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हमारा अनुपम काव्य-साहित्य
बन्दना के बोल
(महात्मा जी के प्रति श्रद्धा के फूल) हरिकृष्ण प्रेमी! २।)
रूप-दर्शन : दरिकृष्ण प्रेमी” ६) श्राँखों में : हरिकृष्ण “प्रेमी” २।) बलिपथ के गीत : जगन्नाथ प्रसाद 'मिलिन्द! ३) रावण महाकाव्य : दरदय!लुसिंह ५) काव्य-धारा : संग्रह-कर्तो डा० इन्द्रनाथ मदान ३॥) २॥) प्राखोत्सगं : देवीदयाल चतुवंदी 'मध्तः १॥) राजधानी के कवि :
गीत-गोविन्द (सचित्र पद्मानुवाद ) : विनयमोहन शर्मा ५४)
मधु-सञ्चय : संग्रह-कर्ता बालकृष्ण राव
कील तथा त्यागी. ३)
प्रथम सुमन : सत्यवती शर्मा १) अमृतप्रभा : राजेश्वरप्रसाद नारायणसिंह ॥&) झ्रम्वपाली : राजेश्वरप्रसाद नारायणसिंह ३॥)
राधा-कृष्ण : राजेश्वरप्रसाद नारायणसिंद २॥) संकलिता : राजेश्वरप्रसाद नारायणृतिंह २॥) बाल-कविता संग्रह एक था राजा, एक थी रानी : चिरंजीत १)
नटखट के गीत : चिरंजीत १) बाल-मेला : शम्भूनाथ शेष! ॥) नव-प्रभात : चन्द्रिकाप्रसाद मिश्र ॥)
हमारा पुरस्कृत साहित्य १. रावण महाकाव्य : हरदयालु सिंह वर्मा ५)
२. साहित्य-विवेचन : क्षेमचन्द्र सुमन तथा योगेन्द्र मल्लिक ७)
विसेजन : प्रतापनारायण श्रीवास्तव ६)
३
४. रूप-दर्शन (कविता) : हरिक्ृण प्रेमी ६) ५. दापथ (नाटक) को २॥) ६. उद्धार (नाटक श २) ।
' बलिपथ के गीत : जगन्नाथ प्रसाद 'मिलिन्द' ३) , स्मंपण ; *.
€. हिन्दी कविता में युगान्तर : डॉ० सुधीनद्र ८) १०. इन्सान (उपन्यास) : यज्ञदत्त छर्मा ४)
११. मेने कहा गोपालप्रसाद व्यास ३) १२. आय का मुस्ना (तीन भाग) सावित्रीदेवी वर्मा १३॥) १३. भूगोल के भोतिक श्राधार रामस्वरूप वश्षिष्ठ ६) १४. शिवालक की घाटियों में : विद्यानिधि ५) १५. सध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ :
डाँ० सावित्री सिन्हा ८)
१६. काव्यालंकार सूत्र श्राचाययं विश्वेश्वर १२)
१७. डूबते मर्तूल (उपन्यास) नरेश मेहता ४) १८. सचिनत्र गृह विनोद अरुण ८)
१६. चन्दा मामा का देश सनन््तोष नारायण नौटियाल ३)
२०. विन्ध्य-भूमि की लोक कथाएँ : श्रीचंद जैन अम्बाप्रसाद श्रीवास्तव १) २१. प्राचीन भारतीय परम्परा श्लौर इतिहास : डॉ० रांगेय राघव १२) २२. स्वप्न-भंग नाटक : हरिक्ृष्य प्रेमी १॥) २३. विष पान : » जम अर्थ
है ।
आत्माराम एण्ड संस, कश्मीरी गेट दिल्ली-६
न कक
शिवदानसिंह चोहान
हिन्दी-कविता का विकास
श्रीधर पाठक से लेकर भ्रब तक के सत्तर-पत्रहत्तर वर्ष हिन्दी (ख़ड़ीबोली) कबिता के जन्म आर विकास के अ्रभूतपूर्व वर्ष हें । त्रोत से निकली क्षोरा धारा जंसे भ्रपनी यात्रा में मार्ग की उप- त्यकाओं, वन-प्रान्तरों और समेदानों का पानी समेट कर विशाल धारा बन जाती है, श्लोर कोटि-कटि एकड़ भूमि को सींचती और उर्बर बनाती हुई भागे बढ़ती है, उसी तरह प्रारम्भ में एक-दो कंठों से फूट-निकली हिन्दी-कविता आज एक विशाल धारा बन गई है, जिसके संगीतमय भ्रहरह गर्जन में सेकड़ों समय झर उदीयमान कवियों के कंठों का सम भ्रौर विषम स्वर ॒ध्वनित है, भौर वह कोटि- कोटि हिन्दी-भाषियों के हृदयों को रस-प्लावित कर नये विचारों श्रोर भाषाओ्रों की खेती के लिए उर्वर (चेतन-संस्क्रत) बना रही है।
इस काव्य-धारा के प्रवृत्यात्मक विकास का पभ्रध्ययन इन तीन युगों में बॉँट कर करना अपेक्षित है--( १) पू्व-छायावाद-युग (२) छायावाद-युग (३) उत्तर-छायावाद-युग ।
इस काल-विभाजन का छायाबाद ही प्रमाण है। छायावाद का विस्तार दोनों महपयुद्धों के बीस-इक्कोस वर्षों की काल-अ्रवधि है । छायावाद युग से पहले की कविता में किसी समय कोई एक ही प्रवृत्ति या विचारधारा सर्ज-प्रधान नहीं रही । उत्तर-छायावाद युग में भी श्रभी तक हिन्दी-काव्य को कोई प्रवृत्ति इतनी प्रभुत्वशाली और व्यापक नहीं हो पाई कि उसके नाम पर युग को भ्रभिहित किया जाय । इस काल-विभाजन का छायावाद प्रमाण इसलिए भी है कि पूर्ण और पश्चात् को काव्य धाराएं और प्रवृत्तियाँ छायाबाद से भ्रन्तरंग रूप से सम्बन्धित हें । श्रोधर पाठक से हिन्दी-कविता की जो परम्परा चली, वह छायावाद की ही पूर्ब-गामिनी थी । छायावाद के पूर्ग-चिह्नू उसमें प्रगट थे, और उसके बहिरंग को देखकर आालोचकों भौर इतिहासकारों ने भ्रपने रजिस्टर में प्रवृत्तियों के चाहे जितने खाने खोल दिए हों, उसका स्वाभाविक विकास छायावाद की ओर ही था, क्योंकि युग की प्रगतिशील चेतना झौर अ्रनुभूति श्रश्नात रूप से इस दिशा में ही विकास कर रही थी। इसी भ्रकार उत्तर-छायावाद युग की कविता भी छायावाद से ही निसृत है । छायावादी काव्य के ह्ास- चिह्न इसमें प्रकट हें । छायावादो प्रवृत्ति एक संशिलिष्ट प्रवृत्ति थी, किन्तु उत्तर-छायावाद युग में उसको संहिलिष्ट भावना विश्युंबलित हो गईं; जिससे काव्यानुभूति के तार बिखर गये । छायावादो कविता का स्वर बिखर गया । कुछ कवियों ने छायावाद के समाज-परक तत्वों में नये विचार भरकर सच्ची श्रनुभूति के बिना ही प्रगतिशीलता का स्व॒र-संघान करना चाहा, तो कुछ ने उसके व्यक्तिपरक तत्वों की गठरी सहेज कर प्रयोगशीलता का बोद्धिक घत्मकार दिखाया । दोनों श्लोर खोखला भ्रात्म प्रदर्शन ही भ्रधिक रहा, जीवन के हुषं-विधाद और उसकी समस्याश्रों की सामिक भ्रभिव्यक्ति बिरल
हो गई । इसलिए प्रारम्भ की साथरण, सरल, इतिवृत्तात्मक किन्तु ब्रिकासोन्मुखी हिन्दी कविता;
र काब्य-धारा
दोनों महायुद्धों के बीच की श्रपने पूर्ण उत्कर्ष पर पहुंची छायाबादी कविता श्रौर उत्तर-छायावादयुग की पथम्नष्ट अ्रधबा पथ-खोजी; दुरूह भ्रथवा गद्यात्मक कविता में एक-सूत्रता है। जिसे हमारे इति- हासकार बड़े गर्ग से “राष्ट्रीय कबिता कहते हें (मानों उन चन्द उद्बोधनात्मक कविताओं और तुकबन्दियों के भ्रतिरिक्त सब कुछ भ्र-राष्ट्रीय हो), वह भी इस सूत्र में ही श्रनिवायंतः गुंथी हुईं है । राष्ट्रीय-जागरण के करोड़ में ही हिन्दी-कबिता का जन्म श्लौर विकास हुआ है, इसलिए राष्ट्रीय-भावना कहीं दृश्यस्तर की वस्तु-योजना को लेकर तो कहीं गहरी श्रन्तःप्रवृत्ति की सृक्ष्म, मार्मिक श्रभिव्यक्ति के रूप में व्याप्त रही है । ठ
जिस कविता को हिन्दी में छायावादी कहकर पुकारते हें, वह वस्तुतः पाश्चात्य देशों की 'रोमांटिक' (स्वच्छुन्दताबादी ) कविता की अनुरूपिणी है। बंगला से लेकर “छायावाद” नाम तो उन विरोधियों का विया हुआ है जिनमें यथातथ्यवादी, अ्रभिधा-शेली में लिखी तुकबन्दियों या परम्परा- विहित धारिक-भावना से लिखी कबिताओं के भ्रतिरिक्त किसी प्रकार की भी संश्लिष्ट श्रौर अ्रनु- भूति-प्रधान कविता को समभने की क्षमता ही नहीं थी। किन्तु यह शब्द प्रचलित होकर रूढ हो गया झौर स्वयं स्वच्छुन्दतावादी कथियों ने इसे अपना लिया। स्वच्छुन्दताबाद की प्रवृत्ति विश्व- साहित्य में नई नहीं है । यथार्ंबादी प्रबुत्ति की तरह काल-बिशेष की विशेष परिस्थितियों में यह वस्तुजगत् के प्रति संवेदनशील मनुप्य की एक विशिष्ट, किन्तु स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। यह केवल एक पअ्रन्ध भाव-प्रतिक्रिया ही नहीं है, बल्कि जीवन झोर जगत् के प्रति एक निश्चित श्रौर मूलभूत दृष्टिकोरा भी है। इसलिए हिन्दी की छायावादी कविता को पाइचात्य या बंगला-काव्य की श्रनुकृति या अनुवरतिनी नहीं कहा जा सकता, यद्यपि उनसे प्रभावित वह भ्रवश्य है। एक सीसा तक किसी भी काल को कविता को स्वच्छुन्दतावादी कहा जा सकता हे जो भाव भ्रोर कल्पना-प्रधान हो, श्रर्थात् जिसमें रीति-बद्ध काव्य की तरह रूढ़ि-नियमों, श्नौर सुनिश्चित शास्त्रीय परम्परा का निर्वाह न हो । इस ब्यापक श्रथ्थ में हम प्राचीन काव्य में भी यत्र-तत्र स्वच्छुन्दतावादी प्रवृत्ति के चिह्न खोज कर निकाल सकते हैं । लेकिन श्रठारह॒वीं-उन्नीसवीं शताब्दी के पश्चात्य काव्य और साहित्य की एक विशिष्ट प्रवृत्ति और जीवन-दृष्टि के श्रर्थ में ही स्वच्छुन्दताबाद या “रोमान्टिसिज्म' शब्द का प्रयोग होता है । इस प्रवृत्ति के अंकुर चाहे पश्चिम की प्राचीन और मध्यकालीन काव्य-परम्परा में मिलते हों, लेकिन इसका प्रस्फूटन अनेक श्रन्तविरोधी तत्वों के संयोग से एक भ्रभिनव और विशिष्ट रूप में हुआ |
एक अंग्रेज़ी आ्रालोबक का कहंना है कि स्वच्छन्दतावादी दृष्टिकोण का प्रतिनिधि प्रतीक सध्यकालीन गाथाओ्नरों का चरितनायक डाक्टर फॉस्टस है, जिसने वर्जित तंत्र-ज्ञान का भ्रध्ययन करके स्वयं ईश्वर को चुनौती दी थी। मध्यकालीन जन-साधारण को दृष्टि में डाक्टर फॉस्टस सामन््ती सत्ता को चुनौती देने, ज्ञान की उपलब्धि में निरत रहने और “मनुष्य भ्रपने हित-साधन के लिए प्रकृति को वश में कर सकता है, इस सानवी विश्वास का प्रतीक था | किन्तु बाद में, स्वच्छन्दता- वादियों को दृष्टि में वह भ्रज्ञात और श्रप्राप्य को प्राप्त करने की शाइवत मानव-चेष्टा, वस्तु-जगत् से मनुष्य के चिरन्तन श्रोर दुनिवार श्रन्तविरोध का प्रतीक बन गया । मध्यकालीन दृष्टिकोण में व्यक्ति की महत्ता ओर शक्ति-सम्भावना में भ्रास्था थी, तो स्वच्छन्दतावादी दृष्टिकोण में सनुष्य और वस्तु-जगत् में चिरस्थायी संघर्ष और विरोध का विश्वास था। इस प्रकार वास्तविकता और उसके सत्य की खोज से विमुख होकर वास्तविकता से ही पालायन करने की चेष्टा करना यथाओर्थ- . यादी दृष्टिकोण से स्वच्छुन्दतावादी दृष्टिकोण की ओर संक्रमण है ।
इस स्थान पर हम उन समाजगत कारणों की ओर संकेत ही कर सकते हें जिन्होंने कला
हिन्दी-कविता का विकास ३
और साहित्य में व्यक्तिवाद को जन्म दिया । सध्यकाल से निकल कर मनुष्य ने जब प्रौद्योगिक युग में प्रवेश किया, उस समय व्यक्तित की सत्ता के प्रति वह पहली बार व्यापक रूप से सचेतन हुआ । क्रांस और इंग्लेंड की प्रौद्योगिक क्रान्तियों ने, जिनके फलस्वरूप मानव-समाज सामन््तकाल से निकल- कर पूंजीवादी युग में ग्राया, मनृष्य के श्रधिकारों की घोषणा को थी। यह एक प्रजातांत्रिक सिद्धान्त की घोषणा थी, जिसका भ्रयं था कि स्वतन्त्रता श्रौर भाईचारे के वातावरण में हर व्यक्ति शान्ति- पूर्वक अपने व्यक्तिगत सुख-सम्मान के साधन जुटा सकता है; कतई झावद्यक नहीं कि उसके व्यक्तिगत हित सामाजिक हितों से भ्रनिवार्यंतः टकरायें ही। व्यक्तिवाद की यह स्वोकृति समाज की अस्वीकृति पर निर्भर नहीं थी। व्यक्ति-चेतना का यह रूप मनुष्य मात्र की चेतना का मुक्तिदायी विकास-चिह्न है। तब से व्यक्तिबाद किसी न किसी रूप में विश्व-मानव को चेतना का भ्रभिन्न अंग बना हुआ है झौर किसी भी भावी समाज में व्यक्ति को सत्ता और उसकी व्यक्ति-परक चेतना को विस्मृत करने के लिए मनुष्य को विवश नहीं किया जा सकता। एक पूर्णतः जनवादी अ्रयवा समष्टिवादी समाज में भी व्यक्ति ही समाज के योग-क्षेम का प्रमाण रहेगा, क्योंकि व्यष्टि और समरष्टि के हितों में वेषस्य भौर असामंजस्य के कारणभूत बर्ग-भेद मिट जायेंगे । लेकिन झठारहवॉीं-उन््नीसवीं शताब्दियों की पूंजीवादी क्रान्तियों ने व्यक्ति श्रौर समाज के पारस्परिक साम॑- जस्य की सम्भावना की घोषणा तो की परन्तु ब्यबहारतः यह सम्भावना प्रतिफलित न हो सकी । नये समाज के ऋर वर्ग-सम्बन्धों ने तत्काल मनुष्य की झ्राशाओरों, इच्छाओं और कल्पनाओों पर कुठारा- घात किया । साहित्य की रोमान्टिक या स्वच्छुन्दताबादी धारा ने व्यक्ति श्लर समाज या वस्तु- जगत् के इस वेषम्य को चिरन्तन मानकर व्यक्तिवाद की पताका फहराई। नेराश्य-वेदना के भावना- कलों के बीच स्वच्छन्दतावाद को धारा प्रवाहित हो चली ।'* जर्मनी के इलीगल, शेलिग भौर फिस्ते से सर्वप्रथम सन् १८०० ई० के लगभग स्वच्छुन्दतावाद के काव्य-दर्शन असीम की साधना' को बुनियाद डाली थी । यह वर्शन उस युग के बुद्धिवाद झौर क््लासिसिज्म की भावना की प्रतिक्रिया के रूप में जन्मा । फ्रांस के रसो और उसके पभ्रनुयाथियों ने इसका अपने ढंग से समर्यत किया । जर्मनी की स्वच्छुन्दतावादी धारा बुद्धि-पक्ष की भ्रपेक्षा हृदय-पक्ष को, चेतना की श्रपेक्षा भ्रवचेतना या भ्रन्तस्चेतना को, तर्कज्ञान की श्रपेक्षा विव्य-ज्ञान को, प्रतिनिधि मानव-चरित की अपेक्षा विशिष्द व्यति-चरित को, मानवता की श्रपेक्षा लोकजनों को, दिवस और धूप को अपेक्षा राज्ि ओर ज्योत्स्ता को, भावी समाज की भ्रादर्श-कल्पनाभों की भ्रपेक्षा इतिहास को अभ्रधिक मूल्य देती थी । जमंन-धारा का सम्बन्ध मध्यकालीन जीवनादर्शों और ईसाई-घर्म से इतना श्रांगिक था कि वह॒ राजनीति में शीघ्र ही प्रतिक्रियाबादी शक्तियों से सम्बद्ध हो गई। लेकिन फ्रांसीसी
१. विषय-वस्त से साहित्य की प्रवृत्ति का निर्धारण नहीं किया जाता । भ्रृत्ति प्रब्ृत्ति है, जीवन और जगत् को देखने की दृष्टि और रागात्मऊ प्रतिक्रिया का वह समन्बित रूप है। स्वच्छुन्दतावादी काव्य और कला ने अपनी दृष्टि से जीवन और जगत् के बहुविधि विषयों, वस्तश्रों, भावों और जोवन- व्यापारों का कलात्मक वर्णन ओर चित्रण किया है। लोकवार्ता, परियों की कद्दानियों, पौराणिक गाथाओं, ऐतिदासिक घटनाओं श्रोर चरित-नायकों से लेकर व्यक्ति-मानस के यूक्ष्माति-सूक्षम संवेदनों को अभिव्यक्ति दी है। इसलिए स्वच्छुन्दताबादी या यथार्थवादी प्रवत्ति के अन्तर्गत रखते समय किसी रचना के बहिरंग को ही नहीं देखना चाहिए बल्कि उसके अन्तरंग से म्रांकती हुई कवि-दृष्ट आर स्वर को पहचानना चाहिए |
रु काव्य-धारा
धारा ने क्रान्ति का समर्थन किया झौर प्रगतिशील बिचारों को धार्मिक श्रभिव्यक्ति दी। अंग्रेज़ी में शेली, वायरन झोर प्रारम्भिक उत्थान के वर्ड सबर्थ श्रादि ने स्थच्छन्दतावादी प्रवृत्ति के जिस रूप को अ्रभिव्यक्ति दी वह फ्रांसीसी धारा से मिलती जुलती है। उसकी श्रहंवादी भावनाएँ उदात्त और व्यापक हें। कहने का तात्पर्य यह कि श्रपने-अपने देशकाल को विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थि- तियों में स्वच्छन्दतावाद की प्रवृत्ति का भिन्न-भिन्न रूप-संस्कार हुआ । उसके व्यापक वृष्टिकोश में यद्यपि समानता है, किग्तु अभिव्यक्ति में काफी भेद भी है। अ्रनेक ऐतिहासिक विचार-तन्तु और प्रवृत्तियों की संश्लिष्ट-योजना स्वच्छुन्दतावादी काव्य में मिलती है, और देश-काल परिस्थिति- भेद के भ्रनुसार किसी देश की धारा में यदि एक तत्व की प्रधानता है तो दूसरे देश की धारा में. दूसरे तत्व की । श्रतः यह कहना जेसे ग़लत होगा कि फ्रांसीसी धारा जसंन धारा के अ्रनुकरण पर चली या अंग्रेज्ञी धारा फ्रांसीसी धारा की भ्रनुवतिनी थी, उसी तरह यह कहना भी ग्रलत होगा कि हिन्दी को छायावादी कविता पाश्चात्य ( भला किस देश की ? पाइचात्य में तो जर्मनी, फ्रांस, इंगलेगड भ्रादि सभी हैं ) धारा की नक़ल है। झौर यदि फंशन की नकल की जाती हैं तो तत्कालीन या समसामयिक फेशन की । सौ वर्ष पुराने फंशन की नहीं । किन्तु उस स्वच्छन्दतावादी धारा का तो जिससे छायावाद की कविता प्रभावित है, सत्तर वर्ष पहले भ्रवसान हो चुका था, और प्रथम महायुद्ध के बाद की पाइचात्य कबिता स्वच्छन्दतावाद के भ्रवशिष्ट ह्लासोन्मुखी, घोर व्यक्ति- वादी, अ्रनास्थावादी और असामाजिक तत्वों को ही एकांगी श्रभिव्यक्ति दे रही थी ॥ छायावादी यदि सहसा उनकी परिपादी पर चल पड़ते तो उन पर अनुकरणा-वृत्ति का झ्रारोप सही उतरता | वस्तुतः अपने देश-काल की विशिष्ट परिस्थितियों में हमारे कवियों के हृदय में वास्तविक जगत् और उसके मानव-संबंधों की जो प्रतिक्रिया हुई, उसकी अभिव्यक्ति देते समय उन्हें उन््नसवीं शताब्दी को पाइचात्य ( अंग्रेज्ञी ) स्वच्छन्दतावादी धारा में कुछ सामान्य तत्व मिले जो उन्होंने ग्रहण किये ।* छायावादी कवियों ने श्रपना श्रलग साहित्य-दर्शन प्रतिपादित किया, जिसका विवेचन प्रसंग आने पर होगा। इस संक्षिप्त भूमिका के बाद हम हिन्दी-कबिता के विकास-क्रम को सरलता
से समझ सकते हें । पूर्व -छायावादी युग भारतेन्दु और उनके समकालीन लेखक हिन्दी श्रौर हिन्दू-जाति के उद्धार के लिए आन्दोलन
करने वाले देश-प्रमी पत्रकार श्रौर प्रचारक ही भ्रधिक थे, कवि और साहित्यकार कम । उनका देश-प्रेम॑ एक ओर हिन्दू पुनत्थानवाद की मुस्लिम-विरोधी साम्प्रदायिकता तो दूसरी ओर राजभक्ति कीं
१. सांस्कृतिक मानव-शास्त्र के विद्यार्थी ज!नते हैं कि किसी भी देश वा जाति की जीवन तथा विचार:पद्धत में या तो अपने सामाजिक जीवन के विकास की आनन््तरिक आवश्यकताओं के तकाजे के फलस्वरूप परिवतन होते हैँ या किसी अपने से उन्नत बांह्य संस्कृति ओर जीवनप्रणाली के संपक में आने के कारण, या फिर दोनों कारणों के संयोग से । केंबल पुराणपंथी ही बाह्य-प्रभावों को वर्जनीय घोषित कर सकते हैं | यदि सब देश और सब जातीय संस्कृतियाँ आवश्यकतानुसार अ।दान-प्रदान से वंचित कर दी जायें तो मानव-समाज की प्रगति-घारा केंचुए की गति से भी मंद पड़ जायगी, संभव है कि अनेक संस्कृतियां हासोन्मुखी होकर मिट चलें। बाह्य-प्रभावों में स्वस्थ और अस्वस्थ दोनों प्रकार के तत्व होते हैं, लेकिन जीवन का यह नियम है कि अन्ततः स्वस्थ प्रभाव ही
विजयी होते हैं।
हिन्दी-कविता का विकास ५
अवसरवादिता के संकोर्ण घेरे में हो भ्रन््त तक चक्कर काटसा रहा । श्राश्चर्य की बात तो यह है कि उननसवोीं शताब्दी में ही नहीं, बीसदों शताब्दी के पहले दो दशकों तक, भ्रर्यात् छायावादी काव्य- धारा के फूट पड़ने से पहले तक के हिन्दी कवि (महावीर प्रसाद द्विवेदी, भ्रयोध्यासिह उपाध्याय “हरिश्रौध' भ्रोर मेथिलीशररा गुप्त) इस संकोर्ण घेरे का भ्रतिक्रमणा करने का साहस नहीं कर पाये । जातिगत, सम्प्रदायगत ग्रौर भाषा-गत स्वाय्यों से ऊपर उठकर बे श्रपनी वारी में राष्ट्रीय एकता का वह उदात्त स्वर नहों फ् क पाये जिसते रबीख्नाथ ठाकुर और इक़बाल के कंठ से निकलकर सारे देश में एक नया स्पन्दन भर दिया था । छायावादी कविता ने ही सबसे पहले काव्य-क्षेत्र में इन संकीर्ण सीमाओों को तोड़ा । राज-भक्ति को अ्रवसरवादिता उसमें कहीं नहीं मिलती, यद्यपि प्रसाद और निराला में हिस्दू-पुनरुत्यानवाद की दूरागत अ्रनुगू ज आरम्भ में कहीं-कहीं भ्रवश्य सुनाई देती रही । भ्रस्तु, प्रधानतः सुधारक, प्रच:रक ओर पत्रकार होने के नाते भारतेन्द्रकालीन लेखकों को दिन प्रतिदिन श्रपने-अपने सम्पादित पत्र-पत्रिकाओं द्वारा हिन्दू-समाज में प्रचलित कुरीतियों, धारभिक मिथ्याचार, छल-कपट, अमीरों की स्वार्यंपरता, पाश्चात्य-सम्यता के रंग में रंगे नये शिक्षित वर्ग की प्रनुकरणव॒त्ति, पुलिस झौर कर्मचारियों की लूट-खसोट, भ्रदालतों में प्रचलित भ्रन्याय-प्रनीति, उद्ू के प्रति सरकार के पक्षपात, देश को सामान्य दुरवस्था, भ्रकाल, महामारोी के प्रकोप, अंग्रेज़ी शासन के ग्राथिक-शोषण श्रादि के संबंध में भ्रपने विचार प्रकट करके पाठकों को सामयिक प्रइनों के प्रति जागरुक बनाना होता था । वे इन विचारों को कभी गद्य-लेखों में तो कभी छन्द-बद्ध पद्यों के माध्यम से प्रकट करते थे। कभी- कभी इन विचारों को और अ्रधिक प्रभावशाली अ्रभिव्यक्ति देने के लिए वे नाट्य-विधान का भी उपयोग करते थे । उनके लेखों श्रौर नाटकों की भाषा तो हिन्दी होती थी, लेकिन नाठकों में झाये गीतों और पद्मों की भाषा बहुधा ब्रजभाषा होती थी । भारतेन्दु ने खड़ी-बोली में पद्यरचना करनी चाही, किन्तु वें सफल न हुए, निजीव तुकबन्दियाँ ही बन पड़ीं | द्रजभाषा में अपेक्षया उन्होंने कुछ साभिक कविताएँ लिखो हैं, जिनमें अनुभूति का योग है। ब्नजभाषा या खड़ी-बोली में भारतेन्दु- कालीन लेखकों ने सामयिक विषयों पर जो पद्मात्मक रचनाएं को उन्हें कविता की कोटि में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि उनमें राजनीतिक-सामाजिक विचारों को ज्यों का त्यों छुन्द-बद्ध करने की ही प्रव॒त्ति है, जीवन और जगत् के भ्रनुभव को मर्म-छवियों के माध्यम से मूर्त्त कलात्मक अ्रभि- व्यक्ति देकर तयी श्ररथ॑-सृष्टि करने का प्रयास क़तई नहीं है । विचारों और वकक्तव्यों को बिना अनुभूति के छंद-बद्ध कर देने मात्र से कबिता नहीं पेदा होती | ऐसी छन्दोबद्ध तुकबन्दियाँ ग्राज- कल भी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं, नये से नये विषयों पर भी, लेकिन उन्हें कबिता कहलाने का गोरव नहीं मिलता । स्वयं भारतेन्दुकालीन लेखक भ्रपने को कवि और अ्रपनी पद्मात्मक रचनाओं कों कविता कहकर पुकारने में संकोचशोल थे । बाबू बालमुकन्द गुप्त ने लिखाः---
“भारत में भ्रब॑ कवि भी नहीं हें औऔलौर कविता भी नहों है । कारण यह है कि कविता देश आर जाति की स्वाधीनता से सम्बन्ध रखती है । जब यह देश, देश था और यहां के लोग स्वाधीन थे, तब यहां कविता भी होती थी । उस समय की जो बची-खुची कविता भ्रव तक मिलती है वह आदर की वस्तु है श्लौर उसका झ्रादर होता है । कविता के लिए अपने देश की बातें, भ्रपने देश के भाव और अपने मन को सोज दरकार है । हम पराधीनों में यह सब बातें कहाँ ? फिर हमारी कविता क्या और उसका गुरुत्व क्या ? इससे इसे तुकबन्दी कहना ठोक है। पराधीन लोगों की तुकबन्दी में कुछ तो भ्रपने दुःख का रोना होता हे, और कुछ भ्रपत्ती गिरी दशा पर पराई हंसी 7 कप
ध् काव्य-धारा
इसलिए भारतेन्दु या उनके जीवन-काल में जिन लेखकों ने खड़ीबोली में इक्की-वुक्की तुक- बन्दियाँ रचीं उन्हें कविता कहना ठीक नहीं । भारतेन्दुकालीन लेखक श्रधिकतर हिन्दी में गद्य भौर ब्रजभाषा में पद्म-रचना करते थे । उनके बाद भी उन्नीसवों शताब्दी में कोई कवि केवल हिन्दी का कवि नहीं हुआ । जिन्होंने भी पद्य-रचना की, हिन्दी श्र ब्रजभाषा दोनों में की । साहित्य की दृष्ठि से हिदी-कविता के प्राराम्भक कवियों में केवल तीन नाम उल्लेखनीय हें---भ्रीधर पाठक, नाथ्राम शंकर झौर राय देवीप्रसाद पूर्ण । हिन्दी के प्रारम्भिक कवि होने के कारण ही इनका विशेष महत्व है । भारतेन्दु ने सन् १८७६ में हिन्दी में तीन पद्य रचे थे, लेकिन तीनों कविताएं “भोंड़ी' बन पड़ीं, इस पर उन्होंने उद् कविता के अ्रनुभव को अनदेखा करके और अ्रपनी अ्रसामर्थ्य को स्वीकार न करके यह फतवा दे दिया कि हिन्दी में “क्रिया इत्यादि प्रायः दीर्घ मात्रा में होती हैं इससे कविता भ्रच्छी नहीं बनती ।” तथा “इससे यह निश्चय होता है कि ब्रजभाषा ही में कविता करना उत्तम होता है और इसीसे सब कविता ब्रजभाषा ही में उत्तम होती है ।” बद्रीनारायण चौधरी “प्रेमघन', राधाचररणा गोस्वामी, प्रतापनारायण मिश्र, श्रम्बिकादत्त व्यास आदि भी इस मत के अ्नुगामी थे। गद्य और पद्य की दो भाषायें भारतेन्दु की मृत्यु (सन् १८८५ ई०) तक, श्रपवाद छोड़कर बिल्कुल अलग चलती रहीं । श्रीधर पाठक ने सन् १८८६ में 'एकान्तवासी योगी की रचना करके यह परम्परा तोड़ी । सन् १८८८ में अ्रयोध्याप्रसाद खतन्नी ने “खड़ी-बोली आन्दोलन” नाम की एक पुस्तिका छपाई जिसमें उन्होंने यह सम्मति प्रकट की कि ब्रजभाषा और श्रवधी की रचनाएँ हिन्दी की नहीं हें । हिन्दी की कविता हिन्दी में होनी चाहिए। इस प्रइन को लेकर दो दल बन गये + श्रीधर पाठक, अयोध्याप्रसाद खत्री और महावीरप्रसाद दिवेदी ने हिन्दी ( खड़ी-बोली ) का पक्ष लिया । प्रतापनारायण सिश्र, राय देवीप्रसाद पूर्ण श्रादि ब्रजभाषा की हिमायत लेकर उठे ॥ मनो- रंजक बात यह है कि खड़ी-बोली हिन्दी के पक्षधर ब्रजभाषा में भी कविताएं लिखते थे और ब्रज-
१, इस वक्तव्य में अनेक भ्रान्त स्थापनांएँ हैं | पहला शब्द ही श्रम में डालता है। भारत? शब्द का प्रयोग बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने या तो ओपचारिक रीति से किया है, या हिन्दी-भाषी क्षेत्र को ही वे समग्र भारत समझ बैठे हैं। अन्यथा “भारत में अब कवि नहीं? वे न लिखते। मिर्जा ग़ालिब की मृत्यु हाल ही में हुई थी (सन् १८६६ ई०) ओर यद्यपि इक्तत्राल का रचनाकाल किंचित् बाद में शुरू हुआ (सन १८६८ ३०), तो भी 'दाग़”, 'हाली', “अकबर” इलाहाबादी तो उस समयः जीवित ही थे, और बेहद लोक-प्रिय थे। उधर बंगाल में माईकेल मधुसूदन दत्त की रचनाएँ युगा- न्तर उपस्थित कर चुकी थीं, हेमचन्द्र ओर नवीनचन्द्र सेन के महाकाव्य और देश-प्रेम से ओतप्रोत काब्य-अन्थ सामने आ चुके थे ओर साहित्य-गगन में स्वयं रवीन्द्रनाथ ठाकुर का उदय हो चुका था । सन् १८७४ में रवीन्द्र की प्रारम्मिक कविताओं का संग्रह “वनफूल और प्रलाप' के नाम से छपा था, फिर श्दू८० में 'बालमीकि प्रतिभा'---संगीत-नाटक, १८८१ में “'भग्न-हृदय” कविताओं का संग्रह, १८८रे में “काल-मृगया'---गीति-नाटक आदि रचनाओं के प्रकाशित होने का धारावाहिक क्रम शुरू हो गया था और यह सब पराधीन देश में ही | पराधीन देश में ही कबीर, सूर, तुलसी और मीरा ने कविता की | अपनी अञ्र-प्रतिभा और श्रपनी अ-कविता के लिये देश की पराधीनता में औचित्य खोजना एक समाजशास्त्रीय प्रबंचना को जन्म देना है। किन्तु विचारों के इस कच्चेपन के होते हुए भी बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने अपने समय के लेखकों की तुकबन्दियों को तुकबन्दियाँ ही स्वीकार करके जो ईमानदारी दिखाई वह आज के लेखकों के लिए. भी अनुकरणीय है।
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हिन्दी-कविता का विकास ७
आधा के पक्षपाती खडी-बोली में । फिर भी दोनों शोर से पत्र-पत्रिकाओों में ऐसा जमकर वागयुद्ध आला कि एक समय तक झौर सब प्रसंग फीके पड़ गये । श्रपने जन्म-काल में ही पत्रकारों भौर अचारकों के नेतृत्व के कारण हिन्दी-साहित्य को कितने ग़लत बिचारों झ्लौर संकीर्ण , भावनाओ्रों का भार वहन करना पड़ा है, यह स्वयं झ्पने भ्राप में स्वतन्त्र भ्रध्ययन का विषय है। जो भी हो, इन सार्यक-निरयंक बहसों के बीच श्रीधर पाठक, नाथू्राम शंकर झौर राय देवीप्रसाद “पूर्ण' ने हिन्दी काव्य-धारा का सूत्रपात किया । तीनों ही साधारण प्रतिभा के कवि थे, लेकिन इनमें नाय- रास शंकर (सन् १८५६-१६३२ ई०) का महत्व इसलिए है कि उन्होंने खड़ी-बोली में अ्रति- दायोक्तियों से भरे रीतिकालीन ढरें के श्यृंगार-प्रधान कवित्त रचकर यह सिद्ध कर दिया कि भाषा पर अधिकार हो तो हिन्दी में भो ब्रजभाषा जैसा शब्द-चमत्कार पैदा किया जा सकता है। उदा- हरण के लिए-- तेज न रहेगा तेजधारियों का नाम को भी मंगल मयंक मन्द मन्द पढ़ जायेंगे। मीन बिन मारे मर जायेंगे सरोकर में, डूब-डूब संकर” सरोज सड़ जायेंगे॥ चौंक-चौंक चारों ओर चोकड़ी भरेंगे मृग, खंजन खिलाड़ियों के पंख भढ़ जायेंगे । बोलो इन अंखियों की होड़ करने को अब कोन से अड़ीले उपमान अड़ जायेंगे |॥ नाथ्राम शंकर शर्मा को कविताओं में भ्रनुभूति का योग नहीं है, केवल चमत्कार-प्रदर्शन की स्थल भावना है। वे वस्तुतः पुरानी रीतिकाव्य-परम्परा के ही कबि हें, भेद केवल इतना है कि उन्होंने ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी-बोली हिन्दी में लिखा। इसोलिए छायावाद-युग जहाँ इति- बृत्तात्मक पद्य-रचना की परम्परा को पीछे छोड़कर श्रागे बढ़ चला, वहाँ इस तरह को चमत्कार- श्रधान संवेदन-शून््य कविताओं को भी उसने पीछे छोड़ दिया। नाथ्राम शंकर शर्मा सन् १६३२ तक जीवित रहे, लेकिन काव्यक्षेत्र में उनको प्रतिभा युग का साथ न दे सकी । यही हाल एक सीमा तक श्रीघर पाठक और उनके अ्रनन्तर आने वाले इतिवृत्तात्मक पद्च-प्रबन्धों, मुक्तकों. या खण्ड-काब्यों की रचना करने वाले कवियों का हुआ । प्रथम म्रहायुद्ध के अन्त तक हो वे पाठकों की रुचि का रंजन कर पाये, यद्यपि उनमें से श्रधिकांश कवि छायावाद-युग में भी लिखते रहे । प्रतिभावान् कवियों का हिन्दी-गगन में उदय होते ही उनका प्रकाश मन््द पड़ता गया । लेकिन इनको इतिवृत्तात्मक, यथा- तथ्य वर्णन-प्रधान रचनाएँ प्रव॒त्यात्मक दृष्टि से छायावाद की ही पूर्वंगामिनी हें, उनमें स्वच्छन्दता- बादी भावना के पूर्व-चिह्न प्रकट हें । श्रीचर पाठक, भ्रयोध्यासिह उपाध्याय 'हरिश्रौष', मंथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपठी ग्रादि इस प्रकार “छायावादी-युग' की श्रादि-कड़ी हें । श्रीधर पाठक (१८५६-१६२८ ई० ) ने सन् १८८६ में लाबनी की शेली पर हिन्दी में अंग्रेज़ी की प्रयम स्वच्छुन्दतावादी धारा के प्रसिद्ध कवि गोल्डस्मिय के हर॒ुभिट (स्रद्याया८) का *एकान्तवासी योगी' ओर फिर “श्रांत पथिक' के नाम से टरंवलर ([737८।|९८४) का अनुवाद किया। इनके झ्रतिरिक्त लॉंगफेलों और पारनेल की कृतियों के भ्रनुवाद भी उन्होंने किये । साथ ही हिन्दी में उन्होंने स्वतन्त्र प्रकृति-वर्णण को ओर पहली बार ध्यान दिया। ब्रजभाषा की रीति-काब्य- परम्परा में प्राकृतिक-दृश्यों के प्रत्ति मनुष्य का सहज भ्रनुराग प्रकट नहीं हुआ । “घट्-ऋतु-वर्णन'
