 4 - ०५००. +.. 5५० प्रतीक

अज्कुष्ध् 7 न्त्- वध हे च्यू 5 के अधि आर मम 2 डे रा थक

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_ पते ने > सिनेक नह उपर सन हुक : 2.5 # एस शक इरथवीवक लक कह बाप चिपक पलक - चए आज

( ११) वेश्या के वध का प्रायश्चित्त *०* परस््रीगमन का प्रायश्चित्त *ट

श्रोत्रिय की पत्नी के साथ संभोग का प्रायश्चित्त परस्त्ी से प्राप्त धत के विषय में विचार ***

अन्य-उपपातक के दोष का प्रायश्चित्त १०»

व्यभिचारिणी सत्रीकेलियेब्रत 5३५

पंशुमैथुत का प्रायश्चित्त *०« ही पंचम अध्याय सुरापान का प्रायश्चित्त ३६६

अज्ञानवग सुरापान करने का प्रायश्चित्त

अमेध्य के निगलने पर प्रायश्चित्त »००५

वजित मांस खाने पर प्रायब्चित्त सा

सुरापान करने वाले की गंध पाने पर प्रायश्चित्त गुरुपत्तीगमन का प्रायश्चित्त

गुरुपत्नीगमत के समान अन्य, पातक पा प्रायव्चित्त करने वाली स्त्री के लिये दण्ड . “७.

वीय॑स्खलन आदि का प्रायश्चित्त

. सूर्योदय के बाद उठते का प्रायश्चित्त कल

अपवित्र वस्तु के दर्शन पर प्रायश्चित्त अभोज्य वस्तु के भोजन पर प्रायद्चित्त आक्रोश करने का प्रायश्चित्त विवाहादि में झूठ बोलना पाप से मुक्त इसके अपवाद

वर्जित दा में स्रीगमन का प्रायश्चित्त

पृष्ठ अध्याय रहस्य का प्रायब्चित्त. ... “ब्राह्मण बध का रहस्य ' सत्तम अध्याय

ब्रह्मचय भंग करने वालोंका प्रायश्चित्त

अष्टम अध्याय कृच्छू आदि का स्वरूप ' अतिकृच्छू के विषय में विशेषता

२३ ७०* र्‌३ २३१ २३२ र३२ २१३३ २३४

र३०. २३3६ २३७- २३७ २३८ श्र

रह० . रधर

२४४ २७४५ २४५

5. रश्०

२५१ २५२'

२५४७४

२५४

२५६२

२६२:

रा + +॥ है ते हर * ना 7 (7, 58 र्‌ प्र र्‌ 0 | १5० यो चर ; के # |

[५ 5.)

कृच्छातिकृच्छु का स्वरूप 'कुच्छू इत्यादि के आचरण का फल

नवस अध्याय चान्द्रायण की विधि 'चान्द्रायण का फल

दशम अध्याय सम्पत्ति का बंठवारा पिता के बाद और जीवन काल में विभाजन 'पशुओं के विभाजन के विषय में विशेषता *'* उसका अपवाद हा अनेंक माताओं वालों के बीच बंटवारा का ढंग '** ज्येष्ठ पुत्र को बड़े बैल की अतिरिक्त प्राप्ति "पुत्र होते पर सम्पत्ति के उत्तराधिकार का विचार स्त्रीधन **- बंटवारे के बाद मृत अ्राता के धन- का विभाजन '** वित्ता बंटवारे के मरे हुए श्राताओं के विभाजनका प्रकार : अँंटवारे के बाद उत्पत्त पुत्र का हिस्सा '

. मुंखे आता के छिये विभाजन की व्यवस्था

औरस आदि छः प्रकार के पुत्र का उत्तराधिकारं

असवर्ण पुत्र का विभाग

अन्याय का आचरण करने वाले सवर्ण पुत्र के लिये भी विभाग का अभाव कु

पिना पुत्र वाले ब्राह्मण का विभाग

विना पुन्न वाले क्षत्रिय का विभाग.

मन्दबुद्धि और नपुंसक का पार्लनपोषण

परतिलोम विवाह से उत्पंत्न हुओं का विभाग

'जेंछ आदि का विभाग नहीं संदिग्ध विषयों का निर्णय 'प्रिषतु का लक्षण _शिष्टवचने करने के संबन्ध में प्रमाण . “धर्मशारत्रों की प्रशंसा

२६.७ २६७

२६९ श्छ२

र्ज्प्‌ २७४५ २७६ २७७

२७७

२७९ २७९ श्८ श्र रश्प्र श्द्३्‌ र्८४॑ र्द५्‌

' प्र हैं | ] हि + +े हे 7 !' (६ पूछा छु 0 5 7५ की रे ; ; ] दा मि + [हा हे | 7 5 4, ५७ 7 5 दे गा 3

7 शेधव,

र८९

स्द्वष

र्८९ र्‌८९ २९० २९० २९१ २९१

है ;

| 5० तत्सदूत्रह्य 4 नमः ।।

गोतमधममसत्राणि सानुवाद मिताक्षरावाति साहितानि

अथ प्रथमप्रश्ने प्रथमो5ध्यायः + वेदों धममूलम्‌ १॥

नमो रूद्राय यद्धमशा्त्रं गौतमनिर्मितय |

क्रियते दर॒दत्तन तस्य वृत्तिभिताध्रा || कंमजन्योउम्युद्यनि:श्रयसहेतुरपू॒त्रीर्य आत्मगुणो घमः। तस्य मूलं॑ प्रमाणम्‌ वेदी :सन्त्रत्नाह्मणात्मकः जातावेकब्रचनम्‌ | चत्वारो. बेदा ऋग्यजुःसामात्मकास्त॑ एवं घर्म प्रमाणघ्‌। योगिप्रत्यक्षं नानुमान

. नार्थापत्तिन शाक्याद्यागमा | तेने तस्मूछा एबोपनयनादयो धर्मों

वक्ष्यन्तेः चेत्यबन्दनकेशोल्लुख्बनादय इति। 'घमग्रहणमु पछक्षणम्‌ | अधमेस्थावि प्रतिषेधात्सको वेद एवं सूलम्‌। निषेधषिधयों दि. अह्ा- हत्यादौ विषये प्रवृत्त निव्रतेंयन्ति ) रागह्ंघादिना विषये अ्रकृत्त- स्तता निवतयितु शक्‍्य:ः | यद्यसों विषयोवनुष्ठित: प्रत्यवायदेतुन रुवादिति निषेधविधिरव प्रत्यवायद्वेतुतां गमयति |

(चारों ) वेद धर्म के मूल (प्रमाण) हैं १॥ . मम

अथ यत्र प्रत्यक्षो वेदों मूलभूतो नोपपद्यते तत्र कथम्‌-- तद्िदां स्वृतिशीले तहिदां वेद॒विदां मन्वादोनां या स्घृतिप्तणीत॑ धमंशारत्र॑ यच्च तेषां शीलमनुष्ठान॑ ते स्मृतिशीले अस्मदादीनां प्रमाणम्‌। तेषा- मनुष्ठान निमूलं सम्भवति सम्भवति वेदिकानासुत्सन्नपाठे वेदानु- भव इति। तेषां तु तदानों विद्य मानत्वेन सम्प्रदायाविच्छेदाचच बविका- नृष्ठानं वेदसूछमेव यथा5५ह55पस्तम्ब:-- तेषामुत्सन्ना: पाठाः प्रयोगादनुमीयन्त इति २॥

; हु हे | जा |] 3 का

गोतसधमसूत्राणि

- उन ( वेदों ) के ज्ञाताओं (मनु आदि ) को स्घति तथा ( उनके ) ( धर्मानुकूल ) आचरण (भी प्रमाण हैं )॥

यदि शीलं प्रमाणम , अतिप्रसन्ञः स्थात्‌ | कथम्‌ , कतकभरद्वाजों व्यत्यस्य भांये जगमतु। वर्स्िष्रक्चंणएड|लीमक्षमालाम्‌ | प्रजापति: सवां दुष्षिरम्‌ रामेण पितृयचनादविचारेण मात) शिरश्छन्नमित्यादि साइसमपि प्रमाण स्थात्‌ नेत्याइ-

* हृष्टों धमव्यतिक्रेमः साहसं महताम्‌ ||

महतामेतादेशं साहुसमपि धमव्यतिक्रम एवं हृष्ट! तु घम: रागह्रंषनिबन्धनत्वात्‌ ||

महान्‌ पुरुषों के साइस कर्म भी ( जैसे प्रजापति द्वारा अपनी पुत्री का भोग या परशुराम द्वारा पिता की भाज्ञा से माता का शिर काटना आदि ) धमम . के व्यतिक्रम के रूप में देखा जाता है ३॥

. तेषामेवंबिधं दृश्मित्येतावताउस्मदादीनामपि प्रसद्ञ: | कुत।-- अपरदोबल्यात्‌

।.. अवरेषामस्मदादोनां दुबलत्वातू | तथा श्रयते--

क्‍ तेषां तेज्जोविशेषेण प्रत्यवायों विद्यते |

तदन्वीक्ष्य प्रयुज्लान: सीदत्यवरकोी जनः इति ॥. ||

( इन महापुरुषों को अपेक्षा तेज आदि की दृष्टि से हम ) अवर कोटि के.

< >ोगों के दुबंल होने के कारण ( महापुरुषों के घर्मविरद्ध आचरण को .प्रमाण

. “मानकर उसका अनुशीलन करना हमारे लिये कष्टप्रद होगा ) | ४॥ अय यत्रःद्वे विरुद्धें तुल्यनले प्रमाणे उपनिपतत:। यथांडतिरात्रे षोडशिन

/...गह्ति, नातिरात्रे घोडशिनं श्रह्मति | उदिते जुह्ोत्यनुदिते जुह्ेतीति श्रतिः | ... . नित्यमभोज्यं केशकीठावपन्नमिति गैतम:-+' : ५:

पक्षिजग्ध॑ गवाप्रातमवधतमवक्षतम्‌ |. केशकीटावपन्‍ननं मृत्मक्षेपेण झ॒ुध्यति || इतिं मनुः तन्न कि कृतंव्यम्‌-- जा

क्‍ तुल्यबलविरोधे विकल्पः || ॥| तुल्यप्रमाणप्रापितयो रेवंजातीयकयो रथयोर्विकल्प: तह्ढदं वेत्यन्य-

.. त्तरस्वीकारः। समुच्चयोउसम्भवात््‌ प्रकर्षब्रोधने तु श्रविस्तृति-

:... बिरोधे स्थृत्यर्थों, नाउड्रणोयः। अतुल्यबलूत्वात्‌ू भत .एब :::., जाबालिराह-- के

सानुवाद-मिताक्षराबृत्तिसहितानि इ्‌

श्रतिस्मृतिविरोधे तु श्रतिरेव गरीयसी | अविरोधे सदा कार्य स्मात बदिकवत्सदा || इति ५॥। दो समान कोटि के प्रमार्णों में विशेध उपस्थित होने पर विकल्प होता है ( अर्थात्‌ उनमें से किसी एक का अनुसरण किया जा सकता है। श्रुति और स्मृति के प्रमाण समान कोटि के नहीं होते; अतः इनमें परत्पर विरोध द्वोने पर स्मृति मान्य नहीं होती ५॥ ) » अयेदानीं धर्मान्‌ वक्ष्यन्नुपनयनपूव कत्वात्तेषामुपनयनं ताबदाइ-- .