प्ज काव्य-धारा
श्रादि में परम्परा-बिहित ढंग से प्राकृतिक वृश्यों, पेड़-पौधों, फूल, पशु-पक्षियों ग्रादि का उल्लेख केवल नायक-तायिका के भावों का “उद्दीपन' कराने-भर के लिये होता था। वाह्म-प्रकृति के चिर-संसर्ग में चलने वाले मनुष्य के नाना कार्य-ब्यापारों का पुराने ब्रजभाषा-काव्य में कोई संकेत ही नहीं मिलता, इसलिए संस्कृत-काव्यों की तरह प्रकृति के बस्तु-व्यापारों को काव्य का स्वतन्त्र झालम्बन बनाने या पाइचात्य परम्परा के अनुसार “प्रकृति के नाना-रूपों के बीच व्यंजित होने वाली भावधारा का सुन्दर उद्घाटन' करने का प्रश्न ही नहीं उठता था । श्रीधर पाठक ने हिन्दी श्रौर ब्रजभाषा दोनों में समान रूप से स्वतन्त्र प्रकृति-वर्णन किया, और ब्रजभाषा में कालिदास के “ऋतुसंहार' का श्रत्यन्त सरस काव्यमय अनुवाद भी । ब्रजभाषा में ही उन्होंने गोल्डस्सिथ के “डिज़र्टेड बिलिज! ( [025९70९2० ५१]!9 ४८ ) का “ऊजड़ ग्राम' के नाम से अ्रनुवाद किया। हिन्दी के प्रथम और एक सीमा तक समर्थ कवि की भाव-धारा को गोल्डस्मिथ श्रौर कालिदास में सहज श्राधार क्यों मिला, यह विचारणीय है । गोल्डस्मिथ अ्रठारहवों शताब्दी ( सन् १७२८-७४ ई० ) का लेखक है। सेम्युअल रिकार्डसन, हेनरी फील्डिग, स्टर्न और गोल्डस्मिथ अ्रठारहवीं शताब्दी--अंग्रेज़ी-साहित्य के उन श्रेष्ठ लेखकों में से हें जिन्हें हम उन्नीसवीं शताब्दी के स्वच्छुन्दतावाद श्रोर यथार्थंवाद इन दोनों महान् साहित्य-धाराशं के हरकारे कह सकते हैं । इनकी रचनाओं में, विशेषकर गोल्डस्मिथ के काव्य-ग्रंथ 'हरुसिट' और “डिजटेंड विलेज' में, उसके उपन्यास “दी विकार श्रॉफ बेकफील्ड' में और नाटक “शी स्ट्प्स टू कॉन्कर' में अंग्रेज़ी जीवन के यथार्थ, उसके सहज हास्य-बिनोद, संयम, उदात्त भावना, नेतिक श्राचरण और मानववाद का हम विशद चित्रण पाते हें, जिसने गोल्डस्सिथ के बाद जेन आस्टिन; सर वाल्टर स्काट, चॉल्स डिकेन्स झौर थेकरे को अंरेज्ञी जीवन की सरलता, सहदयता और श्रादर्शवादिता मिश्चित यथार्थ चित्र अंकित करने की प्रेरणा दी । दूसरी ओर गोल्डस्मिथ की रचनाओं में उसकी अ्रप्ती ग्रात्मा भी कल- कती है। राग-सम्बन्धों और जीवन-श्रादशों से समन्वित लेखक का व्यक्तित्व उसकी भावुकता में से भलक पड़ता है। उसके श्रन्तस् की भाव-धारा स्वच्छन्दतावाद की शोर ऊध्वंगमन करती दीखती है ॥ नागरिक समाज के कृन्निम और आ्ाडम्बरपूर्ण वातावरण की अपेक्षा ग्रास्य-जोवन की सरलता के प्रति उसके सन का सहज अनुराग है। उसने अपनी रचनाश्रों में ग्राम्य-जीवन और भद्र-समाज के शिष्टा- चारों से भ्रनभिज्ञ रुक्ष और गेंवार, किन्तु आत्मीय, सरल और सहृदय ग्रामीणों के अ्रनेक चित्र अंकित किए हें। गोल्डस्मिथ ने प्रकृति-प्रेम और प्रकृत-जीवन का काव्यादर्श सामने रखा। नवोत्थित पूंजी- वाद को नागरिक सम्यता के प्रति यह भावकतामयी मध्यम वर्गोय प्रतिक्रिया थी। ये तत्व भ्रगली शताब्दी की स्वच्छन्दतावादी काव्य-धारा में एक नया जीवन-दर्शन लेकर विकसित हुए। इस प्रकार गोल्डस्मिथ और प्रकृति और मानव-स्वभाव के अ्रनन्य कवि कालिदास की क्ृतियों में भ्रपनी भाव-धारा के प्रकाश के लिए आधार खोजने का अर्थ है कि श्रीधर पाठक श्रपनी अन्तश्चेतना सें काव्य ओर जीवन के श्रादर्शों में आसन परिवतंनों का अनुभव कर रहे थे। उनमें स्वयं इतनी समर्थ प्रतिभा नहीं थी कि इन परिवतंनों को कल्पना के योग से सूर्त अभिव्यक्ति दे सकते, इसलिए उन्होंने उनका आ्राभ्रय खोजा, जिनकी रचनाओं में उन्हें श्रपने हृदय को ग्ज सुनाई दी । हिन्दी शौर ब्रजभाषा में उन्होंने स्वयं श्रपतती श्रनभूति से जो कुछ लिखा वह भी ब्रज, अभ्रववी, राजस्थानी या मेथिली आदि हिन्दी भाषा समूह की परम्परागत कविता में एक नया स्वर था--प्रकृति-प्रेम और साधारण जन-जीवन का चित्रण :-- “बीता कातिक मास शरद् का अन्त हे , लगा सकल सुख-दायक ऋतु हेमन्त है ।
हिन्दी-कविता का विकास ६
ज्वार वाजरा आदि कभी के कट गये , खलयान के काम से किसान निकट गये | थोड़े दिन को बेल परिश्रम से थमे , रबी के लहलहे नये अंकुर जमे। जमीदार को मिली उयाही खेत की , मूल ब्याज सब देन महाजन की चुकी | उसके घर आनन्द हर्ष खुल मच रहा , जिनको कुछ नहीं बचा,काम को टो रहे, किस्मत को दें दोष बेठ घर रो रहे । खाने भर को जिस किसान को बच रहा || ख़्रीफ़ के खेतों में अब सुनसान है , रबी के उपर किसान का ध्यान हे। जहाँ तहाँ रहट परोह़े चल रहे , बरहे जल के चारों ओर निकल रहे । जो गेहूँ के खेत सरस सरसों घनी , दिन-दिन बढ़ने लगी विपुल शोभा सनी । सुन्दर सौंफ सुन्दर कछूम की क्यारियां , सोआ, पालक आदि विविधग्तरकारियाँ | अपने अपने ठोर सभी ये सोहते , सुन्दर शोभा से सबका मन मोहते''' * ( श्रीघर पाठक, 'हेमन्त' )
१. स्मरण रहे कि 'एकान्तवासी योगी” (गोल्डस्मिथ के 'हरमिट! का अनुवाद) सम् १८८६ मैं प्रकाशित हो गया था और “हेमन्त” कविता उसके एक वर्ष बाद की रचना है। उनकी मौलिक कविता में तुकबन्दी की साधारणता और अनूदित कविता में शेली की प्रीदुता और सरसता का अन्तर द्रष्टव्य है |
दूर एक ज॑गल में जिसका नहीं जगत को कुछ भी ध्यान | बाल्य क्यस से बसा हुआ था थृद्ध एक योगी सुज्ञान ॥ घास पात था बिस्तर उसका, दीन गुफा सुखवासस्थान | कन्दमूल स्वादिष्ट मिष्टफ़ल क्मिल कृपजल भोजन पान ॥ जग से अलग अचिंतित निश्नदिन करे मगन ईश्वर का ध्यान | एक भजन ही काम उसे, आनंद, सदन भगवत गुनगान |
( 'एकान्तवासी योगी से )
साथ ही, सन् १८८४ में क्जभाषा में लिखो उनको मौलिक कविता 'मेघागमन' का भी मिलान कौजिए :---
नाना कृपान निज पानि लिए, वपु नील कसन परिवास किए, गंभीर घोर अभिम्रान हिए, छकि पारिजात-मधुपान किए
१० '. काव्य-धाण
यहाँ प्रकृति-दृश्य श्रपनी इयतता खोकर किसी नाथिका की सुन्दरता के उपमान बने नहीं खड़े हैं, न युगल-प्रेमियों के प्रणय-विलास में उद्दीपन का सरंजाम कर रहे । यहाँ सिर्फ हेमन्त-ऋतु- कालीन किसात-जीवन और पग्राम्य दृश्य का यथातथ्य, पद्मात्मक वर्णन है । किन्तु इसमें एक नया स्वर है, वास्तविक जीवन का रुक्ष संस्पर्श है और कवि की सहानुभूति के प्रसरण के लिए नया क्षेत्र है । इसमें छायावाद के बीज हें, लेकिन इतिवृत्तात्मक, वर्णन-प्रधान काव्य का तो यह आरम्भिक रूप है । भागे चलकर श्रीधर पाठक की हिन्दी कविताश्रों में भी परिष्कृति और चुस्ती भ्रा गई, लेकिन अनुभूति में अधिक गहराई न श्रा पाई । हम ऊपर कह चुके हें कि काव्य को भाषा के सम्बन्ध में खड़ी-बोली बनाम ब्रजभाषा का विवाद छिड़ते ही लेखक दो दलों में बट गये थे और श्रीधर पाठक, अ्रयोध्याप्रसाद खन्नी और महा- वीरप्रसाद द्विवेदी हिन्दी का पक्ष लेकर उठ खड़े हुए। श्रयोध्याप्रसाद खत्नी कवि नहीं थे, महावीर- प्रसाद द्विवेदी थोड़े-थोड़े कवि भी थे, किन्तु श्रौर बहुत-कछ थे । छायावाद-युग के पूर्ण प्रसार तक वे हिन्दी-क वियों के प्रेरक, पथ-प्रदर्शक और नेता रहे । सन् १६०३ में द्विवेदी जी ने 'सरस््वती' (प्रयाग ) पत्रिकां का संपादन-कार्य संभाला । उस समय तक हिन्दी का साहित्यिक रूप स्थिर न हो पाया था। गद्य-लेखक व्याकरण की भूलों, विषय-प्र तिपादन की शिथिलता और श्रव्यवस्था पर ध्यान ही न देते थे। कविगरा खड़ी-बोली में ब्रजभाषा और अ्वधी के शब्दों और क्रियाओ्ों का प्रयोग मनमाने ढंग से करते थे। द्विवेदी जी ने भाषा-संस्कार का श्रान्दोलन छेड़ दिया । गौरीशंकर मिश्र, कामता प्रसाद गुरु और चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने इस कार्य में उत्तका हाथ बेंटाया । उन्होंने विषयानुरूप गद्य-शली का आदर्श सामने रखा । कविता के क्षेत्र में उन्होंने कोई नया आ्रादर्श नहीं रखा । श्रीधर पाठक ने इतिवृत्तात्मक, या यथातथ्य वर्णवात्मक (नंचुरलिस्टिक) शेली का प्रयोग किया था, यद्यपि उनकी भावना था प्रवृत्ति कुछ-कुछ स्वच्छन्दतावादी थी । द्विविदी जी ने भी इस शली को ही प्रोत्साहन दिया। बंगला की कोमल-कान्त पदावली की श्रपेक्षा मराठी की इतिवत्तात्मक शेली उनके मल के अश्रधिक झनुकल थी । उनकी स्वयं श्रपती लिखी कविताओं का भ्रधिक महत्व नहीं है, किन्तु उन्होंने अपने संपादनकाल सें जिन उदीयमान कवियों का सार्ग-प्रदर्शन किया उनकी कृतियों से हिन्दी-कविता गौरवशाली हुई है । पुर्ब-छायाबाद-युग़ के कवियों में श्रयोध्यासिह् उपाध्याय 'हरिऔषधर', गयाप्रसाद« शुक्ल 'सनेही' और मेथिलीशरणा गुप्त की काव्य-प्रतिभा अपने पूर्णविकास के लिए इतिवृत्तात्मक शली की शुधष्क-ती रस सीमाओ्रों का अतिक्रमरण करके यग-जोवन की व्यापक समस्याओं का काव्यो-
छिन छिन पर जोर मरोर दिखा+त, पल पल पर आक्ृति-कोर म्ुक्रावत बनेराह बाट -श्यामता चढ़ावत, वेधव्य बाल वामता वढ़ावत यह मोर नचावत, सोर मचावत, स्वेत स्रेत क्य पॉति उड़ावत ॥ सीतल सुगन्ध सुन्दर अमंद, नन््दन ग्रधून मकरन्द विन्द मिश्रित समीर बिन घीर चलावत अंधियार रात, हाथ न दिखात, बिन नाथ बाल विधवा डरात तिन के मन मंदिर आय लगावत छिन गर्जि गजि पुनि लर्जि त्र्जि निज सेन सिखावत तर्जि तर्जि दुन्दुभि घरनि आकाश लचावत मल्लार राग ग्रावत विह्यग, सुख पावत आवत मेघ महावत
हिन्दी-कविता का विकास ११
खित चित्रण करने की झोर उन्मुख हुई । छायावादी-युग में भी इस मार्ग पर चलने वाले अ्रनेक प्रतिभाशाली कवि सामने श्राये, जिनमें से माखनलाल चतुर्वेदी, रामतरेश त्रिपाठी, गोपालश रण सिह, गुरुभक्तालह भक्त, सियारामशररा गुप्त, सुभद्राकुमारी चौहान, जगन्नाथ प्रसाद 'मिलिन्द' और इयासनारायणा पाण्डे के नाम उल्लेखनीय हें । प्रवोध्यासिह उपाध्याय 'हरिऔध' झ्ौर सुभव्राकुमारी चौहान के प्रतिरिक्त, सौभाग्य से, ये सभी कवि जीबित हें औऔलौोर उनका रचना-क्रम जारी है ।
मैथिली शररा गुप्त को 'कालानुसरण की क्षमता भ्रर्थात् उत्तरोत्तर बदलती हुईं भावनाओं झौर काव्य-प्रशालियों को ग्रहएा करते चलने को शक्ति! का उल्लेख आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किया है । किन्तु यह बात न्यूनाधिक रूप में वर्णनात्मक शेली के उपरोक्त सभी कवियों पर लागू होती है। काव्य-क्षेत्र में ये किसी 'वाद' से बंधकर नहीं चले, यद्यपि गाँधीवाद का सर्वाधिक प्रभाव इनकी विचारधारा पर पड़ा है। ग़ालिब के शब्दों में इन सब कवियों की स्थिति कुछ ऐसी रही है--
चलता हूँ थोड़ी दूर हरइक तेज रो के साथ | पहचानता नहीं हूँ अभी राहबर को में॥
इस बीच राष्ट्रीय झ्ान्दोलन में जो उतार-चढ़ाव आये, राष्ट्रीय-चेतना में जितनी विचार- धाराएँ प्राकर मिलों उन सब को श्रनुगूंज इनकी कविता में मिलती है, साम्प्रदायिक संकीणंता और सम्राज-सुधार को भावना से झ्राग बढ़कर इनका मानव-पश्रेमी हृदय दलित-पीड़ित किसान-मज़दूरों के प्ार्तनाद या शंखनाद या दोनों को सुनने में समर्य हुआ है। राष्ट्रीय-संग्राम में इन्होंने श्रपनी उदबो- घनात्मक बारी से योग दिया है । भ्रतीत के गौरव-गान गाकर इन्होंने जनता में स्वाभिमान जगायां है । इनकी कविता में भारतेन्दुकालीन या द्विवेदीकालीन इतिवृत्तात्मक कविता की शुष्कता नहों है, बल्कि विषयानुक्ल काव्योचित लालित्य, सरसता और झ्ोज भी है, यद्यपि शेली मूलतः वर्णनात्मक ही है ॥ म्रावश्यकतानुसार इन कवियों ने संस्कृत वृत्तों में भी कविता को और हिन्दी के मात्रिक छल्दों में भी और छायावादी कविता से प्रभावित होकर श्रतुकान्त और छन्द-मुक्त कविता भी लिखी है । इन्होंने प्रबन्ध-काव्य, खण्ड-काव्य और प्रगीत-मुक्तकों की भी रचना की है। विशेषकर अपने णीतों में इनमें से अधिकांश ने छायावाद को देखा-देखी लाक्षरिक व्यंजना और श्रप्रस्तुतों की योजना भी करनी चाही है, लेकिन इस तरह के प्रयोग बहुत सफल नहीं हुए। उनकी अन्तःप्रकृति आर काव्य-मनोभूमि से छायावादी शैली का पूरा मेल नहीं बंठता, लगता है जेसे यत्न-साध्य ऊपर से झोढ़ा हुआ परिधान है, भ्रन्तर्भाव को प्रकट करने के लिए भ्रभिव्यक्ति का स्वाभाविक रूप-प्रकाश नहीं । उनकी दृष्टि मूलतः बहिमु खी है, इसलिए राष्ट्र-जजीवन की सम-सामयिक हलचलों में निरन्तर रमसती चलो आई है, भ्रन्तमु खी होकर व्यक्ति-चेतना को अ्रगसम गहराइयों में नहीं उतर पायी । विद्येषकर लोक-प्रचलित पौराणिक आाल्यानों, इतिहास वृत्तों और देश की राजनीतिक घटनाओं से इन्होंने अपने काव्य की विषय-वस्तु कों सजाया है, इन अहख्यानों, वृत्तों और घटनाओ्रों के चयन में उपेक्षितों के प्रति सहानुभूति, देशानुराग और सत्ता के प्रति विद्रोह का स्वर मुखर है। यह एक प्रकार से राजनीति में राष्ट्रीय श्रान्योलन झौर काव्य में स्वच्छन्दतावाद की प्रवृत्ति के बीच पलने भ्रौर बहने वाली कविता को बहिम्खी धारा है, जिसने हिन्दी-भाषी जनता को ग्राधुनिक जीवन के व्यक्ति-समाज-सम्बन्धी गहरे तात्विक प्रइनों के प्रति नहीं, तो राजनीतिक पराधीनता और राष्ट्रीय संघर्ष की ग्राववयकता के प्रति सचेत बनाने में बहुत बड़ा काम किया है। स्थूलस्वरूप से इस धारा को राष्ट्रीय-धारा कह सकते हें, लेकिन छायावादी कविता भी भ्र-राष्ट्रीय नहीं है। एक ही जीवन- वास्तव को ये स्थल और सूदम, बहिम्खी और श्रन्तमुखी प्रतिक्रियाएँ हें। बल्कि छायावादी
१२ काव्य-धारा
कवियों ने झराधुनिक जीवन के केन्द्रीय प्रइनों को उठाकर राष्ट्रीय-चेतना में गहरी श्रन्तदूं ष्टि पैदा की है। सामान्यतः ये बातें इस समूची धारा के बारे में कही जा सकती हैं, किन्तु हर कवि का व्यक्तित्व, प्रतिभा, कृतित्व भौर शेली का भ्रपना बेशिष्ट्य है ।
प्रयोध्यासिह उपाध्याय. (सन् १८६५-१६४१ ई०) भारतेन्द्रु के जीवन-काल में ही कविता करने लगे थे, किन्तु उस समय वे ब्रजभाष। में लिखते थे । सन् १८८२ में उन्होंने “भीकृष्ण शतक' की सत्रह वर्ष की भ्रवस्था में रचना की, जिसमें सौ दोहे संग्रहीत हैं। इसके श्रनन्तर सन् १६१४ में “प्रिय-प्रवास' के प्रकाशित होते तक वे ब्रजभाषा में ही काव्य-रचना करते रहे । सभी रचनाएँ कष्ण-सम्बन्धी थीं, जिनमें कहीं कृष्ण को परब्रह्म के रूप में, तो कहीं मानव-रूप में . चित्रित किया गया था। '“खड़ी-बोली श्रान्दोलन' के प्रभाव में श्राकर उन्होंने “प्रिय-प्रवास' की रचना के पूर्व भी हिन्दी में कभी-कभी कुछ लिखा था, लेकिन' बहुधा उदू के छन्दों और ठेठ बोली में ही । “प्रिय-प्रवास' हिन्दी का पहला महाकाव्य है। इसमें उपाध्यायजी ने श्राद्यान्त संस्कृत के वर्ण- वृत्तों का प्रयोग किया है । शैली वर्णनात्मक है, जिसमें सुक्ष्म-से-सूक्ष्म भावों की व्यंजना हुई है। झ्राचार्य शुक्ल का मत है कि “इसकी कथा-वस्तु एक महाकाव्य क्या अ्रच्छे प्रबन्ध-काव्य के लिए भी अरपर्याप्त है। भ्रतः प्रबन्ध-काव्य के सब भ्रवयव इसमें कहाँ भ्रा सकते ।” हमारा मत शुक्ल जी के मत से किचित् भिन्न है । यह ठीक है कि महाकाव्य होने के लिए काव्य-वस्तु भी इतनी विशाल होनी चाहिए कि उसमें जीवन का सर्वांगीणा चित्रण हो सके । लेकिन “प्रिय-प्रवास' की संक्षिप्त कहानी--कृष्ण का ब्रज से मथुरा को प्रवास और फिर लोट कर झआाना--श्रौर उसकी काव्य-वस्तु दो भिन्न चीजें हूँ । रूढ़ि-रीति-प्रस्त दृष्टि के कारण ही यह भेद ऊपर से दिखाई नहीं देता। 'हरिओऔध' जी की विशेषता यह है कि उन्होंने इस छोटी-सी कहानी के भीतर ही कृष्ण-जीवन का पूरा वृत्त झौर उसके माध्यम से समाज के विविध अंगों, समस्या्रों श्रादि को ऋलका दिया है। कृष्ण के घले जाने पर ब्रजवासियों में कृप्ण-सम्बन्धी चर्चाएँं चलती हें, अऋधो के आगमन पर छे महीने तक कृष्ण की बाल-लीलाएँ झोर ब्रज की जनता की रक्षा के निमित्त किये गये कार्य-कलाप झोर ब्रज को स्मृतियाँ मुखर हो उठती हें । इस प्रकार काव्य-वस्तु केवल कृष्ण के प्रवास-प्रसंग तक ही सीमित नहीं है । यदि भोर भी सूक्ष्मता से देखा जाय तो प्रबन्ध-रचना श्र यथार्थ-चित्रण की पद्धति का मनोरम रूप प्रिय-प्रवास सें व्यक्त हुआ है--सीधे-साधे एक छोर से दूसरे छोर तक ब्योरेवार कहानी का वर्णन करने की श्पेक्षा केन्द्रीय प्रसंग से श्रागेगीछे हटकर स्मृति भौर कांक्षा के योग से जो कहानी कही जाती है, वह भ्रधिक मनोवंज्ञानिक भी होती है श्रौर जीवन के विविध श्रन्तसंस्बन्धों भर अ्रन्तसू् त्रों को भो उद्घाटित करने में श्रधिक समर्थ होती है। इसलिए वस्तु-योजना का इस महाकाव्य में काफो संशिलिष्ट झर विशद रूप मिलता है। यह ठीक है कि संस्कृत के वर्णवृत्तों झोर बंगला की कोमल-कान्त-पदावली के कारण शेली जितनी सरस है, उतनी ही बोकिल और गतिहीन भी ।
(प्रिय-प्रवास' में कृष्णा अपने शुद्ध-मानव रूप में, विशव-कल्याणकार्य में निरत एक जन-नेता के रूप में अंकित किये गये हेँ। प्राचार्य शुक्ल ने 'साक्तेत! की आलोचना करते हुएं यकायक सूत्र- रूप में एक भयंकर पुराणपन्थी बात कही है, जो न जाने क्यों “प्रिय-प्रवास' के प्रसंग में कहना वे भूल गये । उन्होंने लिखा है--“किसी पोरारिक या ऐतिहासिक पात्र के परम्परा से प्रतिष्ठित स्वरूप को मनमाने ढंग पर विकृत करना हम भारी भनाड़ीपन समभते हैं ।” लेखक झोर कलाकार को यदि परम्परा से इतना बंध कर चलने की बाध्यता हो तो पोराणिक या ऐतिहासिक भाख्यातों
हिन्दी-कविता का विकास १३
झौर पात्रों को अंकित करने की सार्यकता ही न रह जाय । कोई सच्चा कलाकार प्ननुकृति नहां रचता । किसी विषय-बस्तु के द्वारा यदि वह भ्रपने युग की केन्द्रीय समस्याओं का उद्घाटन नहीं कर सकता, यवि नये सत्य को भलका नहीं पाता तो केवल पुनरावृत्ति के लिए उस पर कलम या तूलिका नहीं उठाता । यह सामान्य नियम है । वाल्मीकि रामायरा में राम का मानव-चरित्र अंकित ._ हुप्मा है; किन्तु तुलसीदास ने उन्हें मर्यादा-पुरुषोत्तम बना दिया है। इनमें से राम के किस रूप को परम्परा से प्रतिष्ठित माना जाय ? यवि वाल्मीकि के राम को, तो तुलसीदास का “भारी पश्रताड़ीपन' शुक्ल जी को क्यों तहीं खला ? या अ्रलोकिक से लोकिक बनाने में ही 'मनमाने ढंग पर विकृत' करते का लांछन लगता है ? राधा का ही परम्परा से प्रतिष्ठित कौन-सा रूप है ? जयदेव की ._ बिलासिनो, प्रेम-विह्लला राधा; विद्यापति की योवनोन्मत्त मुग्धा नायिका जेसी राधा; चण्डीदास की परकीया नायिका जेसी राधा; सूरदास की मर्यादा-संतुलित नागरी राधा; नन््ददास की ताकिक राधा या रीतिकाल की उच्छ खल, भ्रल्हड़ किशोरो राधा--इनमें से राधा का कौनसा-रूप परंपरा प्रतिष्ठित माना जाय ? क्या हर युग के कवियों ने अपने जीवनादशों के भ्रनुकूल 'राधा' की कल्पना नहीं को ? भ्रयोध्यालिह उपाध्याय ने भी हिन्दी को एक नई “राधा' दी--भआधुनिक युग की प्रबुद्ध नारी के रंग में रंगी । वस्तुतः “प्रिय-प्रवास' में उन्होंने समय से पहले ही राष्ट्र-जीवन को एक केस्त्रीय समस्या की पूवं-ऋलक दे दी है शोर उसका आदशंबादी, श्रतः स्थूल समाधान भी उपस्थित किया है---इस समस्या को बाद में एक गंभीर मनोवेज्ञानिक समस्या के रूप में रवीन्द्रनाथ ठाकुर शोर प्रभी कुछ दिन पहले जेनेन्द्रकुमार ने अपने उपन्यासों 'घर और बाहर तथा 'सुखदा' में उठाया। 'प्रिय-पअवास' में इस समस्या की प्रारस्भिक ऋलक हमें मिली । समस्या है स्थानीय श्रौर सार्वदेशिक, व्यक्तिगत और सकल मानवगत हितों,राग-सम्बन्धों के वेषम्य भ्रौर परस्पर समन्वय की। स्वच्छन्दता- बाद का यह पहला रूप है, जब व्यक्तिवादी चेतना इतनी मुखर नहीं हुई कि व्यष्टि और समष्टि के हितों में दुलिवार वेषम्य दोले झ्लोर अत्यन्त जटिल मनोवेज्ञानिक समस्याएँ पैदा हो गई हों । झ्ादर्श- बादी ढंग से दोनों में समन्वय भ्रभी सम्भव है। लेकिन उससे दोनों का श्रस्तित्व नहीं मिट जाता, झौर इसको स्वीकृति ही ऐसी करुणाजनक स्थिति पैदा कर देती है, जो काव्य-वस्तु का झ्ाधार बन सकी । राष्ट्रीय संघ को आगे बढ़ाने ओर देश की प्रगति में हाथ बंटाने के लिए प्रबुद्ध जनों को अपते घर-बार छोड़कर देश के कोने-कोने में श्रलख जगाते फिरना होगा, किन्तु भ्रपने प्रियजनों का मोह, क्या इस साधना को विफल नहीं कर देगा, प्रिय-जन इस वियोग को सहन कर सकेंगे ? क्या स्त्रियाँ, प्रेमिकाएं भी इस अ्रनुष्ठान में योग दे सकेगी ?--यह हमारे राष्ट्रीय-जागरण और संघर्ष की ही समस्या थी । इसी समस्या को मूर्त्त काव्य-रूप देने के लिए उपाध्याय जी ने ब्रज से कृष्ण- प्रवास का साभिक प्रसंग चुना, और बिना किसी प्रकार का “झनाड़ीपन' किये उसके माध्यम से युग- जीवन की यह केन्द्रीय समस्या भलका दी । कृष्णा मथुरा गये झौर विश्व-कल्याण झौर राजनीति की समस्याझ्रों में इतने उलके कि लोटकर वापस न झ्रा सके, लेकिन उनका हृदय ,ब्रजभूमि में हो रमा रहा। उद्धव के समझाने पर ब्रजवासियों को कृष्ण के बाहर रहने की भ्रनिवार्यता समभ में था गई ओर विरह-बविदग्ध राधा ने चिर कोमार्य का ब्रत धारण कर लोक-सेवा के लिए झ्पना जौवन भ्रपित कर दिया। उपाध्याय जी की भय रचनाएं इस कोटि की नहीं बन पड़ीं । उनके दूसरे महाकाव्य “बंदेही बनवास' में भी लोक-संग्रह की यही भावना व्याप्त है, लेकिन उसमें उन्होंने कोई नई भूमि नहीं नापी । चोखे और चुभते चोपदों में भाषा-प्रयोग का चमत्कार कहीं-कहीं जरूर मिल जाता है, लेकिन
१४ काव्य-धारा
उतना ही पर्याप्त नहीं है।
मेथिलीशररण गुप्त (सन् १८८६) हिन्दी के राष्ट्रकवि के रूप में विख्यात हें। सन् १६०७ से ही श्रापकी कविताएँ झ्राचायं महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा सम्पादित 'सरस्वती' में छपने लगी थीं । उन दिनों बोल-चाल को भाषा में लिखी इतिवृत्तात्मक कविताश्रों का ही जोर था। गुप्त जी ने भी इस शली में लिखना श्रारम्भ किया । सन् १६१० में इनका “रंग में भंग”! नाम का एक छोटा-सा प्रबन्ध-काव्य छपा, लेकिन सब से पहले इनकी कीति 'भारत-भारती' के कारण फैली । यह मोलाना हाली के “मुस॒हूस' के ढंग पर लिखी गई थी । मौलाना हाली ने मुसहुस की रचना करके मुसलमानों में जाग्रति फंलाई थी । गुप्त जी ने भी 'भारत-भारती' में हिन्दुओं के भ्रतीत वेभव और गौरव की भश्रपेक्षा में बतंमान हीन-दशा का वर्णन करके हिन्दू-जनता को उदबुद्ध करना चाहा । काव्य की म्ं-बोधिनी रसात्मकता न रहने पर भी यह पुस्तक उस समय हिन्दू-युवकों में बहुत लोक-प्रिय हुई । इसमें साम्प्रदायिक संकीणंता और श्रग्रेज़ी-राज्य के प्रति भक्ति और प्रशंसा के भाव भी मिलते हैं, जो भारतेन्दु-कालीन दृष्टिकोण के श्रवशेष-चिन्ह समभने चाहिए। श्रामे चलकर गुत्त जी की दृष्टि श्रधिक व्यापक और उदार मानववादी हो गई ।
उपाध्याय जी और इस धारा के श्रन्य कवियों की तरह गुप्त जी का दृष्टिकोश भी मूलतः श्रादर्शवादी और भावनामूलक है। वस्तुन्मुखी मनोवेज्ञानिकता या गहरे संवेदनशील भर्मबोध की उनमें भी कमी है, इसलिए श्रगले काव्यग्रन्थों में, यद्यपि उनकी होली का परिष्कार हो गया है शौर उन्होंने उत्कृष्ट काव्यों की भी रचना की है, लेकिन नई भाव-भूमियों का उद्घाटन करने वाली तल-स्पर्शी दृष्टि क। विकास वे नहीं कर सके, जीवन के केवल गोचर-दृब्य का ही अंकन करते रहे ।
“रंग में भंग” के बाद “जयद्रथ-बध', 'गुरुकुल', “किसान', “पंचवरटी', 'सिद्धराज” श्रादि आपके नेक छोटे-छोटे प्रबन्ध-काव्य छुपे, जिनमें से जयद्रथ-बध श्रौर पंचवटी को साहित्य-क्षेत्र में काफ़ी सम्मान मिला । इस बीच श्राप वर्षों तक अ्रपने सहाकाव्य 'साकेत' की रचना में संलग्न रहे, जो सन् १६३१ में प्रकाशित हुआ । 'साकेत' और उसके बाद “यज्ञोधरा' गुप्त जी की स्थायी कीति के दो स्तम्भ हें। 'साकेत” रचकर गुप्त जी ने सहाकाव्यों की परम्परा में एक युगान्तर उपस्थित कर दिया । उपाध्यायजी की राधा कवियों की कभी उपेक्षिता नहीं रही,जयदेव से लेकर 'रत्नाकर' तक ने राधा के काव्य-चरित्र का अंकन किया था । लेकिन राम-काव्य की परम्परा के कविगण अ्रयोध्या से बनगमसन करते ही राम के साथ-साथ लंका तक तो भ्रमण कर आते थे, मगर अयोध्या औ्रौर वहाँ के लोगों का ध्यान भी न लाते थे । विशेषकर लक्ष्मण से वियुकत उमिला तो उपेक्षित ही रह जाती थी। गुप्त जी का भावनाशील कवि-हृदय राम के साथ वन-गमन को तत्पर नहीं हुआ, अ्रयोध्या में ही रम रहा । इसलिए 'साकेत'; और साकेत के नायक भरत और नायिका उमिला हें ।
साकेत के राम वाल्मीकि के लोक-प्रतिनिधि, वीर-चरित और तुलसीदास के मर्यादा पुरुषोत्तम लीलावतारी राम से भिन्न हें। वे एक सामान्य मानव हें और अपनी मानवता के उत्कर्ष द्वारा ही ईश्वरत्व के अधिकारी हैं । भरत, उभिलां, कंकेयी, सुमित्रा आदि सभी सामान्य सानव-प्राणी हें । यद्यपि उनके व्यक्तित्व अलग-अलग और विशिष्ट हैं । हर पात्र के व्यक्तित्व की मर्यादा की रक्षा करते हुए गुप्त जी ने व्यक्तिवाद और समत्व की भावनाओं का समन्वय करने की चेष्टा की है। इसके साथ ही साकेत में तत्कालीन राजनीतिक आन््दोलनों की भ्रनु-
हिन्दी-कबिता का विकास १५
. भू भी सुनाई देती है, ज॑से उ्िला द्वारा सैनिकों को श्रहिसा की शिक्षा देना, प्रजा के श्रिकारों
की चर्चा, राम के वनगमन के प्रवसर पर भ्रयोध्यावासियों का सत्याग्रह, विश्व-बन्धुत्व और मानव-
बाद के झादशों की प्रतिष्ठा ग्रादि। ये सामयिक घटनाओं के प्रभाव हें, जो कवि ने काफो सावधानी
८ के
2६ आज 4
फीफीक मशीन |