हे उपनयन बआक्मणस्याष्टमे || उपनयनानन्तरभाबत्रिनि ब्राह्मणत्वेडत्र [ ब्राह्मणग्रहणम्‌ | ब्राह्मण- अह्ण तु ब्राह्णस्थ सत एवापनयन तूपनयनादिसंस्कारजन्मत्राह्मण्यमिति ज्ञापनाथम्‌ | किंच ब्राह्मणो हन्तव्य: | ब्राह्मणों छुरां पिबेद्ति निषे धश्रतिरनुपनोतविषये ( या ) स्यात्‌ | त्ाह्मणस्थाष्टमं वर्ष मुख्यमुपन्यन- काल: | प्रथमभाविनो गर्भावानादोन्‍्संस्कारानुल्लेडःध्योपनयन व्याचक्षा- णस्वस्य प्राधान्यं द्शयति | तेन देवानुपपत्त्या गंभोधानादेरकरंणेडप्युप- नयनं भवति | तस्याकरणे तु विवाहादिष्वनधिंकारं इंति सिंद्धमू ..ब्राह्षण का उपनयन संस्कार आंठव वर्ष में होना चाहियें ||

नवमे पश्चमे वा काम्यम्‌ ||

कामनिमित्तं काम्यम्‌ | तन्नवसे पद्ममे वा भवति। नबसे तेजस्का-:... ममित्यापस्तम्बः क्‍

ब्रह्ममच सकामस्य कार्यों विप्रस्य पद्चमे | इति मनुः

(तेज की कांसना से ) नवें या ( ब्क्गववचंसू की इच्छा से ) पाँचवें वर्ष में... _ इच्छानुकूछ ( ब्राह्मण का उपनंयन संस्कार करना चाहिए ) छ। | |॒ गर्भादिः संख्या वर्षाणाम ८॥ : बष्चाणां संख्या गंभादिरिव भवति जननादिः || ||

.' ( उबनयनः काल “के ) . वर्षों की गिनती गर्भमकार से करनी -चाहिए क्‍ .. . जन्म के समय से नहीं ) ||

तंद्द्वितीयं जन्म ९.॥

तदपनयेन हितीय जन्म .। अव्रास्य माता. सावितन्रो पिता त्वाचायः | तेन टहिजन्मत्वसिद्धि: ९॥।

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रा, पपजयप9-<:3 8००2 ०-बाज के. 2५4८३ पेन मन ७० कर िमेसेनन+ झा कम: कल लक गाय ॥७७ रा जम्शा & 5 5 नह कह हि -<८ - - $े

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४८ .... - गौतमघमसूत्राणि .

वह ( उपनयन संस्कार ) दूसरा जन्म होता है। ( इसके द्वारा उपनीत व्यक्ति द्विंज कह्दा जाता है )॥ || हि तंचेस्मात्स आचाये! १० ॥| तदेपनयन पिंतुरभावे यंस्मात्पुरुषाद्भथति आचाये: १० बह ( उपनयन संस्कार के समय का दूसरा जन्म ) जिस पुरुष द्वारा होता .. है वह आचाय॑े कहलाता है || १० तु केवछादुपनयनात्‌ | कस्मात्तहि--- वेदानुबचनाल ११ अंनुवचनमध्यापंनम्‌ं अन्न मनुः-- उपनीय तु या शिष्यं चेद्मध्यापयेद्‌ द्विज:। ' सकलल्‍प॑ं सरहस्यं तमाचाय प्रचक्षते )। इति ११ ।| ..._( उपनयन के उपरान्त बालक को ) वेद्‌ का अध्यापन करने से भी ( अंध्यापन करने वाला आंचौये कहलाता है )॥ ११

एकादशद्रादशयो:ः क्षत्रियवैश्ययो! १२ नित्योडयम तयो: कल्पः | काम्यस्तु मनुना. द्शित:-- . रज्षो बंलार्थिनः पष्ठे बैश्यस्याथोथिनोडष्टमे || इति १२ |। ( गर्मकाल से ) ग्यारहवें और सोलहवें वर्ष में ( क्रमशः ) क्षत्रिय और वैश्य का ( उपनयन संस्कार करना चाहिए ) | १२ अथा5घपत्कल्पानाइ-- ' पोडशाद ब्राक्मणस्यथापतिता सावित्री १३ अभिविधावाकारः आ. षोडशाद्रषोद ब्राह्मणस्थ सावित्रयपतिताड- प्रच्युता। सावित्रीशब्देन तदुपदेशनिमित्तमुपनयन लक्ष्यते। तद॒ुपनयनस्य

.' 'काछ इत्यथें)॥ २१३

सोलहव वर्ष तक ब्राह्मण के लिए सांवित्री च्युत नहीं होती ( उस समय तक सावित्री मंत्र के उपदेश का अर्थात्‌ उपनयन की अवधि रहती है )॥ १३

दाविशते राजन्यस्य हयधिकाया वेश्यस्यथ १४ !|

के उभयत्राप्याड्चुबतते पूरणप्रत्ययस्य छोपो द्रष्टट्यः | द्वार्विशा- .. द्वषोद्राजन्यस्था55चतुविशाद यरयापतिता साविन्नी १४ ||

बॉइसवें वर्ज तक क्षत्रिय की और उससे दो वर्ष अधिक अर्थात्‌ चौबीसवें

/, बर्ष तक वेय की ( सावित्री च्युत नहीं होती )॥ १४॥

723 सदाए अफयर सउदाबतभ + मरिसरक िन्‍आमक ०. सा... का थ#.

सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि

मौद्ीज्यामोवीसोत्यों मेखला: क्रमेण १५ झज्ञी दभविशेषस्तद्विकारों मौज्नी | मूवोउरण्यौषधिविशेष: | ( सर-

लीति द्रविडभाषायाम्‌ ) | तद्विकारां मोर्षा | ब्या चासों मोर्वी चेति क्मे- घारयः ज्याशब्देन घनुषो ग्राह्मंति यावत्‌। सौत्री सूत्रविकारः। एता बणक्रमेण मेखला भबन्ति || १५ ||

( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वेश्य के लिए, ) क्रमश! मूँज, मोर्वां घास की बनी हुई घनुष की डोरी और सूत की मेश्वछा ( होती है ) १५

कृष्णुरुरुषस्ता जिनानि १६

कृष्ण: क्रृष्णसार: रुसर्बिन्दुमान्मग: | बस्तदछागः | एतेषामजलिना- न्युत्तरीयाण क्रेण। अजिन॑ स्वेबोत्तर धारयेदित्यापस्तम्बीये दृशनात्‌ १६

( इन तीनों वर्णों के क्रमशः ) काले मग के चम का, धब्बे वाले रद मृर के चम का और बकरे के चर्म का अक्षिन ( उत्तरीय ) होता है।॥ १६

: वासांसि शाणक्षौमचीरकुतपाः सर्वेषास १७॥ शणविकारः शाणः क्लुम्ताउवसो|तटद्विकार; क्षीमम | श्रेतपट्ट इत्यन्ये |

दर्भादिनिर्मितं चोरम्‌। ऊर्गो्निर्मितः कम्बलूः कुतप:। चत्वारयतालि

वासांसि सवंधाम्‌ || १७॥ .... सन के, अतसी के, दर आदि द्वारा निर्मित एवं ऊन के बने हुए, कम्बल

( कुतप )--थये ( चारो ) बच्चन समी के ( ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं बेश्य समी वर्णों

के ब्रह्मचारियों के ) होते हैं १७ |।

कार्पासं वाउविक्ृतम्‌ १८ क्‍

अविकृत कापौ्स बासः सर्वेषाग | कुछुम्भादिरागद्रब्येबणीन्तरकल्पनं ... -

बिक्ृतिस्तद्रहितम्‌ ॥। .१८६॥ ध।

अथवा विना रंगा हुआ रई का वस्त्र ( सभी द्विनाति अक्षचारियों के हिये....

होना चाहिए )।॥| १८ पक हट अनुमतान्याह --

कापायमप्येके १९ एके त्थाचाया: कषायेण रक्तमपि धाय मन्यन्ते ॥। १९

कुछ आचार्यों का विचार है कि गेखआ रंग का वस्त्र भी (बकझ्षचारी पहन सकता है )॥ १९॥

क्र ' ; गोतमधमंसत्राणि तत्नापि नियम)-- .

वाक्ष ब्राह्मणस्य माज्जिप्ठहारिद्रे इतरयों! २० वृक्षकषायेण रक्त वाक्षप्‌ चद्ब्राह्मणस्य | सश्निप्ठया रक्त मास्िप्रप्‌ हरिद्रया रक्त हारिद्रम्‌ | ते इतरयो: क्षत्त्रियवेश्ययोरिति यावत्‌ | २०॥॥। ब्राह्मण ( वण्ण के ब्रह्मचारी ) का वच्न वृक्ष के कषाय से रंगा हुआ ( होना चाहिए. ) और शेष दोनों वर्णों ( क्षत्रिय और बेदय वर्णों के ब्रह्मचारियों ) का मंजीठी और हल्दी से रंगा हुआ ( होना चाहिए ) २०

बेल्वपालाशो बाक्षणदण्डौ २१ बेल्वः पाछाशो वा ब्राह्मणस्य द॒ण्डो पुनः समुश्चितो || २१ ब्राह्मण (वर्ण के ब्रक्मचारी ) का दण्ड ब्रिल्व या पलाश का होना चाहिए २१ |. .

कप ।घे ही 4

अश्वत्थपैलवी शेषे २२ पोलवृक्षबिशेष: | उत्ता (? ) उता इति प्रसिद्ध: | शेषे क्षत्तियवेदय- विषये || २२९।। ,

शेष. ( क्षत्रिय और वेश्य ब्रक्मचारियों ) के दश्ड पीपछ यां पीछु का होना चाहिए २२ यज्ञियों वा सर्वेषाम २३

सवषामुक्तालाभे यज्षियो यज्नियवृक्षो वा. दण्ड: स्यात्‌ ।| २३॥ अथवा ( उल्लिखित बृक्षों के दण्ड मिलने पर ब्राह्मण, क्षत्रिय और बेदय )

हु क्‍ . सभी ब्रक्मचारियों के दण्ड किसो यशिय (यज्ञ में प्रयुज्य) वृक्ष के हो : सकते हैं॥ २१३

2 अपीडिता यूपवक्राः सशल्का: २४ ...._- अपीडिताः कोटादिमिरदूषिताः यूपवक्रा यूपवद्म बक्रा: | सशंल्काः खत्वचः। एवंविधा दण्डाः सब षाम्‌ |। २४ |

. : ( दण्ड ) कीड़ों आदि से अक्षत, यूप ( यज्ञ के खूँटे ) की तरंहं ऊंपर वक्र . ओर छाल से युक्त होना चाहिए.॥ २४

मूधललाटनासाम्रप्रमाणा: २५ || यथासंख्यमत्रेष्यते | मूधप्रमाणों ब्राह्मणस्य दण्डः। छछाटावधि क्षल्रियस्य.! नांसावधिवश्यस्येति ॥] २४॥ - (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वेश्य के दण्ड रूम्बराई में ) वर्णक्रमानुसार सिर

नर उ्केरई,,. ३३ ीआलध पड ाओश्णप २३, 6

हे ७क

8. औधे आंच. प्आ बा % पद “कक, हु. _य अंकल लक .. ५5 "5५ 5 “न -

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सानुवाद-भिताक्षरावृत्तिसहितानि तके, ललछाट तक और नासिका के अग्रमाग तक के होने चाहिए॥ २५॥

मुएडजटिलशिखाजटाश २६

अन्र यथासंख्यम | मुण्डा छप्रसवकेशाः। जठिलाः केशधारिणः | जटा केशसंहति:। शिखामात्रेव जटा थेषां ते शिख्लाजटाः | सबषासर्य॑ सामान्यधमः | छन्दोगापेक्षया मुण्डशब्दग्रहणम २६॥

( ब्रक्मचारी ) सभी केश भुडाये रखे, या जटा धारण करे अथवा केवल 'शिखा को ही जद! के रूप में रखे २६

द्रव्यहस्तश्रेदुच्छिशोडनिधाया5ञ्चामेत्‌ २७

मृत्रपुरीषयो: कस, भीजनादि चोडिछष्टत्वनिभित्तम्‌ | द्रव्यहस्त सन्नच्छिष्टश्वत्तद्द्रव्यमनिधायाइड्चासेत्‌ उच्छिष्ट: सन्‌ द्रव्यहस्तग्ंदू द्रव्य निधायाउ5चामेत्‌ तथा च॑ मतुः-- उच्छिष्टेन तु संस्प्रष्ठोी द्रव्यहस्तः कर्थंचन

अनिधायब तद्द्व॒व्यमाचान्तः झुचितामियात्‌ | इति

किंच भक्ष्यभोज्यादिद्रव्यविषये तदूद्॒व्यं मिधायेब सूत्रपुरीषयों: कर्म ऊत्वा पुनस्तत्पान्न॑ निधायाइ5चामेत्‌ वद्खधदण्डादिविषये त्वनिधायेबाइ5- चामेत्‌ २७ ॥।

यदि हाथ में ( कोई ) वस्तु लिये हुए ही मूत्र, पुरीष करे या मोजन करने

के उपरान्त जूठा हुआ हो तो उस द्वाथ में ली हुई वस्तु ) को अलग रखे विना |

( अनिधाय ) आचमन करे | || २७ |। दूसरा अर्थ--यदि ( पूर्वोक्त प्रकार से ) उच्छिष्ट ( अपबविच्न या जूठा )

होते हुए किसी वस्तु को हाथ में के तो उसे अछग रखकर ( निधाय)

आचमन करे। कक को कप त्तीसरा अर्थ--यदि कोई खाने योग्य वस्तु हाथ में हो तो उसे अछूग रख- .-

5 : , कर मृत्र, पुरीष कर्म करे और तब आचमन करे

अथ द्रव्यशद्धिरुच्यते-- द्व्यशुद्धि! परिमाजनप्रदाहतक्षण निर्णेजना नि तैजसमार्तिक-

/.. .. दारवतान्तवानाम्‌ २८.)

तैजसांदीनां द्रव्याणां यथांक्रम॑ परिमाज॑नादिशुद्धयः |. तैजर्स कांस्यादि मार्तिक॑ सुन्मयादि दारवं दारुमयादि तान्तवं तन्तुमयादि तेषां क्रमेण परिसाजनम्‌ | तत्र भस्मना कांस्यस्य | शक्ृता सोवणराज-

"८ .... .._गौतमधमसुन्राणि

' त्योः। आम्लेन ताम्रस्य | इद्मुच्छिष्टलिप्तानाम्‌ | तेमसानामेवंभूतानां भस्मादिभिरिति कण्वः। रजस्वछाचण्डालादिस्पृष्टानामेकदिन पद्चगव्यं निक्षिप्येकविंशतिकृत्वो, माजनाच्छुद्धि!। मार्तिकानां प्रदाह्म। प्रकृष्टो दाहों बर्णान्‍्तरापत्तियेथा स्यात्तथाविधों दाहः शोधनम्‌ | इदं स्पर्शो ' श्हतानाम्‌ | अन्न वसिष्ठ:-- मद्ममृत्रपुरीषेस्तु इलेब्मपूयाश्रशोणितेः |

.... संस्पृष्टं नैब शुध्येत पुनर्दादिन मन्मयम ।। इति

द्रवाणां तक्षणाच्छुद्धि:। इद्मभेध्यादिवासितानाम्‌। अन्यत्र प्रोक्ष- णप्रक्षाउनादि | तान्‍्तवानां निणजनाच्छुद्धिः!। इंदं रपशदूषितानाम्‌ | .. मलादिदूषितानां धावनं तन्मात्रच्छेदन॑ वा स्पशदूषितानां बहुनां

ओक्षणाच्छुद्धरिति | २८ ॥| यम

क्रमशः माँनने से, आग में तपाने, काटने और धोने. से ( कसे आदि )

अत क्‍ _ चातु के, मिट्टी के, लकड़ी के और सूत से निर्मित वस्तुओं की ( जो उच्छिष्ट से > . दृषित हुई हों ) शुद्धि होती है ॥२८॥।

तेजसंवदुपलमणिशह्डमुक्तानाम्‌ २६॥

डपछादोनां तैजसबच्छुद्धिः परिमाजनमिति २६ || घातु के पदार्थों को शुद्धि के समान द्वी उपलछ ( पत्थर ) के पदार्थों, मणि शंद्ध और मुक्ता की भी ( शुद्धि परिमाजन द्वारा होती है ) २६

दारुवदस्थिभू म्यो! ३०

अस्थि हस्तदन्‍्वादि | भूमिगृगादि। नयोदारुवच्छुद्धिस्तक्षण॑मिति !

दारववदिति वक्तव्ये दारुवदिति निर्देशाद्विकारस्य या शुद्धिर्बिकारिणोंडपि सेव शुद्धिरिव्युक्तम || ३० |

काठ से बनी हुईं वस्तुओं की शुद्धि के समान हो हाथोदाँत से बनी

रा वस्तुओं और (घर के भीतर की ) भूमि की भी शुद्धि काटने या खोदने से .-.. होती है॥ ३०

.. आवपन भूमेः ३१ . आवपनमन्यत आनीय परणसधिका शुद्धिभूमेः : अंत्र बसिष्ठा-- - खननाहह॒नादद्धिर्गोंभिराक्रमणेन | चतुभि: झुध्यते भूमिः पत्चमात्तपलेपनात्‌ इति ३१

पी जी. ि रे ४... न+- नशा | आओ -ै- मु 5 "0० 2 हर ल्‍ आइए -> 7० >> 5 का टड जहर > ब्रज हो... हु यह तय पा नव पके बा जप कक कर छू थे रे किया ७५८. दम क॥> किक 725 आल $ अधच्डष्ट कैच, -ातओ., 2 5 23 सार या से सिरधर

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सानुवाद-मिताक्षराबृत्तिसहितानि

और दूसरे स्थान से मिट्टी लाकर ( पहले शुद्धि के लिए खोदी गई भूमि को ) भरने से भूमि की और भी अधिक शुद्धि होती है | ३१

चैलबद्रज्जुविदलचमंणाम्‌ ॥। ३२ विदलं वेन्रवेणुविदकादिनिर्मितम्‌ | पिच्छनिर्मितमप्यन्ये रण्ज्वादीनां त्रयाणां चेलवद्श्रवच्छुद्धेनिण जनमिति पेठीनसिस्तु-- रज्जुविदलचमणामस्प श्यस्पृष्टानां प्रोक्षणाच्छुद्धिरिति ।। २२

वस्त्र की शुद्धि के समान ही रस्सी की, बेत से बने हुए. ( और पिच्छ से निर्मित ) पदार्थ की ( शुद्धि धोने से होती है )।। ३२

उत्सगगों वाउत्यन्तोपहतानाम ॥। ३३

इदं बासिप्ठेन समानविषय मद्ममृत्रपुरीषरित्यादिना बाशब्दः पक्ष- व्यावृत्तो ३३

अथवा ( मूत्र, पुरीष आदि से ) अत्यन्त दूषित हो गये हों तो ( उन पदार्थों

का त्याग कर देना चाहिए. )॥ ३३

प्राइ्युख उदडसुखो वा शौचमारभेत ३४ इच्छातो विकल्प आरभेतेति बचनात्पादप्रक्षालनग्रभ्ृतिदिक्लनिय मः |

'आपस्तम्बस्तु प्रत्यक्पादावनेजलमित्याह | शौचग्रहणमाचमन एवं मा

भून्मूश्रपुरी पादिशौचेडपि दिला[नियमज्ञापनाथम्‌ | ३४ ( पादप्रक्षाऊन आदि आचमन जेसे ) शौच कम पूर्व की ओर मुख करके अथवा उत्तर की ओर मुख करके करना चाहिए ।। ३४ ॥! शुच्ो देश आसीनो दक्षिणं बाहुं जान्वन्तरा कृत्या यज्ञोपवीत्यामशिषन्धनात्पाणी प्रक्षाल्य बाग्यतो हृदयस्प्रशत्तरि अतुर्वापप आचामेत्‌ ३५ क्‍

: * इृदमेक॑ वाक्यंम। आचमनकाले शुचो देशेब्नुपहत आसीन इत्यु पल- क्षणमासीनस्तिष्ठन्‌ प्रहो वेति। जान्बन्तरा जानुनोमध्ये दक्षिणबाहुं

..,. :. छत्वा | दक्षिण बाहुमित्युक्तत्वाद्रामहस्तसथ चावश्यंभावः। यज्ञोपबीतीति ८.०... 5... घूर्ज स्वस्थानस्थमपि यथास्थाननिवेशनाथ म्‌ अथवोत्तरीयविन्यासा्थम | है ........ तलंथा चा55पस्तम्बः--उपासने गुरूणां बुद्धानामतिथोनां होमे जप्यकर्माण

भोजन आचमने स्वाध्याये यज्ञोपत्रीतोी स्यादपि वा सूत्रमेबो पवीतार्थ:

इति | आमणिबन्धादेमन्शेथरि मणिबेध्यत तस्मात्राणी अल्लाल्थ |.

९० ..._गौतमधमेसूत्राणि

वाग्यतः शब्दमकुब | हृदयस्पृशः परिमाणाथमिदं यावत्यः पोता हृदय स्ुशन्ति यासु माषो मज्जति त्तावतीरप आचामेत्त्रिश्वतुबों। यत्र मन्त्रव- दाचमनं बिहितं तत्र तेन सह चतुः | अन्यत्र त्रिरति विकल्पः | ३५॥।

( आचमन करते समय ) पवित्र स्थान पर बैठकर, दादिनी बाँह को दोनों घुटनों के बीच में करके, यश्ञोपवीव को यथास्थान रखकर, कछाई तक हार्थों को घोकर और मौन होकर तीन चार बार इतने जल से आचमन करे, बितना

जल ( पीने पंर ) हृदय तक पहुँच सके || १५ द्वि! परिमज्यते २६ प्रतियोग॑ सोदकेन पाणिनोष्ठयोः परिसाजनप्‌ | ३६ || प्रत्येक वार दोनों ओठों को हाथ में 'जल लेकर पौंछे ३६ पादो चाम्युक्षेत्‌ ३७ ॥| .. चकाराच्छिरश्व )| ३७॥ | - , दोनों-पैरों ( और शिर ) पर जल छिडके ३७ ।॥। खानि चोपस्पृशेच्छीषेण्यानि || ३८ ॥|

शीष भवानि शोषण्यांति | शिरोभवानोति यावत्‌ | खानोन्द्रियाणि तान्युपरप्रशेत्‌ | अञ्र चकार: प्रतीन्द्रियोपस्पश नाथः ।। शे८ ||

शिर की इन्द्रियों ( नेत्र, कान, मुख, नासिका-छिद्रों ) में प्रत्येक का

हक . खरश करे ३८ हे मूधेनि-च दद्यात्‌ ३९

चकारान्ताभो मूधरनिं स्वाभिरहगुलोमिरुपस्प्रशेदित्य्थ: ३९ |

( नामि-और ) सिर का सभी अंगुलियों से स्पश करे || ३९

सुप्तवा भ्ुक्‍्त्वा ज्षुत्वा पुन; ४० स्वापादिनिमित्त पुनर्द्धराचामेदिति यावत्‌ | ४०

सोने, भोजन करने और छोॉकने' के बाद दो बार आचमन करना

. चाहिए॥ ४०॥|... .. .

दन्तश्लिष्टपु दन्तवदन्यत्र जिहाभिमशनात्‌ || ४१ द्न्‍्वरिछष्टेपूरिछष्टलेपेषु . जिह्ाासिमशनादसन्यत्र दन्तवन्नाशुचि- त्वम ४१ :... दाँतों के बीच अटके 'हुए भोजन के उच्छिष्ट . कर्णों में जीम से नद्छू ..., जो सकने वाले उच्छिष्टकण दाँतों के समान ही अपविन्र नहीं होते ४१

५५ जाप 3 _7 सा 5८ पा - सन 403307 2 आम का

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सानुवाद-मिताक्षराबृत्तिसहितानि १९

तत्नापि-- | | प्राकच्युतेरित्येके ४२

सत्यपि जिह्वाभिमशने यावक्लेपाः स्वस्थानानन च्यवन्ते तावन्ना- शुचित्वभिति ४२ |

कुछ विद्वानों के मत से दाँतों में अय्के हुए उच्छिष्ट कण जीम से छुए जाने योग्य होने पर भी दाँतों से गिरने के पूब तक अपविन्न नहीं होते || ४२

च्युतेष्वास्राववद्धि द्यान्निगिरन्नेव तच्छुचिः ४३ आख्राव आस्यजलम्‌ | निगरणमन्त:प्रवेशनप्‌ | च्युतेषु निगिरन्नेबत- च्छुचिरिति वक्तव्य आख्रावषद्धिद्यादेति वर्चनमांखावे निगरणादँव॑ शुचिरिति सूचनाथप्र.| ४४ :( दांतों में अटके हुए अच्छिष्ट कण के ) दांतों से निकलने पर उन्हें छार के समान समझना चाहिए, और उनको निगलने से ही शुद्धि होती है।॥ ४३

मुख्या विग्रप उच्छिष्ट कुवन्ति। चेदद्ग निपतन्ति ॥४४।॥। मुखे भवा मुख्याः। पिग्रष आख्रावबिन्दवः। भूम्यादिषु पतिता नोच्छिष्टतां नयन्ति ४४ मुख के हार की दूँदें ( गिरनें पर किसी पदार्थ कों, जूंठा या अश्ुद्ध नहीं बनातीं | शरीर के किसी अंग “पर गिरती हैं तो भी उसे उच्लछिष्ट नहीं करती हैं ४४ | लेपगन्धापकषंणं शौचममेध्यस्य ४५ बसा शुकरम सुझाब्जा मृत्रविटकणविण्नखा: इलेष्माश्र दूषिका स्वेदो द्वादशैते नृर्णां मछाः इति मनु) |