से प्रहएा किये हें । साकेत में वर्णनात्मक और प्रगीतात्मक दोनों शेलियों का सम्मिञश्रण है। पहले झाठ सर्गो में रास के ग्रभिषेक की तेयारी से लेकर चित्रकूट में भरत-मिलन तक, कथया-सूत्र वर्ण-
. ज्ञात्मक झोली में व्यवस्थित रूप से चलता है। इसके बाद नवें सर्ग में उमिला की वियोगावस्था को
सनस्थितियों का प्रयोतात्मक वर्णन है । कथा-सूत्र इस बीच थमा रहता है । दसवें सर्ग में उभिला झपले शदवकालोीन भ्रतीत का स्मरण करती है । ग्यारहबें-बारहें सर्गों में सहसा भरत के बाण से हसुसान के गिरने को घटना के पदचात् भ्रयोध्या के राज-परिवार के देनिक-जीवन को राँकी मिलती है झौर शत्र॒ुघ्त ओर मांडवी के मुख से दण्डकारण्य से लेकर लंका तक की घटनाएँ सुनने को मिलतो हैं । भ्रन्त में, राम के वापस लोटने और लक्ष्मएा-उभिला-मिलन से काव्य की समाप्ति होती है। इन झ्न्तिम चार सर्गो में, विशेषकर दो सर्गो में वस्तु-व्यापार का काव्योचित बिकास नहीं हो पाया, जिससे काव्य में शिथिलता झ्रा गई है । ऐसी ओर भी अनेक त्रुटियाँ दिखाई जा सकती हें, किन्तु फिर भी समग्र रूप से साकेत एक श्रेष्ठ काव्य है और उसने आधुनिक महाकाव्यों की पर- म्परा का सूत्रपात किया है । यशोधरा की रचना प्राचीन चम्पू के ढंग की है ।। मारिक भावों की व्यंजना गीतों में है झौर कया-सत्र कहों-कहीं गद्य में है । गुप्त जी ने लिखा है कि यश्लोधघरा की ओ्रोर संकेत उभिला ले ही किया । बुद्ध यशोधरा को आाबी रात के समय सोती छोड़ कर चले गये । उभिला के लिए भ्रविध का सहारा था, लेकिन यशोधरा के लिए वह भी नहीं था। उसे त्याग का गौरज भी नहीं मिल पाया । उपेक्षिता यशोघरा के मन को पीड़ा, उसकी समस्त आ्ात्मा का उपालसम्भ केवल इतना है कि वे उससे कहकर क्यों न गये : जायें, सिद्धि प्रार्वें वे सुख से दुखी न हो इस जन के दुख से-- उपालंभ दूं में किस मुख से ? आज अधिक वे भाते / सख्ि वे, मुझ से कहकर जाते । बिरहिएी यशोघरा और कुमार राहुल का चरित्र-चित्रण इस काव्य में झ्रत्यन्त करुणोत्पादक झोर सामिक हुआ है | प्रबन्ध-काव्यों के भ्रतिरिक्त, मुख्यतः छायावाद के प्रभाव में गुप्त जी गीत- मुक््तकों को ओर भी भुके । साकेत के नवें सर्ग और यज्ञोघरा के गीतों पर भी लाक्षण्क व्यंजना का प्रभाव दिखाई देता है । उनको स्फुट कविताझ्रों के संग्रह “मंकार' और “मंगल-घट' में विशेष रूप से इस शंली के गीत संकलित हें । इन दो महाकवियों के भ्रतिरिक्त इस धारा में ओर अ्रनेक प्रतिभा-सम्पन्त कवि योग देते भ्राये हें । गयाप्रसाद शुक्ल सनेही (जन्म १८८३ ई०) की सरल-कोमल और झोजस्वी कविताएं काफी लोक-प्रिय रहो हें । तू हे गयन किस्तीर्ण तो मैं एक तारा क्षुद्र हूँ” की विनय-शील भाबु- कता के साय-साय उनमें 'जी न चुराओ रण से, समर सूरवत डटे रहो? का उद्धत घोष भी है । साखनलाल चतुर्वेदी “एक भारतीय आत्मा' (जन्म १८८८ ई०) की कविता उनके कर्मठ राष्टु- सेबी जीवन की समतल पर चली है । उनके व्यक्तिबाद को परिणाति देश के स्वतन्त्रता-संग्राम में
१६ काब्य-धारा
बलिदान होने की भावना में हुई--“मुम्के तोड़ लेना बन माली / उस पथ पर <देना तुम फेंक । मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक |”? रामनरेश त्रिपाठी (जन्म १८८९ ई०) के तीनों खंड-काव्य 'पथिक', “मिलन झोर “स्वप्न' जो सन् ३० के राष्ट्रीय-भ्रान्दोलन के दिनों प्रत्येक राष्ट्प्रेमी युवकके कण्ठहार बने हुए थे, भ्रभी तक विस्मृत नहीं हुए । इन प्रबन्ध-काव्यों में त्रिपाठीजी ने उपाध्याय जी या गुप्त जी की तरह पौराणिक झाख्यानों या इतिहास के पात्रों को नहीं लिया, स्वयं अपनी कल्पना से उनके पात्रों की सृष्टि की । इनके झ्रधिकतर पात्र उनकी देश-भक्ति-पूर्ण भावनाओं के प्रतीक बन कर सामने शभ्ाते हें । श्रादर्शोन्मुखी भावना-प्रधान शैली और भाव-भूमि के कारण हो बे सर्वांग-सजीव पात्रों की सृष्टि नहीं कर पाये, लेकिन युग की भाव- नाओं के साथ मिलकर उनकी भाषा श्र भ्रभिव्यक्ति इतनी सजीव है कि सहज ही प्रभाव डालती है । स्थल-स्थल पर प्रकृति-चित्रण का भी भव्य-रूप देखने को मिलता है--“ग्रतिक्षण नूतन वेष बनाकर रंग-विरंग निराला | रवि के सम्मुख थिरक रही है नभ में वारिद माला |?? तीनों काव्य देश- भक्ति की भावना से प्रेरित हें। “स्वप्न! में मनोवेज्ञानिक ढंद्न्ध भी मिलता है । प्रियतमा के प्रेम-साहचर्य का सुख और अ्रसंख्य पीड़ित जसों के श्रातंनाद को सुनकर जाग्रत कतंव्य-विवेक दोनों श्रपनी-अपनी झोर झाकर्षित करते हें । इस तरह प्रेम और कतंव्य के इन्द्र को लेकर चलने वाला यह काव्य राष्ट्रीय- झान्दोलन द्वारा उठाई समस्या फो ही श्रत्यन्त मासिक ढंग से प्रतिबिम्बित करता है। ठाकुरगोपाल दरणरसह (जन्म १८६१ ई०) की यह प्रार्थना भ्रभी तक बिस्मृत नहीं हुई--'प्रथ्वी पर ही मेरे पद हों, दूर सदा आकाश रहे? प्रौर इस पृथ्वी पर ही खड़े होकर उन्होंने नारी को दुलहिन के सुहाग- भरे रूप में भी देखा और देवदासी, उपेक्षिता, भ्रभागिनी, भिखारिनी, वीरांगना के समाज-बिकृत प्रभागे रूप में भी। तभी "तेरे दुःख की दुःख ज्वालाएं, मेरे मन में हैं छुन्द हुईं? का चीत्कार कवि के हृदय से निकल पड़ा। उन्होंने हिन्दी में ब्नजभाषा के छंदों का सफलता-पूर्वक प्रयोग किया और उनकी भाषा झौर शली श्रत्यन्त सरस और मासिक है। सियारामशरण गुप्त (जन्म १८६४ ई०) करुण-भावना के कवि हैं । उनकी कविताओ्रों में सात्विक और श्ञान्त भाव प्रकट हुआ है, विचार-तल पर वे गांधीवाद, मानववाद और कुछ-कुछ रहस्यवाद से प्रभावित हैं, भौर श्रपनी कविताओं में इन विचार-जन्य अमूत्त भावनाओ्रों की संजूषा भी सजाते हें। भ्रनूप शर्मा इसके विपरीत हिन्दी में वीररस के कवि प्रसिद्ध हें। श्रापने कवित्त छंद में हिन्दी को सुघरता से ढाला है। आरम्भ में आप ब्रज- भाषा के ही कवि थे, लेकिन फिर हिन्दी में लिखने लगे। ऐतिहासिक और सामाजिक सभी विषयों पर झापकी दृष्टि गई है। 'सुनाल' नाम के खंड'काव्य में अंकित कुणाल के चरित्र ने सबसे पहले लोगों का ध्यान झ्राकर्षित किया । श्रठारह सर्गों के भीतर संस्कृत के शिखरणी, मंदाक्रांता, ख्ग्धरा झ्ादि वर्ण-वृत्तों में श्रापने बुद्ध-चरित को लेकर “सिद्धार्थ' एक महाकाव्य भी रचा। इसके पदचात् झापने और भी अ्रनेक खण्ड-काब्य और फुटकर कविताएँ लिखी हैं। श्राधुनिक ज्ञान-विज्ञान द्वारा उद्घाटित सृष्टि और जीवन-सम्बन्धी नये तथ्यों को भी भ्रापने मारमिक रूप में काव्योचित श्रभिव्यक्ति दी है। गुरु भक्तसिह भक्त (जन्म १८६३ ई०) को लोग छायावाद की “नई धारा' के कवियों में भी गिनते हैं, क्योंकि प्रकृति-चित्रण के लिए भाप प्रसिद्ध हें। लेकिन वस्तुतः श्राप पूरी तरह दोनों में से किसी एक धारा में नहीं खपते । आपके प्रबन्ध-काव्य “न्रजहाँ की स्मृति श्राज भी शेष हैं। सन् ३४-३४ के दिनों 'न्रजहाँ' उतनो ही लोक-प्रिय थी, जितना 'पथिक' और “सिलन' । श्रापकी शैली प्रधानतः वर्ण उत्मक है, और भाषा सरल और मुहावरेदार । लेकिन इस धारा की यशस्वी कवियित्री हें दिबंगता सुभद्रा कुमारी चौहान (सन् १६०४-१६४७ ई०) । इनकी वर्णनात्मक शैली
हिन्दी-कविता का विकास १७
में जो भाव-तस्मयता, ग्रोजस्विता भौर प्रवाह है वह प्रन्यत्र दुर्लभ रहा । उनको कबिता के दो स्वर हैं, एक में राष्ट्रीय भावनाझ्रों का स्फूतिदायी उद्धोष, तड़प श्रौर श्रोज है तो इूसरे में पारिवारिक जीवन की सरसता, वात्सल्य की गरिमा भ्ौर मबुरता फो व्यक्त करने वाली सुकुमारता और कोम- लता है । गहरे, दा्शनिक विचारों और व्यापक विश्व-बोध का उनकी कविता्रों में यदि श्रभाव है तो उसकी क्षति-पूर्ति पारिवारिक और ढेश्ञा-प्रेम को उत्सगं-भावनाझ्रों ढ्वारा हो जाती है, जिससे वे सहज हो हृदय को छू लेतो हें। “चमक उठी सन् सत्तावन में कह तलवार पुरानी थी ! बुन्देले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी- खूब लड़ी मरदानी वह तो भाँसी वाली रानी थी /?” ने हर भारतवासी का मस्तक ऊँचा उठाया है । जिस समय हमारे भारतेन्द्रकालीन कवि “धन्य तिहारों राज, अरी मेरी महारानी !” (प्रतापनारायण मित्र) लिखकर “भारतेक्वरी', “आ्रार्येब्वरी', श्माता', 'देवी', विक््टोरिया को प्रशस्तियाँ गाते थे शौर सन् सत्तावन के राज-ब्रोह की-- दिसी मृढ़ प्रिपराही कद्भुक ले कुटिल प्रजा संग | कियो अमित उत्पात, रच्यो निज नासन को ढंग ॥? (बद्री- नारायण 'प्रेमथन') कहकर सनत्त्संना कर रहे थे, उन्हीं दिनों ब्रज ओर बुन्देली के लोक-गीतों में जनता के कण्ठ से भ्रतायास ये कृतज्ञता-भरे शब्द फूट रहे थे--'खूब लड़ी मर्दानी, अरे रॉसी वाली रानी ।* सगरे प्िपाहियों को पेड़ा जलेबी, आपने चबाई गुड़घानी | अरे झाँसी वाली रानी, खूब लड़ी मर्दानी ॥!” भारतीय जनता की सच्ची भावनाप्रों को व्यक्त करने वाले इस लोक-गीत का उद्धार झ्ौर संस्कार करके सुभद्राकुमारी चोहान स्वयं चिरकाल के लिए भारतीयों की कृतज्ञता की पात्र बन गई हैं । इससे भ्रधिक ओजल्वी जन-गीत हिन्दी में और कोई नहीं रच सका । इस प्रसंग के अंत में इयामतारायणा पांडे (जन्म सन् १६१० ई०) विशज्ेष रूप से उल्लेखनीय हें । दोररस झोर करुणरस के श्राप प्रसिद्ध फवि हें । आप की वर्णनात्मक झोली भ्रन्य कवियों को अपेक्षा भ्रधिक अगल्भ और वेगवती है । “हल्दी-घाटी' नाम से १७ सर्यों में रचे गये झ्ाापके महाकाव्य में युद्ध का श्रावेगपूर्ण भ्लोर चित्रमय सजीव वर्णन जगनिक कवि (सन् ११७३ ई०) का “आल्हा' का स्मरण दिलाता है-- वारिद के उर में चमक-दमक, तड़-तड़ थी बिजली तड़क रही | रह-रह कर जल था बरस रहा, रणघीर भुजा थी फड़क रही ॥** “'केरी दल को ललकार गिरी, कह नागिन सी फुफ़कार गिरी | था शोर मोत से बच्तो-वचो, तलवार गिरी, तलवार गिरी |?? में भावा, श्रणि- व्यक्ति और भावना का आवेग तो बहुत है, लेकिन व्यापक वस्तृन्मुखी जीवन दृष्टि का झभाय है । इसके अतिरिक्त हमारा विचार है कि जिन्होंने मुस्लिम राजत्व-काल से ऐतिहासिक घटना-असंग लेकर स्फुट कविताओं या प्रबन्ध-काव्यों की रचना की है, उनके पात्र चाहे शिवाजी और प्रताप जेसे बोर-चरित्र ही क्यों न हों, वे देश की. सामथिक परिस्थिति में व्यापक राष्ट्रीय भावना का पोषण करने में सफल न हो सके, ऐसी रचनाश्रों में सर्वजनीनता के स्थान पर साम्प्रदायिक संकोर्णता का आा जाना अनिवार्य है । एकता-विधायिती साम्नाज्य-विरोधी स्वातंत्य-भावना में ऐसी रचनाएँ कवि द्वारा न चाहने पर भी सध्य-कालीन भारत के हिन्दु-मुस्लिम संघर्ष को स्मृतियों को जगाकर अनि- वारयंतः एक विक्षेप उपस्थित कर देतो हें, जो शुद्ध राष्ट्रीय-भावना का उदात्त स्वरूप स्थिर करने में बाधक होती है । पौराणिक या पू॑-मध्यकालीन झख्यान भारतीय हिन्दू अऋबवा बोद्ध-संस्कृति के प्रतीक होते हुए भी सर्वजन-संयेद्व हो सकते हैं, या कम-से-कम राष्ट्रीय-भावना में विक्षेप नहीं उपस्थित करते ।
; हमने राष्ट्रीय जाग्रति से प्रेरित श्लादर्श-भावना का रूप-संस्कार करके भ्रधिकतर निर्वेयक्तिक दृष्यस्तर पर क/ब्य-रचना करने वाले वर्णनात्मक पद्धति के उन मुक्य-मुख्य कबियों को ही लिया
जि काव्य-धारा
है जिनका कतित्व झ्रपनी धारा की सामान्य परिधि के भीतर भी विशिष्ट श्रौर महत्त्वपूर्ण है । श्रीधर पाठक से लेकर ध्यामनारायरा पाण्डेय तक इस धारा का प्रवाह कभी विच्छिन्न नहीं हुआ | काल-क्रम की दृष्टि से, प्रिय-प्रवास भौर इतर कुछ रचनाओं को छोड़ कर, इस धारा की श्रधिकांश रचनाएँ भी छायावाद-यग में या दो महायुद्वों के बीच ही रची गईं, लेकिन फिर भी हमने उन्हें पूर्व -छायावाद-युग में ही रखा है, क्योंकि यह धारा जिस काव्यादर्श को लेकर चलती रही--इसके दाब्द-प्रयोग, भाषा परिपाटी, श्रनुभूति-प्रकार, श्रन्तः स्वर, चित्रण-क्रम, वस्तु-विन्यास आदि श्रादि-- वह पूर्व-छायावाद-युग का ही काव्यादर्श है। इसके भाव-संकेत श्रौर भावना-संस्कार भी पूर्व-छायावाद- युग के हैं । छायावाद-युग में काव्यादर्श बदल गया, कवियों क। विश्व-बोध, उनकी जीवन-दृष्टि और उनकी श्रनुभूति श्नौर श्रभिव्यंजना का रूप-प्रकार सभी मौलिक रूप से बदल गये, जिससे ये कवि
भी प्रभावित हुए । किन्तु फिर भी छायावाद की मुख्य-धारा में पुरानी धारा का पूरी तरह पर्यवसान नहीं हो पाया । छायावाद-युग
हम पहले कह चुके हें कि छायावाद या स्वच्छन्दतावाद की सूलवर्तो भावना आधुनिक शझ्रौद्योगिक युग से प्रेरित व्यक्तिवाद है। इस वक्तव्य का पूरा श्रर्थ समक लेना चाहिए । प्रारम्भ में श्राचायं द्विवेदी श्र श्राचार्य रामचन्द्र शुक्ल जंसे भ्रालोचकों ने भी छायावादी कवियों पर पाइचात्य कविता का भ्रनुकरण करने का आरोप लगाया था। बाद में जब छायातादी कविता की मान्यता प्राप्त हो गई तो हिन्दी-आलोचकों ने यह स्वीकार कर लिया कि छायावादी कविता हमारे देश की राष्ट्रीय जाग्रति की हलचल में ही पनपी और फली-फूली है श्रौर इसकी मुख्य प्रेरणा राष्ट्रीय और सांस्कृतिक है । यह दूसरी स्थापना सत्य के श्रधिक समीप है। किन्तु यही बात इतिवृत्तात्मक पद्धति के उन काव्यों के बारे में भी सत्य है, जिनका विवेचन हम अभ्रभी कर आये हें। इसलिए इस बात को स्पष्ट समझ लेने की जरूरत है कि यदि हमारा देश पराधीन न होता श्रौर हमारे यहाँ राष्ट्रीय झान्दोलन की श्रावश्यकता न रही होती, तो भी श्राधुनिक श्रौद्योगिक समाज (पूंजीवाद) का विकास होते ही काव्य में स्वच्छन्दतावादी भावना और व्यक्तिवाद की प्रवृत्ति मुखर हो उठती । इसलिए छायावादी कविता राष्ट्रीय श्रान्दोलन या जाग्रति का सीधा परिणाम नहीं है; बल्कि पाइचात्य श्रर्थ-व्यवस्था और संस्कृति के सम्पक में आने के परिणाम-स्वरूप हमारे देश और समाज के बाहरी श्रौर भीतरी जीवन में जो प्रत्यक्ष और परोक्ष परिवर्तन हो रहे थे, उन्होंने जिस तरह सामूहिक व्यवहार और कर्म के क्षेत्र में राष्ट्रीय एकता की भावना जगाई और राष्ट्रीय संघर्ष को प्रेरणा दी, उसी तरह सांस्कृतिक क्षेत्र में उसने स्वच्छन्दतावाद की प्रवृत्ति को प्रेरणा दी । जिस तरह राष्ट्रीय जाग्रति और राष्ट्रीय श्रान्दोलन हमारे बाह्य कर्म-जीवन को समग्र-रूप से संचालित करने लगा, उसी तरह स्वच्छन्दताबादी प्रवृत्ति हमारे अश्रन्तरस्थ भावों और आकांक्षाओं को संचा- लित करने लगी । इस प्रकार राष्ट्रीय जाग्रति और स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्ति दोनों ही ने आधुनिक युग की सामान्य परिस्थितियों से जन्म लिया। राष्ट्रीय जागरण और आ्रान्दोलन की प्रेरणाएँ सामयिक और बाह्मयस्तर की होने के कारण श्रधिक बलवान होती हें । उन पर समूचे देश का सामाजिक, आर्थिक ओर राजनीतिक विकास निर्भर करता है। इसलिए अ्रधिक व्यापक और तलस्पर्शों होते हुए भी सांस्कृतिक भावना का रूप-विन्यास राष्ट्रीय जाग्रति से प्रभावित होता है। इस दृष्टि से हम कह सकते हैं कि देश की प्राचीन संस्कृति और पाइचात्य काव्य-साहित्य के प्रभावा को गृहण करती हुई छायावादी कविता राष्ट्रीय जागरण के करोड़ में पनपी और फली-फूली ।
हिन्दी-कविता का विकास ५६
व्यक्तिवाद अपते प्राप में बुरी चीत नहों है, न यह भ्रसामाजिक भावना हो है, किन्तु पाश्चात्य वेशों के ह्लातोन्मुखी पूंजीवाद के युग में व्यक्तिवाद को परिणाति बहुधा ऐसी भ्रहंवादो, स्वार्थ-प्रेरित, प्रात्म-केन्द्रित, ्रसामाजिक और प्रसंतुलित मनोवृत्तियों के रूप में हुई है, कि किसी को #पक्तिवादी' कहना दुर्वंचत-सा बन गया है । बस्तुतः बिकासोन्मुखी पू जीवाद के युग में “व्यक्तिवाद' सानव-चेतना के एक झभिनव विकास की सूचना देता है । मध्यकालीन सामंती समाज में व्यक्ति के मनोभावों और व्यक्ति के भ्रथिकारों का प्रइत ही नहीं उठता था । कर्तव्यों की एक अट्ट श्यूंखला में व्यक्ति का भ्रन्तर्बाह्म जीवन बंधा हुआ था। लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था में समाज-सम्बन्ध इस इकतरफ़ा भित्ति पर नहीं खड़े रह सकते थे। व्यक्ति समाज की इकाई है । इन इकाइयों से मिलकर हो समाज बनता है, इसलिए समाज के प्रति व्यक्ति का कर्तव्य है तो व्यक्ति के प्रति भी समाज का कतेंव्य है, प्रस्यया समातता का कोई श्रर्थ ही नहीं रहता । व्यक्तिवाद इस प्रकार एक साप्राजिक झावदयकता को चेतना का रूप लेकर ही पैदा हुआ । झ्ागे चलकर पूंजीवादी समाज ने नये भ्रप्र- त्यक्ष पूंजी-सम्बन्ध स्थापित करके व्यक्ति के आ्राध्यात्मिक और भोतिक विकास के मार्ग बर्ग-सीमित कर दिये झौर युग को स्वच्छुन्दतावादी भावना प्रतिक्रिया-स्वरूप पूंजीवाद से द्रोह न करके सारे समाज और सामाजिकता से ही द्रोह कर बेठी । यह पूंजीवादी व्यवस्था की आन्तरिक असंगतियों झोर छ्ास को कहानी है । किन्तु इससे व्यक्तित्व या व्यक्ति की सत्ता की स्वीकृति का प्रइन अपनी संगति नहीं खो बेठता ।
हमारे देश में जिस समय व्यक्ति-भावना का जन्म हुआ उस समय राष्ट्रीय-चेतना का भी उदय हुआ । इसलिए व्यक्ति-भावना का प्रारम्भ से ही राष्ट्रीय आज़ादी की भावना से गठबन्धन हो गया, झौर नई छायावादी कविता का व्यक्तिवाद अ्सामाजिक पथों पर न भटक कर राष्ट्रीय नवजीवन को उदात्त ग्राकांक्षा का गम्भीर मर्म-वेदन लेकर मुखरित हुआ । रवीन्द्रनाथ ठाकुर हिन्दी से पहले ही बंगला-काव्य में स्वच्छुन्दतावाद की धारा प्रवाहित कर चुके थे, जिसने एक नई काव्य-भूमि के बिस्तृत सीमान्त खोल दिये थे । उनका व्यक्तिवाद स्वयं अपने पार्थिव जोवन के सुख-वुःख से ऊपर उठकर जाति, वर्ण, देश और समाज की सीमाझों को पार करता हुआ विद्व-बन्धुत्व और मानवी- सीमाओं में असीस भोतिक और आध्मात्मिक विकास की सम्भावनाओं का दर्शन कर रहा था । उत्की गोचर में भ्रगोचर को खोज अ्रं।र पार्थिव में दिव्य का अवतरण ओर प्राण-प्रतिष्ठा करने की साधता मानव-जोवन की अनन्त सम्भावनाझ्रों का सत्यान्वेबण करने का हो नेतिक प्रयास था। इन उदात्त भावनाओं और दार्शनिक चिन्तन ने व्यक्तिगत अ्ननुभूति का रूप धारण करके प्रगीता- त्मक अभिव्यक्ति पायी, क्योंकि कवि का संवेदनशील व्यक्ति-हृदय उस समय “मानवता का स्वच्छ मुकुर' बन गया था, जिसमें हमारे देश को ही नहीं, मानव-मात्र को झ्राशाओ्रों-आकांक्षाओं, सुख-दुःख झोर राग-विराग का सम्पूर्ण वेदन प्रतित्रिम्बित हो रहा था। कवि बाह्म-जीवन में से प्रतिनिधि- अरित्रों का तिर्माण किये बिना ही प्रत्येक्र व्यक्ति के भ्रन्तर्भावों को छू सकता था, उन्हें भ्रपनी संबे- बला और अनुभूति का अंग बनाकर मासिक चित्रों को भाषा में क््रभिव्यक्ति दे सकता था। ब्यक्ति- हृदय या व्यक्ति-चेतना समाज-हृदय झौर समाज-चेतता से भी एकात्म थी। इसलिए प्रारम्भिक छायावादी कविता का रुदन-क्दन, व्यक्तिगत रुवन-कन्दन, के साथ-साथ रूढ़ि-बद्ध, पराधीन झौर संघर्षशील भारतीय समाज का ही रुदन-ऋन्दन था । कवि का 'में' प्रत्येक प्रबुद्ध भारतवासी का 'में था, इस कारणा कवि की विवयगत दृष्टि ने अपनी सृूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए जो लाक्षणिक भाजषा प्लोर भ्रप्रस्तुत योजना-शेली भ्रपनायी, उसके संकेत भ्रोर प्रतीक हर ब्यक्ति
२० काव्य-धारा
के लिए सहज प्रेषणीय बन सके । छायाबादी कवियों की भावनाएँ यदि उनके विशिष्ट वेयक्तिक दुखों के रोने-धोने तक ही सीमित रहतीं;। उनके भाव यदि केवल झ्रात्म-केन्द्रित ही होते तो उनमें इतनी व्यापक प्रेषणीयता कदापि न झा पाती । “निराला ने लिखाः-- “मैंने??''मैं?? शेली अपनाई देखा एक दुखी निज भाई दुख की छाया पढ़ी. हृदय में झट उमड़ वेदना आईं |”? इससे स्पष्ट है कि व्यक्तिगत सुख-दुखों को श्रपेक्षा अपने से 'श्रन्य' के सुख-दुखों की श्रनुभूति ने ही नये कवियों के भाव-प्रवण झशौर कल्पनाशील हृदयों को स्वछन्दता की श्रोर प्रवत्त किया।._ प्रारम्भ में हिन्दी के प्रमुख आलोचक छायावादी कविता के इस युगीन रूप को न पहचान सके, यद्यपि हिन्दी के पाठकों में ये कविताएं लोक-प्रिय होती जा रही थीं । बाबू मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक्त, मुकुटधर पाण्डेब श्रौर पंडित बदरीनाय भट्ट ने छायावादी-युग से पहले कुछ गीता- त्मक रचनाएँ की थीं और उनमें कहीं-कहीं रहस्प-भावना की पुट भी दी थी । लेकिन इन रचनाओं के भाव-संस्कार पुराने शोर धार्मिक ही थे । यहाँ तक तो उस युग के श्रालोचकों को सह्य था, लेकिन हिन्दी-काव्य परम्परा-विहित मार्ग को छोड़कर नितान्त नयी भाष!), पद्धति और श्रथथ-भूमि की सृष्टि करने लगे, यह उनके शास्त्र-ज्ञान भर पूर्व-ग्रहों को तीत्र चुनोती थी, जिसके लिए वे तेयार न थे । सन् १६१३ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नोबल-पुरस्कार प्राप्त हुआ था, तब से, कम-से-कम उन पर सीधे आक्रमण करने का साहस झालोचकों को नहीं रहा था, यद्यपि उनकी कविता को बे किसी पूर्व-परिचित, श्ास्त्रोक्त परिपाटी के अन्दर रखकर समझे सकने में असमर्थ थे । हिन्दी-आलोचकों ने इस कारण रवॉंद्रगाथ ओर उनकी कविता के प्रति एक आक्रोशपुर्ण उदासीनता का भाव अभ्रपना रखा था। वे नहीं चाहते थे कि बंगला-काव्य को रवि बाबू जिन झनजाने पथों पर घसीटे लिए जा रहे थे उन पर हिन्दी के उदीयमान कवि भी भटक जायें। इसीलिए जब निराला और पन््त की कविताएँ पत्र-पत्रिकाश्रों में छपने लगीं तो हिन्डी-आलोचकों ने उनका जमकर विरोध किया । स्वयं अ्ाचाये द्विवेदी ने इस विरोध की शुरूआत की और बाद में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी इस नई धारा के विरुद्ध पर्याप्त लिखा। केवल अपने भ्रन्तिम दिनों में ही उन्होंने स्वीकार किया कि “छायावाद की शाखा के भीतर धीरे-धीरे काव्य-शेली का बहुत अ्रच्छा विकास हुआ, इसमें सन््देह नहीं। इसमें भावावेश की श्राकुल व्यंजना, लाक्षणिक वेचित्र॒य, मृत्त प्रत्यक्षीकरण, भाषा की वक्ता, विरोध-चमत्कार, कोमल पद-विन्यास इत्यादि काव्य का स्वरूप संगठित करने वाली प्रचुर सामग्री दिखाई पड़ी ।” छायावादी कविता के विरोध में रवीन्द्रनाथ ओर पाइचात्य स्वच्छुन्दतावादी कवियों के अ्रनुकरण का आरोप तो लगाया ही जाता था, किन्तु द्विविदी जी का मुख्य आरोप यह था कि इस कविता में प्रासादिकता नहीं है । वे प्रासा- दिकता या प्रेषणीयता को काव्य का प्रधान युर मानते थे। आचाये शुक्ल का विरोध इन बातों के श्रतिरिक्त, इस बात को लेकर भी था कि छायावादी कवि काव्य-वस्तु को संकीर्ण बनाकर केवल अप्रस्तुतों की योजना करने और लाक्षरिक मूत्तिमत्ता और विचित्रता लाने की ओर प्रवृत्त हें और प्रेम-क्षेत्र के भीतर ही प्रकांड बेदना, ओऔत्सुक्य, उन््माद झ्रादि की व्यंजना करते हैं, जो रीति-कालीन श्रृंगारी कविता का ही, कुछ अदल-बदलकर, प्रत्यावर्तत है। प्रासादिकता या प्रेषणीयता के सम्बन्ध - में हम कह चुके हें कि छायावादी कविताएँ धीरे-धीरे लोक-प्रिय होती जा रही थीं क्योंकि युग-चेतना
द्िन्दी-कविता का विकांस २१
का प्रवाह उनके भ्रनुकूल था। रही प्रेम-क्षेत्र के भीतर ही भ्रधिकतर छायावादी-काव्य के सीमित रहने को बात, तो इस सम्बन्ध में हमें यह कहना है कि श्रादि-काल से स्त्री और पुरुष का प्रेम- सम्बन्ध काव्य, कला और साहित्य की विघषय-बस्तु बनता भ्राया है, इसलिए नहीं कि महान् कबि और कलाकार विलासी और श्यूंगारी मनोवृत्ति के व्यक्ति थे, बल्कि इसलिए कि मानव-सम्बन्धों में प्रेम का सम्बन्ध न केबल सर्वोच्च है, बल्कि मनुष्य की उच्चतम नेतिक भावना, परदुख-कातरता, सौहाई आर सहृदयता को सबसे बड़ी कसौटी भी है। नर-तारी के प्रेम-सम्बन्धों को काव्य-कला में रूपायित करने का भ्रर्य है, मनुष्य की उज्चतम उदात्त भावनाश्रों, श्राशाओ्रों, श्राकांक्षाओं झोर तत्कालीन सामाजिक जीवन को रूपायित करना। यह सामाजिक जीवन या तत्कालीन समाज- सस्बन्ध व्यक्ति और उसके माध्यम से सानव-समाज की प्रगति में सहायक या बाधक हैं, इसका मामिक प्रतिबिस्त उस समाज के नर-तारी के प्रेम-सम्बन्धों श्रोर नेतिक धारणाझ्रों, रूढ़ियों और सामाजिक आचरणा में मिलता है। इसलिए अधिकतर प्रेम-गीत लिखने के कारण ही छायावादी कवियों पर “शूंगारी' होते या “नाना भ्रय-भूमियों पर काव्य का प्रसार” रोक देने का लांछन लगाना ब्रसंगल था । छायावादी कविता के तथा-कथित "प्रेम-गीत', वस्तुतः सामन्त-कालीन, रूढ़ि-जर्जर व्यवस्था, नेंतिकता और मानव-सम्बन्धों के विरुद्ध भ्रसन्तोष ओर विद्रोह के गीत हैं और मानव- सम्बस्धों को ग्रधिक व्यापक मालवीय अ्राधार पर संगठित करने को युगीन श्राकांक्षा के प्रति- निधि हें ।
हिन्दी-आलोचकों के इस विरोध का एक शुभ परिणाम भी निकला। वड़् सवर्थ ओर शैली की तरह छायावादी कवि भी स्वयं श्रपनी कविता के प्रवक्ता बने । अ्रपने कविता-संग्रहों की भूमि- काओ्रों में उन्होंने कविता के सम्बन्ध में जिन नये व्याख्या-सूत्रों की उद्भावना की, वे परम्परागत शास्त्रीय व्याल्याओं से भिन्न थे। यद्यपि इन व्याख्याप्रों का मूलभूत दार्शनिक आधार “आझ्रादशंवाद' था, भौतिकवाद नहीं, जिसके कारण उन्होंने सामान्यतः काव्य को मनुष्य के शेष कार्य-व्यापारों से लिम्त एक असाधारण, लोकोत्तर एवं आध्यात्मिक सर्जन-क्रिया के रूप में देखा, किन्तु फिर भी उन्होंने जीवन और यथार्य से उसका अ्रविच्छेद सम्बन्ध भी स्वीकार किया। किसी देश या जाति का मुक्ति-प्रयास, उसकी सत्य भ्रौर सोौन्दर्य-निष्ठा उसके काव्य में प्रतिबिम्बित होती है; अनुभूति और अभिव्यंजना दो पृथक् क्रियाएं नहीं हें, बल्कि “व्यंजना वस्तुतः अ्नुभूतिमयी प्रतिभा का स्वयं परिणाम है;” सन के संकल्प झौर विकल्प इन दोनों रूपों में से यदि विज्ञान विकल्प (विश्लेषण, तर्क, प्रयोग-परीक्षा ) द्वारा बस्तु-सत्य को जानने की .,चेष्टा करता है तो कबिता मन की संकल्पात्मक अनुभूति द्वारा वस्तु-सत्य को जानने की चेष्टा करती है; जड़ से चेतन का, बाह्या-जगत से अ्रन्तर्जंगत
का सम्बन्ध कराती है और इस प्रकार मनुष्य को समष्टिगत चेतना और सोन््दर्यानुभूति को जाग-
रुक करके व्यापक और गहरा बनाती है; सत्य, शिव और सुन्दर केवल बेयक्तिक श्रादर्श नहीं हें, बल्कि कविता के सामाजिक श्रेय झ्रोर प्रेय का व्यापक जीवन-सत्य से ग्रन्थि-बन्धन कराके श्रादर्श झोर ययार्थ, बुद्धि ओर भाव, व्यक्ति श्रोर समाज के समन्वित और सामंजस विकास के आदर्श हें-- इन और इतर ऐसी ही अनेक मासिक तथा दाझ्निक स्थापनाझों द्वारा छायावादी कवियों ने एक नये काव्यादर्श, नये सौन्दर्य श्लोर जीवन-मूल्यों का प्रतिपादन किया भर साहित्य के नये प्रतिमान स्थिर किये।
पुराने काव्यानुशासनों से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने काव्य-भाषा, छन््द, भ्रलंकार, बस्तु- विन्याल, मूत्त-विधान झोर प्रभिव्यंजना-क्षेत्री में शतशः प्रयोग किये, तुकान्त, अ्रतुकान्त, मुक्त-
ब्रे कांव्य-घारा