एतत्सव॑ममेध्यशब्देन विवक्षितम्‌ू अस्य यावता गन्धों छेपब्रीप- : . क्ृष्यतेडपनी यते छाबता शौचमिर्ति। तत्र यस्‍्य महस्य गन्धमात्रनं तस्य . .. «7

तद पकर्षणम | यरय गन्धो लेपग्वथ. तस्य तदुभयापकषणम्‌।| ४५

शरीर के मछों. ( से दूषित पदार्थ ) की शुद्धि उनके लेप और गन्ध की ... |

दूर करने से होती है ॥| ४५

तदद्धिः पूष सदा च॥ ४६ तत्पूब गन्धवन्मछापकषणमद्धिल्लपगन्धवन्मछापकषणं म्रद्षा चाह्लि- | इद्‌ हस्तपादादेरमेध्यलिप्तस्य शोचम्‌ | तेजसादिषु विशेषस्य पूर्व . मुक्तत्वातू्‌ ॥। ४९ ॥। हे

श्२ . गोतमघमसूत्राणि :

तब पहले ( गन्धवाले मछ को ) जल से और (गन्ध तथा लेप वाले मल को ) मिट्टी एवं जल से दूर किया जाता है ४६ ||

मृत्रपुरीपस्नेहवि्वेंसनाभ्यवहारसंयोगेषु ४७ चकारः पूर्वोक्तसमुश्चये | स्नेहों रेतः। मृत्रपुरीषस्नेहानां विस्लंसन॑ : निरंसनप्‌ | अभ्यवंह्ारमव्यवंहाय॑द्रव्यं तेन संयोग: एषु निमित्तेषु

'पूबबन्मदा चाह्लिः शौचमिति || ४७ ||

मृत्र, पुरीष और वीय के त्याग से तथा व्यवहार में काई जानेवाली दूषित वस्तुओं के संयोग से होनेवाली अशुद्धि पूर्वोक्त .विधि से भर्थात्‌ मिट्टी

और जल से दूर होती है ४७ || 0 आम अधि यत्र चा्म्नायों विदष्यात्‌॥ छढता भत्र विषये यहुछौचमाम्नाये विदृध्याक्तत्त सद़ेब भवति | यथा

..__' चमसानामुच्छिष्टकिप्तामां माझीछोयाडिः प्रक्ाउनमिति ४८॥

से शुद्धि करनी चाहिए ४८

... बैद में जिस विषय में जैसी शुद्धि का. विधान किया गया है उसी विधि

अथ गुरूपसदनविधिः--

:.... पाणिना सब्यमुपसंगृह्ानहुष्ठमधीहि भो इत्यामन्त्रयेद्‌ गुरु : तत्र चक्षुमनः-प्राणोपस्पशंन दमें: ४९

पाणिना रवेन दक्षिणेन | सव्यमिति विशेषप्रहणाइक्षिणेनेति गम्यते | गुरोः सब्यं पाद्मनहुष्ठमछुष्बर्ज' गृह्ोत्वाउधीहिं' भो इति शुरुमामन्त्र- येत्‌। तन्न गुरौ मनश्चक्षुषी निधायाबहितः स्यादिति प्राणाः शीष- ण्यनोन्द्रियाणि तेषामात्मीयानामाचमनोक्तक्रमेण दूभरुपस्पशन कतंव्य॑ साणव्रकेन ४९ |॥| | है

बक्षचारी अपने दाहिने हाथ से (गुरु के) बायें पैर को अंगूठा छोड़ते हुए

.... पकड़े और “अधीहि भोः (औमन्‌ , सुझे पढ़ावें) ऐसा कहकर गुरु को आमन्तित

... भरे। वंहां गुरु की ओर अपने नेत्र एवं मन लगाकर प्रार्णों (सिर की इन्द्रियों)

. का छुश से स्पशे करे ४९

आशायामास्रयः पश्चदशमात्रा/ ४० कार्यो इति शेषः। जानुपाश्वतः परिसृज्य ब्रुटिमेकां कुयौत्सैका : जत्रा। ता; पद्मद्श पूर्यन्ते यांवता कलछिन्न, तावन्तं काल: प्राणबार्यु ... धारयेत्स एक: प्राणायाम: | ते त्रयः कार्य: गा

कत-4 43०

ता: *

मी 5क कमेटी. कार

सांनुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १३ मनुः--सव्याह्॒तिकां सप्रणवां गायत्रों शिरसा सह | त्रिः पठेदायतप्राणः प्राणायामः उच्यते इति ॥| ५०

पन्द्रह मात्रा ( समय तक ) का प्राणायाम करना चाहिए | ( घुटनों की बगल से सटाकर एक बार चुटकी बजाने में जो समय छगता है वह एक मात्रा

का काल होता है। ५० | प्राक्कूलेष्वासनं ॥| ५१

प्रागग्रेषु दर्भष्या सन चक्रारास्कृतव्यमिति शेष: | ५१ जिनके «अग्रभाग पूष की कोर हों ऐसे कुशों को आसन बनाना चाहिए. ५१ ॥। 5पूर्वा व्याहतयः पञ्च सत्यान्ता; | ४२ ॥| व्याह्ृतिसाम भूसु वः रवः सत्य पुरुष इति पद्न। अन्न तु पुरुष-

... . व्याहविश्वतुर्थी सत्यव्याह्ृृतिः पद्चमी वक्तव्या | ताश्च प्रत्येक प्रणवपूवो .... बक्तव्याः॥ ५२ ॥|

( प्रत्येक के ) पंइले उ« जोड़कर संत्यम्‌ तक ( भूः, भव), *स्वः, पुरुष

और सत्यम्‌ ) पाँच व्याइंतियाँ होती हैं ।। ४४

गुरोः पादोपसंग्रहणं प्रातः | ५३

. अहरहः प्रातर्गुरोः पादो पसंग्रहर्ण कार्यम्‌ | मनुः--ज्यत्यस्तपाणिना कायमुपसंग्रहरण गुरोः | सव्येन सव्यः स्प्रष्टटयो दक्षिणेन तु दक्षिणः || इति | ५३

प्रतिदिन प्रातःकाल गुरु का चरण छूना चाहिए || ५३

' ब्रह्माचुबचने चाउज्यन्तयो; १४ हक

ब्रह्म वेद: | अनुबचनमंध्यापनंम्‌ | तत्राउड््यन्तयीश्व गुरुपादोप- संग्रहण कायम | ५8॥

बेंद का पाठ होने पर ( पाठ आरम्म॑ होने के ) पहले और अन्त में गुरू ! हे

5 दे . का चरण-छुये॥ ५४

अनुज्ञात उपविशेत्‌ प्राइमुखो दक्षिणतः शिष्य उदड्मुखो वा॥ ५५

आचायणानुज्ञातस्तदक्षिणतः ग्राडम्मुख उद्‌डःमुखो वोपबिशेत्‌ | कायोनुगुणों विकल्प:+॥ ५५ ||

| मद हे '

१४ 7: सौतसघ्मसूत्रोंणि | «

आचार्य की आज्ञा पाकर ( ब्रक्मचारी ) उनकी दाहिनी ओर. पूव की ओर मुख करके अथवा उत्तर की ओर मुख करके बैठे || ५५ |

पे सावित्री चानुबचनम्‌ १६ क्‍ .. तत्सवितुब रेण्यमित्येषा नत्वन्या सबितृदेवत्या सा बाउनुवचर्न प्रत्यध्ययनं पठनीयेति ।। ५६ |। क्‍ .. प्रतिदिन के अध्ययन के समय सावित्री मन्त्र का ( तत्सवितुररेण्यं भर्गां देवस्य घीमदि | घियो यो नः प्रचोदयात्‌” सवित देवता के इसी मन्त्र का किसी दूसरे मन्त्र का नहीं ) उच्चारण करे || ५६॥ क्‍ आदितो त्ह्मण आदाने | ५७॥ |... पाणिना, सव्यमुपसंगृह्नेत्यादि सावित्रयनुव बनान्त॑ युक्त तदिदं ब्रह्मणो वेद्रय गुरोः सकाशादादित आदानकाले कतव्यम्‌। उपनयना- दुनन्तर साविश््युपदेशकाले च, प्रत्यहं तु तत्र चह्षुमेनस्त्वम्‌ | प्रातरध्य- यनाइन्तयोश्र गुरोः पादोपसंग्रहणमनुज्ञातोपवेशनं कर्त॑व्यप्र्‌ [५७॥ . गुरु से वेद का ज्ञान अहण करते समय (गुरु के ब्रायें पैर को दाहिने हाथ से छूने से लेकर सावित्री मन्त्र के उच्चारण तक के पूर्वोक्त कार्य ) आरस्म से करना चाहिए || ५७॥ मय 35 कारोडन्यत्रापि ५८

का साविश्यनुब चनादन्यब्राप्योंकारो _ वक्तव्यः |... प्रत्यहमध्ययनकाल

इत्यथ: 5४ कक मी आह 5 ... - ( सावित्री मन्त्र के उच्चारण के साथ ड० का उच्चारण करने के अतिरिक्त ) ... अन्‍्यत्र ( प्रतिदिन अध्ययन के समय .) उं% का उच्चारण करना चाहिए ५८ .... अन्तरागमने पुनरुपसदनम्‌॥ १६ गुरोः शिष्यस्य मध्ये गसनमन्तरागमनम्‌ | यस्य कस्याप्यन्तरा- मने पुनरुपसंदर्न क्तेव्यमू | पाणिना सब्यमित्याद्योंकारे5न्यत्रापीत्यन्त- सुपसंदनम्‌ ५९॥ _( गुर और शिष्य के ) बीच में किसी भी प्राणी के जाने पर पुनः गुरु .._ कै चरण सशं ( आदि पूर्वोक्त कम ) करने होते हैं ॥५९॥ .... वैनकुलसपंमण्इकमाजाराणां ज्यहमुपवासो विग्रवासथ ६०॥

धादोनामन्तरागमने व्यहमुपवासो विग्रवासश्रञ कतेव्यः | विप्रवास : 'अआचायकुलादन्यत्र वासः | मनुस्तु--......

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सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १०

पशुमण्डूकमाजोरखसपनकुछेपु ।च | अन्तरागमने विद्यादनध्यायमहरनिशम्‌ || इति | तद्धारणाध्ययनविषयम्‌ | गौतमोयं तु प्रहणाध्ययनविषयम्‌ ६० कुत्ता, नेवछा साँप, मेदक और बिल्ली के (गुरु और शिष्य के बीच में ) जाने पर शिष्य तीन दिन उपवास करे और गुरुकुछ से परथक निवास करे | ६० |. प्राणायामा घृतग्राशनं चेतरेपास ॥| ६१ इतरेषां श्वादिव्यतिरिक्तानां प्वादीनामन्तरागमने प्राणायासाखयः कार्यो घृतप्राशनं कार्यम्‌। एतत्सवं शिष्यस्य प्रायश्वित्तं गुरोः, उभ- योरित्यपरे ६१॥ ..._( उपयुक्त प्राणियाँ के अविरिक्त ) अन्य पशुर्ओों के गुर और शिष्य के बीच में आने पर शिष्य ( तीन ) प्राणयाभ करे और घी खावे। ( कुछ शात्ज- कार्रों के मंतोनुसार यह प्रायश्रित शुद और शिष्य दोनों को ही करना

चाहिए )॥ ६१ ॥| श्मशानाभ्यध्ययने चैवम्‌ ६२ अभिरुपरिभावे इमशानस्थापंयध्ययने चेब प्रायश्रित्तम। प्राणायामा शृतप्राशनं चेति | द्विरक्तिस्थ्यायपरिसमाप्त्यर्था || ६९॥ -

इंति श्रोमौतमोयबृत्तों हरदत्तविरचितायां मिताक्षरायां प्रथमप्रदने प्रथमोडध्याय: ॥|