छुन््द, विषम-चररणा-बन्ध श्राद सभी का नियोजन किया और सीधी-सादी भाव-संवलित भाषा से लेकर लाक्षणिक और श्रप्रस्तुत-विधानों से युक्त चित्रमयी भाषा तक का प्रयोग भी किया। प्रगीत, खंड-काव्य और प्रबन्ध-काव्य भी लिखे और बीर-गीति, संबोध-गीति, शोक-गीति, व्यंग्य-गीति, आदि काव्य के अन्य रूप-विधानों का भी प्रयोग किया। छायावादी कवियों का भाषा और छन्व-प्रयोग केवल बुद्धि-विलास, वबचन-भंगिमा, कौशल या कौतुक-वृत्ति से प्रेरित नहीं रहा; बल्कि उनकी कविता में भाषा भावों का अनुसरण करते दीखती है और श्रभिव्यंजना श्रनुभूति का । यह ठीक है कि छायावादी कविता विषयि-प्रधान (सब्जेक्टिव) है और बहिजंगत् और जीवन की समसस््याएँ कवि-बिशेष की व्यक्तिगत शभ्रनुभूतियों के रंग में रंगी हुई प्रतिबिम्बित हुई हैं, किन्तु इसका यह परिणाम भी हुआ है कि छायावादी कविता में वाह्म वस्तु, इतिवृत्तात्मक चित्र, प्रकृत, यथातथ्य दृश्य श्रौर वर्णन घुसकर विक्षेप नहीं उपस्थित करते, ओर प्रत्येक कविता एक सुश्यृंखलित झौर अखंडित भाव-इकाई की रूप-सृष्टि करती है । इसका यह तात्पयं नहीं कि छायावादी कबिता एक ही प्रकार की भाव-संवेदना या दृष्टिकोण की कविता है । समग्र रूप से छायावादी कविता में विविध भाव-संवेदनाञ्रों और दृष्टिकोणों की भ्रभिव्यंजना हुई है। एक ही कवि की भिन्न-भिन्न कविताश्ों में उल्लास, उत्साह, निराशा और अवसाद से पूर्ण बेयक्तिक श्रनुभूतियों की विवृत्ति देखने को मिलती है। प्राचीन वेदान्त-वर्शन, बोद्ध-दर्शन, स्वामी विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गाँधी, माक्स और अरविन्द के दाशंनिक विचारों और सिद्धान्तों का उनके श्रात्म-चिन्तन पर प्रभाव पड़ा है। बहिजंगत् श्रौर जीवन की समस्याञ्रों की कवियों के मानस में जब जेसी प्रतिक्रिया हुई है, झपनी व्यक्तिगत श्रनुभूतियों के माध्यम से ही उन्होंने बाह्यजगत् श्रौर जीवन के व्यापारों को : प्रतिबिम्बित किया है। इसलिए यद्यपि उनकी वाणी में मनुष्य को महिमा का उद्घोष है, रूढ़ि-ग्रस्त समाज के बन्धनों शौर मनुष्य के शोषण-उत्पीड़न के विरुद्ध एक नेतिक और न्यायपरक भावना का मार्भिक प्रतिवाद है श्र समाज के श्रधिकार-वंचित प्राणियों के प्रति सहज करुणा और सहानु- भूति की उदात्त भावना है, तो भी कहीं-कहीं घोर नराइ्य-भरा और श्रात्मपीड़क चीत्कार भी है, जो अपने निबिड़-आवेग में उनके श्राधारभूत मानववाद को समाजद्रोही भावनाओ्रों से तिमिराच्छस्त कर लेता है। किन्तु ऐसी ह्ासोन्मुखी प्रवृत्तियाँ सन्! ३५ के बाद ही अधिक मुखर हुई और कुछ विशेष कवियों में ही, नहीं तो प्रसाद, निराला, पंत जेसे भ्रग्रणी कवियों की सहज-प्रवृत्ति सामान्यतः अपने व्यक्तिगत सुख-दुखों को वाणी न देकर उनसे ऊपर उठने की श्रोर ही रही है ।
हमने प्रथम महायुद्ध की समाध्ति से दूसरे महायुद्ध के श्रारम्भ काल तक छायावाद-युग की व्याप्ति मानी है, किन्तु इस तरह के निश्चित काल-निर्णय केवल सुविधा की दृष्टि से ही संगत समभने चाहिए । साहित्य की किसी प्रवृत्ति का झरादि श्रौर भ्रन््त किसी निश्चित तारीख से बाँध देना अ्रत्यन्त कठिन काम है। इसलिए यह न समझ लेना चाहिए कि युद्ध समाध्ति पर सन्' १८ में सहसा छायावादी काव्य-धारा फूट पड़ी और दूसरा महायुद्ध शुरू होते ही सन् १६३६ में ह॒ठात् विलीन हो गई । छायावादी कविताएँ सन् १६१८ से शुरू हो गई थीं और सन् १६३६ के बाद भी होती रहीं; सच तो यह हैं कि श्रब भो रची जा रही हैं । इसलिए इस निश्चित काल-श्रवधि का तात्पयं केवल इतना है कि उस बीच छायावाद ही हिन्दी-कबिता की मुख्य-धारा थी, तटवर्ती या पाइवंवर्तो धारा नहीं, बल्कि मध्य की मुख्य-धारा। छायावाद के आरंभिक उत्थान में तीन युगावतारी प्रतिभा के कवि सामने आये--प्रसाद, निराला और पंत ।
जयशंकर प्रसाद--(सन् १८८६-१६३७ ई०) को हिन्दी मे छायावादी कविता का प्रवर्तक
हिन्दी-कबिता का विकास २३
कहा जाता है । सत् १६१३ से पहले 'प्रताद' जी ब्रजभांषा में ही कविताएं लिखा करते थे शोर उत्को ब्रज-कविताझ्रों का संग्रह “चित्राघार' के नाम से प्रकाशित हुआ था + फिर खड़ी बोली में 'कानत-कुसुम', 'महाराणा का महत्त्व, 'करुणालय' (गीति-नाटअ ) और “प्रेम-पथिक' प्रकाशित हुए । इन कविताझ्रों में गोति-काब्य झोर बंगला कविताओं के ढंग की अ्रतुकान्त पदावली को श्रोर
द उत्तकी प्रवृत्ति का झाभास तो मिलता है, लेकित इनमें श्रभी छायावाद का रूप नहीं कलका था,
पक १. ६ नल की
न विशेष नवीनता ही थी । भारतेन्दु-कालीन पंडित अ्रम्बिकादत्त व्यास शोर बाद में श्रोधर पाठक इस
ढरें की भ्रतुकान्त रचनाएं पहले ही कर चुके थे । स/थ हो, बाबू मेथिलीशरणा गुप्त, बदरीनाथ भट्ट और सुकुटघर पाण्डे की इस काल को गीतात्मक रचनाएँ भ्रपेक्षया भ्रथिक नई पद्धति को थीं । उनमें वित्रसयी भाषा का प्रयोग भी था और भावना भी स्वच्छन्दतावाद के भ्रधिक निकट थी । प्रसाद जी ले भी पीछे नयी पद्धति ग्पनाथी, और सन्' १६१८ में उनको २४ कविताओं का संग्रह “ऋरना' के नाम से प्रकाशित हुआ। “ररना' की कविताझ्रों को छायावाद की दिशा में उनका पहला प्रयास ही समझना चाहिए । उनमें न प्रौढ़ता थी, न कोई विशिष्ट नया स्वर ही, जो उस समय की प्रचलित कविताओं से उन्हें प्रन्यतम बना देता । इसीलिए, सम्भवतः सन् १६२७ में “ऋरना' का दूसरा संस्करण निकला जिसमें ३१ नई कविताएँ जोड़ी गई, जिनमें छायावादी काव्य-वस्तु शोर शेली की विशेषताएँ थीं । स्मरण रहे कि इसके पूर्व ही पंतजी की “बीणा', “प्रन्थि' श्र 'पललव' प्रकाशित हो चुके थे झौर निरालाजी की स्फुट कविताएं भो पत्र-पत्रिकाशरों में छपने लगी थों, ओर छाबावादी कविता अपने पूर्ण उन््मेष को प्राप्त करके हिन्दी-जगत् में एक युगान्तर उपस्थित कर चुकी थी। प्रसाद जो को पहली भ्रौढ़ रचना “आँसू' है जो सन् १€३१ में प्रकाशित हुई । इस प्रकार हम देखते हें कि एक महान छायावादी कवि के रूप में प्रसाद जी का विकास पंत और निराला की अपेक्षा धीरे-धीरे, लगभग १५ वर्ष की साधना लेकर हुआ । छायावादी कविता के प्रारस्मिक इतिहास में जिस तरह पंत का 'पल्लव' और निराला के 'परिमल' का विशिष्ट स्थान है, उसी तरह उसके विकास और अन्ततः ह्लास के इतिहास में आँसू' का भी विशिष्ट स्थान है । “आँसू' की रचना उन दिनों हुई थी, जब देश में राष्ट्रीय आन्दोलन का जोर था, किन्तु पूं जीवादी संसार एक भयंकर आशर्थिक-संकट में फेंसा हुआ था और उस संकट से बाहर निकलने का आस्त्रीकरण झौर युद्ध का मार्ग अपनाये
. बगैर, उसे और कोई मार्ग न सूकता था । इस आर्थिक-संकट ने भारतीय जनता और भारतीय
उद्योग-घन्धों को भी अ्रपनी लयेट में लेकर एक निराशा, अश्रनिश्चितता और क्षोम का वातावरण वैदा कर दिया था। सन्' ३०-३२ का राष्ट्रीय-प्रान्दोलन इस क्षोभ का परिणाम था, किन्तु प्रासाद के 'आँसू' ने निराशा और अनिश्चितता को अत्यन्त माभिकता के साथ प्रतिबिस्बित किया । निराशावाद और नियतिवाद का गहरा भ्रवसाद इसमें व्यक्त हुआ, जिसने महांदेवी जी के चिरन्तन पौड़ावाद, बच्चन के हालावाद और अंचल के भोगवाद की आात्मकेन्द्रित श्रौर श्रहुंवादी प्रवृत्तियों को प्रेरित किया । 'आँसू' में प्रसाद जी ने '“प्रेम-बेदना' को दिव्यता से मण्डित कर दिया है, जिसको गोद में सुख-दुख दोनों पलते हें । सामाजिक चेतना और स/माजिक उद्योग का तिरस्कार इस कविता में दीखता है, क्योंकि विस्मृति या चेतना-शून्यता की महारात्रि में ही वास्तविक मिलन-सुख और कल्याणा-वर्षा' की संभावना कल्पित की गई है । “चेतना-लहर न उठेयी जीवन-समुद्र थिर होगा संध्या हो सगे प्रलय की विच्छेद मिलन फिर होगा ।”” अपने अगले कविता-संग्रह “'लहर' में प्रसाद जी ने विविध अर्य-भूमियों पर भ्रपनी कल्पना
२४ काब्य-धारा
को दोड़ाया । इसको कविताओं में कहीं श्रानन्दवाद की भलक मिलती है, तो कहीं भ्रज्ञात प्रियतसम से रहस्यमय भ्रभिसार के चित्र हें, कहीं सजीले स्वप्नों से श्रतुप्ति को मिटाने का प्रयास है तो कहीं ब्रह्मवेला का “बीती विभावरी, जाग री? का श्राह्वान है, भ्रौर कहीं “अरब जागो जीवन के ग्रभातः की कामना है। किन्तु समग्र रूप से भ्रधीरता, बेदना झौर निराशा का स्वर॒इन कविताओं में भी प्रधान है ।
“'लहर' के बाद सन् १६३४५ में 'कामायनी' प्रकाशित हुई। यह छायावाद-युग का महा- काव्य है, क्योंकि इसमें एक उदात्त श्रादर्शवादी स्तर पर व्यक्तिवाद की श्रन्तिम परिणति देखने को मिलती है। 'कामायाती' की कथा एक पौराशिक-चबृत्त पर श्राधारित है, किन्तु यह वृत्त तो एक रूपक है जिसके माध्यम से प्रसाद जी ने मनुष्य के बौद्धिक शौर भावतात्मक विकास और श्राधुनिक जीवन के झान्तरिक वेषम्य की वास्तविकता को ही चित्रमयी भाषा में प्रतिविम्बित करने का विराट झ्रायोजन किया है। काव्य के मुख्य पात्र सनु, इड़ा और श्रद्धा पौराणिक से भ्रधिक प्रतीकात्मक व्यत्रित हें। मनु भाज के श्रात्म-चेतन व्यक्तिवादी व्यक्ति के प्रतीक हें । इड़ा श्राधुनिक पूंजीवादी समाज के वर्ग-भेद भर शोबरा की सान्यताभों पर श्राधारित बुद्धि-तत्त्व की प्रतीक है श्र श्रद्धा मनुष्य को सहज मानवीय भावनाओं, नेतिक-मूल्यों श्ौर सौहाद्ंता से युक्त मानव-हृदय के झ्रास्था- शील श्रद्धा-तत्त्व की प्रतीक है। इन तीन पात्रों के माध्यम से प्रसाद जी ने श्राधुनिक पूँजीवाद-प्रणीत सभ्यता श्रौर उसके समस्त श्रन्तविरोधों और श्रसंगतियों का ऊहापोह विवेचन किया है ॥ प्रसाद जी ने जिस समय 'कामायनी' की रचना की उस समय गांधी जी के नेतृत्व में चलने वाले राष्ट्रीय शान्दोलन ने देश के हर वर्ग में स्वतन्त्रता और भावी राष्ट्-निर्माण के स्वप्न जगा दिये थे, लेकिन प्रसाद जी ने इस भ्रादश्शंवादी उमंग की लहर से श्रप्रभावित रहकर उस समाज कौ आ्रावार-भूत मान्यताश्रों को जाँचने-परखने का साहसपूर्ण प्रयास किया जिसका निर्माण करने के लिए ये सपने जगे थे। भारतीय विचार-धारा में बुद्धि और हृदय-पक्ष के परस्पर विरोध और ह्वत की धारणा प्राचीन श्रौर रूढ़ थी । बुद्धि यदि ज्ञान-विज्ञान, सम्यता-निर्माण में योग देती- है, तो मनुष्य में बर्गे- भेद, मानव-शोषरण, निरंकुशता, सत्ता-मद शौर भ्रहंकार भी पेदा करती है, और इस प्रकार मनुष्य को मानवीयता से दूर खींच ले जाती है । बुद्धि-प्रणीत सभ्यता योग्यतम की विजय की ऋ स्वायें- परता के भ्रमानवीय सिद्धान्त पर टिकी है। इसी लिए इस द्वंत की धारणा में श्रद्धा या मनुष्य की हादिकता, सहानुभूतिशीलता के प्रति भारतीय मानस और तत्त्व-चिन्तन का विशेष आग्रह और झनुराग रहा है। साधारणतया मनुष्य तत्सामयिक स्थिति को ही चिरन्तन समझ लेता है; कम से कम उस समय तक जब तक कि उस स्थिति में मौलिक परिवर्तन की संभावनाश्रों का ज्ञान उसे नहीं हो जाता । इसलिए प्रसाद जी को इड़ानिर्मित झ्राधुनिक पूजीवादी सम्ध्ता नये विकास की संभा- बनाओरं के झभाव में चिरन्तन ही दिखाई दी और उनका संवेदनशील हृदय उससे विद्रोह कर बेठा । इस विद्रोह का सहज-प्राध्य अस्त्र बनी भ्रद्धा। बुद्धि का तिरस्कार श्रौर श्रद्धा का गृहर ही उन्हें भ्राधुनिक पूँजीवादी समाजके श्रभिशापों से मुक्ति का एकनात्र सा्ग समझ में झ्राया। यह प्रत्यावतंन और पलायन का मार्ग भी है और वर्गं-समाज सें व्यक्तिवाद की श्र-सामाजिक परिणति का भी । मनु ने श्रद्धा का त्याग करके इड़ा की सहायता से जिस सभ्यता का निर्माण किया वह अपनी समस्त श्री-सम्पन्नता के बाव- जद ह्वास-प्रस्त हो गई, क्योंकि उसमें वर्ग-भेद, प्रातंक-दमन, सत्तावाद, शोषण-दारिद्रय, कृत्रिमता श्र भ्रहंवाद का बोलबाला हो गया । इस सभ्यता का ध्वंस होने पर मनु का हृदय पुत्रः श्रद्धा कौ श्लोर प्रवृत्त हुआ । श्रद्धा उन्हें इस धरती के जन-रव, वेषम्य, वर्ग-भेद और श्रहंमन््यता के दूषित
हिन्दी -कविता का विकास २५
बाताव रण से दूर कंलाश पर्वत के समरसत और सामंजस्पपयूर्ण श्लातन्व-लोक में ले जाती है । इस प्रकार प्रम्ततः बुद्धि का तिरस्कार भ्रौर श्रद्धा का स्वीकार प्रसाद जो की, वेचारिक स्तर पर, उस इत-घारणा का ही परिणाम है, जिसका हमने उल्लेख किया है । व्यक्तिवाद की इस समाज-द्रोही परिणति के बावजूद, 'कामायनी' का विराट रूपक वर्तमान पूंजीवादी समाज को वास्तविकता और अन्तविरोधों को इतनी सजीव मूर्सता ओर गहराई से प्रतिबिम्बित करता है कि वह इम युग का प्रतिनिधि महाकाव्य बन गया । पूंजीवाद की शापग्रस्त सम्यता से मुक्ति. पाने का वे कोई सामा- जिक आादर्श उपस्थित नहीं कर पाये, लेकिन यह सम्यता ज्ञाप, ग्रस्त है और इसका हूास अनिवार्य है, एक श्रन्तव् ष्टा की तरह, इसका मासिक चित्रांकन करने में वे सफल हुए । सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला' (सन् १८६६) छायावाद-युग के सबसे अ्रधिक सशक्त और भ्रौढ़
प्रतिभा के कबि हें । भ्राचार्य रामचन्द्र शुक्ल “निराला' जी के प्रशंसक नहीं थे, श्रौर उनके समय तक हिन्दी-प्रालोचकों की ओर से “निराला का विरोध भी बदस्तूर चल ही रहा था, किन्तु फिर भी शुक्ल जी ने यह दिखाते हुए कि “संगीत को काव्य के और काव्य को संगीत के ग्रधिक निकट लाने का सबसे श्रधिक प्रयास निराला जी ने किया है,” यह भी स्वीकार किया कि “बहु-बस्तु- स्पशिनी प्रतिभा निराल। जी में है ।” स्मरण रहे कि “छावावाद' के प्रति शुक्ल जी का यहो प्राक्षेप था कि इस प्रवृत्ति के कारण “नाना श्रयंभूमियों पर काव्य का प्रसार रुक-सा गया” है। श्नतः निराला के सम्बन्ध में अपनी ही मान्यता का खंडन करके शुक्ल जी ने एक वस्तुन्मुखी ;प्रालोचक- दृष्टि का परिचय दिया। किस्तु इससे निराला जी की काव्य-प्रतिभा की महानता ही भ्रधिक प्रमा- णखित होती है । “निराला' इस बीच हिन्दी के उपेक्षित कबि नहीं रहे, सब ने एक स्वर से उन्हें महा- कवि मान लिया है। लेकित सन्, ३५-३६ तक जिस तरह बिना समक्े-बुझे निराला जी पर चतुर्दिक से प्रहार किये जाते थे, उसी तरह बिना सम*रे-बुके भ्रब उन्हें 'महाप्राण', 'महामानव' और “महाकवि' घोषित करके अंब-भक्ति और अंब-स्तुति से जेसे उस पुर्व-अयराघ का प्रायश्चित किया जाता है । हिस्दी के आलोचक “निराला' की कविता का ठीक-ठीक मूल्यांकत न तब करते थे, न ञ्रब करते हें । जीवन में इतने बिकट (और हिन्दी के लिए लज्जास्पद) संघर्ष के बाद “निराला' जी को स्वीकृति, यश और मान चाहे भ्रव मिल रहा हो, लेकिन दुर्भाग्य से उनके समूचे काव्य का पूबंग्रह-रहित निष्पक्ष और वस्तुपरक मूल्यांकन होना अभी बाक़ी है। डा० रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक “निराला' में, तथा पण्डित नन््ददुलारे बाजपेयी और दो-एक आलोचकों ने भ्रपने निबंधों में निराला जी को कविता को समभने-समम्राने का प्रयत्न किया है, लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। सबसे पहले उनको कविता का मूल्यांकन महाकवि पंत ने श्रपती कविता “अनामिका के कवि श्री सूयंकान्त त्रिपाठी के प्रति' में किया था, जो मेरी दृष्टि में आज भी अन्य सभी विवेचनों से अधिक वस्तुपरक और गंभीर है श्लोर 'निराला' जी को कविता के वास्तविक सोन््दर्य, भ्रर्थ-गौरव झौर महिमा का सही उद्घाटन करता है ।
“बुंद-बंध शव तोड़, फोड़कर पर्वत कारा
अचल रूढ़ियों की, कवि, तेरी कविता धारा
मुक्त, अबाघ, अभंग, रजत निर्कर सी निःस्त,--
गलित ललित आलोक राशि, चिर अकलुष अविजित !
स्कटिक शिलाओं से तूने वाणी का मन्दिर ॥ शिल्पि, बनाया, - ज्योति-कलश निज यश का घर चिर |
६ काव्य-धारय
शिलीभूल सोन्दर्य, ज्ञान, आनन्द अनश्वर शब्द-शब्द में तेरे उज्ज्जल जड़ित हिम शिखर | शुअ कल्पना की उड़ान, भव भास्वर कलरव, हंस, अंश वाणी के, तेरी प्रतिभा नित नव, जीवन के कर्दम से अमलिन मानस सरक्षिज शोभित तेरा, करद शारदा का आसन निज | अमृत-पुत्र कवि, यशः काय तव जरा मरणजित, स्वयं भारती से तेरी छत्तंत्री भ्रंकति ।” . (पंत : युगवारणी)
पंत जी की कविता में निराला जी की कविता के उन सभी विशिष्ट तत्त्वों की ओर संकेत मिल जाता है, जिनका सम्यक् उद्घाटन उनकी “बहु-वस्तुस्पशिनी' कविताश्रों की श्रपेक्षा में रखकर विशद्-रूप सें होना श्रभी शेष है। इस संक्षिप्त विवरण में यह कार्य सम्भव नहीं है । यहाँ केवल निराला की कविता के विकास की रूप-रेखा ही अंकित की जा सकती है ।
जूही की कली' निराला जी की प्रारम्भिक कविताओं में से है। सन् १६१६ में (जब निराला जो केवल २० वर्ष के थे) इस कविता की रचना हुई, किन्तु यह प्रथम. बार प्रकाशित हुई- खन् १६२३ में 'मतवाला' के अ्रठारहवें अंक में । मतवाला-काल की उनकी कुछ कविताएँ कलकत्ते से प्रकाशित होने वाले संग्रह 'अनामिका' में झा गई थीं, लेकिन ठीक से उनको रचनाओं का प्रका- धन सन् १६२६ से ही शुरू हुआ, जब उनका “परिमल' प्रकाश में झ्राया । पंत के 'पल्लव' की तरह 'वरिमल' की कविताएँ भी छायावाद के उत्कर्ष-काल की प्रतिनिधि रचनाएँ हें ।
अचल रूढ़ियों की पर्वंत-कारा फोड़कर मुक्त, अ्रबाध' निर्भर-सी बहने वाली निराला की कविता-धारा का महत्त्व क्षण-स्थायी ही होता यदि यह विद्रोह भ्रसंयत और उच्छ खल होकर केवल विचित्र काव्य-प्रयोगों, उक्ति-चमत्कारों भ्रौर छिछले व्यंग और वचन-भंगिमा के श्रात्म-प्रदर्शन में लग जाता, जंसा कि रुढ़ि तोड़ने का उपक्रम करने वाले वरंमान प्रथोगवादी कवियों की बचकानी छुकबन्दियों से. प्रमारित है। प्रत्युत छायावादी कवियों के विद्रोह ने सामान्यतः, और निराला के घिद्रोह ने बिशेषतः, एक उच्चतर नेतिकता और काव्यादर्श की स्थापना में अ्रपने को प्रकट किया । 'परिमल' की कविताश्रों में व्यक्त कवि का संघ, उसका उदात्त श्नन्तःस्वर, करुखा से सहज द्रवित हृदय की विज्ञालता, भ्रन्याय श्रौर उत्पीड़न के विरुद्ध उसका मानवोछित दर्प एक शक्तिशाली व्यक्तित्व का सूचक है। भावों के सुक्ष्म-सौदर्य, दाशंनिक यहराई, श्रर्थ की गम्भीरता, श्रभिव्यंजना की प्रोढ़ृता ओर वस्तु की विविधता के नाते 'परिमल' की कविताएँ उस समथ तक के छायावादी काव्य-साहित्य में बेजोड़ थीं। “जूही की कलौ', 'पंचवटी' झौर “जाग्रति में मुक्षित' श्लादि प्रेम भर सौंदर्य के सरस कल्पना-चिन्र भ्रपनी सोन्दर्य-दृप्त श्रावेश्मयी भाषा श्रौर सूक्ष्मतत्ता के लिए प्रसिद्ध हैं। 'परिमल' सें निराला के छे बादल-गीत हैं, जिनमें वाबल की अलग-अलग कल्पनाएँ हें । “विधवा' में इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-सी?, 'काल-तारडव की स्मृति-रेखा? श्रौर “व्यथा की भूली हुई कथा?-सी भारतीय विधवा का करुण चित्र है। झ्रागे 'भिक्षुक' का कारुणिक चित्र कलेजे के दो टूक” करने में समर्थ है। इनके भ्रतिरिष्त श्लौर अ्रनेक कविताएँ हे जिनमें प्रतीक-व्यंजना द्वारा निराला ने श्रत्याचार पीड़ित, दलित जनों के प्रति झ्पने हृदय की करुणा उडेली है ! उनका प्रसिद्ध भक्षति-गीत “भर देते हो' झ्पने झाराध्य या प्रेमी की स्नेहमयो करुखा के प्रति एक सरल हृदय की
हिन्दी -कविता का विकास २७
निर्ष्याज आस्या से परिपूर्ण है, भ्रौर हृदय में एक सघन कृतज्ञता का भाव जगाता है। इनके भ्रति- रिक्त परिमल फो कुछ कविताएँ शुद्ध छायाबाद की हैं, जिनमें अज्ञात से मिलने की कामना व्यक्त हुई है । कुछ पर स्वामी विवेकानन्द के रहस्यवाद का प्रभाव है । कुछ कविताप्रों में प्रतीत इतिहास की स्मृति दिलाने वाले चित्र हें; तो कुछ में प्रलयंकर शिव के ताण्डव नृत्य का गायन कर श्यूंगार से विरक्ति झ्लोर सामाजिक वेषम्य को मिटाने वाली ध्वंसलीला के प्रति श्राग्रह प्रकट किया गया है । कुछ में हिन्दू पुनर्जागरणा की भावना को उद्बुद्ध किया गया है झश्लौर कुछ में पौराणिक जीवन के चित्र अंकित किए गये हें । कुल मिलाकर “परिमल' में छायावाद की अश्रनेक-मुखी प्रवृत्तियों की उदात्त ऋलक मिलती है। राष्ट्रीय चेतना की सूक्ष्म-प्रनुभूतिमयी व्यंजना जितने गम्भीर और प्रोढ़ स्वरों में 'परिमल' में हुई उतनी उस समय तक छायावाद के किसी श्रन्य कबि की वाणी में नहीं हो पायो । 'परिमल' की कविताझों से सचमुच 'सम्ची जाति के मुक्ति-प्रयास' का पता चलता है ।
शथरिमल' के बाद “गीतिका' आई और “गीतिका' के बाद अनाभिका' । “'गीतिका' के छोडे- छोटे गीतों में भी 'परिमल' का-सा हो वेविध्य है, एक ही भाव की, विविध स्थितियों में रख कर आवृत्ति नहीं है । भावों को ऐसी सुसम्बद्ता और कमनीयता, मानवीय भावनाओं की उदात्त भ्रभिव्यक्ति श्रन्यत्र दुर्लभ है । किन्तु गीतिका के भीत उतने लोक-प्रिय न हो सके, इसलिए नहीं कि उनमें प्रेषणीयता का श्रभाव है, बल्कि इसलिए कि “निराला' ने इन गीतों के रूप में एक-एक बूंद में सागर भरना चाहा है । भाव-सररणि सरल और एकसूत्रीय भी नहीं है, बल्कि उनमें भ्रक्सर एक नाटकीय ढंग से विपरीत और विषम भावों को संइिलिष्ट समन्विति की गई है। उनका नाद-सोन्दर्य भो नवीन है जो शास्त्रीय या लोक-संगीत में पूरी तरह नहीं समाता। एक-एक गीत को बार-बार पढ़ने या गाने से ही उसके भाव और श्रर्थ के शतदल एक-एक कर खुलते हें । किन्तु अनामिका' ( सन् १६३७ ) के गीतों ओर कविताश्रों में निराला की प्रगल्भ कल्पना को पुनः मुक्त उड़ने का झ्रवकाश मिला । “झनासिका' उनका प्रतिनिधि काव्य-ग्रन्थ है, जिसमें उनकी कविता का प्रोौढ़तम विकास दिखाई देता है ।
छायावादी कवियों ने स्त्री और पुरुष के प्रेम की जो कल्पना की है वह रीतिकालीन श्वूंगारी कवियों की काम-क्रीड़ा की वस्तु और इधर के भोगवादियों झ्र।र प्रयोगवादियों की जेविक स्तर पर उतर कर स्त्री को मात्र शारीरिक वासना-पूत्ति का साधन समझने वाली अ्रसामाजिक कल्पनाओों से भिन्न है। साथ ही भक्त और अध्यात्मवादी कवियों की तरह छायाबादी कवियों ने नारी को न सहज भ्रपावन' माता और न ॒प्रगतिवादियों की तरह क्रान्ति-पय में बाबक समझ कर उसे सन््देह की दृष्टि से ही देखा। छायावादियों ने (निराला, पन््त, श्रताद, महादेवी झादि ने) नारी-पुरुष प्रेम को इन सभी रूढ़ियों या एकांगी दृष्टियों से मुक्त करके एक सहज मानवीय आधार पर स्थापित करना चाहा, जिस में एक-दूसरे का भ्राकर्षण, एक-दूसरे के प्रति उत्सर्ग और समर्पित होने की सच्ची हादिक भावना ही उनके मुक्त-प्रेम की कसौटी हो, न कि रूढ़ि- बन्धन, समाज के भ्रर्थ-सम्बन्ध या मात्र शारीरिक वासना । प्रेन की इस उदात्त और संस्कृत कल्पना को, जिसमें नारी के व्यक्तित्व के पूरे गोरव को समान भाव से स्वीकार किया गया था, छुछ लोगों ने बायवी प्रेम या भ्रशरीरी वासता का नाम दिया, किसी ने इसे फल्पित झौर क्षयी रोमान्स कहा । इसके नव-संस्क्रृति-विधायक रूप को कम लोगों ने ही पहचाना, यद्यपि इस युग के नये समाज-सम्बन्धों में छायावादी कविता द्वारा निर्मित लये और उच्चतर मानव-मूल्यों को स्वीकृति स्वयं बिकास-तर्क से होने लगी थी । बाद में प्रगतिवादियों ने या प्रयोगबादियों ने नारी-समस्या के भ्रत्नि जो एकांगी
श्र काव्य-धारा
दृष्टिकोण श्रयनाये, वे श्राज की सुसंस्क्ृत भ्राधुनिक नारी को मान्य नहीं हैं। न वह जीवन के संघर्य॑ में बाधक समझी जाना पसन्द करती है और न जेबिक श्राधार पर, भावनारहित शारीरिक वासना की पूर्ति का मात्र साधन हो जाना चाहती है। वह जीवन के हर क्षेत्र में पृर्व की समकक्षिनी बनने की श्राकांक्षी है, किसी की वासना-तृप्ति का साधन न बनकर मुक्त-हुदय से श्रपने हुदय का प्रेम देना और पश्ना चाहती है । यह प्रेम ही नारी-पुरुष-सम्बन्ध की उच्चतर नेतिक मर्यादा है, युगल-प्रेमियों के संयम भ्रौर सामाजिक दायित्व श्र स्वामित्व की कसौटी है । दलित वर्ग के प्रति सहज करुणा के भाव की तरह ही नारी के प्रति छायावादी कवियों का यह समानता का भाव भी प्रगतिशील श्रौर नई सांस्कृतिक चेतना का छोतक है ।
_“निराला' जी की कविता में श्रौर विशेषकर “अनामिका' में इस सांस्कृतिक चेतना का भव्य रूप देखने को मिलता है। 'अनामिका' की पहली कविता “प्रेयसी' में ही यह प्रगट है । इसलिए सम्राट एडवर्ड भ्रष्टम के प्रति' में उन्होंने प्रेम के लिए इतने बेड़े साम्राज्य को त्याग देने वाले एड- वर्ड भ्रष्टम को बधाई दी है; क्योंकि “आलिंगित तुम से हुईं सभ्यता यह नूतन !?? और अनेक _ कविताओं में निराला जी ने नारी पुरुष प्रेम को उदात्त श्रभिव्यक्ति दी है। इनके श्रतिरिक्त “अना- मिका' में 'तोड़ती पत्थर', 'वे किसान की नई बहू की आ्ाँखें', 'बादल गरजो' “तोड़ो-तोड़ो, तोड़ो कारा' श्रादि कविताएँ एक नई प्रगतिशील चेतना की सूचना देती हें। 'सरोज-स्मृति' एक लम्बा 'शोक- गीत' (एलेजी ) है, जो उन्होंने श्रपनी पुत्नी सरोज की स्मृति में लिखा है । कुछ श्रालोचकों का मत है कि विश्व-साहित्य में इतनी गहन-वेदना श्ौर तीखे व्यंग से युक्त शोकगीत की श्रभी तक रचना नहीं हुई । भ्रपने व्यक्तिगत दुख से ऊपर उठने की चेष्टा 'सरोज-स्मृति' में हृदय को विदीर्ण करने वाला मार्भिक उद्गार बनकर फूट पड़ी है--दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ, आज जो नहीं कही ।? “निराला जी की काव्य साधना वस्तुतः इस व्यक्तीकरण की महत् चेष्टा की आदि से श्रन्त तक प्रमाण है । घोर निराशा छर अवसाद की श्रनुभृतियाँ बरबस दबाने पर भी यद्यपि कहीं- कहीं फूठ पड़ती हैं, जेसे, "जीवन चिरकालिक हूदन?, या “में अफ्रेज़ा / देखता हूँ, आ रही मेरे दिवस की सांध्य वेला? या दिख चुका जो-जो आये थे सब चले गये, मेरे ग्रिय सब भले गये, श्रादि कविताओं में; लेकिन हताश अ्रवस्था में भी उनकी प्रुरुष तेजस्विता भ्रपना श्रात्म-गौरव नहीं खो देती, और इस प्रकार वे पाठक में जीवन-संघर्षों के प्रति स्वाभिमान का भाव ही जगाते हें। अनामिका' और श्रगले संग्रहों के ऐसे गीतों को व्यक्तिवाद का भ्रसामाजिक रूप नहीं कह सकते, क्योंकि पीड़ा बिना भेले ही, संघर्ष में बिना टूठे ही पीड़ा और संघर्ष से पलायन करने वाली प्रवृत्ति उनमें नहीं है, बल्कि एक ऐसे तेज:पुंज व्यक्ति की सहज श्रनुभूति का गम्भीर, कचोटनेवाला बेदन है जो इतना कुछ भेल कर भी नतशिर नहीं है। 'अनतासिका' में ही निराला जी की प्रबन्ध-कबिता “राम की शक्ति-पूजा' छपी है। इतने छोटे झ्राकार-प्रकार का महाकाव्य निराला जी. की प्रतिभा ही रच सकती थी । “राम की शक्ति-पूजा' बीज रूप में एक महाकाव्य ही है, क्योंकि इतने संक्षेप में, और राम-कथा के एक प्रसंग को लेकर ही, उन्होंने मानव-हृदय की विविध स्थितियों भर भावनाश्रों का सम्पूर्ण चित्रण-सा कर दिया है। 'अनामिका' के बाद “तुलसीदास' में प्रबन्थ-काव्य रचने को इस झ्रसाधारण सामर्थ्य का और भी विकास हुआ है । “तुलसीदास' की रचना के बाद निराला जो ने नया मोड़ लिया । 'कुक् रमुत्ता', अरखिमा', “बेला', 'नये पत्ते' और “अरंना' में निराला जी ने प्रगति- शील विचारधारा के नये वस्तृन्मुखी प्रभाव ग्रहण किये, छायावादी काव्याभरण उतार कर श्रधिक सरल और मुहावरेदार भाषा का प्रयोग किया । “जमीदार की बनी, महाजन धनी हुए हैं; जय
हिन्दी-कविता का विकास २६