इमशान के समीप अध्ययन करने पर भी यहीं प्रायश्रित्त ( प्राणायाम

ओऔर घृतप्राशन ) करे || ६२॥ गोतमधमसूत्र का प्रथम अध्याय समाप्त -

अथ दितोयो-ध्याय: उपनीतप्रसड्रेनानुपनीतधर्मा उच्चन्ते--.-

आगुपनयनात्कामचार; कामबाद। काम भक्त! आधषोडशाद त्राह्मणस्येत्यापत्कल्पोपनयनभिषयम्‌ | कामचार इच्छा- चरणमू | अपण्यान्यपि विक्रोणीयाच्छबबृत्त्याइईपि जीवेदिति | कामवादो- 5हल्छीढानृतादिवचनम्‌ कामभक्षो छशुनपयु षितान्नादिभक्षणं चतुःपत्न- कत्वो वा भोजनमित्येताबद्यस्य तथोक्तः | ॒तु बद्नहृत्यासुरापाना- द्यतिश्रसन्व:॥ १॥ दा ये ... उपनयन होने के पूर्व (बालक ) इच्छानुसार कार्य ( बेचने योग्य

:..; वस्तुओं का. विक्रय आदि कर्म )कर सकता है; जैसा चाहे वैसा ( अर्थात्‌

अइलील या असत्य ) बोल सकता है और इच्छानुसार ( जैसे छहसुन, बासी, या चार-पाँच बार ) भोजन कर सकता है | १॥ ही अहुतात्‌

- हुतशेषं पुरोडाशादि.। तद॒त्तीति हुतातू | तद्दिपरीतोडहुतातू | अनुप- नीतो हुतं नाद्यादेति २॥ रा

जिसका यशोपवीव हुआ हो वह इवन के उपरान्त अवशिष्ट ( पुरोइडोश

आदि ) का भोनन नकरे॥ २॥ | .. -जअब्चारी॥ ११... . कासचारादेरयमपवादः |. आषोड्शादिल्युक्तत्वात्क्षीषु प्रसहृयोग्यता-

.. अश्ल्यतो अद्बाचारी जितेन्द्रियः स्यादिति | तथा स्मृत्यन्त रै--

प्रायश्चित्त॑ विलछ॒प्रमवकीणिगत्रतेन शुद्धमुपनयेन्न सप्तदशमत हूध्च

रा आत्यावकीणिब्रताभ्यामिति

के ( यशोपवीत के पूव भी बालक ) ब्रह्मचारी रहे ( अर्थात्‌ इन्द्रियों पर _ संयम रखे, छलप्रसंग करे ) | | ... क्‍

क्‍ यथोपपादितमूत्रपुरोीषो भवति

मूत्रपुरीषे थथोपपद्मेते यस्य तथोक्त: प्रा डस्मुखाद्रिपि कुर्यात्‌

7... भूमावनन्तर्घायेत्यादिस्थाननियमो5पि नास्ति 8 |।

2५० 9८०२२८७ 20-2७ 2९४८:

हल अंडर कि-स- 5

सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १७

जिस दंग से सुविधा हो उस ढंग से मूत्र ओर पुरीष का त्याग कर सकता है

नास्या5डचमनकल्पो विद्यते | कल्पनिषेधाद[चमनमलुज्ञातं स्रोशूद्रवत्‌ उस ( अनुपनीत बालक ) के लिए आचमन का विधान नहीं है ५॥

अन्यत्रापमाजनप्रधावनावीक्षणेम्यः अपमाज नादोनि वजयित्वाइड्चमनकल्पो नास्ति | अपमाजनादि कमस्तीति यांवत्त | यद्यप्यपमार्जनादीन्याचमनकल्पे. नान्तभेवन्ति तथापि पयुदासमुखेन तानि विधीयन्ते | अन्न( त्राप )मार्ज सोदकेन पाणिना परिमाजनमुच्छिष्टादिलिप्रस्थ | प्रधावनममेध्यादित्तिप्त स्याद्धि- मंदा क्षाउनप्‌ | अवीक्षण रजस्वछादिस्पृष्टस्य | इद्मत्यन्तवालविषयम्‌ पडव्षादृध्व स्वानमिच्छन्ति | अस्यानुपनोतस्येतावदुक्तमात्रकास चारा- दिव्यतिक्रमे प्रायश्रित्तमस्ति तत्र स्वृत्यन्तरे--... अशीतियस्य बर्षोणि बालो वाउष्यूनपोडशः | : प्रायश्वित्ताधमहंन्ति ख्ियों व्याधित एवं ऊनकादशंवषत्य पद्चवर्षात्पस्य च। : चरेदूगुरु: सुहच्चेव प्रायश्वित्त विशुद्धये || अतो बालतरस्यास्य नापराधों पातकम्‌ | राजदण्डश्व तस्यातः प्रायश्वित्तं नेष्यते || इति॥

भोजनोपरान्त उच्छिष्ट को धोने, मछ आदि दूषित पदार्थों के छेप और . .. गन्ध को दूर करने और रजस्ला आदि के स्पश से शुद्धि करने के अतिरिक्त

अन्य किसी आचमन का विधान अनुपनीत बालक के लिए नहीं है

तदुपस्पशनादशोचम्‌

तदुपरपश नात्तस्याकृतो पनयनस्यो दक्यादिस्पृष्टस्याप्युपरपश नादशौच॑ स्यात्‌ | स्पृष्टास्पृष्टिरपस्पश नम | तेन स्नान कतव्यम्‌ | भुक्तोच्छिष्टस्य कृतमूत्रपुरीष स्य] स्पशनादपि नाइड्चमनम्‌। इदमपि षड़व्षात्मागेव | किमथ तहिं तस्य शौच विहितध्‌। न॑ ताबद्नुष्ठानाथ नापि स्पशंयोग्य- ताथम्‌ | अकृतशोचस्यापि स्पशयोग्यस्वात्‌ रक्षणाथमिति श्रम: | तथा 'च स्मृत्यन्तरम्‌-

बालस्य पठचमाद्रर्षादक्षाथ शौचमाचरेत्‌ | इति || उसके ( अनु पनीत बारूक के छः वर्ष की अवस्था से पहले ) रणस्वरू

गो०

प्श्द गौतमधमंसूत्राणि

स्त्री द्वारा छूए जाने, भोजन के उपरान्त जूठे हाथ होने या मृत्र और मल्त्याग करने से अश्युद्ध होने पर भी ) स्पश से अशौच नहीं होता ||

नत्वेत्रेनमपिहवनब लिहरणयोनियुब्ज्यात्‌ | एनमनुपनोतमप्रिहदन औपासनहोमादों बलिहरणे वैश्वदेवादों नियुब्ज्यान्न नियुश्नीतेति यावत्‌ | तुशब्दादुक्तादन्यत्रापि समन्त्रके कमणि नियुश्ञोतेति | एबकारो5बधारणे | अथा55श्वछायन:ः--- पाणिग्रहणादि ग्रह्म परिचरेत्स्वय पत्न्यपि वा पुत्र: कु्मांयन्तेवासी वा” इति। छन्‍्दों गांश्य पतनो जुहुयादिति पत्नीकमार्यायनुज्ञातेडस्मिन्पक्षे नत्वेवेन

यथ:ः 5 ॥। इस ( अनुपनीत बालक ) को औपासन होम आदि में और वेश्वदेव आदि घंलिकम भें छगावे || ८॥

अक्याभिव्याहारयेदन्यत्र स्वधानिनयनात्‌ || ब्रह्म वेद: | एनमनुपनोत॑ ब्रह्म नाभिव्याहरयेन्नोचारयेत्‌। किमविशे घणेति नेत्याह। अन्यन्न रवधानिनयनात्‌ | पिव्यस्य सबस्य कर्ण उपलक्षणम्‌। अन्यत्रोदककमस्वधापितृसंयुक्तेभ्य इति बासिष्ठ दशनात्‌ | अगृद्दीताक्षरः पुत्र: पिन्नो: संस्कारमहतीत्यादि च। अन्यस्यासंभवे सब पिश्रयंह्कर्म तदानीं मन्त्रान्प्ाहयित्वाइ्सों कारयितव्यः . स्चा ( उदकदान आदि श्राद्ध ).कर्म को छोड़कर इस अनुपंनीत बारूक से वेदमंत्रों का उच्चारण नहीं कराना चाहिए ॥:९॥.. 5 .. . ४... उपनयनादनियमः॥ रैव्यी... अग्नीन्धनादियों नियमो वदन्‍्यते उपनयनादिरेंब | अनुपनीतांधि- ,कारेण॑ विच्छिन्नत्वादुपनीताधिफाराथमिद्व्‌ १०॥ . , आगे ( अग्नीन्धन आदि जो ) नियम बताये जाँयगे वें उपनयन से आरम्भ दोते हैं १० का .... उक्त ब्ह्मचयम्‌ ११॥ अनुपनीतस्य यदुष्त ब्रह्मबचय तदुपनीतस्यापरि. समानमे। नतु चर

ख्रीप्रेक्षणालम्भने इति निषेधो, बक्ष्यते। तथा5पि स्मरणकीतनादि- ,

निषेधाथमिदम्‌ ११

अंतुपनीत बालक -के लिए. जिस ब्रह्मचय का नियम बताया गया है वह हृपनीत बारूक, के लिये भी समझना चाहिए || ११:॥

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सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि १९

अग्नीन्धनभैज्षचरणे १२ अग्नीन्धनं समिद्धोम | भिक्षाणां समूहों भेक्षम्‌। तदथ प्रतिगृहं चरणं भेक्षचरणम्‌ | ते प्रत्यहं कतंव्ये | तत्र मनु।-- दूरादाहत्य समिधः संनिद्ध्याद्विहायासि | साय॑ प्रातश्व जुहुयांत्ताभिरग्निमतन्द्रितः ।। अकृत्वा भेक्षचरणमसमिध्य च.पावकरप््‌ | अनातुरः .सप्तरात्रमवकीणिग्रतं चरेत्‌ || इति | आपस्तम्बस्तु-सायमेवाग्निपुजेत्येक इति ॥१२॥ * ( प्रतिदिन ) अग्निकर्म भर्थात्‌ समिधाओं से होम और मिक्षाचरण करे १२॥

सत्यवचनम्‌ ॥| १३ . उपनोतेन सत्यमेव बक्तव्यमू || १३ | उपनीत को सत्य ही बोलना चाहिएं १३

अपामुपस्पशनम्‌ १४ उपसरपशन रस्नानंप्‌ | तदप्यहरदहः कतंव्यम || १४ जल से प्रतिदिन स्नान करे॥ ९४॥

एके गोदानादि १५॥ गोदानं नाम षोडशे वर्ष कतेव्यं ब्रतम्‌। तदूत़तेषु. द्वितीयम्‌ | छन्दो गानामेक आचायो गोदानादि स्नानमिच्छन्ति ततः प्राग्दीक्षि तबदस्थापि जअह्मचरयेदोक्षानियुक्तत्वातूं | नित्यस्नानस्यायं प्रतित्रेषः नेमित्तिक॑ तु कतवठ्य, तत्र. दण्डवदा प्छवतप | नाप्सु श्ाथ भानः स्ताया- द्त्यापस्तम्बस्मरणात्त | १५ ||

छन्‍्दोगों के. कुछ आचांय ग़ोदान ( सोलइव वध में किये जाने वाले केश रे के

ओर इम्रश्रु के काटने के संस्कार: ) के बाद से उपनीत व्यक्ति के लिये स्तान कम विहित करते हैं १५॥ क्‍ पालक बह व. बहि।सध्यत्व वे १६ ॥।।

... सायंप्रातह्द संध्ये, यस्य गामादृहिभवतः बहिःसंध्यस्तस्य भाव: ग्रामाद्ृहि रेव संध्योपासन कतव्यमिति ॥॥ है६ै॥

.. गांव से बाहर ही. ( उपनीत व्यक्तिः) सौय॑ एवं प्रातः की सन्ध्याएँ करे || १६

२० गौतमधमेसूत्राणि तत्कदा कथ्थ चेत्याइ-- तिष्टेत्पूवामासीतोत्तरां सज्योतिष्याज्योतिषो दर्शेनाद्दा-

ग्यत!ः १७॥ प्रातःसंध्यां तिष्ठेत्सायंसंध्यामासीत अत्यन्तसंयोगे द्वितीया।

.... स्थानासनयोरुपक्रमोपसंहारों कथयति-सज्योतिषि काले समारभ्याड्ष्ज्यो

तिरन्तरदश नात्‌ प्रातनेश्षत्रज्योतिरारभ्याउडसूर्यज्योतिदंशनात्सायमादि त्यज्यो तिरारभ्याउ5नक्षत्रदशनादिति तावन्तं काल वाग्यतश्व स्मात्‌ | तथा मनु :--- ' . पूवां संध्यां जपंस्तिष्ठेत्साविन्नीमाउकद्शनात्‌ पश्चिमां तु समासीत सम्यगृक्षविभावनात्‌ || इंति॥ १७

प्रातः सन्ध्या में नक्षन्नों के दिखाई पड़ते रदने के समय से लेकर सूर्योदय के समय तक खड़ा होवे और साय॑ सन्ध्यां में सूय की ज्योति दिखाई पड़ते .