$ के मूर्त पिशाच-बूतेगण गनी हुए है |”? जैसी पंक्तियों में समाज के वर्ग-संघर्ष कौ खुली ऋाँकी $॒ है। इस बीच निराला जो का सानसिक स्वास्थ्य गिरता गया, सम्भवतः बाह्य भ्रभावों की चेतना और आरात्म-वेदता के गरल को स्वयं पीकर केवल अमृत-दान करने के श्रान्तरिक संघर्ष ने ही उन्हें ._ झस्वस्थ बनाया है, क्योंकि निराला जी की प्रत्येक कविता से लगता है, जैसे भीतर श्रभिव्यक्ति पाने के लिए भावों और प्रनुभूतियों का पारावार उमड़ रहा है, जिसे बाँध तोड़ कर प्लावन करने से . कवि को बरवस यासना पड़ रहा है। भ्पनी कल्पना को कु्रेद-क्रेद कर निरर्थक, फालतू या श्रलं- . क्वारी ज्ञाब्दों से उतको कविता का भवतर निर्मित नहीं हुआ, बल्कि लगता है जैसे किसी बिपुल-राशि मं से उन्हें ग्रपती श्राववयकतानुसार केवल एक स्वल्प-राशि को ही चुनने के लिए बाध्य होना पड़ . रहा है--संयम भ्रौर चयन का यह प्रयास उनकी शैली से भी प्रकट है। इसीलिए उनकी कविताओं में ध्वनित प्रर्थ कोरे भ्रभिधार्थ से कहीं भ्रधिक गसम्भीर और मर्मभेदी हें। उनको श्रात्म-निष्ठ और . सम्ताज-तिष्ठ, रहस्यात्मक श्रौर समाजोन्न्मुखी प्रवृत्तियाँ मानवताबोधिनी एक ही समंजस श्रनुभूति का प्रकाश हैं । 'अनाभिका' के पश्चात् की कविताओ्रों में उनका समाज-चिन्तन श्रथिक मुखर रहा है ।॥ यह उनकी कविता के उतार का काल है। उनमें पहले जेसा काव्य का उत्कर्ष नहीं रहा। निराला जी ने श्ञास्त्रोक्त ग्राधार पर कोई महाकाव्य नहीं रचा, किस्तु समग्र रूप से उनका काव्य इस युग की प्रवृत्तियों का एक महाकाव्य ही है, जिसमें राष्ट्रीय चेतना और हमारे सांस्कृतिक जीवन और चिन्तन को भी घाराएँ अभिव्यक्तित पा गई हैं। उनके भ्रलग-अलग गीत इस महाकाव्य के झ्रलग-अलग सर्ग हें । सुमित्रानन्दन पंत (सन् १६९०१--)--छायावादी-युग के तीसरे महाकवि हें। पंत जी सहाकवि तिराला की तरह संघषं-प्रिय, पौरुष-भावता के कवि नहीं हैं, बल्कि “मेरा मधुकर का-सा जीवन; कठिन कर्म है, कोमल हे मन !?? बाले प्रकृति और मनुष्य के सुन्दर रूप के कवि हैं । उनकी कविता में इस सौन्दय्य-प्रियता श्रौर स्निग्थ कोमलता का ही रस प्रवाहित है । प्रकृति के उग्र रूप या मनुष्य-स्वभाव की क्षुद्रताओं यां सामाजिक जीवन की कुरूपताओं की शोर उनका मन सहज शभ्राकर्षित नहीं होता, यद्यपि प्रकृति, मतुष्य और समाज के ऐसे चित्र भी उन्होंने अंकित किए हैं । प्रकृति को पंत जी ने अनेक रूपों में चित्रित किया है। प्रकृति के रूप-चित्रण के . साथ-साथ, उन्होंने उसे ग्रपनी भावनाओं के सौन्दर्य में रंग कर ऐन्द्रिकता भी प्रदान की है । कभी . प्रकृति को नारी रूप में देखा है और अपनी किशोरावस्था में प्रकृति से पूर्ण तादात्म्य का अ्रनुभव ._ क्र स्वयं झपने को भी नारी-रूप में अंकित किया है। उनकी इस भावना को 'स्त्रेण' और 'अस्वा- भाविक' कह कर कुछ भ्आालोचकों ने पंत जी पर भट्द श्रारोप भी किए, मानो पुरुष में नारी-सुलभ कोमल भावना कोई अपराध हो । पंत जी का रचनाकाल सन् १६१८ ई० से शुरू होता है, जब वे केवल सोलह-सत्रह बर्ष के थे । उनकी प्रारम्भिक रचनाएँ “वीणा।' में संग्रहीत हैं । पंत जी ,की भ्रप्नस्तुत रूपों का मृत्त-विधान करने वाली लाक्षणिक शैली का निखार इन प्रारंभिक रचनाझ्रों में भी स्पष्ट है। साथ ही, प्रभी बिश्व-चिन्तन का प्राग्रह नहीं है, प्रकृति और मानव-ज्ोवन के प्रति एक कंशोर जिज्ञासा श्लौर रहस्य-भावन। की ही प्रधानता है, यद्यपि स्वामी विवेकातन्द, राम-तीर्य और रवीखनाथ के प्रभाव से विश्व-प्रेस का रुचिर राग” उनके सहज मानववादी हृदय को भ्राकधित करने लगा था। “'कोौन- कौन तुम परिहृत-वसना, म्लान मना, भू-पतिता-सी ? धूल धूसरित, मुक्त-कुन्तला, किसके चरणों की दासी !”” और “प्रथम रश्मि का आना रंगिणि ! तूने केंसे पहचाना ? कहाँ, कहाँ
३० काव्य-घारा
हे बाल-विहंगिन ! पाया तूने ये गाना !?? झ्रादि जिज्ञासु-हुृदय क्री कोमल-कल्पनाएँ “बीखा'-काल की ही हें । 'बीणा' की कविताओं में प्रकृति-प्रेम का उल्लास इतना प्रबल है कि कवि किसी बाल- जाल में भ्रपने लोचन उलभा देने के लिए तंयार नहीं है। लेकिन 'प्रन्थि' में पंत जी का यह किशोर उल्लास प्रसफल प्रेम की सघन बेदना में परिणत हो गया। 'ग्रन्थ' एक खंड-काव्य है, यद्यपि उसमें कहानी का विशेष महत्त्व नहीं है। भील में नाव उलठने पर एक युवक डूब कर बेहोश हो जाता है, मूर्छा टूटने पर देखता है कि अपनी जाँघ पर उसका सिर रखे एक युवती उसकी परिचर्या कर रही है। दोनों में प्रेम हो जाता है। समाज इस स्वेच्छाचार को रोकने के लिए उस युवती का किसी और से विवाह कर देता है। युवक का हृदय इस आधात से तिलमिला कर विषाद से भर जाता है । नारी-पुरुष के सहज और पुनीत प्रेम को समाज कितनी निर्ममता से कुचल देता है, इस खंड-रूपक की यही कहानी है । 'ग्रन्थि' में कंशोर-सुलभ भावना का प्रदेग भ्रवश्य है, लेकिन भाषा और भावों की भ्रभिव्यक्तित में पर्याप्त प्रौढ़ता है, जो उनकी श्रगली रचना “पललव' (सन् १६२७) में श्रपनी पूर्णता को पहुँची । 'पल्लव' की भूमिका का भी हिन्दी-काव्य के विकास में एक श्रात्यन्तिक स्थान है । इसमें पहली बार पंत जी ने नये काव्यादर्श के प्रतिमान स्थिर किये और काव्य-रूढ़ियों और प्राचीन सान्यताञ्रों पर श्राक्मण। किया। 'पललव' की कविताओं में दृश्य-जगत् के नाना सुन्दर रूपों का मृत्ते और मांसल चित्रण है और विविय भावों की श्रभिव्यंजना है। 'पल्लव' में पंत जी की 'बीणा'-कालीत प्राकृतिक अनुराग की भावना सौंदयं-प्रवधान हो गई है--'वी चि', “विलास' बदल, “नक्षत्र', 'मौत-निम्ंत्रण', 'आँसु', 'विश्व-वेणु', “उच्छवास' झ्रांदि इस सौंदर्यभयी कल्पना की श्रेष्ठ कविताएँ हैँ । उनकी प्रसिद्ध कविता “परिवर्तन! भी 'पल्लव' में संग्रहीत है ॥ “परिवतंन' में पंत जी की एक नई उपलब्धि के दर्शन हुए । लगता है जेसे उनका सौंदर्य-स्वप्न दूढ गया है झोर जगत् और जीवन के चिर परिवततेनशील रूप ने उनकी समस्त श्राशाश्रों-आ्राकांक्षाओं को भक- भोर दिया है । परिवतंन, प्रकृति और जीवन का शाइवत नियम है, लेकिन इस नियम को समभने की दार्शनिक दृष्टियाँ परस्पर विरोधी भी हो सकती हें---एक दृष्टि से परिवर्तन निष्क्रितता और निरुपायता और घोर भाग्यवादी नेराइय-भावना को जन्म दे सकता है, दूसरी दृष्टि से परिवतंन के नियम की चेतना रूढ़-रीतियों से प्रस्त मानव-समाज को बदल कर नये निर्माण की प्रेरणा दे सकती है। झ्राध्यात्मिक दर्शन पहली भावना को जन्म देता है तो वेज्ञानिक भौतिकवादी दृष्टि संसार को बदलने की प्रेरणा देती है । पंत जी ने जिस समय “परिवर्तन” की रचना की उस समय उन्त पर झ्ाध्यात्मिक दर्शन, विशेषकर उपनिषदों का प्रभाव था, इसलिए उन्होंने “निष्ठर' और “दुर्जेय विश्वजित्' परिवतंन को एक ऐसे उग्र और विराद रूप में देखा, जिसके श्रागे मनुष्य की इच्छा झनिच्छा, सुख-दुख, जीवन-मरण का कोई मूल्य नहीं है । 'परिवर्तत) की यह कल्पना किसी अन्य कवि में नियतिवाद श्र निराशावाद के श्रभावात्मक (नेगेटिव) दृष्टिकोण को उभारती, लेकिन पंत का सोंदर्यानुरागी संवेदनशील मन सानव-प्रेम से द्रवित हो उठा। '“गुंजन' की कविताओं में उनकी कल्पना श्रात्म-चिन्तन श्रौर लोक-कल्याण की भूमियों पर विचरण करती हुई सुख-दुःख में समत्व स्थापित करने की श्रोर उन्मुख हुई । श्राध्यात्मिक दर्शन का प्रभाव यहाँ भी प्रबल है, जिसके कारण सुख-दुःख की नित्यता को स्वीकार करके उनमें सामंजस्य स्थापित करने की आादशंवादी कामना है। लेकिन जीवन के हर्ष-विसर्षों और उच्चादर्शों के प्रेमी कवि का सन इस निष्कियता- बादी समन्वय से सन्तुष्ट नहीं हुआ-“लगता अपूर्य मानव-जीवन, में इच्छा से उन््मन-उन्मन |? पंत जो स्वभावत:ः संघर्ष-प्रिय या निराज्ञावादी व्यक्त नहीं, जैसा कि उन्होंने स्वयं झपनी कबिता
हिन्दी-कबिता का विकास ३१
के विकास को समझाते हुए “झराथुनिक कवि', भाग २ की भूमिका में कहा है। इसीलिए “गुंजन' के गीतों में ही उनके मानवता-प्रेमी दृष्टिकोण का बह रूप गोचर होने लगता है जिस में वे “वर्तमान समाज को कुरूपताप्रों से कट कर भावी समाज कौ कल्पना' श्रौर कामना करते दीखते हें। ध्रृंजन के बाद को कविताओं में मानव-जीवन को संभावनाझ्रों के प्रति भ्रास्थाशील कवि की कामनाएं विविधि रूप-चित्रों के द्वारा व्यक्त हुई हैं । भ्रपने व्यक्तिगत सुख-दुख को वाणी न देकर प्रगतिशील मानवता की प्राकांक्षाप्रों को उन्होंने बार-बार प्रार्थना के रूप में मुखरित किया है । “नव छवि, नकरंग, नव मधु से मुकुलित पुलक्ित हो जीवन”? निशचय ही संघर्ष-प्रिय निराला या निराशावादी महादेवी या बच्चन जेंसी हादिकता पंत के काव्य में नहीं मिलती । 'पललब' के बाद उनका जग-चिन्तन उन्हें व्यापक कल्याण को भावना मं ही सत्य और सौन्दर्य की खोज करने को प्रेरित करता रहा है, जिससे उनके बिचारों की दाहनिक १८5-भूमि चाहे उपनिषदों का अ्रद्वंतवाद हो या सास का दन्द्वात्मक भौतिकवाद या गांधी झौर झरविन्द का दर्शन, उनको सहानुभूतियाँ बौद्धिक धरातल की ही अ्रधिक रही हें। “गुंजन' में उन्होंने यह झ्राग्रह प्रकट भी किया था--तुन्दर विश्वासों से ही बनता रे यह सुखमय जीवन ॥' हिल््दी के भ्रतेक विद्वान और भाव-प्रवण झ्रालोचकों को पंत जी की कविता का यह नया मोड़, जो ध्युगास्त' , 'युगवाणी' और 'ग्राम्या' में ग्रौर भ्रधिक सुस्पष्ट होता गया, रुचिकर नहीं लगा । उन्हें श्वल्लव' की कविताओं को प्रलंकार-सज्जित, ऐन्द्रिक रूप-चित्रों का निर्माण करने वाली सोन््दयं- कल्पना के मुक़ाबले में लोक-मंगल की भावना से प्रेरित, दलित-शोषित मानवता के प्रति बोद्धिक सहानुभूति व्यक्त करने वाली कविताएं नीरस लगीं । पंत जी ने भ्रपनी सक़ाई में कहा कि “बोद्धि- कता भरी हादिकता का ही एक रूप है, वह हृदय की कृपणता से नहीं आती ।” और “युगान्त', श्युगवाणी' और “ग्राम्या' को कबिताएं सचमुच हिन्दी-काव्य के लिए एक नए पय का निर्देश करतो हैं, जिलमें यद्यपि 'पल्लव' जेसी मांसलता नहीं, लेकिन जीवन के मूत्तं-चित्रों की भी कमी नहीं है । ._ किन्तु लगता है कि पंत जी के आलोचकों का भय ही ठीक निकला, क्योंकि 'ग्राम्या' के बाद को कविताओं में मनुष्य के भावी विकास की भ्रादर्श-कल्पनाएँ, जीवन के व्यापक सत्य की उद्भाबनाएँ . और बाह्य और अन््तर्जोबन के समन्वय की दार्शनिक विचारणाएँ बोद्धिक चिन्तन के अतिशय श्रारोप के कारण निरी श्रमूर्त (एब्सट्रंक्ट) हो गयी हें। 'प्राम्या' के बाद का पंत-काव्य छायावादी कबिता- . डॉली में रचा पंत-दर्शंन बनता गया है । स्वर की उदात्तता, भावनाओं की मानवीयता भर भाषा * को सुकुमारता के कारण इन रचनाओं को कविता चाहे कहलें, किन्तु वास्तव में वे दाशंनिक रचनाएँ हैं । कल्पना और काव्याभरण तो पंत के दाशंनिक चिन्तन को श्रभिव्यक्ति देने के उपकरण मात्र न् ॥ इसीलिए भ्रव झ्रालोचक 'ग्रास्या' से बाद की रचनाओं के काव्यगत सौन्दर्य की विवेचना में न पड़कर पंत के समन्वयवादी दृष्टिकोण या दर्शन का ही समर्यन या विरोब करने में प्रवृत्त होते हैं । 'युगवारी' के गीत-गद्य के बाद 'प्राम्या' में नए जीवन-बोध से प्रेरित कवि ने प्रामोरा-जोवन के प्रनेक मूर्त चित्र दिये थे और झाशा बेंघी थी कि उनके बौद्धिक चिन्तन ओर प्रात्म-मन््थय से लोक- मंगल की भावना में पूर्णतः पर्यकसलान करके युग-सत्य की उपलब्धि करली है, भ्रौर पंत में पुनः ॥ की समग्रता पेदा होगी और वे नए सत्य को काव्य की मूर्त भाषा में व्यक्त करेंगे । लेकिन की समग्रता पुनः न पैदा हो सको, क्योंकि जीवन को कुरूपता झोर विषमता के सामने पड़- सामान्य मनुष्य को प्रतिक्रिया उससे संघर्ष करने को या उससे भागकर निराश्षा के गर्त में डूबने
२ का उ्य-धारा
की होती है । पंत जी श्रपने साधु भ्रौर उदात्त चिन्तनशौल स्वभाव के कारण इन दोनों प्रकार कौ प्रतिक्रियाश्रों से निस्संग रहकर लोक-मंगल भ्रौर केवल बौद्धिक भावना-प्रक्रिया के तल पर नयी मानववादी संस्कृति के निर्माण-स्वप्न कल्पना में गूंथते रहे, और कवि से एक मनीषी चिन्तक बन गये । अपने स्वभाव की इस विशिष्टता का उन्होंने बार-बार उल्लेख किया है । दोनों महायुद्धों के बीच की पाइचात्य कविता में भी बोद्धिकता का ही प्राधान्य है, किन्तु यह बोद्धिकता भ्रतिबेयक्तिकता, श्रनास्था, निराशा और सानवद्रोह के रूप में मुख्यतः व्यक्त हुई है। एक भयंकर झौर रुग्ण स्नायविक विक्षोभ की प्रतिध्वनियों ने पाइचात्य कविता के अंतरंग जीवन-बोध, भाव श्र श्रनुभूति के ताने-बाने को विश्युंबल कर दिया था। पंत की सामाजिक बौद्धिकता इसके बिपरीत है, बह एक नए जीवतादर्श के प्रकाश से श्रालोकित है, किम्तु फिर भी इधर की कविता देखकर लगता है कि वे कविता में दाहं निक गाम्भीयं नहीं भर रहे, बल्कि दर्शन को काव्य-रूप देकर तरल बना रहे हैं। काव्य की दृष्टि से दोनों में भ्रन्तर है। 'युगवाणी' में पंत जी ने घोषणा की थी : “बन गये कलात्मक जगत के रूप नाम जीवन संघर्ष देता खुख लगता ललाम |?” इससे एक स्वाभाविक झाशा पैदा हुई थी कि आयास बहने वाली “युगवाणी' में युग का सम्पूर्ण वेदन प्रतिध्यनित होगा, क्योंकि कवि जीवन-संघर्ष में सुख का श्रनुभव करने लगा है। “आज मनुज को खोज निकालो”?, “मुक्त करो नारी को मानव”, “सत्य नहीं वह, जनता से जो नहीं प्राण सम्बन्धित!” श्रादि से लगा कि कवि सत्य, शिव, सुन्दर को वर्गों की सीमा में से निकाल कर ऊध्व॑मूल संस्कृति को श्रधोमल बनाने के लिए अपने कोमल सन के बावजूद शोषित मानबता के कठोर कर्ममय जीवन की वेदना श्लौर नये जीवन और नयी मानवीय संस्कृति के निर्माण की संघर्ष चेष्टाओ्रों का मूत्त, भावपुर्ण, चित्रों की भाषा में अंकन करेगा । 'युगवाणी: और 'ग्राम्या' की जीवप्रसु', 'चींटी', 'नारी', “दो लड़के', “नि३इ्चय', 'खोज', लेनदेन, “झंका में नीम, “ग्राम युवती, गग्रामभौ', “वे श्राँखें', 'धोबियों का नुत्य', 'स्वीट पी के प्रति', भारत माता, “बह बुड्ढा', “गंगा, मारों का नाच', “संध्या के बाद', 'रेखाचित्र', 'पतझर' झ्रादि प्रकृति और जीवन के मांसल चित्र अंकित करने वाली ऐसी कविताएं हैँ, जिन्होंने छायावादी कविता को एक नया प्रगतिशील काव्या- दर्श और जीवन-बोध दिया । सन् १९३८ और १६४५ के बीच इन कविताओं ने प्रगतिशील धारा को अ्रपना नया रूप-संस्कार करने की प्रेरणा दी। लेकिन 'प्राम्या' और “युगवाणी' में भी श्रमत्ते दाशनिक विचारों को उदात्त उद्गारों के रूप में व्यक्त करने वाली कविताओं की पर्थाप्त संख्या है, और झाग की कविताशों में तो यह प्रवृत्ति ही प्रधान हो उठी, झौर 'ग्राम्या' ने जिस झ्राशा को अंकुरित किया था, वह पल्लवित न हो सकी । इस विवेचन के बावजूद, पं त-काव्य को यदि समग्र रूप से देखें तो उनकी सुक्ष्म सौंदय्य- दृष्टि श्ौर सुकुमार उदात्त कल्पना हिन्दी काव्य-साहित्य में भ्रनन्य है। लोक-मंगल को साधना करने वाले इस महाकवि जैसी युग-जीवन की व्यापक झार्थिक सांस्कृतिक, समस्याप्रों को चेतना भी अन्यत्र दुलंभ है । जिस 'परिवर्तंन' को पहले उन्होंने एक भाग्यवादी को दृष्टि से देखा था, लोक-मंगल के लिए वे उसी की प्रावश्यकत्त का अनुभव करते हें |
हर डर ४४ जु ९
हिन्दी-कविता का विकास ३३
“यह सच है, जिस अथे-भित्ति पर विश्व-सभ्यता आज खड़ी हे
बाघक है वह जन-विकरास की--
उसमें आज अपेक्षित है व्यापक परिवर्तन
उसे पाटना है इस युग को
आत्म-त्याग से,
सहिष्णुता, शिक्षा-समत्व से
और नहीं तो, ँ
सत्यागह के शत-शत नि्भेय बलिदानों से ! जिससे भू का रक्त-क्षीण शोणित विषण्ण-मुख फ़िर प्रसन्त्र जीवन मांसल हो, युग शोमन हो ! उत्तर शरती अवश्य यंत्र-युग के विप्लव में स्ामरण्जस्य नया लायेगी जनमन बांछित
जिससे शिक्षा, संस्कृति, सामूहिक विकास का पथ ग्रशस्त हो पायेगा युग मानव के हित!” . ( उत्तर-शती रूपक से ) छायावाद-युग के इन तीन महाकवियों के श्रतिरिक्त इस धारा के अ्रन्य महत्त्वपूर्ण कबियों में महादेवी वर्मा, “बच्चन', “दिनकर', भगवतीचरण वर्मा, बालकृष्ण शर्मा “नवीन', उदयशंकर भट्ट, रामकुमार वर्मा, नरेन्द्र शर्मा, 'अंचल' के साथ-साथ जगन्नाथ प्रसाद “मिलिन्द', हरिकृष्ण "प्रेमी, मोहनलाल महतो “वियोगी', केदारनाथ मिश्र “प्रभात', गोपालरसह नेपालो, जानकोवल्लभ ज्ास्त्रो, . सुमित्राकुमारी सिन्हा, विद्यावती कोकिल, हंसकुमार तिवारी भ्रादि के नाम भी उल्लेखनोय हें । हम पहले कह चुके हें कि छायावादी कविता में भ्रनेक प्रवृत्तियाँ और श्रनेक दृष्टिकोस्ों की संइलिष्ट प्रभिव्यंजना हुई है । जिन तोन सहाकवियों का हमने ऊपर विवेचन क्रिया है उनकी कविता का भ्रन्तःस्वर यद्यपि सर्वत्र उदात्त है और उनकी चेष्टा सदा अ्रपने व्यक्तिगत सुख-दुख से ऊपर उठकर , समूची, जाति के सुख-दुख को भ्रभिव्यक्ति देने की शोर रही है, फिर भो उनके काव्य में एक-रसता . नहीं है, यद्यपि उल्लास भी है, मर्मान््तक वेदना भी है, बहिर्मुख भाव-चित्रण भी । साथ ही, ये तीनों .. महाकबवि सामन्ती मूल्यों के विरुद्ध युगानुकूल जीवन के व्यापक मान-मूल्य निर्धारित करने की ओर ... भी सतत् प्रयत्नशील रहे हें । किन्तु सन् १६३० के बाद ही छायावादी-काब्य में श्र भ्रनेक नयी . अ्रतिभाएँ मुखर हो उठीं, जिनमें भावों को गहराई भौर श्रावेग चाहे श्रधिक हो, किन्तु वृष्टि उतनो | व्यापक नहीं थी । भ्रपने व्यक्तिगत स्वभाव, जीवनानुभव और रुचि के झ्नुसार ये कवि छायावाद .. की प्रधानतः एक-एक प्रवृत्ति के गीतकार बनकर प्रागे बढ़े, जिससे उनको कविता में जहां एको-
३७ काव्य-धारा
न््मुखी और एक-सूत्रीय सघनता भ्रधिक है तो एक ही भाव की विभिन्न अवस्थाओ्रों श्रौर परिस्थि- तियों की श्रावृत्ति भी बहुत है श्रौर समग्र-रूप से उनकी काव्य-भूमि का दायरा संकीर्ण हो गया है । इस प्रकार स्वछन्दतावाद की परिणति बेयक्तिकता में होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, काव्य का उदात्त भ्रन्तःस्वर मन्द पड़ने लगता है श्रौर जीवन-मूल्यों का विघटन शुरू हो जाता है । यह ह्ास की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को सम्तग्न रूप में ही समझना चाहिए, श्रन्यथा, प्रत्येक कवि ने अंश रूप में हिन्दी-काव्य को नई देन दी है श्रौर उस सीमा तक उसका बिकास किया है॥ महादेवी वर्मा (१६९०७--) की कविता में वेयक्तिक अ्रनुभूति के तल पर सामनन््ती समाज के बन्धनों में ग्रस्त भारतीय नारी-जीवन की निबिड़ वेदना, पीड़ा श्रौर कहीं-कहीं सुक्ति-श्राकांक्षा व्यक्त हुई है। इसी कारण श्रतेक श्रालोचकों ने महादेवी जी को निराशावाद या पीड़ावाद की कवियित्री कहा है। स्वयं महादेवी जी ने लिखा है--“दुख मेरे निकट-जीवन का ऐसा काव्य है जो सारे संसार को एक-सूत्र में बाँध रखने की क्षमता रखता है। हमारे अ्रसंख्य सुख हमें चाहे मनुष्यता की पहली सीढ़ी तक भी न पहुँचा सकें, किन्तु हमारा एक बूंद भी जीवन को अ्रधिक उबंर बनाये बिना नहीं गिर सकता ।' * *विश्व-जीवन में भ्रपने जीवन को; विश्व-वेदना में अपनी बेदना को इस प्रकार मिला देना जिस प्रकार एक जल-बिन्दु समुद्र में मिल जाता है, कवि का मोक्ष है ।” इसी प्रसंग में उन्होंने पुनः कहा है--“मुझे दुख के दोनों ही रूप प्रिय हैं, एक वह जो मनुष्य के संवेदन- शील हृदय को सारे संसार से एक श्रविच्छिन्न बन्धन में बाँध देता है और दूसरा वह जो काल और सीमा के बन्धन में पड़े हुए श्रसाौम चेतन का ऋन््दन है । सहादेवी के गद्य में श्रपने संवेदनशील हृदय को सारे संसार से एक श्रविच्छिन्न बन्धन में बाँध देने वाले दुख (श्रात्मीयता, करुणा, सहानु- भूति) का रूप व्यक्त हुआ है तो उनकी कविताओं में काल ओर सीमा के बन्धत्त में पड़ हुए झसीम चेतन (नारी-जीवन के सामाजिक बन्धनों की चेतना) का ऋन्दन है ।' श्राध्यात्मिक दर्शन झौर विशेषकर बुद्ध की करुणा ने उनकी बेदता की श्रनुभूति को लोक-दृष्टि श्रौर उद्ात्त आधार दिया है। कुछ झ्ालोचक इस आ्ाध्यात्मिक दर्शन के कारण ही महादेवी की कविता को रहस्यवादी झोर लोकोत्तर सिद्ध करते श्राये हें, किन्तु यदि महादेवी जी के वक्तव्य को ही ठीक से परखा जाय तो उनको कविता में व्यक्त श्रसीस और श्रज्ञात की चाह और पीड़ा-वेदना का मोह एक “ओर वर्तमान समाज के रूढ़ि-बन्धनों में प्रस्त नारी-हृदय का चीत्कार है, तो दूसरी ओर पाठक में दुख की गहरी अनुभूति जगा कर इस विषमावस्था के प्रति चेतना (पीड़ित के प्रति आत्मीयता, करुणा झौर सौहाद भावना) उद्बुद्ध करने का सूक्ष्म सांस्कृतिक प्रयास है । जहाँ जिस समाज में वर्ग-भेद झोर अ्समानता हो; वहाँ श्रधिकार-वं चितों को उनका सामान्य दुख एकता के सूत्र में बाँधता है, यह एक ऐतिहासिक सत्य है । हमारे राष्ट्रीय जागरण की जिस साम्नाज्य-विरोधी श्ौर सामान्तवाद- विरोधी पृष्ठभूमि में छायावादी कविता का विकास हुआ, उसमें व्यक्तिगत दुख और बेदना के गीतों में भी सामाजिक ठुख और बेदना ही प्रतिध्वनित हुई है । इन गीतों -के उपस्ान और प्रतीक बेय- क्तिक नहों हैं, बल्कि लोक-चेतना में सहज प्रेषणीय बाह्म-प्रकृति श्रौर जीवन से लिए गये हें । महादेवी जो को विशेषता यह है कि छायावाद ने व्यक्ति ओर समाज की जिस व्यापक असन््तोष- भावना को श्रभिव्यक्तति दी उसमें उन्होंने भारतीय नारी के - असन्तोष, निराशा और आकांक्षा के स्वर को भी जोड़ दिया । अ्रपनी युग-युगान्तर से चली पाने वाली निगूढ़ व्यथा में भ्रारतोय नारी यदि चीत्कार कर उठती है, में नीर भरी दुख की बदली /? तो उसे इसका भी ऐहसास है कि वह रात के उर में दिवस की चाह का शर्? है। सहादेवी की कविताओं सें पीड़ा और बिरह
हिन्दी-कबिता का विकास १५ की स्थिति के प्रति एक निराशावादी की प्रासक्ति बार-बार व्यक्त हुई है, “मिलन का मत नाम
द ले में विरिह में चिर मिलन हूँ? या “तुम को पीड़ा में दूँ ढा, तुम में दृददँगी पीड़ा ।! साथ हो उन्होंने जीवन भ्लौर सौन्दर्य की भ्राकांक्षा भी भ्रनेकविधि में व्यक्त की है :---
“करण्टकों की सेज जिसकी आँधुओं का साज झुभग ( हँस उठ, उस प्रफुल्ल गुलाब ही-सा आज बीती रजनि, प्यारे जाग |? -' महादेवी जी के गीत भ्रपनी सुन्दर चित्रमय व्यंजना के कारण अनूठे है । रामकुमार वर्मा--- (सन् १६०५--) पर महादेवी वर्मा की तरह कबीर श्ौर दूसरे रहस्य-
वादी कवियों का प्रभाव है । उनकी रहस्य-चेतना में भी निराशा का स्वर तीव्र है। साथ ही भ्रज्ञात
झौर जिज्ञासा को भावना में कहों-कहीं एक बोद्धिक भ्रविश्वास भर सन्देह का है; जो जीवन के प्रति उस भ्रविश्वास की ही प्रतिध्वनि है जिसका पूरा विस्फोटक परवतों
क जदिशों रचनाधों में मिलता है--
हि उषे, बतला यह सीखा द्वात कहाँ ?
यदि)तेरा जीवन जीवन है तो फ़िर हे उच्छुवासः कहा ? अपने ही हूँ सने पर तुक को क्षणमर है विश्वास कहाँ ? समाजोन्मुखता का परित्याग कर जब्र व्यक्तिवाद भ्रात्म-निष्ठ हो जाता है; तब स्वयं श्रपने को सारे विश्व का केख्र मातकर चलने की प्रवुत्ति की अ्रनुगूंज सुनाई पड़ने लगती है :-- एक दीपक--किरण कछ हूँ धूमत्र जिसके क्रोढृ७ में हे उस्तअनबल का द्वाथ हैँ में नव अ्भा -लेकर . चला हूँ पर जलन: के साथ .ूँ में । सिद्धि पाकर भी तपस्या-- साधना का ज्वलित क्षण हूँ | ऐसे ही भ्रनेक सुन्दर गीतों में वर्मा जी ने भ्रपनी रहस्य-चेतना को व्यक्तिवाद, निराशा और सन््देह की भावनाओं में रंग कर प्रकृति श्लौर जीवत के शब्द-चित्र अंकित किये हैं। उनकी
कविता छायावादी शैलो झ्ौर काव्य-वस्तु से भ्रपने को मुक्त करके नहीं चली, यद्यपि उसमें इस
शैली के बन्धन कुछ ढीले पड़ते भ्रवश्य दिखाई देते हें । यह कार्य “बच्चन और “दिनकर' ने अपने-
अपने ढंग से किया, जिन्होंने भ्रपने व्यक्तिगत उद्गारों या लौकिक भावनाझ्रों को व्यक्त करने के लिए
रहस्य-कल्पना तथा किसी चिर भ्रज्ञात या सविशेष को उद्भावता या मध्यस्थता भ्रावश्यक नहां समझी ।
हरिवंशराय “बच्चन/-- (सन् १६०७-) हिन्दी में मधु के गीत लेकर भ्रवतीर्ण हुए । उनकी प्रारम्भिक कविताशों पर अंग्रेजों कविता श्लोर उमर खेयाम की रुबाइयों का प्रभाव स्पष्ट है । “बच्चन की कविता में स्वच्छुन्दतावादी व्यक्तिवाद ने एक नयी दिज्ञा पकड़ी । “प्रसाद, पंत, “निराला', महादेवी की कविता पर प्राचीन भारतीय प्राध्यात्म दर्शनों प्रौर रहस्यवाद का प्रभाव था, जिसके कारण उनको कविता में व्यक्तिगत सुख-दुख भौर सामाजिक सुख-दुख में समत्व
हा
३६ काव्य-धारा
स्थापित करते चलने की उदात्त-भावना निरन्तर क्रियाशील दीखती है। इससे उनकी कविता में एक ऐसी निस्संगता, निर्वेयक्तिकता, सात्विकता श्रौर मर्यादा है, जो जीवन के संघर्षों में फंसे लोगों को वायवी, भ्रशरीरी और काल्पनिक लगी |
कीइस प्रतिक्रिया हुई भ्रौर “बच्चन” ने मधु श्रौर यौवन के गीत गाने शुरू किये। “बच्चन को प्रारम्भिक रचनाओं में प्रबल जीवनाकांक्षा का उन्माद श्राग्रह है, 'है आज भरा जीवन मुरू में, है आज भरी मेरी गागर !” लेकिन उनका यह जीवनोल्लास भौर जग का हास-रुदन भूलकर मधुमय हो जाने का प्रात्म-केन्द्रित व्यक्तिवाद रूढ़िवादी समाज को रुचिकर नहीं लगा । “बच्चन' ने तब सामाजिक-विरोध के बीच, सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए श्रपने मधु-गीतों की सृष्टि की । 'कह रहा जय वासनामय हो रहा उद्गार मेरा /? या हैं कुपथ पर पाँव मेरे आज दुनिया की नजर में'--सामाजिक विरोध के प्रति कवि के उपालम्भ की सूचना देने वाली कविताएँ हैं । इनमें पुरानी सामाजिक मर्यादाश्रों, धर्म, लोकाचार श्रौर नेतिकता के विरुद्ध कवि का विद्रोह पूरे ज्ञोर से व्यक्त हुआ्ा है। पुरानी मान्यताओ्रों के प्रति यह प्रतिक्रिया श्रभावात्मक (नेगेटिव) या व्यक्तिवादी ही है, जिससे वह उनके स्थान पर, भोगवाद को छोड़कर, कोई नया जीवनादर्श स्थापित नहीं कर पाता । “लहरों का निमन्त्रणण' सुनकर वह सामने पड़े श्रम्बुधि में तेर कर उस पार जाने को तत्पर होता है क्योंकि 'कुछू विभा उस पार की इस पार लाना चाहता हूँ', किन्तु झन्त में इस अ्रभियान की कल्पना केवल व्यक्ति की एक उमंग, नई राह शौर पथ पर चलकर श्रपने व्यक्तित्व को प्रमारितत करने की श्राकांक्षा में ही सीसित होकर रह जाती है। उसके किसी ज्ञात लक्ष्य या परिणाम से कवि सरोकार नहीं रखता। कुछ भी हो “बच्चन' ने जिस दर्प और झहंभाव से समाज की मान्यताओं को चुनौती दी, वह सन् १९३५-४० के काल में देश के विषण्ण- मन युवकों को बहुत भायी। मर्यादाञ्नों को तोड़ना मात्र भी कभी जीवन की चरम सिद्धि-सी दिखाई देने लगती है, विशेषकर उस समय जब मर्यादाएँ भावी-विकास में बाधक बन रही हों | लेकिन कोरी प्रभावात्मक प्रतिक्रिया मनुष्य के उदात्त श्रन्तःस्वर को ही श्वनुदात्त नहीं बना देती, उसमें घोर निराशा और विफलता का भाव भी उत्पन्त करती है। “बच्चन! की कविताओं में वेयक्तिक भ्रहंकार-दर्प के साथ-साथ निराज्ञावाद के भाव भी प्रमुख हो उठे ।
'मधुकलश' की कविताश्रों में भी निराशा का स्वर छिपा नहीं है, स्वयं कवि ने इसकी सफाई दी है :--- “पूछता जय, हे निराशा से भरा क्यों यान मेरा!
मुस्करा कठिनाइयों आपत्तियों को दूर टाला, घेय॑ धर कर ,संकटों में
खूब अपने को सम्भाला, किन्तु जब ॒प्रकत पढ़ा आ शीशपर में सह न पाया जब उठा हो भार जीवन तब उठाया होठ * प्याला
हिन्दी-कविता का विकास ३७ व्यय कर दिन-रात निंदा
विश ने जिया थकाई, था बहाना एक मसन-+- बहलाव का मधुपान मेर। /? महादेवीं के कविता-संप्रहों में जेसी एक-सूत्रीय योजना मिलती है, 'बच्चन' के संग्रहों में भी वैसी हो योजना है, भ्रर्यात् एक-एक संग्रह के गीतों में एक ही जेसे भावों का उद्रेक करने वाले बाह्य झोर प्रास्तरिक-जीवत की स्थितियों झ्ौर प्रसंगों को लेकर गीत-रचना की गई हैं। निशा- लिसन्त्रण' में सायंकाल से लेकर प्रातःकाल तक के गौत हें, जिसमें कवि ने एक कल्पित साथी को लक्ष्य करके झ्पने हृदय में छाये शोक को सौ गौतों को श्यृंखला में बांचा है। “एकान्त-संगीत' में यह कल्पित-साथी भी बिछूड़ गया है और कवि के हृदय की वेदना भी भ्रषिक घनीभूत हो गई है । वह बाह्या-जगत् से झपने को भ्रलग करके स्वयं भ्पने में ही डूब गया है। “एकान्त-संगीत' के गीत स्वगत हें । कु “निश्ञा-निमन्त्ररण' झौर 'एकान्त-संगीत' के गीत 'मघुशाला' झौर “मघुकलश' की कविताप्रों की तरह ही लोक-प्रिय हुए । भ्रपनी वेदनासिक्त भावनाओं में रंग कर उन्होंने सरल बोल-चाल की भाषा में प्रकृति-दृश्यों भ्रौर भ्रपतो मनोदशाप्रों के जो मूर्त्त शब्द-चित्र अंकित किये वे हिन्दी-कविता में एक नई चीज़ ये। क्या तुम तूफ़ान-समझ प्राओगे?”, 'सन्ध्या-सिन्दूर लुटाती है, “यह पपीहे की रटन है? , अब मत मेरा निर्माण करो”, “तब रोक न पाया मैं आंयू”, "त्राहि-त्राहि कर उठता जीवन”, अब खंडहर भी टूट रहा है? श्रादि भ्रनेक गीत मूर्त चित्रांकन झोर गहरी हादिक बेदना के कारर प्रविस्मरसीय हें । छुछ गीतों में वेदतना इतनी घनीभूत है कि कवि ने जीवन का तिरस्कार भ्ौर उपहास भी किया है, किन्तु कुछ गीतों में उसका व्यक्तिवाद तिलमिलाकर पूरे सालवोचित दर्प से गरज उठा है, ज॑से “विष का स्वाद कताना होगा ।” 'क्षतशीश मगर नतशीरश नहीं?, प्रार्थना मत कर, मत कर, मत कर !? या “अग्नि-पथ ! अग्नि-पथ ! अग्नि-पथ /? यह महान् इश्य हे चल रहा मनुष्य है अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ / लथपथ ! लथपथ /! किन्तु 'बच्चन' के “झ्राकुल भ्रन्तर' तक के गीत मैंने गाक़र दुख अपनाये” की भावना के ही गीत हैं भौर उनमें जीवन के प्रति गहरा विक्षोभ, नेराइय भ्ौर भ्रविश्वास व्यक्त हुआ है। “चाँद _ सितारे मिलकर बोले” में इस दृष्टि से सुख-दुख को सांसारिक उपलब्धियों की क्षराभंगुरता का सा्भिक अंकन है । किन्तु 'सतरंगिनी' ओर “मिलन-यामिनी' की कविताप्रों में इस मर्मान्तक निराशा का स्वर पुनः झाशा भर उल्लास में परिणत होते दीखा है, उनका गीत 'नीड़ का निर्माण फ़िर फ़िर /” इस नये सोड़ का प्रतीक है ।
* बच्चन के गीतों ने हिन्दी-कविता का एक नया रूप-संस्कार किया । भाषा सरल, मुहावरे- वार और व्यक्तिगत वेदना की ग्रनुरूति से मूर्स और भाव-सिक्त हो उठी । काव्य-वस्तु का क्षेत्र यद्यपि सीमित हो गया लेकिन अ्रभिव्यक्तित में श्रथिक मांसलता और हादिकता भ्रा गई, जिसके कारण पअनुभूतियों का प्रेषण प्रधिक सहज बन गया। इस हूास-अ्रक्रिया के दोर में भी एक नया उठान-सा श्राया । जीवन के व्यापक प्रइनों से हटकर नये कवियों की एक पीढ़ी को थोढ़ी निःस्वप्न
भ्झ कांव्य-धारा
झौर निश्चान्त हो भ्रपने व्यक्तिगत दुखों को गौत-बद्ध करने लगी । व्यक्तिवादी धारा का यह ऐसा स्फ्रण था जिसके बाद काव्य-वस्तु, काव्य-भाषा, श्रनुभूति और श्रभिव्यंजना सभी क्षेत्रों में एक भयंकर विघटन अनिवार्य हो गया । यह गीत इस बात के प्रमाण हैं कि कवि श्रपनी व्यक्तिगत बेदना को मूत्त चित्रों की भाषा में श्रभिव्यक्ति देकर सामाजिक बता रहा है, इसीलिए पाठकों ने उनमें अपने दुखों को ही प्रतिबिम्बित होते देखा । लेंकिंन जीवन का यह अत्यन्त सीमित श्रौर एकांगी झ्राकलन ही था, इसीलिए जब इन गीतों की आवृत्ति एक फ़ैशन-सीं बन गयीं। तब जो प्रतिक्रिया हुई उसने हिन्दी-कविता को झनेक छोटी-छोटी धाराओं में बिखर कर श्रग्रसर होने को विवश कर दिया। इस प्रसंग में श्री भगवतीचरंण वर्मा, नरेख्र शर्मा भौर रामेश्वर शुक्ल “अंचल' के नाम भी उल्लेखनीय हैं। भगवतीचरण वर्मा (सन् १९४०३--) भी “बच्चन' को तरह छायावाद की रहेस््या त्मकता और श्राध्यात्मिकता को चुनौतीं देते हुए मंधु, उल्लास और यौवन के गीत गांतें आंगे बढ़े ॥ उन्होंने श्रपने योवन् श्रोर प्रेम की आ्राकांक्षाओं को किसी तात्विक चिन्तन या नेतिक अवगणुठन में छिपाकर उपस्थित करना उचित नहीं समझा । “बच्चन” की तरह उनकी कविता में भी लाक्षरिक व्यंजना या श्रप्रस्तुतों की योजना का अ्रभाव है। व्यंग और श्रतिशयोक्ति की सहायता से उन्होंने भी अभिधा में श्रपने भावों को सरल, किन्तु श्रांकर्बक ढंग से व्यक्त करना शुरू किया-- हम दीवानों की क्या बस्ती आज यहाँ रहे कल वहां रहे, मस्ती का आलम साथ चला हम धूल उड़ाते जहाँ चले |?? यह शआात्म-केन्द्रित 'मस्ती का आलम “मधुकण' झौर “प्रेम-संगीत' की . कविताओं तक हीं रहा। “मानव में वर्मा जी की दृष्टि प्रंगतिवाद से प्रभावित होकर संसार में फैले दुःख और उत्पी- डत की ओर गई। “कवि का स्वप्न! में मध् से मतवाले मधुवन में मंदन जेंसे सुन्दर युवक और रति जेसी सुन्दर युवती के मधुर-प्ररशय की कहानी लिखने के लिए तत्पर कवि ने स्वप्न-भंग का चित्र खींचा है-- “कवि - संहर्सा सिहरा, काप उठा सुन भूखे बच्चों का रोदन, पत्नी की पथराई आंखों में केन्द्रित था जय का क्रन्दन, गन्दे-से टूटे . कमरे में होता अभाव का था नंतन कवि खड़ा हो गया पागल-सा उसके उर में थी कोन जलन ?”? उनके कविता-संग्र ह 'मानव' में झभाव-पीड़ित मनुष्यों के प्रति सहानुभूति और करुणा से द्रवित भावना के भ्रनेक चित्र हें। उनकी कविता 'जा रही चली भेंसगाढ़ी, चूँ चररमरर, चू चरर- मरर? हमारे ग्रामजीवन के सनातन पिछड़ेपन की प्रतीक है। इस प्रकार 'मस्ती का आलम" छोड़कर वर्माजी प्रगतिशील भावनाश्रों को श्रभिव्यक्ति देने लगे । #उक्छि हा नरेन्द्र शर्मा (सन् १६१३--) की प्रारम्भिक कविताओं में मस्ती और उल्सोस की नहीं एक भावुक और कल्पनाशील युवक की प्रेम-यांचनाएँ और विरह-दग्ध हंदय की करुण स्मृतियाँ व्यक्त हुई हैं। नरेन्द्र शर्मा की कविताओं का स्वर और उसकी भाषा अनासक्त भोकता का स्वर या
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हिन्दी-कबिता का विकास ३६
उसको भाषा नहीं है :-''सुमुख्ि तुमको भूल जाना है असम्सव हे असम्भव /? बाद की कविताध्रों में प्रगतिवादी विचारबारा और श्रान्दोलत का श्रभाव भी काफ़ी स्पष्ट है, लेकिन उनकी भावुकता उन्हें प्रेम-गीत रचते के लिए बाध्य करती रहती है । नरेन्द्र शर्मा ही पहले कवि हें, जिल्होंने अ्रपने सत्र में बुद्धि और भावुकता के बीच चलने वाले-अन्तईन्द्र को निस्संकोच स्वीकार किया । “प्रवासी के गोत' को भूमिका में उन्होंते अपने हृदय को “क्षयी रोमांस के प्रति श्रासक्ति' का पश्चात्ताप-भरे शब्दों में उल्लेख किया । झागे चलकर “मिट्टी और फूल' की भूमिका में भी उन्होंने स्वीकार किया क्ि.“में मस्त को दुबंलताम्रों का कवि हूँ ।' हिन्दी काव्य-साहित्य के इतिहास में कवि द्वारा अभ्रपनी बुबंलताओ्रों की ऐसी प्रात्म-स्वीकृति एक नई चीज़ थी । इसमें कवि के युगद्रष्टा या खष्टा रूप के ग्रोरब की अ्रस्वीकृति है + यहाँ तक कि स्वयं भ्पने ही 'व्यक्तित्व' को भ्रस्वीकृति है। विचार और भावना के तल पर व्यक्तिवाद को परिणति “व्यक्तित्व” के तिरोभाव में ही होती है। श्रागे चलकर प्रयोगवादी धारा में कवि के “व्यक्तित्व झौर गरोरव का झोर भी बिलोप. हो गया। फरक़ सिर इतना-है कि जहां नरेन्द्र शार्मा ओर फिर “अंचल' में अपने सत्र को दु्बलताओं से लड़ने और मनुष्य की प्रगतिशील भावनाओं और अ्राकांक्षाओं को अ्रभिव्यक्ति देने को सजग चेब्टा दिखाई पड़ी, वहाँ प्रयोगवादियों में मन को दुबंलताप्रों को ही निरपेक्ष सत्य मानकर उनका ओरोचित्य लिद्ध करते को चेष्टा प्रथान हो उठी । नरेन्द्र दार्मा की जिन कविताप्रों में उनके मन का अन्तंन्द्र व्यक्त हुआ है।उन्तमें पर्याप्त सामिकता है: “उजड़ रहीं अनगिनत बस्तियों म्रन मेरी ही बस्ती क्या ?? किन्तु जिन कविताओं में उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुस्त-दुख से ऊपर उठकर प्रकृति-दृश्यों के भावना-चित्र अंकित किये हैं, वे भ्रत्यन्त मधुर और कोमल हैं । रामेश्वर शुक्ल “अंचल (सन् १६१५--) में इसके बिपरोत किसी गहरी अनुभूति या सूक्ष्म, कोमल भावना का प्रकाश नहीं है। उनको कविता में पहले क्ञा रीरिक वासला शोर लालसा की स्थूल, प्रावेगमग्री प्लोर भ्रतिशयोक्ति-पूर्ण भ्रभिव्यक्ति हुईं । भ्रव तक के छायावादी कवियों में नारी के प्रति एक मर्यादाशील समानता और आदर को भावनाएँ ही व्यक्त हुई थीं। उन्होंने नारों को सदा मानव्ों श्ौर प्रेयसी के रूप में ही देखा था, लेकिन अंचल ने नारी को केवल उपभोग्या स््ज्ो योनि के रूप में ही देखा । उनको वासनाजन्य तुष्णा, लालसा झौर प्यास की भावना बहुत ऊपरी तल की है-- “एक पल के ही दरत्त में जग्र उठी तृष्णा अघर में
छः जल रहा परितिप्त-अंग्रों में प्रिपासाकुल पुजारी ।”
.. उनके सारे वेदन-अन्तवेदन का पर्यंवस्तान 'रति-सुख' में हो होता है। 'मघूलिका', “प्रपराजिता' के गीतों में इसो वासता की आवृत्ति-विवृत्ति हुई है। बाद को “अंचल' ने भी अभ्रपनी “क्षयी रोमान्स के प्रति अवांछनीय भ्रासक्ति' को घिक््कारा और प्रगतिशील विचारों और भावनाझ्रों को भ्रभिव्यक्ति देने लगे । “किरण-वेला' “'लाल-चूनर' आदि में उत्को प्रगतिशील कविताएं संग्रहीत हैं, लेकिन यहाँ भी नारी के प्रति उनका दृष्टिकोश उतना ही संकोर्ण है ।
प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी ने व्यक्ति के सुख-दुल, उल्लास-निराश्ञा की प्रनुभूति-प्रवरण झौर विषय-प्रधान अभिव्यंजना करते हुए भी जिन नये म्रालब-मूल्यों को सुष्टि को थी, कविता का जित नयी अर्यंभूमियों पर प्रसार किया था और काब्य के भ्रन्त:स्व॒र. में : मानववादो उदात्तता को
जो गरिसा भर दी थी; अंचल तक प्राते-प्राते उन मानव-मूल्यों, भ्रय॑-मूमियों प्ोर भ्रन्तःस्वर की
उदात्तता का सम्पूर्ण विघटन हो गया श्रोर छायावादी कविता का दायरा संकीर्णतर होता गया । छायावादी काव्य के उत्कर्ष भर ह्वास की यह प्रक्रिया हिन्दी-कविता के विकास-क्रम को एक कड़ी
४० काव्य-धारा
है । इसी समय प्रगतिवादी विचारधारा राष्ट्रीय-चेतना का नया संस्कार करने लगी थी। पंत, निराला, नरेन्द्र शर्मा और स्वयं 'अंचल' इस नई विचारधारा से प्रभावित होकर नये विचारों और शोषित-पीड़ित जनता को भ्राकांक्षाओं को भ्रपनी कविता में वाणी देने की श्रोर उन््मुख हुएं। एक नये जीवनादर्श श्रौर नये मानवम् ल्यों की उद्भावना होने लगी । “दिनकर” “'नवीन' श्रोर उदयशंकर भट्ट जेसे भ्रन्य समर्थ कवियों में भी इस नई सानववादी विचारधारा की प्रतिध्वनियाँ सुनाई देने लगीं । भ्रनेक तरुण कवि प्रगतिशील भावनाझ्रों की भ्रभिव्यंजना करने लगे । लेकिन 'अ्रज्ञेय' श्र कुछ दूसरे कवि, जिनका व्यक्तिवादी और श्रात्मकेन्द्रित मानस सामाजिक श्राकांक्षाओं के प्रति संवेदनाशील होने में सर्वथा श्रसमर्थ था, प्रयोगशीलता के नाम पर विघटन की इस प्रक्रिया को काव्य की भाषा शोर श्रभिव्यक्ति के प्रकार में भी घसीट लाये, जिससे प्रयोगवादी धारा की कविता झपनी प्रेषणीयता भी खो बंठी | छायावाद-युग की समाप्ति के बाद उत्तर-छायावाद युग को प्रगतिशील श्रोर प्रयोगशील प्रवत्तियों के विकास-क्रम का विवेचन करने से पहले उन तीन महत्त्वपूर्ण कवियों का उल्लेख कर देना भी ज़रूरी है, जो न सम्पूर्णतः छायावादी हैँ, न प्रगतिवादी श्लोर न इतिवृत्तात्मक शैली के ही, परन्तु जो इनमें से दो या तीनों घाराशरों के सीमान्त छूते हें । बालकृष्ण शर्मा 'तवीन! (सन् १८६७---) की कविता में जहाँ एक श्रोर राष्ट्रीय भ्रान्दोलन शोर देशभक्ति से प्रभावित विविध सामाजिक भावनाएँ हैं, वहाँ दूसरी श्लोर रोमान्टिक भावों को श्राध्यात्मिक जामा पहनाने का प्रयास भी है। छायावादी कला-चेतना से पृथक् मार्ग पर चलने की प्रारस्भिक प्रवृत्ति पुरी तरह विकास नहीं कर सकी, उस पर दाशंनिकता का गहरा रंग चढ़ गया। 'कुंकुम' में संग्रहीत राष्ट्रीय झ्रान्दोलन, गांधीवाद श्रौर प्रगतिवाद्र से प्रभावित गीतों में उनका व्यक्तिवाद “दिनकर” की तरह प्रगति को इतिहास-चेतना का विश्वास-भरा गवं-स्फोत स्वर लेकर प्रकट हुआ-- “में हैँ भारत के भविष्य का मूर्तितान विशास महान्, में हूँ अटल हिमांचल-सम थिर में हूँ मूर्तिमान बलिदान |”? ः देश में तीत्र होते हुए वर्ग-संघर्ष, मजदूर-भ्रान्दोलन श्रौर प्रगतिवादी विचारधारा के प्रभाव - में 'नवीन' जो का भाव-प्रवण कवि-हृदय फेंकी पत्तल से उठाकर जठन खाते हुए इन्सान को दुर्दशा से सर्माहत श्र कुपित हो उठा और उन्होंने भी शभ्रन्य प्रगतिशील कवियों की तरह भ्रपने कवि से सांग की : “कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पृथल्न मच जाये, एक हिलोर इधर से आये एक हिलोर उधर से आये।” लेकिन इस प्रवृत्ति को 'नवीन' जी श्रागे नहीं ले जा सके, उनके श्रोता ऐसी नई “तान' सुनने के प्रतीक्षाकुल ही बने रहे । 'अपलक' श्रोर 'क्वासि' को कविताओं में प्रेम की भावभूमि का बाशनिक श्यृंगार करने का प्रयास है। तुम न आना अतिथि बनकर” या "मेरा क्या कालकलन!' इस ढंग की प्रतिनिधि रचनाएँ हें ।
हिन्दी-कविता का विकास ४१
उदयक्षंकर भट्ट (सन् १८६७--) देश के विभाजन से पहले तक हिन्दौ-क्षेत्र से बाहर लाहोर में रहे, जिससे उनको कविताधोों की ओर भझ्ालोचकों का ध्यान कम गया । प्राचीन दर्शन ओर इतिहास के विद्वान् होने के कारण भट्टजी ने 'तक्षशिला के खंडहरों में प्राचीन भारतोय संस्कृति का स्वर सुनकर झपनी बारी को प्रसारित किया ।' फिर 'राका' और “बिसर्जन' में छायावाद से प्रभा- बित होकर उन्होंने वेदना, प्रभाव भोर निराशा के गीत भी गाये, यद्यपि निराशा का स्वर उनके सहज प्रास्थाशोल भ्ौर प्रात्म-विश्वासी हृदय के भ्रनुकूल नहीं था। प्रतः जब प्रगतिवादी विचार- घारा-हिन्दी-काव्य को प्रभावित करने लगी, उस समय भट्टजो को कविता ने भी नयी दिज्ञा पकड़ी शोर उन्होंने 'मानसी' में विश्व के यथार्य-दर्शन की भ्रनुभूतिमय बिवेचना करते हुए भ्रपने प्रन्तिम उदृवोधनात्मक गौत में माँग को : “समय के सभी स्राथ जीवन बदलते समय को बदलता हुआ तू चला चल”! इसके बाद एक झाशावादौ को दृष्टि से प्रकृति श्ौर जीवन के भप्रनेक दृश्यों प्लोर मासिक प्रसंगों को उन्होंने प्रणली रचनाझों में सरस भ्रभिव्यक्ति दो । भट्टजी को शेली छायावाद के सौमानन््त छूतो-भर है, छायावादो नहीं है, यद्यपि भावना कहीं-कहीं स्वच्छुन्दतावादी है। भ्रभिव्यक्ति श्रधिकतर शोचर दुष्यस्तर को है, किन्तु कहीं-कहीं अ्रप्रस्तुतों की भी योजना है आर उत्प्रेक्षा ओर विरोधाभास को मात्रा भी पर्याप्त है। आशा, उत्साह, कर्म और जाग्रति का सन्देश उनकी कविताओं में बार- बार व्यक्त हुआ है, जिसमें प्रगतिशील कविता को अभ्रतिशयोक्ति-पूर्ण व्यंजना के पूरे दर्शन मिलते हें : “जाग उठा हूँ, जाय उठा हूँ / एक बार फ़िर मरण निगल कर, सांस-सांत में-- घराकाश में, नये प्राण भर / जाय उठा हूँ ! जाग उठा हूँ !? रामघारीसिह “दिनकर' (सन् १६०६--) सजग सामाजिक चेतना के भाव-प्रवण कवि हें । उन्होंने जिस समय लिखना शुरू किया उस समय छायावादी कविता में ह्ासोन्मुली प्रवृत्तियाँ मुखर हो उठी थों, उसको व्यापक सार्वजनीन सांस्कृतिक चेतना में वेयक्तिक निराशा और बेदना का स्वर प्रधान होता जा रहा था और कविता का श्रेय श्रोर प्रेय केवल कलावादी सोन्दर्य-साथन में सोमित होता जा रहा था। इस समय एक झोर इस प्रकार को सोन्दर्य-लघना भौर वेयक्तिक भावनाओं की श्रभिव्यक्ति का आकर्षण तो था ही किन्तु दूसरो शोर प्रगतिशील विचारों ने जिस नई सामा- जिक चेतना को जन्म दिया था, उसका आकर्षण भी कम प्रबल न था ! हृदय और बुद्धि को प्रपनी-अपनो ओर खींचने वाले इल दोनों झ्राकर्षणों के परस्पर इन्द्र के बीच “दिनकर' को भ्पनी कविता के लिए नया युगानुकूल मार्ग निकालना पड़ा। “रसवमन्ती' तक को कविताश्रों में उनके सोन्दर्योपासक, एकान्त-प्रिय, योवन की उमंगों से तरंधित मन भौर उनके हुदय के श्रतल में बहने
.. बालो न्याय, मुक्ति और मानव-प्रगति के लिए संघर्ष करने बाली सामाजिक भावना में निरन्तर
|
चलने वाले इन्द्र को कलात्मक विवृत्ति मिलती है । उनका व्यक्तित्व प्रयोगवादियों को तरह भ्रपनी मध्यवर्गोय विवशताओं के भ्रागे नतशिर होकर अपने कवि-गोरव का हनन नहीं होने देता । “दिनकर' के ग्रात्म-सस्थन में उनको सामाजिक-भावना हो विजयो होतो भ्रायी है, भौर इसने उनको प्रभि-
श्र काव्य-घारा
व्यक्तित में ऐसा प्रखर प्रावेग भ्ोर प्रवाह पेदा किया है जो भ्रन्यत्र मिलना दुलंभ है । जीवन कौ वर्ते- मान देन्यता ओर कुरूपता के प्रति विद्रोह की भावना को तीक्न श्रभिव्यक्ति देने के लिए उन्होंने
नये बिराट् प्रतीकों, लाक्षरिकता-प्रधान वक्र-भंगिमा श्रौर भाषण-कला में प्रयुक्त होने वाली भ्रतिशयोक्ति-पुर्ण भाषा का प्रयोग किया ।
“फ्रेंकता हूँ लो तोड़-मरोड़ अरी निष्ठुरे / बीन के तार, उठा चॉदी का उज्ज्जल शंख फूँकता हूँ भेरब-हुंकार । नहीं जीते-जी सकता देख विशृत में म्ुक्ा तुम्हारा भाल, बेदना-मधु का भी कर पान आज उगल्बू गा गरल कराल |?” दीन बालकों का भूख श्रोर दूध के लिए चीत्कार सुनकर कबि दर्प से उठकर चल
पड़ता है :--- “हटो व्योम के मेघ पन्थ से, स्वर्ग लूटने हम आते हैं,
दूध-दूध ओ वत्स, तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं ।” इस प्रकार अभ्रपने मन की उमंगों और लालसाओं से संघर्ष करते और जन-कल्याण की कामना करते हुए 'दिनकर' ने हिन्दी की प्रगतिशील कविता को वर्तमान जीवन कौ कठोर यथाये- चेतना का झ्राधार दिया । "कुरुक्षेत्र! में 'दिनकर' की प्रतिभा का पूरा उन्मेष दिखाई दिया। महायुद्धों की विभीषिका से पोड़ित विश्व-जनता की व्यापक शान्ति-कामना इस महाकाव्य में प्रतिबिम्बित हुई है । 'दिनकर' ने एक युग-द्रष्टा कवि की तरह श्रतीत इतिहास से कुरुक्षेत्र का प्रसंग चुनकर इस युग की केन्द्रीय समस्या--युद्ध श्लौर शान्ति--का उद्घाटन किया है। महाभारत की समाप्ति पर विजेता धमंराज युधिष्ठिर इतने भयंकर नरसंहार से क्षुब्ध होकर वाण-शेया पर लेटे पितामह भीष्म के पास शपने मन में उठने वाली शंकाओ्रों का समाधान माँगने जाते हैं। महाभारत के '“शान्ति-पर्व॑' की भी यही कथा है, लेकिन “दिनकर' ने उसे युगानुकुल श्रभिव्यक्ति देकर प्रगतिशील मानवता की शान्ति-भावना को ओर अ्रधिक गहरा बनाया । “कुरुक्षेत्र” केवल विचार-विनिमय का महाकाव्य है, उसमें दो व्यक्तियों के बीच मानव-समाज की विविध समस्याञ्रों पर, विशेषकर युद्ध और शान्ति की समस्या पर, विचारों का श्रादान-प्रदान ही होता है, इसलिए वहाँ रूढ़ श्र्थों में कार्य-व्यापार का विकास खोजना व्यर्थ है। बिचारों का श्रादान-प्रदान भाषण-कला की उदात्त भाव-सम्बलित तकं-पद्धति से नये प्रतोकों श्रौर चित्र-भाषा द्वारा मूत्त ढंग से होता है। “रस सोखता है जो मही का भीमकाय वृक्ष उसकी शिराएँ तोड़ो, डालियाँ कतर दो |” शान्ति-स्थापन की समस्या पर धर्मराज की शंकाओ्ों का समाधान करते हुए भीष्म भ्रन्त में
अंग “आशा के ग्रदीप को जलाये चलो घमेराज, एक दिन होगी मुक्त भूमि रख-भीति पे, भावना मनुष्य की न राग में रहेयी लिंप्त, सेक्ति रहेगा नहीं जीवन अनीति से; हार ते मनुष्य की न महिमा घटेगी ओर तेज न बढ़ेगा किसी मानव का जीत से; स्नेह-बलिदान होंगे पाप नरता के एक, घरती मनष्य की बनेगी स्वगे प्रीति से |”?