रहने के समय से लेकर नक्षत्रों के दिखाई पड़ने के समय तक बैठे और मौन होकर ( सन्ध्योपासन ) करे १७ ना55दित्यमीक्षेत १८॥ क्‍ ब्रह्मचारिणो5यं सदा55दित्यद्शने प्रतिषेधः | स्नातकस्य तु-- मानवी०--नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्त॑ यथान्तं कदाचन |

नोपरक्त वारिस्थ॑ त-मध्यं नस्ससो गतम्‌ इति ॥१८॥ क्‍

बह्ाचांरी कदापि सूय को देखे || १८

:.... बजयेन्मधुमांसगन्धमाल्यद्वास्वप्नाज्षनास्यश्लनयानोपान- .. जछत्रकामक्रोधलोभमोहवादवादनस्नानदुन्तधावनहपेनृत्यगीतपरि- . वादभयात्र १९॥

.. , अध्वादीनि वजयेत्‌ | मधु साक्षिकम्‌। मांस सगादे!। गन्धश्न्द- .... 'लादिः। साल्यानि पुष्पाणि। दिवास्वप्नो दिवानिद्रां। अद्जनमक्ष्णोः

: ' अभ्यज्ञन तेलाभ्यड्र: | यानं शकटादि उपानच्छत्रे प्रसिद्धे। काम: स्री .. _.सन्नः | क्रोधः कोपः लोभो द्रब्यामिलाषः : मोहो विवेकशुन्यता वादो

. “बहुजल्पः | वादत् वीणादीनाम्‌ | स्नान सुखाथमुष्णवोयादिना कण्ठादधः

.: अक्षांहनमू। दन्तधावन दन्तमछापकर्षणप्‌ | हर्षोडभिमतराभाक्षित्तोट्रेक: _.. नृत्यगीते प्रसिद्धे। परिवादः परदोषकथनम्‌ | भय भंयहेतुः कान्‍्तारप्रवे ... शादिः | इदं हष5पि दरंष्टठत्यम १९

सानुवाद-मिताक्ष्राक्षत्तिसहितानि २१

( ब्रह्मचारी को ) मधु, ( मृग आदि का ) मांस, ( चन्दन आदि ) गन्व, पुष्व, दिन में शयन, आंखों में अज्ञन लगाना, शरीर के अंगों में तेछ या सुगन्धित लेप लगाना, रथ या गाड़ी को सवारी, जूता, छाता, काम, क्रोध, छोम ( द्रव्य आदि की इच्छा ), मोह ( विवेकशून्यता ), अधिक भाषण, वीणा थादि , का वादन, आनन्द के लिये स्नान, दन्तधावन, हर्ष प्रकट करना, दृत्य,' गत, परनिन्दा और भय के कम ( जेसे घोर वन में प्रवेश )--इन सबका परित्य|ग करना चांदिए १९॥

गुरुदशने कण्ठप्राइतावसक्थिकापाश्रयण॒पादप्रसारणानि

शुरवः पित्राचार्यादयः | तेषां दशनयोग्ये देशे कण्ठप्राबृवादीनि बज“ येत्‌ | कण्ठप्राबृतं कण्ठप्रावरणं वल्लादिना। अवसक्थिका, शु( )रो पादमारोप्यावस्थानम्‌ अपाश्रयर्ण कुडयस्तम्भाद्याशित्याउडइसनम्‌ | पादृअसारणं प्रसिद्धमण। गुरुजनलकाशे विनयसंकोचेन तिष्ठेद्त्यथः

... २०॥

गुरु ( पिता, आंचाय आदि श्रेष्ठ जनों) के संम्मुख कंण्ठ ढकना,. गुरु की ओर पैर करके बैठना (या नाँध पर पैंर रखकर बैठना), दीवाल या खम्मे आदि का सहारा: लेकर बैठना तथा पैर फौछाना ( व्ित है ) २०

निष्ठीवितह॒सितविष्क( ज॑ )म्भितांवस्फोटनानि २१ ॥४

वर्जयेदिति निष्ठीवितं कण्ठाच्छलेष्मण: सशब्दं॑ बहिनिरंसनमूँ। हि " पु

हसितं हासः विजम्भितं जम्मिका अवर्फोटनमड्डलीनां सशब्दमुप- मदेनम्‌ | २१ |

खखांरना, हँसना, जम्दाई लेना और अंगुलिंयों की चटखाना ये कार्य भी

गुरु के समक्ष करे २१॥

द्वीप्रचणालम्मने मेथुनशडकायाम्‌ २२

णां प्रेक्षणमवयवशों निहुपर्ण यादच्छिक दर्शनप्‌। आंलम्भन स्पशन ते अपि वजयेव्‌ | मैथुनशह्लायामिति वचनाद्वालूबृद्धातुरासु स्वय

. चे तथाविधस्थ दोषः २२॥

मैथुन की शंका द्वो तो ज्ली ( के अज्ञों ) की ओर ( कामुकतापूवक ) दृष्टि पात और उनका स्पर्श करे अर्थात्‌ सहंसा दृष्टि पड़ जाने और मैथुन की शंका होने पर छोटी बच्ची, इद्धा या रोगिणी को देखने एवं स्पर्श करने में दोष नहीं है ॥। २२

गौतमघमससूत्राणि

दतं हीनसेवामदत्तादान हिंसाम्‌ || २३ थतं बजयेदिति | हिविधं [ झतम्‌ | प्राण्यप्राणिस्रेदात्‌ प्राणियूत॑ मेषयुद्धाद्यप्राणिद्यृतमक्षक्रो डादि दीनसेवां हीनस्थ सेवामघो जातिप्रश्नते: | हीना चासो सेवा शौचादिजलछाहरणम्‌ | अदृत्तादानं केनाप्यद्त्तस्यो रसृष्टस्याप्यस्वामिकस्थाउ5दानप््‌ | हिंसा प्राणिपीडा २३ / ' जुआ, निम्नजाति के व्यक्ति की सेवा. ( अथवा निम्नकोटि की सेवाबूत्ति ), विना दी हुईं वस्तु का ग्रहण और प्राणियों की हिंसा करे || २३

.' * जआचायततुत्रस्धीदी चितनापानि २४

आचायस्य तत्पुत्नस्य तस्क्िया दीक्षितस्थ नाम्रानि वजयेत्‌ | परोक्षे5-

प्यौपाधिकेनामग्रहणं कर्तव्यमितिं २४ आचार्य, उनके पुत्र, उनकी पत्नी तथा (यज्ञ में दीक्षणीया इष्टि करके )

क्‍ |; हा : दीक्षा लेने वाले के नाम नहीं लेने चाहिए,।| २४

, मधुमांसाधेतत्पयन्तं वजयेदिति क्रियान्वयो5स्थापि सूनस्य-- शुक्लवाचो मध्य नित्य ब्राह्मण/॥ २५ ब्राह्मण: शुक्‍्छा अश्छीछाः परोद्देगकारिण्य: | मद्यं मदकरं द्रव्यम्‌ | ताव्य तब नित्यं बजयेत्‌ नित्य॑ ब्राह्मण इति बचनात्‌ क्षत्त्रियवश्ययोगूंह- . इथयो: पैष्टीव्यतिरिक्तमद्यों पयोगें प्रत्यवाय ईतिं॥ २५॥ हर ब्राक्षण अश्छील या दूसरे को कष्ट देने वाे वचन एवं मादक द्रव्यों के . सेवन का नित्य द्वी ( अर्थात्‌ सबंदा ) परित्याग करे | २५ - » अधःशय्यासनो पूर्वोत्थायी जघन्यसंवेशी २६॥ अस्यार्थों मानवे स्पष्ट:-- | ....._ नीच शय्यासन चास्य नित्य स्यादूगुरुसंनिधों। . 3 ..>जत्तिप्ठेस्मथमं. चास्‍्य चरंम॑ चेव संविशेत्‌ं इति २६॥ :+ ब्रह्मंचारी गुरू की शय्या की अपेक्षा नीची शय्या पर सोवे, गुरु के आसन की अपेक्षा नीचे आसन पर बैठे, गुर के जागने से पहले ही उठे और उनके . झोने के बाद सोने २६

कक; वाग्बाहृदरसंयतः || २७

४. ८४०

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+7» ब्राक्सयंमों बहुप्रछापविरह:ः | ब्राहुसंयमो, छोष्टमद्नायभाव: | उद्र- .. संयमो मितभोजनम्‌ २७ हु

" ष्बूं * |

सांनुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि २३.

वाणी, बाहुओं और पेट का संयम रखे ( अर्थात्‌ अधिक बोले, देला आदि चछावे और परिमित भोजन करे )॥ २७

नामगोत्रे गुरो! समानतो निर्दिेशेत | २८

आत्मनो नाभगोत्रे शुरो! समानतो निर्देशित्‌ | समानतो यथावद्प-.. छापरहितसित्यर्थ: | अपर आह--शुरोनोमगोत्रे समानतः सम्यगानतः प्रह्यो भूत्या निर्दिशेवति २८॥

गुरु को अपना नाम और गोत्र उचित रूप में शुद्धता के साथ ( अथवा भछी भाँति नम्नता के साथ ) बतावे २८ ||

अचिते श्रेयसि चैवम्‌ २९ || है अचितो छोके पूजितः। श्रेयान्विद्यादेभिरधिकः | तंयोरप्येवमेव

सम्यगानत इति। अन्न स्पृत्यन्तरम्‌--

आचाय चेक तंत्पुत्रं तद्भायों दीक्षितं गुरुम्‌ . पितरं वा पितृव्यं सातुलं मात्र तथा।॥ ... दितेषिणं विद्वांस खबर पतिमेव च। . ने अयान्नासतो विद्वान्मातुश्न भगिनीं तथा ॥। अचितें श्रेयसि चेत्येबंशब्दी यज्व यावच्च गुरावुक्त तत्सवमतिदि- शति | तेन शय्यासनादिकमपि तयोः संनिधों नोचं भचतीति २६॥

पूज्य और ( विद्या आदि में ) श्रेष्ठ जनों को भी ( इसी प्रकार अपना नाम . क्‍

और गोचर बतावे ).। २९

शय्यासनस्थानानि विहाय ग्रतिश्रव्णम्‌ ३०

गुरावाज्ञापयति सति प्रतिश्रवर्ण श्रतिबच्स . कुबंन्शुय्यासनस्थानानि ब्रिहायाभिगच्छन्कुयोंत्‌ ३० ॥|

गुरु के आज्ञा देंने पर (या कुछ कहने पर ) शेय्या, आसन और स्थान. ..: से उठकर उत्तर देना चाहिए ३२०क.