दिन्दी-कविता का विकास हुं
“दिनकर' कविता के इस मानववादी प्रगतिशील पथ पर प्राज भी पूरे उत्साह से प्रप्नसर हैं ।"
उत्तर छायावाद-युग
छायावादी-कविता के पूर्ण उल्मेष के काल में ही देश को राष्ट्रीय चेतना में एक नया मसानवतावादी संस्कार होने लगा था । देश की स्वतन्त्रता का लक्ष्य केवल अंग्रेजों की राजनीतिक पराबीनता से मुक्ति पाना भर है, या हर प्रकार के श्राथिक, सामाजिक भौर राजनीतिक शोषण, भेदभाव झोर प्रन्यायपूर्ण वर्ग-सम्बन्धों का भ्रन्त करके समानता, न्याय और जनतस््त्र के झाधार पर एक नए शोषणा-मुक्त समाज श्रौर एक नई मानवतावादी संस्कृति की स्थापना करना है--यह् प्रइन सभी लोक-चेता विचारकों को मथित करने लगा था । गाँधी जी के सत्य, भ्रहिसा और राम-राज्य के सिद्धान्तों में स्वतस्त्र-भारत के भावी समाज की रूप-रेखा स्पष्ट नहीं हुई थी। मार्क्स प्रवरतित इन्द्वात्मसक भौतिकवादी दर्शन ्रौर सोवियत् रूस में पूंजीवाद का भ्रन््त करके एक नये साम्यवादी सम्लाज की स्थापना ने इन लोक-चेता विचारकों को मनुष्य की सामूहिक मुक्ति के एक नए मानववादी जीवतादआ से प्रेरित करना शुरू किया। सन् १६३४ के लगभग ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टो (जो भारत सरकार द्वारा ग्रवेध घोषित कर दिये जाने पर सन् १६४२ तक गुप्त रूप से कार्य करती रहो) और कांग्रेल-समाजवादी दल की स्थापना हो गई थी । इन दलों ने अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद को राजनीतिक-प्राथिक गुलामी से मुक्ति पाने के लक्ष्य के साथ-साथ भारतीय सामन््तवाद के भ्रवश्षिष्ट चिह्ढों से किसानों को और भारतीय पूंजीवाद से मजदूरों को मुक्त करके एक शोषण-रहित समाज- वादी जनतन््त्र कौ स्थापता का लक्ष्य भी भारतीय जनता के सामने रखा। इस तत्त्ववाद और सामा- जिक लक्य में व्यक्ति-मानव और सम्रष्टि-मानव के पूंजीवादकालीन दुनिवार अ्न्तविरोध का प्रशमन किसी एक के दमन द्वारा नहीं, बल्कि दोनों के हितों की परस्परिता भौर समन्विति द्वारा ही साध्य है । भ्रर्यात् मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण खत्म करके एक वर्गहीत समाज सभी मनुष्यों की उन्नति झौर विकास के समान साधन जूटायेगा। व्यक्तित शौर समष्टि का अ्न्तविरोध मौलिक नहीं है, परिस्यितिजन्य या झ्ौर स्पष्टता से कहें तो वर्ग-समाजजन्य है । इसलिए वर्महीव समाज में झन्ततः व्यक्ति का हित समाज का हित होगा झोर समाज का हित व्यक्ति का हित होगा। ऐसे शोषण- मुक्त समाज की स्थापना भ्राज सम्भव हो गई है : विश्व-पूंजीवाद ह्ासोन््मुली और संकट- ग्रस्त है और अपनी आात्मरक्षा के लिए युद्ध की तेयारियाँ कर रहा है। ऐतिहासिक सत्य की इस चेतना ने भारतीय साहित्यकारों को भी नयी प्रेरणा दी। सन् १६३६ में “भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की स्यापना हुई । प्रेमचन्द, रवोन्द्रनाव ठाकुर, जोश इलाहाबादी जेसे श्रग्रणी लेखकों झौर कवियों ने इस भ्रान्दोलत का स्वागत ही नहीं किया, उसमें भ्रागे बढ़कर भाग भी लिया ।
हम पहले कह चुके हैँ कि सन् १६३५-४० के काल में छायावादी कविता में हासोन््मुखी
१--इस विवेचन में हम द्िन्दी की हास्प-व्यंग शेली के कवियों और उनकी कविता का अ्रलग से उल्लेख नहीं कर सके हैं, यद्यपि बालमुकुन्द गुप्त, दरिशंकर शर्मा, बेदब बनारसी, कान्तानाथ पाण्डेय “चॉच”, वेघड़क बनारसी, गोपाल प्रसाप व्यास और अनेक पुराने ओर नये कवियों की हास्य-ब्येर-मयी कविताओं की हिन्दी में उमर्थ परम्परा है। इन कवियों ने राष्ट्रीय इश्टिकोण से समाज के जीवन में उठने वाले सामयिक प्रश्नों पर अपने ब्यंगों की बोछार से जन-चेतना को उद्जुद्ध करने में जो योग दिया हैं वह स्वतन्त्र रूप से अध्ययन का विषय है।
४७ काव्य-धारा
प्रवुत्तियाँ सुखरित हो उठी थीं। नये कवियों में व्यक्तिवादी चेतना व्यापक लोक-मंगल कौ दृष्दि शोर श्राशा और उल्लास की भावना छोड़कर श्रात्म-निष्ट श्रोर निराशावादी होती जा रही थी । हम यह भी देख चुके हें कि 'पन््त', “निराला, 'तवीत', 'दिनकर' श्रादि श्रेष्ठ कवियों में नये सामाजिक श्रादर्श से प्रेरित प्रगतिशील भावनाझं श्रौर विचारों की श्रभिव्यक्ति भी होने लगी थी । प्रगतिशील श्रान्दोलन ने इस नये उत्थान की प्रक्रिया को नयी स्फूरत और गति प्रदात की । उत्तर-छायावादी- युग सें भ्रन्य भ्रनेक तरुण-कवि प्रगतिवाद-प्रेरित नये जीवनादर्श श्लौर जन-मंगल के उत्साह भरे गीत गाते हुए सासने श्लाये । इनमें नरेन्द्र शर्मा तो थे ही, शिवमंगलसिह, “सुमन, फेदारनाथ श्ग्नरवाल, त्रिलोचन, नागार्जुन, रांगेय राघव श्र रामदयाल पाण्डेय प्रमुख थे। श्रनेक छायावादी ढरें के तरुण कवियों--शस्भूनार्थासह् “रसिक' विद्यावती 'कोकिल' श्रादि--में प्रगतिशील विचारों की श्रनुगूज सुनायी दी । गांधीवादी कवियों--सोहनलाल द्विवेदी, सुधीन्द्र श्रादि--श्रादि--ने भी नये विषयों पर कविताएं लिखीं । यहाँ तक कि व्यक्ति-चेतना से श्राक्रान्त श्रनेक प्रयोगवादी कवि--गिरजाकुमार माथुर, गजानन माधव '“मुक्तिबोध', नेमिचन्द जेन, भारतभूषरा श्रग्नवाल, शमशेरबहादुर सिंह, प्रभा- कर माचवे, रामविलास शर्मा श्रादि - भी प्रगतिशील धारा से श्रप्रभावित न रह सके, और उन्होंने नई पीढ़ी के तरुण प्रयोगशील कवियों को भी स्वस्थ और ठोस विचार-वस्तु देने की प्रेरणा दौ-- विशेषकर गिरिजाकुमार माथुर की रचनाश्रों में रूपगत प्रयोग नई श्रौर स्वस्थ विचार-वस्तु की अ्रभि- व्यंजता के साधन बने । दूसरे महायुद्ध के पाँच-छे वर्षों के बीच हिन्दी में प्रगतिशील कविता का ही सर्वाधिक जोर रहा । उस समय ऐसा लगता था कि इन महान् सामाजिक श्रादशों की प्रेरणा हिन्दी- काव्य में एक ऐसा युगान्तर उपस्थितकर रही है जिसका पूर्ण उन्मेष छायावादयुग की तरह ही झनेक महान् प्रतिभाश्रों के प्रस्फुटन से महिमाशाली ध्षनेगा। लेकिन तरुण प्रगतिशील कवि स्वतन्त्र रूप से किसी नए काव्यादर्श का श्रभी सम्यक् विकास भी न कर पाये थे कि उन्होंने राजनीतिक दलबन्दी की मतवादी और साम्प्रदायिक संकीणंताशं में पड़कर अपनी काव्य-प्रतिभा को स्वयं ही कुंठित कर डाला । इस बीच, और विशेषकर स्वतनन््त्रता-प्राप्ति के बाद, राजनीतिक दलों की स्पर्धा श्रौर परस्पर विरोध ने राष्ट्रीय-जीवन की स्वाधीनता-संग्राम के दिनों वाली एकता को विच्छिन्न कर दिया था, जिससे विभिन्न राजनीतिक दलों में बेटे हुए इन सभी कवियों का राष्ट्रीय-जीवन से एक प्रकार से विच्छेद-सा हो गया । भावना की समग्रता पुनः विश्युंबलित हो गई भ्रौर कवि भ्पने दलगत विचारों की श्रनुभूतिहीन विवृत्ति करने लगे । इस बीच कोई ऐसी महान् प्रतिभा का नया कवि नहीं पैदा हुआ जो इन दलगत संकीर्णताओों के घेरे को तोड़कर समग्र-भाव से युग-जीवन की नई प्रगतिशील चेतना झौर सत्य को सार्वदेशिक और सार्वजनीन स्वर में कलात्मक पअ्रभिव्यक्ति देता। युग-सत्य नहीं बदला है, केवल उसका बोध तत्काल मलिन और खंडित हो गया है। इसके लिए विपरीत परिस्थतियों से भ्रधिक इन तरुण प्रगतिशील कवियों की भ्रसामर्थ्य श्रौर श्रसंवेदनशीलता ही उत्तर- दायी है, जो उन्हें सत्य की उपलब्धि नहीं होने देती, और संकीर्ण प्यों पर भटका देती है । उत्तर-छायावाद-युग की दूसरी धारा हिन्दी की वह कविता है, जिसमें व्यक्तिबाद की परिणति घोर श्रहंवादी, स्वार्थप्रेरित, श्रसामाजिक, उच्छु खल और असन्तुलित मनोवृत्ति के रूप में हुई है । इस कबिता का शायद श्रभी तक श्रन्तिम रूप से नामकरण नहीं हो पाया है, इसी लिए प्रयोगवादी, प्रतीक- वादी, प्रपद्मययादी या नई कविता--इन अनेक नामों से इसे पुकारा जाता है। प्रथम-युद्धोत्तरकालीन पाइ्चात्य कविता में जिस तरह का व्यक्तिवाद श्रनेक साहित्यकवादों ्रौर प्रवादों की दुहाई देता हुआ ह्यक्त हुआ और उसने काव्यकी भाषा, वस्तु-विन्यास और व्यंजनामें जैसे विचित्र बोद्धिक प्रयोग किए, कुछ
हिन्दी-कविता का विकास ४५
उससे मिलती-जुलती या प्रभावित हिन्दी को तयाकथित प्रयोगवादी कविता भी है । इस कविता में रागा- त्मक सारण से नये प्रर्य की सुष्टि करके मानव-भावना का संस्कार झ्रौर चेतना का विस्तार करने का प्रयास . नहीं है, बल्कि मनुष्य के जीवनबोघ को ही खण्डित झौर विकृत बनाना इसका सहज उद्देश्य दीखता है। . प्रयोगशोलता का झ्ाडम्वर तो केवल सम्राजद्रोही भावनाझ्रों प्रौर जीवनके प्रति घोर भ्रनास्या, फुंठा भौर _ विद्रूपात्मक उद्गारों को एक दुरूह संकेतात्मकू भाषा, श्रस्वाभाविक प्र॒लंकार-योजना झ्ौर भ्रहंवादी झौर बहुघा ग्रोछेतल की वचन-मभंगिमा में छिपाने का उपक्रम मात्र है। “झज्ञेय' झ्ौर उनके समान- ._ घर्मा दूसरे मध्यवर्गो बुद्धिजीवी भ्रपतोी व्यक्ति-चेतना से इतने झ्राऋान्त रहे हें कि वे सामाजिक-जीवन के साथ किसी प्रकार के सामंजस्य की कल्पना ही नहीं कर सकते | इस एकान्तिक श्रहंनिष्ठा ने इस ._ थर्ग के कवियों को प्रत्यन्त 'सेल्फु कान्शस' ओर तुनुक मिज्ञाज बना दिया है भ्रौर चूंकि समाज के बीच रहकर हो वे जीवत-यापन करते हें, इसलिए उनको समाजद्रोही भावनाएं झोर जान-बूमकर साहित्य भ्लोर जीवन के मूल्यों का विघटन करने की चेष्टाएं लोकचेता श्रालोचकों शोर सहृदय पाठकों को कड़ी निन्दा को भाजनं बनती झाई हें । इन कवियों की कविताओं में बहुधा इन निन््दाओं और झालोचनाझों के संकेत रूप में उत्तर दिए जाते रहे हें भ्लोर श्रपती असमर्थताओों श्रौर दु्बंल- ताप्मों का झ्ोचित्य सिद्ध किया जाता रहा है। “अज्ञेय' को कविताओं में अपराथी मनोवृत्ति से को गई ऐसी प्रात्मरक्षात्मक भ्रभिव्यक्तियों की बहुलता है । साधारणतया प्रयोगवादी कविताओं में एक दयनोय प्रकार की मुंकलाहट, खीक, कुंठा, किश्लोर ओद्धत्य और हीन भाव ही व्यक्त हुआ्ना है, जो कवि के व्यक्तित्व को प्रमारितत करने का नहीं, खण्डित करने का मार्य है। महान् कविता का जन्म सारे संसार को, सम्राज को, जीवन के प्रगतिशील भझ्रादशों श्लौर नेतिक भावनाञ्रों को एक उहृण्ड झौर छिछोरे बालक को तरह मुह बिचकाने से नहीं होता । सामाजिक बन्धनों के प्रति व्यक्तिवादी प्रतिवाद का यह तरीका स्वांग बनकर ही रह जाता है। झ्राजकल बड़े संगठित रूप में प्रयोगवादी कविता को हिन्दी की नई श्र श्रेष्ठार कविता सिद्ध करने का प्रयत्न चल रहा है । तर्क दिए जाते हैं कि उसके झालोचकों में या तो इस कविता को समभने की सामर्थ्य नहीं है या फिर वे झपने रूढ़िपस्थी दृष्टिकोण के कारणा इस नये उत्थान का स्वागत नहीं कर पाते। छायावाद के आरम्भ में ग्राचार्य शुक्ल भी ऐसा नहीं कर पाए थे। इतिहास की पुनराबृत्ति हो रही है। लेकित इन कवियों की प्रात्म-प्रवंचना झौर उनके इतिहास-ज्ञान की शून्यता स्वतः सिद्ध है। 'परिमल' और श्वल्लव' को कविताओं की सांस्कृतिक चेतना और व्यापक सामाजिक दृष्टि में उच्चतर जीवन- मूल्यों के प्रति एक सहज भ्रास्था थी । उसमें मनुष्य के प्रेम भोर सोन्दर्य को पुनीत भावनाझ्रों को खिल्ली नहीं उड़ाई गई थी, न मनुष्य को पशुता को गोरवान्वित किया गया था, जिस तरह भश्रज्ञेय ने अपनी कविता “माहीवाल से' में किया है ।
“क्रोँंच बेठा हो कभी वलमीक पर
तो मत समझक--
वह अनुष्टुप बाँचता हे ध्ंग्रिनी के स्मरण के--
जान ले वह्ट दीमकों की टोह् में हे ।' ४ यह ठीक है कि प्रयोगवादी कविता में यत्र-तत्र भ्रच्छे भाषा-प्रयोग भी मिलते हैं; लेकिन .. उसका अन््तरंग इतना खोखला है कि ऊपर की सारी चम-दमक और पालिश पाठक के मन में भी
व्यर्यता का भाव ही जगाती है ।
। हिन्दी कविता से समग्र इतिहास को दृष्टि में रखकर हम प्रनिवार्यतः इस परिणाम पर
४६ काव्य-धारा
पहुँचते हैं कि प्रयोगवादी कविता कोई नया उत्थान नहीं है; बल्कि छायावादी कविता के ह्लास का ही बिकृति-रूप है, भोर हिन्दी की विशाल काव्य-धारा में प्रयोगवादी कबियों की देन श्रभी बूंद के समान ही है । ह
स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद श्रनेक नए कवि पुनः प्रगतिशील सामाजिक भावनाश्रों को अ्रभि- व्यक्ति देने की दिशा में श्रागे बढ़े हें । वे सच्चे भ्रर्थों' में प्रयोगशील भी हैं; क्योंकि वे श्रपने नये जीवन-बोध को भ्रनुभूति को मूत्त भ्रभिव्यक्ति देने के लिए भाषा, शेली और छल्दों में नये प्रयोग भी कर रहे हें इनमें भवातरी प्रसाद मिश्र, नीरज, रंग, शील, वीरेन्द्र मिश्र, ठाकुर प्रसाद सिह, गोपाल- कृष्ण कौल, शेष, सर्वेब्वरदयाल सक्सेना, चिरंजीत, नामवरसिह, रमानाथ श्रवस्थी, देवराज “दिनेश झौर 'त्यागी' झ्रादि के नाम उल्लेखनीय हैं ।
हिन्दी-काव्य के नये उत्थान श्रौर उसके हारा नये जीवन-मूल्यों के निर्माण की श्राशा, सामूहिक मुक्षित के विकास्त के श्रादर्श को एक व्यापक सार्वजनीन सांस्कृतिक चेतना के रूप में अ्रपनी श्रात्मा का शनुभूत सत्य बनाकर वाणी देने पर ही निर्भर करती है। यह कार्य भविष्य का कोई युगद्रष्टा कवि ही कर सकेगा । किन्तु मनुष्य की सामूहिक प्रगति में विश्वास लेकर चलने वाले इन तरुण कबियों का प्रयास उस श्रागामी उत्थान की ही पीठिका तेयार कर रहा है।
डा० सत्येन्द्र
कवि ओर काव्य
काव्य के सम्वन्ध में कोई भी निएइ्चयात्मक भ्रभिमत देना सरल नहीं । ब्रह्म की भाँति काव्य के सम्बन्ध में भी विविध मत हें भ्रोर वे परस्पर भ्रत्यन्त भिन्न हें । इस सतभेद के दो छोर हें--एक छोर पर वे विद्वान् प्राचायं हें जो काव्य को ब्रह्म; उसके भ्रानन्द को ब्रह्मानन्द भ्रयवा ब्रह्मानन्द सहो- बर मालते हैं । इनके लिए काव्य शाश्वत है; युग-युग में सत्तावान ।
दूसरे छोर पर वे लोग हें जो काव्य को कार्य-कारण की परम्परा का परिणाम मानते हैं, जो इसका केवल ऐतिहासिक महत्त्व स्वीकार करते हैं, ऐसे लोगों में एक सम्प्रदाय उन लोगों का भी है जो यह मानते हें कि इस व्यवसाय-युग में गद्य को प्रधानता रहेगी भ्रौर काव्य धीरे-धीरे समाप्त हो जायगा ।
और इन दोनों छोरों के बीच में भ्रनेकों प्राच्य भर पाइचात्य जाति के संप्रदाय हें जिनमें--- झलंकारवादी, वक्रोक्तिवादी, रीतिवादी, रसवादी, ध्वनिवादी, भ्रभिव्यंजनावादी, कलावादी, छाया- बादी, प्रगतिवादी, प्रयोगवादो, भ्रावि हें ।
अ्लंकारवाद, वक्रोक्तिवाद, रीतिवाद, रसवाद, ध्वनिवाद प्राच्य सम्प्रदाय हें। भारतीय ध्रालोचक भ्ोर विचारक इन्हें उपेक्षा को दृष्टि से नहीं देख सकता । भ्राधुनिक-युग में नयो भ्रालो- चना दृष्टि पाकरं भी उसे इस प्राचीन परम्परा की श्रोर संकेत करना ही होता है । क्योंकि प्राच्य हो चाहे पाइचात्य काव्य-रचना में भ्रलंकार किसी न किसी रूप में श्राते ही हें--वक्रोक्ति श्रोर रीति तथा ध्वनि और रस भी किसी न किसी भाँति कविता में स्थान पा ही जाते हें ।
शेष नये सम्प्रदाय पाइचात्य प्रणाली श्रोर विचारधारा के सम्पर्क से प्राप्त हुए हें । श्राज भो #कविता' नाम से रचलाएँ होती हें। श्राज भी कविता श्रोर काव्य पर आलोचनाएँ झोर विचार लिखे जाते हें, यह सत्य है; और वेदों में भो काव्य है, ऐसा लोग मानते हें ।॥ तब सबसे बड़ा झ्राइचर्य यहां प्रस्तुत होता है । वेदों से लेकर भ्राजतक काव्य को धारा प्रवाहित होती चली झ्रायी है। वेद भरी काव्य है, रामायणा भी काव्य है, कालिदास का मेघदूत भी काव्य है, चन्द का पृथ्वी राज रासो, कबीर को साल्नियां, तुलसी का रामचरित, सूर के पद, बिहारी के दोहे, भूषण के कवित्त, गिरधर कविराय की कुंडलिया, प्रसाद जी को कामायनी, गुप्त जी का जयभारत, पन्त जो का पल्लव, निराला जी का कुकु रमत्ता, गोपालप्रसाद व्यास का 'एजी कहूँ कि भ्रो जो कहूँ-सभी काव्य संज्ञा से अ्रभिहित
. होते हूँ । भ्राज सास्तिक पत्रों में साप्ताहिकों श्ोर देनिकों में भी काव्य के दर्शन हमें होते हें ।
* इस समप्नस्त ऊहांपोह से एक तो सत्य यह प्रकट होता है कि काब्य की एक परम्परा है--
.._ एक पुष्ट परम्परा है। परम्पराझ्रों का जहां बोझ हमें ढोना होता है, वहाँ उनसे कुछ महत्त्वपूर्ण तत्त्व
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भी प्राप्त होते हें । परम्परा के द्वारा हमें वे भ्राधारभूत तत्त्व ज्ञात हो जाते हैं जिनसे काव्य का
४८ काव्य-घारा
स्वरूप निर्मित होता है। इस समस्त स्वरूप-निर्माण का एक फल तो निश्चय ही होना चाहिये कि उसके स्वरूप के साथ किसी भी युग में कोई खिलवाड़ नहीं की जा सकती ।
काव्य-रचना प्रत्येक युग में हुई है, और प्रत्येक युग में एक नहीं श्रनेकों व्यक्ति हुए हैं, किन्तु उन सबमें से कुछेक को ही 'कवि' होने और काव्यकार होने को सम्मान मिल सका है। भवभूति ने काव्य की प्रतिष्ठा के सम्बन्ध में दो बातें लिखीं--
१--पृथ्वी बहुत लम्बी-चोड़ी है, यदि काव्य में कुछ काव्यत्व है तो एक स्थान पर नहीं तो दुसरे स्थान पर उस काव्य की प्रतिष्ठा हो सकती है ।
२--समय श्रनल्त है, यदि भ्राज नहीं तो कल प्रतिष्ठा मिल सकती है ।
इन दो कारों से भवभूति बहुत श्राश्वस्त था । उसे श्रपनी प्रतिभा में विश्वास था । किन्तु झाजतक लिखे जाने वाले श्रग सित काव्य नामक प्रंथों में से केवल कुछेक ही छंट कर ऊपर झा सके । इससे यह सिद्ध है कि पृथ्वी की विशालता श्रौर समय की श्रनन्तता भी प्रत्येक कवि के लिए सहायक नहीं होती, केवल प्रतिभाशाली ही वह सम्मान पा सकते हें। श्रतः जहाँ तक युग-युग का प्रझन है श्राज के श्रालोचक और विचारक को भयभीत होने की श्रावश्यकता नहीं क्योंकि जिन रच- माश्रों से श्राज वह क्षुब्ध है, वे सम्भवतः काल पर विजय नहीं पा संकेंगी, समय अ्रपनी तराजू में उन्हें तोलकर थोथा समऋ कर एक शोर फेंक देगा ।
पर, आलोचक ओर विचारक अपने युग में भी रहता है, और युग के सुजन-कर्म से उसका झौर उसके दायित्व का घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह यूग को समझना चाहता है, भ्रपने युग को सम्भला हुआ देखना चाहता है, भोर उसे सम्भालने की और भी प्रयत्नशील रहना चाहता है-फिर वह यह भी सोचता है कि वह ऐसे युग में ही जन्म लेने वाला सिद्ध हो जिसमें उच्च प्रतिभाएं हुई हें। क्यों न उसके भ्रपने युग में ही कालिदास-शेक्सपीयर गेठे जंसी प्रतिभाएं उत्पन्न हों जो काल-चक्र में पिस न सकें, काल के चंगुल से बची रहें । श्रालोचक तथा विचारक की ये सभी भावनाएं महत् हैं, इसी लिए वह अ्रपने युग का पर्यवेक्षण करता है। इस पर्यवेक्षण से उसे विदित होता है कि काव्य-क्षेत्र में कहीं कोई भारी श्रम, श्रभाव या अ्रसमर्थता है।
प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र में कुछ भ्रम भ्रवश्य है । बतंमान काल में इतने विवाद और बाद हें कि भ्रम होना अस्वाभाविक नहीं ।
सबसे सौलिक भ्रम काव्य के विषय में यह है कि वह 'रूप' (फोम) को महत्त्व दे या “वस्तु (मटर) को ही या दोनों को समन्वित रखे । “तथ्य' को महत्त्व दे या सत्य को, या दोनों को ॥ पूर्व को महत्त्व दे या पश्चिम को, या दोनों को । परम्परा में चले, या स्वच्छुन्दता को श्रपनाये, या दोनों को । बुद्धिवादी हो या हृदयवादी या दोनों का समस्वय करे, पदार्थवादी दृष्टिकोण से चले या अरध्या- त्मवादी दृष्टिकोण से या दोनों का समन्वय ढूंढे, श्रादि-आ्रादि !
भ्राज का युग है ही संघर्ष का युग--तभी सेथिलीशरण गुप्त ने इसे “'द्वापर की संक्ञा दो। किन्तु भ्रम श्राज के युग में ही हो ऐसा नहीं, प्रत्येक युग में क्रम की स्थिति किसी-न-किसी रूप में अवश्य रही है। फलतः भय भ्रम का नहीं श्रम से ग्रस्त होने का है। भ्रम-प्रास से बचा जा सकता है-ज्ञान के प्रकाश से । किसी भी पहल् श्रथवा पक्ष को कवि अ्रपना सकता है, किन्तु उसमें उसे बहुत ईमानदार रहने की झावश्यकता है, श्रोर उस पक्ष से ज्ञान के बलपर तादात्म्य स्थापित करने की भ्रावश्यकता है। बिना विषय श्रथवा वस्तु से श्रर्थात् वर्ण्य से तादात्म्य हुए काव्य भ्रमरहित नहीं हो सकता अंग्रेज़ी में कहा गया है। '709797708 75 3078 इसी को शझपने यहाँ भी
कवि और काव्य ४६
बताया गया है--“जानत तुमहि-तु्माहि होइ जाई--तत््वमसि' ज्ञान का ही परिणाम है। भ्रतः विषय भ्रयवा वस्तु का निश्चंम् ज्ञान ही कवि को भ्रम-प्रास से बचा सकता है। हमें प्राधुनिक काव्य के भ्रध्ययन-मनत से यही देखना होगा कि कितने ऐसे कवि हें जो ययार्य में विषय-बस्तु के ज्ञान से तादात्म्य प्राप्त करके लिख रहे हें---केवल दादुरावृत्ति ग्रववा श्रुगाल-रोदन नहीं कर रहे । बिना तावात्म्य के निजी प्रनुभूति का भ्रभाव रहेगा। अनुभूति-हीन काव्य श्रम-प्रस्त होगा, काव्य नहीं कहा जा सकेगा, ओर झानन्व के स्थान पर विषाद और दिग्श्रम पैदा करेगा । इस बौद्धिक युग में यह प्र॒त्यन्त आवश्यक है कि इस तावात्म्य-प्राप्ति के लिए उचित ईमानदारी अपने कवि-कर्म के विषय में हो । 'ईमानदारी' साथना मार्ग है, ज्ञान उसका ज्ञातव्य है और तादात्म्य प्राप्तव्य है । तावात्म्य प्राप्त होते पर कवि सिद्ध कवि हो जायगा | प्रत्येक सिद्ध कवि का अपने विषय के साथ निद्चिचत तादात्म्य मिलेगा । यह किसी भी काव्य की परीक्षा से देखा जा सकता है। ... भ्रम ही नहीं शभ्रभाव भी दिखायी पड़ता है। भ्रमभाव है काव्य के रूपों के भ्रस्थास का । भ्रम की स्थिति का पता सहज ही नहीं लगता। किन्तु काव्य के रूपों के अभ्रम्यास के भ्रभाव का पता तुरन्त लग जाता है। प्रत्येक विषय या वस्तु जब काव्य का रूप ग्रहण करती है, तब वह भ्रपना एक निजी रूप प्रहणा करती है । इतते प्रकार के छन््दों का निर्माण, इतने काव्य-रूपों का सुजन इसी भ्रावश्य- कता के कारणा हुआ। झ्राज भी जो नए काव्य-रूप खड़े हो रहे हैं उनमें भी यही मर्म व्याप्त है । हमारे भ्रषिकांश आधुनिक कवि इस मर्म से श्रपरिचित हैं। फलतः न तो बर्थ्य-विषय-बस्तु से उनका तादात्म्य हुआ है; न रूप का ही ग्रम्यास । यदि वर््य-वियय-वस्तु से तादात्म्य कवि का न हो, किन्तु उस्ते यह साधारण ज्ञान हो कि किस रूप में कंसा विषय समा सकता है भौर उस रूप का अ्रम्यास करके उसमें विषय को अ्भिव्यक्त करे तो भी वह कवि की संज्ञा का श्रधिकारी हो सकता है ।
भ्राज हमें देखने को यह मिलता है कि रूप का अभ्यास तो किड्चित भी नहीं। प्रयोग प्रत्येक युग में होते हैं, प्रयोग प्रयोग के सिद्धान्त के श्राधार पर भी हो सकते हें, किन्तु प्रत्येक प्रयोग के लिए कवि में एक ईमानदारी और निश्चंमता तो श्रनिवार्य है। क्योंकि विषय भ्रथवा वस्तु के साथ प्रयोग का प्रइन झ्रा ही नहों सकता । प्रयोग तो रूपों में ही हो सकता है । कारण स्पष्ट है कि विषय-वस्तु
: बह कैसी ही हो उद्घाटित हो सकती है, वह प्रयोग का विषय नहीं हो सकती । हाँ, उसके प्रेषण का
सराध्यम कवि की अपनी वस्तु है। उसमें वह प्रयोग कर सकता है । फलतः प्रयोगवादी के लिए “रूप की सत्ता' ही प्रधान है । ऐसा प्रयोगवादी' “भ्रस्तित्ववादी' “ऐग्ज्नस्टेंशियलिक्ष्म' में विश्वास रखने वाले की तरह रूपसूष्टि को महत्त्व प्रदान कर सकता है, किन्तु उस दक्षा में उसे इस रूप-ज्ञान के विषय में भी निम्नंम होते की भ्रावश्यकता होगी। रूप का सम्बन्ध भ्रक्षर, भ्रक्षर के वर्ण [घ्वनि के रूप, रंग, प्रभाव को वर्ण कहेंगे], वर्णों की व्यवस्था [संस्कृत-शास्त्र की रीति], वर्ण समुच्चयः शब्द की सत्ता, उनके प्र्थ और अ्र्थयों ओर शब्दों के भ्रक्वर स्वरूप के प्राणा-ध्वनि, उनमें विद्यमान अर्य तथा ध्वनि की गति, शब्दों से निर्मित वाक्य, वाक्य की स्फोट-शक्ति---इन सबका जबतक ईमानदारी से सहज ही निर्श्नंम ज्ञान प्राप्त कर वह इनसे तादात्म्य प्राप्त नहीं कर लेता, वह रूप-सृष्टि कंसे कर सकता है ? ओर कंसे वह प्रयोग का कर्ता माना जा सकता है । फलतः श्राज के कवि को यह सिद्ध करके दिखाने की झ्ावश्यकता है कि वह कवियों को दीर्घ परम्परा में भ्रागे की कड़ी है, यों ही कुछ विश्युंखलित
। . वस्तु नहीं ।
काव्य एक सामाजिक सांस्कृतिक ऐतिहासिक परम्परा की देन है भ्रौर प्रत्येक वेश-काल में
बह इसी अनुकूलता के साथ फलता-फूलता है और कल्याणकारी होता है। नयी उद्भावनाएँ, नये
४० काव्य-धारा
उन्मेष, नूतन सुजन उधार लिए हुए और थेगरी के रूप के नहीं हो सकते, वे परम्परा के बीजों में होने वाली देश-काल को नयी रसायन के फल होते हैँ। हमारी कोई भी श्रभिव्यक्ति मात्र व्यक्तिगत नहीं हो सकती, उसका एक घनिष्ठ सामाजिक मूल है क्योंकि व्यक्ति श्रत्यंत व्यक्तिगत हो जाने पर समाज के लिए मृत हो जाता है; मृत की श्रभिव्यक्षित कल्याण नहीं कर सकती, वस्तुतः तो व्यक्ति इतना व्यक्तिगत होते ही या तो श्रात्मघात कर लेगा या समाज से सम्बन्ध विछिन्न करने की स्थिति वाला व्यक्ति बन ही नहीं सकेगा । फलतः काव्य के किसी भी सुजन को “व्यक्ति---सत्ता के तर्क पर नहीं तोला जा सकता प्रत्येक व्यक्ति अपनी पृष्ठभूमि की भूमिका से पुथकु खड़ा होने की कल्पना कर हो नहीं सकता । फिर कोई भी “रूपसूष्टि' परम्परा से श्रामूल विच्छिन्न कंसे हो सकती है । श्राज हमारे कवि को उस समस्त परम्परा को हृदयंगम करके ही काव्य का कोई शब्द उच्चारण करना चाहिए । किन्तु, यह सामर्थ्य सभी में न होती है; न हो सकती है । यही कारण है कि श्राज का कवि किसी एक क्षरिक भाव के उद्भास को ही बहुत श्रधिक महत्त्व प्रदान करके उसे नूतन सृष्टि कहने के लिए श्रागे बढ़ता है, या शब्द-योजना की किसी श्रद्भुत प्रणाली की परिकल्पता से मुदित होकर उसे एक देन के रूप में श्ाग्रह से प्रस्तुत करने को व्यग्र हो उठता है। फलतः सृष्टा की शक्तियाँ बिखर जाती हैं ।
हिन्दी के कबि का श्राज विद्येष दायित्व है। उसे हिन्दी भाषा की सम्पत्ति को ही समृद्धि नहीं करना, भारतीय-भाव-सम्पत्ति को समृद्ध करना है ओर विश्व में उसकी चमक को श्रद्वितोय सिद्ध करना है ? यह केवल वाग्जाल या भ्रम में भटकने से नहीं हो सकता । इसके लिए कवि-कर्म के योग्य निष्ठा की श्रावश्यकता है, प्रतिभा उनमें है इसे माना जा सकता है ।
काव्य की रागात्मकता ओर बोद्धिक प्रयोग
सबसे पहले भाव-तत््व और काव्यानुभूति के बुद्धिगतत सम्बन्ध को लीजिए। काव्य के विषय में भ्लोर चाहे कोई सिद्धान्त निश्चित न हो, परम्तु उसकी रागात्मकता श्रसंदिग्घ है। इसे पौरस्त्य भौर पाश्चात्य दोनों ही काव्य-शास्त्र निर्श्रान्त रूप से स्वीकार करते हें । कविता सानव-मन का शेष सृष्टि के साथ रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करती है । यह एक विश्वजनीन सत्य है, भौर कविता की यही चरम सार्यकता है। ससय-समय पर बुद्धि और राग में थोड़ी-बहुत प्रति- योगिता रही हो वह दूसरी बात है, परन्तु कभी भी बुद्धि को रांग के स्थान पर काव्य का प्राणतत्त्व होने का सोभाग्य प्राप्त नहीं हुआ । जब कभी बुद्धि-तत्त्व राग-तत्त्व के ऊपर हावी हुआ है, काव्य- तत्त्व भी उसी प्रनुपात से क्षीण हो गया है । काव्य का यह मापदंड छोटे-बड़े सभी कवियों के विषय में लागू रहा है । दांते, तुलसी, मिल्टन, प्रसाद जिस किसी कवि ने भी बोद्धिक तत्त्व के प्रति पक्षपात दिखाते हुए राग की उपेक्षा की है, काव्य के पारखी ने तुरन्त ही उसके बुद्धि-वेभव की प्रशंसा करते हुए भी काव्य-गुणा की क्षीणता का निर्णय दे दिया है। इसका निषेध करने का साहस टी० एस० इलियर में भी नहीं है । काव्य की सार्यकता इसी में है कि वह राग को संवेदनीय बनाये; बोद्धिक तत्त्व को संवेदनीय बनाना काव्य का काम नहीं है। शक्ति का साहित्य भ्रयवा ललित साहित्य वस्तु के साहित्य से इसी बात में मूलतः भिन्न हैं । यह श्रन्तर, जब तक काव्य का श्रस्तित्व है तब तक बना रहेगा, इनका तिरोभाव होने से काव्य के प्रस्तित्व पर ही भ्राघात होता है। प्रयोगवादी कवि ने नवीनता की रोक में इसी मूल सिद्धान्त का तिरस्कार कर काव्य के मर्म पर चोट की है, झौर इसका परिणाम यह हुआ कि उसकी रचना प्रायः काव्य नहीं रह गई है, उसमें मन को स्पर्श भ्रथवा चित्त को द्रवित करने फो शक्ति नहीं रही । दूसरे शब्दों में उसमें रस का भ्रभाव है । पहले तो उसका भ्रर्य ही हाथ नहीं पड़ता श्र यदि दिमाग्र को खुरच कर उसका श्रर्य निकाल भी लिया जाय तो पाठक के मन॒ का प्रसोदन नहीं नहीं होता, श्रौर उसे एक प्रकोर की खीऋ-सी होती है।. प्रयोगवादी कवि का दूसरा श्राग्रह है उपचेतन की उलकी हुईं संवेदनाओं का ययावत् चित्रण । यहाँ भी वह एक भयंकर मनोव॑ज्ञानिक त्रुटि करता है। भ्रन्तचेंतन की संवेदनाएँ प्रायः सभी उलभी होती हैँ । कला या काव्य की सार्यकता ही यह है कि वह उस भ्ररूप को रूप देता है, उलभे हुए संवेदनों को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करता है। फ्ोचे के सिद्धान्त में थोड़ा भ्रतिवाद मानते हुए भी इस बात का विषेध नहीं किया जा सकता कि सहजानुभूति से पूर्व भ्रनुभव का स्वरूप ..._ संबेदनाओं को गुत्यियों से भिन्न नहीं है। कवि में सहजानुभूति की शक्ति जन-साथारण की भपेक्षा " प्रधिक होती है। प्रतएव जन-साधारण जिन उलमभे हुए संवेदनों का भ्रनुभव भर करके रह जाता
श्र काव्य-्धारा
है, कवि उनकी सहजानुभूति कर उन्हें रूप दे सकता है। यही मौलिक कवि-कर्म है, भ्रौर इस्तीलिए एक प्राकृतिक श्रावश्यकता के रूप में कविता का उद्भव हुभ्रा । परन्तु प्रयोगवादी श्रपने मन की उलभी हुई संवेदनाओं को यथावत् श्रर्थात् उसी उलभे रूप में उपस्थित करने के लिए उलदे-सीधे प्रयत्न करता हुझ्ा अ्रभिव्यंजना के मूल सिद्धान्त का ही तिरस्कार करता है। वास्तव में उसके प्रयत्न की श्रनिवार्य श्रसफलता ही उसके सिद्धान्त की अ्रसंगति का श्रकाट्य प्रमाण है । साधारणीकरण की पुरानी प्रणालियों के रुद्ध हो जाने की बात भी काफी विचित्र है । प्रयोगवादी की सफाई है कि साधारणीकरण की पुरानी प्रणालियाँ श्राज के जीवन की श्रति- हाय उत्तेजना को वहन करने में भ्रसमर्थ है । नई प्रणालियों की उद्भावना अ्रभी नहीं हुई, इसलिए कवि श्रपने श्रर्थात् व्यक्ति के भ्रनुभूत को सहृदय समाज का श्रनुभूत बनाने में श्रसमर्थ रहता है । परन्तु यह बात नहीं है। कवि नवीन प्रयोगों को धुन में साधारणीकरण के मूल सिद्धान्तों का ही निषेध रहता है। वास्तव में साधारणीकरण शैली का प्रयोग न होकर एक मनोवैज्ञातिक प्रक्रिया है जिसका मूल आधार है--मानव-सुलभ सह-श्रनुभूति । इसमें सनन््देह नहीं कि श्राज का जीवन विगत जीवन की श्रपेक्षा कहीं श्रधिक उलभझा श्रौर पेचीदा हो गया है और सानव-मन की प्रवृत्तियाँ भी उसी शअ्रनुपात से निविड़ एवं जटिल हो गई हैं। फिर भी साधारणीकरण के सिद्धात्त में इससे कोई शअ्रन्तर नहीं श्राता क्योंकि कवि मन की निविड़ता के साथ सहृदय के मन की निबिड़ता भी तो उसी श्रनुपात से बढ़ गई है। जिन परिस्थितियों ने कवि के मन को प्रभावित किया है उन्होंने सहृदय के मन पर भी प्रभाव डाला है। श्रतएवं कबि और सहृदय के मानसिक धरातल में एक- सा परिवत्तंन होने के कारण साधारणीकरण की स्थिति वेसी ही रहती है; परन्तु वास्तविकता यह है कि कवि साधारणीकरण का प्रयत्न ही नहीं करता। वह विशेष को साधारण रुप में प्रस्तुत करने के वजाय विशेष रूप में ही प्रस्तुत करने का बेतुका प्रयत्न करता है। आखिर उसके श्रौर सहूदय के बीच मानसिक सम्पर्क स्थापित करने का माध्यम तो वही हो सकता है जो दोनों के लिए साधारण हो । परन्तु वह इस साधारण को पुराता समभकर नये माध्यम की खोज में न जाने क्या-क्या चमत्कार दिखाता है। लेकिन वास्तव में यह-सब कुछ नहीं है। यह कवि की सहजा- नुभूति की विफलता मात्र है। उसने उलभन को एक प्रयोगवादी सिद्धान्त के रूप में ऐसे भ्राग्रह के साथ स्वीकार कर लिया है कि वह उसमें एक प्रकार के गौरव का श्रनुभव करता है। एक तो उसकी संवेदनाएँ ही इतनी उलभी हुई हें कि उनकी सहजानुभूति श्रर्थात् उन्हें विम्ब-रूप में प्रस्तुत करना श्रपेक्षाकृत कठिन है, दूसरे वह उलभम को ही संवेदनीय मान बेठा है। परिणाम यह होता है कि उसकी श्रभिव्यक्ति सर्वथा विफल रहती है। इसके श्रतिरिक्त श्रनेक स्थितियों में इस विफलता का कारण कवि में सहजानुभूति की श्रक्षमता भी होती है। कवि की श्रनुभूति में ही इतनी शक्ति नहीं होती कि वह संवेद्य को विम्बरूप में ग्रहण श्र प्रस्तुत कर सके । सहजानुभूति को क्रोचे ने कल्पना का गुर माना है। परन्तु यह कल्पना भी सर्वथा श्रनुभूति ही पर आ्राश्चित है। श्रतः सहजानुभूति के लिए शअनुभूति-क्षमता सर्वथा श्रपेक्षणीय है । जब तक श्रनुभूति में शक्ति नहीं है कवि के मन में संवेदनों का विम्ब बनना सम्भव नहीं है । प्रयोगवादी कवि बुद्धिव्यवसायी है, भ्रपनी अनुभूति पर उसे विश्वास नहीं है । परिणामतः वह सहजानुभूति में श्रसमर्थ रहता है, भ्रर्थात् श्रपने संवेद्य को विम्ब रूप में न तो वह ग्रहएा कर सकता है श्ौर न प्रस्तुत ही कर सकता है और इसके बिना काव्य-रचना सम्भव नहीं है । ; झब रह जाता है भाषा का एकान्त वेयक्तिक प्रयोग, जिसके भ्रन्तर्गत शब्दों का भ्नग्गंल
काव्य की रागात्मकता और बौद्धिक प्रयोग ५३
उपयोग, असाधारण प्रतीक-विधान प्रादि भ्राते हें । यह वास्तव में साधारणीकरणा-विरोधी प्रवृत्ति का ही स्थल रूप है भ्ौर उसी की भाँति प्रसंगत भी । भाषा एक साम्राजिक साधन है। उसकी सार्यकता ही यह है कि वह व्यक्ति के मन््तब्य को समाज पर प्रकाशित कर सके । भ्रतएव उसका प्रयोग सामाजिक ही हो सकता है, वैयक्तिक नहीं । शैली की बेयक्तिकता दूसरी बात है। शैली में शाब्द-संयोजना, वाक्य-रचना, लक्षणा, व्यंजजा भ्रादि का उपयोग निशचय ही व्यक्तिगत होता है, परस्तु शब्द का कोई श्रनर्गल प्रर्थ देना, भ्रयवा शब्दों की भ्रस्त-व्यस्त संयोजनाश्रों द्वारा किसी सर्वया झ्रसस्वद्ध भ्र्य की प्रतीति करना, यह भ्रप्रचलित प्रतीकों द्वारा किसी भ्रर्यग्यक्त भ्रनुभव-ख़ण्ड को झ्रतूदित करना तो भाषा के मूल सिद्धान्त के ही प्रतिकूल है। साधारणतः तो पाठक आ्रापके श्रलि- प्राय को समभेगा नहीं, किन्तु यदि भ्रापकी टिप्परियों की सहायता से समझ भी जाय तो उसे गोरखघस्वे को खोलने का भ्रानन््द मिल सकता है, काव्य का श्रानन्न्द नहीं मिल सकता । साधारण बुरूहता स्री रस-प्रतीति में बाघक होती है, लेकित जहाँ प्रयत्नपूर्वंक दुरुहता के सभी साधन एकत्र किए ग्रए हों, वहाँ रस श्रतोति कसी ?