अभिक्रमणं वचनाद्ष्टन ३१॥- यदि बहिं:स्थितों गुरुण्पश्यस्तेव शिष्य. अ्रवीति तदा शिष्येणामि मणमुपसपंण कत5्य॑ ने पुनरदृष्टीडस्मीत्यनाद्रः कतेव्यः ३१ ( यदि गुरु अन्यंत्र से कुछ कहें तो उनके.) दिखछाई पड़ते रहने पर शिष्य को उनके समीप जाना चाहिए ३१ की

१४ ...._ गौतमघमंसूत्राणि

अधःस्थानासनस्तियंग्वातसेवायां गुरुद्शने चोत्तिष्ठेत ३२

यदा गुरुनीचेंः स्थांनमासनं चाधितिष्ठति स्वयमुच्चेःस्थानासन- स्थस्तदा गुरु दृष्टबोत्तिप्ठेत्‌। तियग्बातस्रेवायां मृत्रपुरीषोत्सगांदौ च॑

... गुरु दृष्टवोत्तिषत्‌। चकारः पृववापेक्षया समुच्चयाथ: | ३२ ||

गुर को ( अपनी अपेक्षा ) नीचे स्थान या आसन पर स्थित और मूत्र या मल्त्याग के समय गुरु को देखकर खड़े हो जाना चाहिए || १२॥

गच्छन्तमनुवजेत्‌ ३३

गच्छन्तं गु रुमनुगच्छेत्‌ ३३ ( शुरु के ) चलने पर उनके पीछे-पीछे चले ३३

ना कम विज्ञाप्याउडख्याय ३४ ... यरत्किंचिदस्य शिष्यस्य:८.कतेव्य तस्य निष्क्ृतिरिदं करिष्यामीत्या-

. /: चघ्यायौय विज्ञाप्य यच्चाउथ्चार्यो( यों )पयिकमुदकुम्भहरणादि तत्स्वय-

मेव ज्ञात्वा कृत्वा तस्मे कृतमित्याख्याय वर्तितव्यमित्यथे: ३४ . जो कर्म करना हो उसे तथा जो कुछ कार्य कर छुका हो उसे गुरु को बतलावे || ३४ आहूतो5ष्यायो ३५

गुरुणा55हूतः सन्नधीयीत तु स्वयं चोद्येदिति ३५॥ गुर के बुलाने पर अध्ययन के छिये जाये ( उन्हें स्वयं प्रेरित करे )॥ २५

युक्तः प्रियह्ितयो! ३६ ....... . आचायस्य यत्रियं हितं तत्र युक्तस्तत्परः स्यांत्‌ प्रियं' तत्काल प्रीतिकरम्‌ | दित॑ काहान्तेरे! तत्करपू ३६॥ .. आचाय को प्रसन्न करने वाले एवं उनका हित करने- वाले कर्मों में तत्पर रहे॥ २६

गे तद्भायापृत्रेषु चेक्म् ३७ तस्या55चांयस्य भायापुत्राश्र तेंषु चेंबमाचायबद्गतितव्यम्‌ ॥| ३७

.. आचार्य की पत्नी एंवं उनके पुत्रों से (आखाय॑ के) समान ही . « अयंचह्ार करे ३७ || हे

अय अधए हट कण आर विस पक 6 + बह औ+ पड पे. की तर पं. ३३५५ फेस 5६

से उमा 5 मिशओ पक

जि डर मद विन 55 कमध5 पदक

5 8 मी कान 5० आस रे ्े ४डंग ग्रेट *णण फैन “25-२5 ६.७३ रू ञ्ड _- कुछ शेप नाल $पच्चाएप्लड + अं -ण उ्रकप 3 के पिला ७. 5. हे शत सिर अपर गा बाबत 4० चरास अत मम प्ले उगकय हु न्‍

सांनुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि २५

अस्यापवाद 3-- नोच्छिष्टाशनस्रापनप्रसाधनपादप्रक्षालनोन्मदनोपसंग्रह-

णानि ३८

उच्छिष्टाशनं भुक्तशेषाशनम्‌ स्नापनं स्नानोयाद्सि: शिरोद्भमदन- पूवकमभिषेकः | प्रसाधनमलंकरणम्‌ पादश्रक्षालन प्रसिद्धमू। उन्मद्‌न- मभ्यज्ञशरोरसंवाहनादि | उपसंग्रहर्ण व्यत्यस्तपाणिनेत्यादि पूर्वोक्तम। एतानि गुरोभ्भाययापुत्रेषु कतव्यानि | अत एवाउ5चार्य करतंव्यानीति सिद्धमू ३८ ॥॥

( किन्तु गुरु की पत्नी एवं उनके पुत्रों के विषय में ) उनका जूठा भोजन करना; उन्हें ( जल से शिर आदि को मछते हुए.) स्नान कराना, अलंकृत करना, पैर धोना, शरीर दबाना और ( पूर्वोक्त उपसंग्रहण की विधि से ) दाहिने

... हाथ से दाहिने और बाएँ हाथ से बाये पैर को छूकर प्रणाम करना--ये काय ... नंकरें॥ शेट॥ ही क्‍

अथीपसंग्रदणस्य प्रतिप्रसव:--

$

. पविप्रोष्योपसंग्रहण शुरुमार्याणाम्‌ ३९ विप्रोष्य भ्रवास॑ गत्वा प्रत्यागतेंन . गुरुभायाणामुपसंग्रहर्ण

कार्यम्‌ ३९॥

यात्रा से लौटकर आने पर ( पूर्वोक्त उपसंग्रहण के नियमानुसार ) गुर. की पत्नियों के चरण का स्पश करे ३९

तत्नापि-- नेक हु

नेके युवतीनां व्यवहारप्राप्तन ४०

. / एके त्वाचार्या युवतीनां गुरुभां्याणां व्यवद्ार्राप्तेन षोडशवषग्रायेण शिष्येण विप्रोष्याप्युपंसंग्रहर्ण कॉरयेमिति मन्यन्ते ४०

कतिपंय आचायों का मत है कि. ( यात्रा से छौटकर आने पर भी ) युवक ( प्रायः सोलह बर्ष की आयु वाले ) शिष्य को युवती ग़ुरुपत्नियों का चरण नहीं छूना चाहिए ४० ॥. पक

अग्नीन्धनमैक्षचरण इत्युक्तम तन्नाग्नीन्धनस्य प्रतिगह्मं व्यवस्थितत्वात्साधा- रणमैक्षचरणे विधिमाइ-- क्‍ क्‍

सा्ववर्णिकमैक््यचरणममिशस्तपतितवजम ४१

सर्वेषु वर्णेषु भव॑ सा्बबर्णिकम्‌। अमभिशस्तान्पतितांश्व बजयित्वा

सर्वेषु बर्णेषु भैक्ष्यं चरितव्यम्‌। अभिशस्ता उपपातकिनः ४१ ||

5. (मामा आदि ) के या अपने पर से भिक्षा मांगे || ४३ ॥|

२६ ..... गौतसधमसूत्राणि .

पातकी और पतितत ( अपने कर्म से च्युत ) व्यक्तियों. को छोड़कर सभी वर्णो ( के शहस्थों के घर ) से मिक्षा' मांगकर छाये ४१ आदिमध्यान्तेषु मवच्छब्दः प्रयोज्यों वश चिक्रमेश ॥४२ भिक्षां देहीति पद्द्यस्थाउडद्मिध्यान्तेपु बणक्रस्रेण, भवरछव्दू: संबुद्धयन्तः प्रयोक्तव्यः ख्लीषु श्लीलिज्ञः | आद्वाण्स्य . भवन्मिक्षां देहि ब्राह्मण्यां भववि भिक्षां देहि | क्षत्त्रियस्थ भिक्षां भवन्देदि | भिक्षां सबति देहि | वैश्यस्य भिक्षां देदि भवन्‌ | भिक्षां देहि भज्ति ४२।॥

( मिक्षा माँगते समय भिक्षा देने वाले के ब्राक्षण क्षत्रिय या वैश्य ) वर्ण,

के अनुसार 'मिक्षां देद्दि! इन पदों के आदि, - मध्य, या: अन्त में 'भिवत्‌' (जी हो तो 'भवति' )शब्द का प्रयोग करे | ४रै)

आचायज्ञातिगुरु [ सवे ] प्वलाभेज्न्यत्र ४३.॥

आंचाये उक्त: ज्ञातिः पितृंज्यादिः सर्पिण्डः। 'गुरुमोतुलांदि:।

स्वमात्मोयग्रहणप्‌ अन्यत्र भिक्षाया अभावे, आचायोदिरृद्देषु “भेक्ष्य चरितव्यप्र्‌ ४३ ' अम्यत्र मिक्षा मिलने पर आचाये, अपने सपिणड जनों, गुरुजनों

के * ई+

तेषां पूत्र पृत्र परिहरेत्त .॥ ४४ तेषामाचायादीनां यो येः अरभ्रभनिर्दिष्टस्त) ते प्ररिद्द रेत,

: + ब्ाल्ाभे स्वगृहे, तत्राछाभे गुरुषु, तत्राछाभे ज्ञातिषु, तत्राढाभ आचार्य-

गृह इति 8४.॥ शक

क्‍ इनमें क्रमशः पहले-पहले वाले. को बचावे ( अर्थात्‌ अन्यन्न सिक्षा मिलने पर अपने घर से माँगे; वहाँ मिलने पर गुरुजनों के यहाँ माँग्रे; वहाँ भी .न॑ मिलने पर सपिण्डजनों के यहाँ माँगे .और , कहीं मिले तब गुरु के घर ' से मिक्षा माँगे ४४

क्‍ निवेध गुरवेज्नुज्ञातो शुद्मीत ४७५ .. इद्मानीत॑ भेक्ष्यमिति गुरंवे निरवेयें तदलुज्ञातों भुझ्लींत। यंदिं गुरु . स्वयं गरह्ोयात्ततोडन्यदाहरेतू ४५ |।

मिली हुईं भिक्षा-की गुर के सम्पुर्ख: पंस्तुत करे आऔर उनकी आशा मिलने पर ही उसका भोजन करे | ( यदि गुरु उसे स्वयं" ग्रहण करें तो दूसरी भिक्षा

(7. 8 काका,

क्‍ . . -माँगकर छानी चाहिए--मितांक्षंरा ) ४५

5 बल 2 4 8८ 2%:22%546 22425 % 32250 38204 53, ## ५3320 कुक हे | मप्र सनकी अपणेध लव लसमरुर ३2605 ५०२७८८५४४

2:02 32220 23304 0303 45330 3237-7०: 02:७७

>> कल १३० -स-प जु

सानुवाद-मिताक्षराक्षत्तिसहितानि सर

असंनिधो तद्भायापृत्रसब्रह्मचारिश्यः ४६

आचायौसंनिधाने तद्भायोदिभ्यो यथासंभव॑ निवेद्य तैरनज्ञातो भुख्जीत | ४३ ||

गुरु के कहीं दूर होने पर उनको पत्नी, उनके पुत्र या अपने साथ के ब्रद्मचा रियों के समक्ष रखकर ( उनक। अनुर्मात मिछने पर भिक्षान्न का भोजन करे ) ४६ क्‍

वाग्यतस्तृप्यन्नलोलुप्यमान; संनिधायोदकम्‌ ४७

यावद्भुक्ति वाचंयमः। तृप्यन्नन्रदशनेंच हृष्यन्‌ू। अछोलछुप्य- मानो5तिस्प्ृद्ामकुबसन संनिधायान्तभोवितण्यथः संनिधाष्येतति | उद्कमुदकभा जनमिति ४५ ॥।

( भोजन करते समय » मोन रहे, प्रसन्न रहे, छाछच करे और जल का पात्न अपने निकंट रखे || ४७

शिष्यशासनप्रकारमाह- 5 शिष्यशिश्रिघेन | ४८॥ . :.

. बधस्ताडनप्र्‌ | अताडयता गुरुणा भत्सेत्रादिभिः शिष्य: शास्यः ॥।४८॥ के

गुरु शिष्य को बिना मारे-पीटे केवल उसकी भत्सना करके अनुशासित

रखे ॥| ४८ कक का

अशक्तो रज्जुवेशुविदलाभ्यां तनुभ्याम्‌ ४९ ॥.......

यदि भत्सेनादिभि: शासितुमशक्यस्ततो रब्ज्वा. तत्वा, तनुना-बेणु- .

विद्लेन वेति | इंद्वनिर्दिष्टयोरपि विकल्पो रज्ज्वा वेणुदछेन वेति मानवे दृशनात्‌ ताभ्यां दुबछाभ्यां ताडयित्वाइपि शासनीय: ॥| ४९

यदि भत्सना से ( उद्दण्ड (शंष्य ) वश में रहे तो पतली सरथसी या बाँस की पतली छड़ी से मारकर ( अनुशासित रखे )॥ ४९ | अन्येन ध्नन्‌ राज्ञा शास्यः ५०॥ हस्तादिना क्रोषवशेन ताडयनराज्षा शास्य आचाये। | एवं शिष्यस्थ गुरुकुछे वास उत्तःन। ४० अन्य किसी प्रकार से ( क्रोपपश होकर हाथ आदि से शिष्य को ) मारने

पर ( आचाये ) राजा द्वारा दण्डनीय होता है ५० ||

रैघद...: : गौतमधमेसूच्राणि कियन्तं कालमित्यत आह--

द्वादश वर्षाण्येकवेदे ब्रक्मचय चरेत्‌ ४१ . यय्प्येकेकस्य वेद्स्य बहयः शाखा:। एकर्तनिशतिधा बंहँश्व॑च

' _ एकशत्त यज्भु: शाखा: सहस्रवत्मो सामवेदी नवधाउडथबंणों वेद इति। ... : तथापि तन तत्र वेदे पूवरध्ययनानुष्ठानाभयां परिगृहोता यावती शाखा .. ..: तावत्यत्र वेद्शब्देन विवक्षिता। एक॑ वेदमधीते द्वादश वर्षाणि

गुंरुकुले ब्रह्मचय चरेत्‌।। ५१ क्‍

एक वेद के अध्ययन के लिए. बारह वंष तक ब्रह्मचय॑ का आचरण करे || ५१५॥

क्‍ प्रतिद्ादश वा सर्वेषु ५२ ही

.. ..... थरतु चतुरो वेदानध्येतुं शक्तः प्रतिद्वाद्श प्रतिषेदे द्वादश ब्षो _... णीत्यथ: | यथा55हा55पस्तम्वः हा उपेतस्या55चायकुले ब्रह्मचारिवासोडष्टाच त्वारिंशद्वत्सराणीति ॥५२॥ अथवा यदि चारों वेदों का अध्ययन करने में समर्थ हो तो प्रत्येक बेंद के .... लिये बारह वर्ष तक गुरुकुछ में निवास करे ५२ बा ग्रहणान्त वा ५३॥

यावता कालेनकों वेदों हो त्रयश्वतुरों वां प्रहीतुं श॒क्यास्तावन्तं काछमिति ५३॥

अथवा बितने समय में ( एक, दो, तीन था चारों वेद का ) अ्रदण कर सके उतने समय तक ब्रह्मचर्याश्रम में रह्दे || ५३

विद्यान्ते गुरुरथन निमन्त्रयः ५४ विद्यासमाप्तो गुरुरथेन प्रयोजनेन निमल्‍्ठय: प्रष्टवयः | गुरो, इदं धन-

क्‍ माहराणीति ५४

विद्याध्ययन समाप्त कर लेने पर गुरु से ( गुरुदक्षिणा.) धन के विषय में पूछि॥ ५४॥ .. कृत्वाध्लुज्ञातस्यथ वा खानम १५

.. ... तत आहरेत्याचार्योक्त कृत्वा स्नान॑ कतव्यम्‌ बंत्स त्वदुगुण रेवाह- :.. मस्मि तोषितो ध्नेनालूमितिं तेनांनुज्ञातस्यं वा; स्नॉनें समावतन कतें-

. उैयमिति ५५

४७ कक _

हि आर करे

8० पड कवर पक २०२९ ५०० करो रटुआए: ०5३ जे नह 7५५ रख. >न:८८ ६: 7 सच

शक 200 2 23% 33४ 33३

2०5 + + -- उच्काहर हर लक जप * 5

ब्छ.२,पइप्स्थार पर कक पर ००

7५. कन्क 2 अजरे.

सानुवाद-मिताक्षराबृत्तिसहितानि २५०,

( शुरु की आज्ञानुसार गुरुदक्षिणा प्रदान) करके अथवा उनके द्वार प्रसन्नतापूवक (बिना दक्षिणा लिये ही) आज्ञा दी जाने पर समावतंन स्नान करे ५५॥

आचाय श्रेष्टो गुरुणां मातेत्येके [ मातेत्येके | ५६

गुरुणां पिन्नादीनां मध्य उत्तलछक्षण आचायः श्रेष्ठ | हि विद्यातस्त॑ जनयति तन्छे््ध जन्म। तेनानेकगुरुसमवाये एवं प्रथम पूज्य: एके त्वाचार्या माता श्रेष्ठेति मन्यन्ते | तथा वसिष्ठ:--

उपाध्यायाहइशा55चाय आचायौणां शत पिता |

पितुद्शगुर्ण माता गौरवेणात्तिरिच्यते आपस्तम्बोडपि-- माता पुत्रत्वस्य भूयाँसि कमोण्यारभते तस्‍याँ शुश्रषा नित्या पतिताया- मपि। हिरुक्तिरध्यायपरिसमाप्त्यथी ५६

इति श्रीगीतमी यवृत्ती हरदत्तविरचितायां मिताक्षरायां प्रथमप्रश्ने द्वितीयोध्ध्यायः ।।

पिता आदि पूज्य जनों में आचाय॑ श्रेष्ठ होता है; किन्तु कतिपय आचार्यों

का म्रत है कि माता ( सभी पूज्य जनों में ) भेंष्ठ होती हैं।। ५६ ॥|

गौतमघमसूत्र के प्रथम प्रश्ने में द्वितीय अध्याय समाप्त ॥|

अथ प्रथमप्रश्ने तृतीयो-ध्याय

तस्या55श्रमविकल्पमेके ब्रवते १॥

तस्येबरमधीतवेद्स्य ब्रह्मचारिणो वध्ष्यमाणाश्वत्वार आश्रमा विकल्प्यन्त इत्येक आचायो ब्रबते | अन्ये तु समुश्चीयन्त इति | तत्नाउ5पस्तम्ब/)-- तेषु सर्वेषु यथोपदेशमव्यभो वतमानः क्षेम॑ गच्छतोतति ) बुद्ध्वा कर्माणि यत्कामयेत तदारभेतेति तथा ब्रह्मचर्याश्रममुक्त्वा अत एव त्रह्मचयवान्प्रत्रजञति” इति बोधायन: | मनुना तु समुच्चयो दृर्शितः-+ - क्‍ ऋणानि त्रीण्यपाक्ृत्य मने मोक्षे निवेशयेत्‌ -अन्नपाकृत्य मोक्ष तु त्रजमानः पतत्यथधः सबंठपि क्रमशस्त्वेते यथाशारत्र॑ निषेविताः ».... यथोक्तकारिण विप्र॑ नयन्ति परमां गतिमू। इति॥ | . क्तिपय आच्चा्याँ का मत है कि उस (वेद का अध्ययन पूरा कर लेने *.. वाछे) ब्रह्मचारी को ( चारों आश्र्मों में से) किसी भी आश्रम को स्वीकार _.. करने की छूट होती है के पुनस्त आभश्रमा।--... ब्रक्षचारी ग्ृहस्थों भिन्लुवंखानसः २॥ यद्यप्यसौ पूव॑मपि ब्रह्मचरयाश्रम उक्तसस्‍्तथाडपि प्रपित्सितनेष्ठिकअदा चारित्वमत्र विवक्षितम्‌ भिक्षुः संन्‍्यासी। वेखानसो वानप्रस्थः | वेखानसप्रोक्तन मार्गंण वर्तंत इति | तेन आश्रमः प्राधान्येन दर्शितः शाख्रान्तरेषु बंखानसस्तृतीयों मिश्षुश्चतुर्थ भाश्रम:। इह तु क्रममेद . प्रागुक्ताक्षय आश्रमिण इत्यत्र बखानसवजनाथः | २॥ ( वेदाध्ययन समास करने के उपरान्त ) ब्रह्मचारी, ग्रहस्थ, संन्यासी या

... वबानप्रध्थ का जोवन आरम्म कर सकता है ( यहाँ प्रधानता के मेद से संन्यास

की वानप्रस्थ के पहले रखा गया है )।।

तेषां शृहस्थो योनिरप्रजनत्वादितरेषाम्‌ तेषां चतुष्वप्याश्रमेषु बतमानानां ग्रहस्थी योनिरुपस (तप) त्तिस्था- ... नम्‌। ग्रहस्थेनेवोत्पादिताश्वतुर्भिराश्रमैरधिक्रियन्ते | ग्रहस्थव्यतिरिक्ता- ... अ्रमस्थानां प्रजोत्पादनस्य निषिद्धत्वात्‌ | तत्र शातातपु+--

पा ] हि तर 227 ०8 जे -ह ] + ]

सानुवाद-मिताक्षरावृत्तिसहितानि ३१

: चण्डाला: प्रत्यवसिताः परिब्राजकतापसा: ! तेषां जातान्यपत्यानि चण्डालेः सह वासयेत्‌ ।| इति || इन आश्रमों में ( स्थित पुरुषों का ) श्हस्थाअम ही उत्पतिस्थान है; क्योंकि गहस्थाभरम के अतिरिक्त अन्य आश्रर्मो में सन्‍्तान-उत्पत्ति की व्यवस्था नहीं है।॥ ३३) इृदानीमाश्रमधर्मान्वश्यन्प थमनिर्दिष्स्य ब्रझ्मचारिण आइ---

. .... तत्रोक्तं ब्रक्मचारिण!

तन्न तेषां मध्ये ब्रह्मचारिणो नैश्चिकस्य यदुपकुत्राणस्योपनयनादिनि यम इत्यारभ्योक्त तदेवास्यापोत्युक्त॑ भवति ||

इन आश्र्मों में अक्षचारी के नियम पहले बता दिये गये हैं. ( अर्थात्‌

'नेष्ठिक ब्रक्षचारी को उन्हीं नियमों का पालन करना चाहिए ) ४॥

तंत्र विशेष-- ' आचायधिीनत्वमान्तम आन्वमादेहपातम | आचायकुछ एवं तच्छुश्षया बतत ५॥ . नैष्डिक ब्ह्मचारी जीवनपर्यन्त आचार्थ के अधीन ( गुरुकुल में नियास करते हुए: एवं -आचाय की सेवा करते हुए ) रहे ५॥ "३५

गुरो! कमशेषेण जपेत ६॥।... आचार्य प्रकते गुरुशब्दः पिन्नोरपि ग्रहणाथ! | ततश्राउ5चाय पितरौं शुश्रपमाणस्तदूत्यतिरिक्त काले जपेद्देदमधीयीत तु स्वाधीनों भवेत्‌ | ६॥ क्‍ " . आचाय ( भौर माता-पिता ) की सेवा के उपरान्त शेष समय . में जप करे |

गुवंभावे. तदपत्यवृत्तिस्तदभावे वृद्ध सब्रह्नचारिण्यग्नो

बा॥

झाचाय या .वृत्तिरंभिहिता सा. तदभावषे- तत्पुत्रे, तत्पुत्राभावे वृद्ध

विद्यया वयस्ा वाध्चिके, बृद्धाभावे तथाभूते सन्रह्मचारिणि, सन्नह्मचार्य -

भावेडग्नों बा कतव्या | समिदाधानादि्भिरग्नो वृत्ति:॥। || गुरु के.नःहोने पर उनके प्रति बताई गई वृत्ति का आचरण उनके पुत्र के प्रति करे; उनके पुत्र के अभाष में ( विद्या में या आयु में ) श्रेष्ठ व्यक्ति के *

... « प्रति और उसके अभाव में अपने. सह्यध्यायी अह्नचारी के. प्रंतिं उस बृत्ति का

३२ गोतमधमसूत्राणि

आचरण करे और उसके भी . अभाव में अग्नि में ( समिधाओं का हवन आदि कम द्वारा ) वृत्ति करे || ७॥

एवंव त्तो ब्रह्मतोकमवाप्नोति जितेन्द्रियः .. स्पष्ठोथथेः | जितेन्द्रियर्य मनुना दर्शितम: श्र॒त्वा रपष्टवा दृष्टवा भुकत्वा ध्यात्वा यो नरः | हृष्यति ग्लायति वा विज्ञेयो जितेन्द्रियः ॥५८॥ इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके इस प्रकार आचरण करने वाला नेष्टिक ब्म- चारी ब्रह्मलोक प्राप्त करता है।|

उत्तरेषां चेतदविरोधि

उत्तरेषामप्याश्रमाणामस्मिन्चृत्त यद्विरुद्धं तत्समानम )। यथा झता- दिवजनम | विरुद्ध यथा--अग्निकाय अनत्रेजितस्य, गुरुकुछबासो वबखा

...... 'नसस्य, ब्रह्मचय यृहस्थस्येत्यपरा वृत्ति:। उत्तरेषां चाउउश्रमाणां धमजा / /. तमेतस्थ द्रष्टव्यम्‌। किमविशेषेण | एतद्विरोधि। एतदाश्रमधर्मावि

रोधि न॒ ल्लेच्छाशच्यधार्मिकेके सह संभाषेतेत्येबमायस्यापि 'भवति ९.।। है ब्रक्मचय के बाद के आश्रर्मों में भी ब्रह्मचर्याश्म के जो आवरण प्रतिकूल , नहीं हैं वे समान रूप से विह्ित हैं॥

बहुवक्तव्यत्वाक्रमप्रामपि गदस्थमुन्नडच्य मिक्षो्धर्मानाइ-- -

अनिचयो भिक्षु; १० निचयो द्रव्यसंग्रहस्तद्रहितः स्थात्‌ ।। १० | संन्यासी को ( द्रव्य आदि का ) संग्रद्द नहीं करना चाहिए १० ऊध्बरेता।