सारांश यह है कि जीवन की भाँति काव्य में भी नवीनता झौर प्रयोग का बड़ा महत्त्व है, परल्तु ग्रावश्यकता इस बात को है कि मूल्यों का सन्तुलन बना रहे । जीवन के मूल तत्त्वों पर दृष्टि केन्द्रित रखते हुए उन््हों के पोषण श्रोर समृद्धि-विकास के निमित्त प्रयोग करना, उनको रूढ़ि भौर स्थविरता से बचाते के लिए नवीन गति-विधि का प्रन्वेषण करना सार्थक और स्तुत्य है। परन्तु यबि एल्ादुशत्व मात्र से वेर हो जाय ओर नवीनता की खोज श्रथवा नये प्रयोग साधन न रहकर साध्य बन जायें, उनको यदि जीवन के मल तत्त्वों से श्रधिक महत्त्व दिवा जाने लगे, तो वे भ्रपनी सार्थकता खो बेठते हे शोर प्रायः बाघक बन जाते हें । काव्य के विषय में भी ठीक यही बात है ॥ काव्य के मूलतत्व रस-प्रतीति पर दृष्टि केन्द्रित रखकर, काव्य को गतिरोध और रुूढ़ि-जाल से सुक्त करने के लिए नये प्रयोग स्तुत्य हैं; वे काव्य के साधक हें। परन्तु क्रम को उलट कर काव्य की पग्रात्मा का तिरस्कार करते हुए प्रयोगों को स्वतन्त्र महत्त्व देना, उन्हें ही साध्य मान लेना हलकी साहसिकता मात्र है काव्य-गत मूल्यों का भ्रनुचित तथा भ्रनावश्यक क्रम-विपर्यय है।
रामधारोीसिह 'दिनकर'
नई पीढ़ी
हिन्दी-कविता में जो नवीनतम क्षितिज भलकने लगा है, उसे लेकर संप्रान््त आ्रालोचकों में फाफी मतभेद है। किन्तु, में बड़े उत्साह में हेँ। छटी सदी में भामह ने यह प्रइन उठाया था कि कविता की श्ात्मा क्या है। कविता की श्रात्मा उन्होंने भ्रलंकार को माना। किन्तु, झ्ाग चलकर वामन को यह बात ठीक नहीं जेंची । कारण, अलंकार का रमणी के लिए जितना महत्त्व है, कविता के लिए उससे भ्रधिक नहीं हो सकता । श्रतएवं, वामन भामह की श्रपेक्षा फुछ भ्रधिक गहराई में गये श्रोर उन्होंने कहा, कविता की श्रात्मा रीति हो सकती है। रीति क्या है ? कबि बराबर अपने लिए एक ऐसी राह बनाता है, जो पहले नहीं थी; यह रीति है । संसार में मनुष्य रोज पैदा होते हैं, किन्तु, दो मनुष्य एक समान नहीं होते; यह रीति है। प्रत्येक कवि प्रत्येक दूसरे कवि से भिन्न होता है; यह रीति प्रमाण है। रीति बड़ी ही गहराई का भ्रनुसन्धान थी, किन्तु, खोज वहीं तक नहीं रुकी । भामह से वासन तक जो प्रगति हुई थी, उसका लाभ आानन्दवर्धन ने उठाया, झोर उन्होंने घोषणा की कि कविता को थश्रात्मा ध्वनि है। श्रर्यात् कविता वह नहीं है, जो कहा जाता है, बल्कि वह जिसकी ओर संकेत किया जाता है। मेरा विचार है, सारे संसार की झ्ालो- चनाओश्रों को निचोड़ डालें; तब भी उससे भ्रधिक गहरी बात का पता नहीं चलेगा, जिसका पता ध्वनिकार को चला था।
कुछ वसा ही प्रश्न हमारे समय में भी उठने लगा है, यद्यपि, इस बार यह समस्या आलो- चकों के श्रागे नहीं, कवियों के सामने है। नये कवि, व्याजान्तर से, इसी बात का प्रयोग कर रहे हैं कि कितने ऐसे उपकररा हैं, जिन्हें छोड़कर भी कविता कविता रह जायगी । सिद्ध है कि कविता केवल कोमल शब्दों के जोड़ में नहीं है; इसलिए, कोमलता की परम्परा टूट रही है। सिद्ध है कि कविता के विषय निर्धारित नहीं किये जा सकते; इसलिए, भ्रपरिचित, श्रप्रत्याशित झौर झनपेक्षित विषय कविता में भरते जा रहे हैं । रवि बाब् ने कहा था कि यदि किसी को स्वस्थ, सुबिकच और सुनवीन पुष्पों के बदले घुन लगे हुए श्रन्धे-कान फूल ही पसन्द श्राते हों, तो उन से प्रेम करने का उसे पूरा अधिकार है। इस उक्त में जो व्यंग्य था, वह तो कपुर के समान उड़ गया; जो बाकी बचा, उसका उपयोग श्राज कवि के जन्म-सिद्ध श्रधिकार के रूप में किया जा रहा है।
हिन्दी में जो कुछ हो रहा है, उसे इलियट श्रादि अंग्रेज्ञी कवियों का श्रन्धानुकरण नहीं कहना चाहिए। अनुकरण का काम दो-चार या दस श्रादमी कर सकते हें । पूरी-कौ-पूरी पीढ़ी श्रनुकरण के रोग से ग्रसित हो, ऐसा मानने का कोई ठोस श्राधार नहीं है । मेरा श्रनुमान है कि जिन झव- स्थाओ्रों ने इंग्लेण्ड में नये कवियों को उत्पन्न किया, उनसे समिलती-जुलती श्रवस्थाएँ श्रपने यहाँ के बुद्धिजीवियों को भी श्रनुभूत होने लगी हें। इसलिए, उनमें भ्रौंर यूरोपीय कबियों में थोड़ा-बहुत
नई पीढ़ी ५५
साम्य दिखलाई दे रहा है। कोलाहल तो बड़े जोर का है श्रोर लगता भी एसा ही है कि लड़के झपने पुरखों के कलात्मक भ्रसबांबों को तोड़-फोड़ कर ही दम लेंगे । किन्तु, यह नवागम का भी रोर हो सकता है । संभव है, बाढ़ में बह कर बहुत-से ऐसे लोग भी भ्रा गये हों, जो कवि नहीं हैं । किन्तु भविष्य पर जिनके पंजों की छाप पड़ने वालो है, वे कवि-पुंगव भी इसी भुण्ड में छिपे हुए हैं । नई झालोचना का धर्म हैं कि वह उन्हें भीड़ से ऊपर लाये, उनके योग्य झ्रासन भर पीढ़े की व्यवस्था करे ।
विश्वम्भर 'सानव'
कविता ओर आलोचक
कविता किसी देश की संस्कृति का श्रनिवार्य अंग है। उसकी उपेक्षा करना उस देश की श्रात्मा की उपेक्षा करना है। ऐसी दशा में यह संभव ही नहीं है कि हमारे श्रालोचक, जिन्हें दूसरे शब्दों में संस्कृति के प्रहरी कहा जा सकता है, कविता की गति-विधि से उदासीन हो जायें ।
जेसे प्रत्येक व्यक्ति कवि नहीं हो सकता, बसे ही प्रत्येक प्राणी कवि को ठीक से समझ भी नहीं सकता । यही कारण है कि काव्य के वास्तविक मम को ग्रहण करने के लिए आलोचक की भ्रपेक्षा होती है ।
एक ही कृति की समीक्षा कई दृष्टिकोणों से हो सकती है । यह बहुत संभव है कि ये दृष्टिकोण विभिन्न श्रालोचकों द्वारा प्रस्तुत किए गए हों; श्रतः जहाँ तक कोई विशेष बात उठाने का प्रशन है, वहाँ ये सभी समीक्षाएँ महत्त्वपूर्ण मारी जानी चाहिए । ऐसी समीक्षाश्रों से यदि वे हेष के कारण नहीं लिखी गई तो हानि के स्थान पर लाभ ही होता है। हिन्दी में कई ऐसे काव्य-प्रंथ हैं, उदाहरण के लिए हम रामचरित मानस, कामायनी श्रोर दीपशिखा को ले सकते हें, जिनकी आलोचना बार-बार होनी च।हिए । ऊँचे किसी महापुरुष के व्यक्तित्व के सभी अंगों से किसी एक ही व्यक्ति को पूरी जानकारी नहीं होती, वेसे ही यह बहुत संभव है कि किसी महान् कृति की शक्ति और सौन्दर्य का पूर्ण पारखी कोई एक श्रालोचक न हो । सर्वांगपूर्ण समीक्षा तो कोई बहुत ही समर्थ और अंतद् बव्टि-सम्पन्न श्रालोचक ही कर सकता है।
इसके झ्तिरिक्त युग-धर्मं के साथ ही काव्य-प्रंथों की श्रालोचना का रूप बदलता रहता है । महान ग्रंथों की विशेषता यह होती है कि वे सभी युगों में किती न किसी रूप में झपना प्रभाव बनाए रखते हें। उनमें शब्दों और शब्दों के श्र्थों से परे ध्वनित और व्यंजित होने वाला कुछ ऐसा भ्रनिवंचनीय सौन्दर्य निइ्चत रहता है जो झ्ालोचना की पूरी पकड़ में कभी ठीक से भ्रा ही नहीं सकता । श्रतः यह झ्ावश्यक है कि महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की श्रालोचना न केवल भिन्न-रुचि रखने वाले व्यक्तियों द्वारा हो, वरन थोड़े-थोड़े काल के पश्चात् भी होती रहे जिससे पाठकों को यह पता चलता रहे कि श्राज भी उसमें कितना और कौन-प्ता अंश सारवान है ।
बीसवीं शताब्दी इस बात में विलक्षर भ्रवव्य मानी जा सकती है कि इसमें साहित्य की सभी विधाओं--कविता, उपन्यास, आलोचना, कहानी, नाठक, निबंध--का श्रभूतपूर्व विकास हुआ है । झ्रालोचना का विकास तो यहाँ तक हुआ कि कवियों तक को प्रकृति श्रालोचनात्मक हो गई और वे व्यवस्थित ढंग के श्रालोचकों ([270[025570:9 ८7३८४८७) की भाँति भ्रालोचनात्मक निर्णय देने लगे । यह प्रकृति काव्य के उचित मूल्यांकन में कहीं-कहीं बाधा बनकर खड़ी हो गई है ।
भ्रच्छा यह हो कि हमारे श्रालोचक की भ्रपनी कुछ मान्यताएँ हों, जो उसे और उसके पाठकों
कविता ओर आलोचक श्ऊ
को स्पष्ट रहें । ये मान््यताएं परम्परागत झ्रालोचना के सिद्धान्तों से भी प्रहणा की जा सकतो हैं, कृति विद्योय पर भी झ्राघारित हो सकती हैं, श्रौर मोलिक चिंतन का परिणाम भी हो सकती हैं | तात्पय॑ . यह कि जीवन भ्रोर कला के प्रति भ्रपना कोई दृष्टिकोश न होने से एक स्वस्थ झौर संतुलित दृष्ठि- ._ कोण का होना कहीं प्रविक भ्रच्छा है । इस दृष्टिकोण के प्रति श्रालोचक की झास्था होनी चाहिए . और अपनी बात को बलपूर्वक कहने का उसमें साहस होना चाहिए । झ्राज़ की कविता को डाँवाडोल स्थिति के बहुत-से कारणों में से एक कारण यह भी है कि भ्रालोचकों का भ्रपना कोई दृष्टिकोण नहीं है प्लौर पथ-निर्देश की क्षमता तो संभवतः झाज किसी में हे ही नहीं ।
विनयमोहन शर्मा
कविता का सत्य ओर उसकी लयमयता
यह सच है कि झ्लाज की कविता पाठक में प्रेषणीयता नहीं पेदा कर पाती। उसके मन में उद्देलन, भावनाओं में सिहरन और चिन्तन में विशिष्ट रूपाकृति नहीं दरसा पाती । इसीसे वह कह उठता है “कविता का युग बीत गया ।” तो क्या सचमुच कविता का युग श्र नहीं रहा ? क्या झ्ाज हमारा कवि भावना-शून्न्य हो गया ? क्या उसके मन में उसके सामाजिक जीवन से उद्भूत सुख-दुख की कोई हिलोर नहीं उठती ? क्या वह कभी प्रकृति के दृश्यों के साथ आ्लात्मसात नहीं होता ? कया उसमें अपने को अ्रभिव्यक्त करने को क्षमता क्षीण हो गई है ? श्रथवा पाठक की रसग्रहण -शीलता ही सो गई है ? वह भ्राज की कविता में क्या देखना चाहता है ? श्रादि प्रश्न हें जिन पर हमें विचार करने की श्रावश्यकता है। किसी भी साहित्य-प्रकार (विधा) का मूल्यांकन उसक्रे “रूप” पर भ्रवलस्बित है। और उसकी उत्कृष्टता की कसोटी उसकी ईमानदारी में निहित है । यदि “साहित्य” जीवन से उद्भूत नहीं है भ्रौर जीवन के लिए नहीं है तो उसका क्ष्या उपयोग है ? वह “ह॒विष्य” किस देवता के लिए है ?
में कविता के मूल्यांकन में “भाव श्ननूठे चाहिए भाषा कसी भी हो” वाले सिद्धान्त को नहीं मानता । में 'भाव' के साथ उसकी अ्रभिव्यक्ति के प्रकार को भी ग्रावश्यक समभता हूँ, भाव भ्रौर शली के बीच की भेदक रेखा मुझे सान््य नहीं है। भाव और शेली की एकरूपता में ही काव्य का सौन्दर्य निखरता है। यदि भाव-व्यंजक शब्दों की योजना नाद-माधुयं की दृष्टि से न को गई तो बिखरे हुए भाव-प्रतीक (शब्द) हमारे मन में कंसे ठहर सकेंगे ? कविता को पाठक के मन में संचरित करने के लिए हमें उसके रूप-विधान पर भी जोर देना होगा । श्राज कई तथाकथित प्रयोग- वादी रचनाओं की असफलता का एक कारण यह भी है कि उसमें रूप-विधान पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया जाता । काव्य में जीवन का “सत्य जब लयमय भाषा के माध्यम से उपस्थित होता है तब वह हमारे संवेदनशील मन में बहुत समय तक गुंजरित होता रहता है । विद्यापति और मीरा के पदों को अमुद्रित भ्रवस्था में भी वर्षों तक कंसे जीवन प्राप्त होता रहा ? 'जगनिक' की “आल्हा' को किन उपकरणों ने प्राण-दान दिया ? यदि उनमें गेय रूप-विधान का भ्रभाव होता तो हम बहुत से जनप्रिय कवियों को कभी का विस्मृत कर चुके होते ।
शाल्तिप्रिय द्विवेदो
छायावाद के बाद
।« ./. अतंमान हिन्दी-कविता का सर्वोच्च विकास छायावाद में हुआ--भाव, भाषा श्रौर शेली को दृष्टि से छायावाद के बाद खड़ों बोलो को कविता का क्रमशः पतन होने लगा । “निराला, पंत महादेवी ने काव्य में जो झ्रात्म-निर्माणा दिया था साथना को उस ऊँचाई तक फिर कोई कवि नहीं उठ सका । “बच्चन' इत्यादि ने उदूं -शायरी के प्रभाव से भर “दिनकर' इत्यादि ने राष्ट्रीय-काव्य के प्रभाव से कला को व्यंजकता बनाए रखने का प्रयत्न किया | किन्तु हमारे जीवन की ही तरह जब हमारा साहित्य भी अपनी ही परम्परा शोर श्रपने हो देश की सीमाझ्रों में झ्रात्मस्थ नहीं रह सका तब श्रन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को तरह साहित्य में अन्तर्राष्ट्रीय विचारधारा का भी प्रभाव पड़ने लगा । बतंमान वातावरण में प्रगतिवाद अपेक्षाकृत भ्रधिक जीवन और साम।/जिक संवेदन बनकर साहित्य में झा गया । यद्यपि प्रगतिवाद के कारण काव्य के लालित्य में श्रीवृद्धि नहीं हो सकी और सच तो यह कि जब जीवन हो लालित्य-शून्य होता जा रहा हैं तब साहित्य में उसकी श्राशा कहाँ तक की जा सकती है ।
प्रगतिवाद ने साहित्य को काव्य से गद्य की ओर मोड़ दिया । इसके बाद प्रयोगवाद ने छायावाद को संरक्षता शोर प्रगतिबाद की वास्तविकता के संभिश्रण से साहित्य में नवीन काव्य- प्रयास प्रारम्भ किया । यहाँ तक तो अभ्रनेक मतभेदों के होते हुए भी रचना-शिल्प की दृष्टि से फिर भी एक साहित्य-साथना बनी हुईं थो; किन्तु इसके बाद मुक्तछन्द के रूप में कविता की जो दुर्दशा हो रही है वह श्रसहा भौर प्रक्षम्य है।
हमारी झ्राशा उन नवांकुरित तरुण कवियों की ओर है जो श्रव भी काव्य को प्रकृति के साम्निध्य में रसात्मक बना हुए हैं । ऐसी कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में कभी-कभी अपनी मनोरम भलक दे जाती हें । इस मरुस्थल की तरह रूखे-सूखे युग में ऐसी कविताओं से हृदय को श्रोसयिस की तरह सुख-शान्ति मिलती है । परमाणु-युग के कारण कविता ही नहों, सम्पूर्ण सृष्टि का भविध्य भ्रन्धकारमय हो गया है । मेंसे ग्रपनी नई पुस्तक-“दिगम्वर' (आपन्यासिक रेखांकन) के अंतिम परिच्छेद में यह प्रइन उप- स्थित किया है कि अणुबम कया चाँदनी का सुख-शान्तिमय साम्राज्य भी समाप्त कर देगा। परमाणु-युग के कारण यदि प्रकृति नहीं मिट जाती तो उसकी अजख्रता जीवन श्रौर
कविता में चिरन्तन झ्मृत-प्रवाह बनकर बहती रहेगी ।
है एवमस्तु !
डा० रामकुमार वर्मा
मेरा दृष्टिकोण
कविता को जीवन की एक पवित्र शझ्ननुभूति मानता हूँ, इसीलिए कविता में हृदय की उन समस्त प्रेरणाओं का श्राकलन रहता है जो जीवन के नेतिक धरातल को अ्रधिक से श्रधिक ऊंचा उठा सकती हें । यह परिस्थिति किस भाँति हृदय में उपस्थित होती है यह तो में नहीं जानता किन्तु जेसे ही कविता लिखने बेठता हूँ वेसे ही समस्त भावनाएं ऐसे केन्द्रबिन्यु में सिमंट जाती है, जिसमें कण्ठ का स्वर गूंजता है, जीवन की स्वस्थ संवेददा की परिधि स्वयमेव निर्मित होती है झौर तब उसका लक्ष्य चाहे श्राध्यात्ममाद की ओर हो चाहे लोौकिक जीवन के पवित्र सोन्दर्य की झोर हो । सौन्दर्य की पवित्रता श्रन्ततः प्राध्यात्मवाद की श्लोर ले जाती है, ऐसा मेरा अ्रतुभव है । यही कारण है कि मेरी रचनाएँ जहाँ भावपक्ष में किसी पविन्नतम श्रनुभूति का बीजवपन करती हैं वहाँ कलापक्ष में वे स्वयंभेव ललित शब्दों की सृष्टि को । सें भी यह नहीं मानता कि भावपक्ष में मेरी रचनाएँ जीवन की अ्रचित्य गहराइयों का श्रवगाहुन करती हैं, पर यह में भली भाँति जानता हैँ कि जो बात भी मेरे हृदय से निकलना चाहती है वह स्पष्ट श्रौर पूरिमा की ज्योत्स्ता की भाँति निर्मल होती है। यह कोई श्रहंबाद नहीं है क्योंकि श्रालोचना के क्षेत्र में कुछ भ्रनुभव रखते के कारण में स्वयं अपती रचताश्रों को उनके निर्मित हो जाने के बाद झालोचना की तीखी कसोटी पर कस लिया करता हूँ ।
इसमें कोई सन््देह नहीं कि जीवन के क्रम में घटित होने वाली घटनाओं से मेरा लगाव नहीं के बराजर है। इस दृष्टि से लोग मुझ्के पलायनवादी भी कह सकते हें किन्तु में यह अनुभव किया करता हूँ कि प्रतिदिन घढित होने वाली घटनाएँ किसी समाचार-पत्न की सामग्री बन सकती हैं, मेरी कविता की सामग्री नहीं । सम्भवतः इसका कारण यह हो कि में उस स्थूल में इतना विश्वास नहीं करता जितना सूक्ष्म में । यद्यपि स्थूल मेरे प्रतीकों का श्राधार भ्रवद्॒य बन जाता है। में कुछ ऐसा समभता हूँ कि जिस तरह एक सुवासित पुष्पमयी लता भूमि से उत्पन्न होती है श्नोर बिना भूमि के लता की उत्पत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु भूमि ही लता नहीं है । उसी प्रकार स्थल वस्तु-जगत से काव्य की सुवासित प्रेरण्ायें उत्पन्न होती हें किन्तु बे प्रेरणायें स्थल नहीं हें यद्यपि उन्हें स्थल का झाश्रय है।
मेरा जीवन कुछ ऐसी स्थितियों से गुजरा है जिसमें घटनाएँ नहीं के बरबर रहो हें श्लौर यदि रही हैं तो उन्होंने मुझ पर विशेष प्रतिक्रिया उत्पन्त नहीं की । संभवतः जीवन के संधर्ष मेरे सामने नहीं झ्लाये; सम्पन्न घर में पोषित हुआ, एम. ए पास हुआ, तुरन्त नौकरी मिल गई इच्छा- नुसार कार्य करने का श्रवसर मिला, मित्रों से सहदयता प्राप्त की, जीवन में उत्साह और उमंग का में कुबेर बना रहा । देनिक समस्पाञ्रों से जुकने का अ्रवसर मुझे नहीं सिला झौर इसी करण यह
मेरा दृष्टिकोश ६१
घटनाएं मेरे सामने चित्रपट के कोतृहल को भाँति श्रायीं झौर चली गयों । शेशव से ही मेन देखा कि मेरा परिवार भक्तिप्रवण है, उसमें सांस्कृतिक भ्राचार-विचार के लिए भ्रधिक सुविधा है, तुलसी झोर कबोर की भक्ति ने मेरे सत्र भौर प्रस्तःकरणा का निर्माण किया है। ऐसी ।स्थति में रहस्य- बाद के प्रति भ्रतुरक्ति होना मेरा स्वभाव-सिद्ध श्रधिकार-सा रहा है। उसमें किसी प्रकार के श्रायास के लिए स्थान ही नहीं था । परिणामस्वरूप काव्य-जीवन के कुछ समृद्ध होते हो मेरी रुचि निसर्गतः रहस्यवाद की झोर भ्राकृष्ट हुई भौर तब से श्रव तक जो रचनाएँ मेने लिखी हैं, जो कविताएं मेंने लिखो हैं उसमें किसी प्रकार के परिवर्तन को प्रावश््यकता मेंने श्रनुभव नहीं की । हिन्दी-काव्य के बिकास में झनेक युग झाये ओर चले गये । प्रगतिवाद श्रौर प्रयोगवाद के भी भ्रनेक आक्रमण मुझ पर हुए, मेंने सबको सहानुभूति को दृष्टि से देखा । विविध काव्यगत दृष्टिकोसों ने मुझ्के लोकप्रियता का लालच भी दिया, किस्तु में श्रपनी भाव-भूमि पर स्थिर रहा शौर जो अनुभूति प्राण्पों में समा - गई थी बह न निफल सकी और न मेंते निकालने का प्रयास ही क्षिय्रा । यही कारण है कि भ्राज भी जब में कवित। लिखने बंठता हूँ तो श्रपनी परिस्थितियों को भूल जाता हूं और स्थल में निहित जो जीवन को रूप-राश्षि है; कश-करा में विखरी हुई पड़ी है उसकी रेखायें संवारने लगता हूँ । में अपनी चार कवितायें झ्रापके सामने रख रहा हूं । पहलो रचना है 'साबना के स्व॒र'। मेंने कबिता को साथना के रूप में हो समझा है श्नौर जीवन का भ्रनन्त सोन्दर्य जिसका संगीत प्राण में प्रनवरत गति से हो रहा है वह क्षरा-क्षण में मधुरतर होता जा रहा है। संयोग में सुख है लेकिन संयोग + चेण्टा में झारम्द है, क्योंकि इस चेज्टा में सुल्व की प्रत्येक किरण कश-करा में समाकर प्रगतिशील होती हुई दृष्टिगत होती है । संभवतः इसी चेब्टा का नाम विरह है और विरह जो मिलन का प्रयत्न है बह मिलत से प्रियतर है, इसमें कोई सन्देह नहीं । जीवन के भ्रनुभव में किसी क्षण में उत्पन्न हुई पहि- चाल प्राणों के लिए एक सुखद जीवन का निर्माण करती है, जो मिलन-बिन्जु विरह की रेखाओं के सिलने पर स्थित है वह कितनी सुलद स्मृतियों का कम्पन लिए हुए है! उसी में उमेंगती हुई उर्मियों को ध्वनि कानों तक पहुंच जाती है। प्रेम की यह् चरम-सावना जिसमें प्रिय फी कथा जाग उठतो है जीवन को ऐसी दिशा में खींच ले जाती है, जिसमें प्रानन्द की भ्रनुभूतियाँ निवास करती हें । यह झनुभूतियाँ अनेक प्रकार के रूपक ग्रहण करतो हैं, थे चाहे शतदल के मधुर रंग हों, चाहे वेशिका के स्वर-सिन्धु हों, चाहे वीणा के यंंजते हुए तार हों, यह् सब प्राण फी प्रभातो का ही स्वर ग्रहण करते हैं ।
दूसरी कविता “आात्म-परिचय' हें । अनेक वर्व पहिले मेंने “किरख-करणा' शीर्षक कविता लिखां थी जो सम्पूर्ण रूप मे आध्यात्मिक दृष्टिकोर से प्रेरित हुई थी जिसमें झ्रात्मा को परमात्मा रूवी दीपक का एक किरणा-कणा कहा गया था। उस कविता में चिन्तन-पक्ष प्रधान था। पिछले बर्षो' को मानसिक प्रगति इस दृष्टिकोण को प्रनुभूति के क्षेत्र तक तो भाई ऐसा ज्ञात होता है और उसी भावभूमि पर प्रस्तुत कविता का निर्माण हुआ । इस कविता में वही दृष्टि-बिन्छु रेखाओं का रूप लेकर एक चित्र के रूप में स्पष्ट हुआ ज्ञात होता है । प्रेम की परिपूर्णता में श्रात्मसमर्पएण को स्थिति है और जब क्षितिज-रेखा के हट जाने से दो संसार एक हो जाते हें तो दोनों में जो एक-रूपता होती है बही भ्रनेक-अनेक प्रतीकों से इस कविता में स्पष्ट हुई है। किन्तु कठिनाई यह है कि श्राग की उष्णता प्राप्त कर कोयेला भ्राग का रूप तो बन जाता है पर अझ्न्ततः वह कोयला ही तो रहता है जो क्षण-क्षण में भस्म होता रहता है । उसी भाँति यह जीवन प्रध्यात्म-किरणों से भ्रालोकित होते हुए भी अन्ततः जोवन ही तो है जो क्षण-क्षण में ऐन्द्रिकता के प्रभाव से मुक्त होना चाहता है। तभो
६२ काव्य-धारा
तो हृदय-बीणा का तार घटनाओं की चोट से टूट तो जाता है। किन्तु उसकी संगीत-लहरी गंजती रहती है; हृदय का पुष्प सूख तो जाता है परन्तु उसकी सुगन्धि दिशाझ्रों को परिव्याप्त किये रहती है; जीवन मृत्यु की गहराई में ड्ब तो जाता है; किन्तु उसकी प्रेरणायें मृत्यु पर भी विजय प्राप्त करती हैं । इस जीवन के क्षण बीतते चले जा रहे है, किन्तु उनके बीतने की शभ्रवधि जैसे-जेसे कम होती जाती है बेसे-देसे उसकी मादकता और भी बढ़ती है। यह जीवन किस ग्रन्थि से बंधा हुआ है यह भ्ज्ञात है तभी तो चाहते न चाहते हुए यह साँसे जाने किस संकेत से रात-दित चलती रहती हैं झौर जीवन की यह दीप्ति सो-बार कठिनाइयों के शलभों से ककभोर दी जाती है, किन्तु बुभती नहीं है, जलती चली जा रही । जीवन की यही प्रेरणा संसार को वेभव सम्पन्न करती है श्रौर इसीलिए : भ्रध्यात्म-क्षेत्र की निराशा जीते रहने का सबसे बड़ा भ्राशावाद है।
तीसरी कविता भ्रसफलता की लकीरें हैँ । यह कविता श्रात्म-विश्लेषण की संवेदना लिए हुए है । जब जीवन गनन््तव्य पर पहुँचने की भ्रनवरत चेष्ठा करता हुआ भी इन्द्रियों के ह्वार पर रुक जाता है और गत साधना पर दृष्टिपात करता है तो उसे चारों झ्रोर श्रपृर्णता ही श्रपुणंता दिखाई देती है । उस समय भविष्य के कोड़ में अ्रनंग की भाँति छिपा हुआ भाग्य जीवन का परिहास करता है और जीवन के शिवत्व पर अपने शक्तिशाली वाण का प्रयोग करता है। करुण-पथ पर चलता हुआ हृदय का रथ बार-बार विपत्तियों की खाइयों में धंस जाता है श्र विवेक का संचालन सूत्र ढीला पड़ जाता है। किन्तु न जाने प्रकृति ने जीवन में कितनी प्रेरणाएं भर दी हैं, यह छोटा-सा अंकुर भू-गर्भ के श्रन्धकार में कौन-सी जीवन की ज्योति छिपाये हुए है जो मिट्टी श्नौर पत्थरों से लड़ता हुआ अपने प्राणों की सुगन्बि छोटे से पुष्पों में बटोरकर पृथ्वी पर निकल आ्राता है श्रौर सूर्य को किरणों का भ्रभितन््दन स्वीकार करता है। उसी प्रकार यह साँसें बारबार बाहर निकलती हैं, किन्तु झ्रन््ततः उनकी जड़ कितनी गहरी है कि वे भ्रपनी शक्ति संसार में बिखराकर भी बारबार निकलने के लिये झातुर रहती हें प्लौर कभी शीतल ओर कभी ऊष्ण बतकर संसार में सुख-दुख का सन्देश बाँटती रहती हैं । इनकी शक्ति पर मुझे विश्वास है, इसीलिए यह भ्रसफलता की लकीरें आगे चल कर जिस चित्र का निर्माण करती हें वह चित्र जीवन के बेभव का है। मस्तिष्क के छोटे से कोष में स्मृतियों के अ्रथाह सागर लहराते हैं श्रौर जीवन की क्षीण किरण भविष्य की सम्पूर्ण कला बनना चाहती है। इसीलिए तो में जीवत को नहीं मृत्यु को क्षणभंगुर मानता हूँ; भौर जीवन एक शाइबत विधान है जो मृत्यु के पहिले भी है और बाद में भी। भले ही इस विस्तृत पथ में मेरी गति झचल-चरणा की भाँति एक क्षण भर को स्थिर रहे, किन्तु पेर श्रागे बढ़ाने के लिये भी तो चरण को स्थिर होना पड़ता है, इस स्थिरता में भी तो गति है और प्रगतिशील होने का अ्रमोध मस्त्र।
चौथी कविता है 'जागरण-गीत' । में प्रकृति को श्राशावाद का सबसे बड़ा केन्द्र मानता हूँ । कीटस ने भी ओ्रो टु नाइटेंगेल' में कहा है--“दाऊ आस्ट नाट बाने फार डेय, ओरो इसार्टल बर्ड नो हंगरी जेनेरेशन्स, ट्रंड दी डाउन”। |
उसी तरह प्रकृति का प्रत्येक पुष्प अमर है; व्यष्ठि-रूप से वह भले ही मुरकझा जाय; परल्तु समष्टि-रूप से वह श्रमर है, उसकी परम्परा श्रमर है। इसलिए यदि मनुष्य अ्मरत्व चाहता है तो वह प्रकृति के समानान््तर बन जाय । यदि विज्ञान की दृष्टि से भी देखा जाय तो मनुष्य भी तो उसी गरिणत से प्रशासित है जो गणित प्रकृति अपने करोड़ में छिपाये हुए है। नाटक के बीज, बिस्दु, पताका, प्रकृति, कार्य की भाँति प्रकृति का प्रत्येक श्रवयव॒ सम्पूर्ण होता है और उसी भाँति मनुष्य: की इस प्रकृति के प्रत्येक करा में एक स्वर है; एक तरंग है; मनुष्य अपने अ्रहंवाद से अ्रनुशासित-
मेरा दृष्टिकोण ६३
होकर इस प्रकृति से दूर होना चाहता है भ्रोर वह जेसे ही प्रकृति के नियमों से भ्रलग होता है बसे ही उसके विकास की गति रुक जाती है। पभ्रतः विकासोग्मुखी जीवन के लिए प्रकृति का स्वभाव- ग्रहण करना मानव के लिए भ्रनिवार्य है । जागरण-गोत में इसी प्रकृति के प्रतिबिम्व में मानव को साकार होने की झ्रावश्यकता है । इसलिए कि मनुष्य प्रकृति का सबसे सुन्दर चित्र है, न जाने कितने परिश्रम से प्रकृति ने मनुष्य का निर्माण किया होगा, कितने पुष्पों को सुगन्धि, सुषमा श्नौर जीवन- शक्ति को मिलाकर मनुष्य का निर्माण सम्भव हुप्रा होगा और मनुष्य इसका भ्रनुभव नहीं करता; इसी जागरण में मनुष्य प्रकृति का भ्रधिनायक है; मानवी सत्य सर्वोपरि है उसी में वह भ्रनन््त शक्तियों का साधक बन सकता है झौर वह स्वयं पृथ्वी पर निर्माण का सूत्रपात कर सकता है । ... औओरे मन में तो बहुत सी बातें हें, किन्तु बह कही नहीं जा सकतीं । कहना भी चाहूँ तो शायद नहीं कह सकूंगा । भाषा तो भावना की भ्रभिव्यक्ति के लिय बहुत झोछा साधन है। इसोलिए झलेक बार प्रनेक रूपकों का ग्राश्रय प्रहण करना पड़ता है और श्रनेक प्रतीक उस भावना को झभि- व्यक्ति में सहायता पहुँचाते हैं, किन्तु बह भावना श्रपूर्ण ही रहती है। यह में सदेव मानता हूं कि काव्य में प्रनेकानेक प्रयोग होने चाहिये, किन्तु सबका लक्ष्य यही हो कि जीवन में शिवत्व और सुरुचि की भ्रभिवृद्धि कविता के माध्यम से हो । जीवन की भ्रनुपम भ्रौर भ्रचिन्त्य सम्भावनाओं के लिये काव्य से बढ़कर दूसरा साधन नहीं है, किन्तु इसके प्रयोग के लिए कवि को लक्ष्य-सिद्ध एकलव्य होने को भ्रावश्यकता है ।
गोपालकृष्ण कोल
नई पीढ़ी : नई कविता : दायित्व का प्रश्न
नई उम्र के कवियों को नई पीढ़ी में मान लेना जितना सरल है उतना ही कठित भी है, क्योंकि साहित्य में कमसिन लेखकों की जमात को केवल उनकी कम उम्र की बजह से नई पीढ़ी नहीं कहा जा सकता । बुजुर्ग लेखक भी साहित्य की परम्परा में नई पीढ़ी के श्रगुश्ना बन सकते हैं शोर बने भी हैँ । न ही श्रतीत में थंदा होने से हुर लेखक क्लासिक हो जाता है और न ही वर्तमान में जन्म लेने से हर लेखक नया बन सकता है। लेखक की श्रपनी उम्न साहित्य की परम्परा में नई- पुरानी पीढ़ी के चलने या बदलने, जन्म लेने या समाप्त होने का प्रमाण नहीं है । साहित्य में पीढ़ियाँ छृतित्व की उम्र के हिसाब से बनती श्रोर मिठती है। लेखक की उम्र से ज्यादा उसके इतित्व की उम्र महत्त्वपूर्ण होती है। कृतित्व के अ्रनुसार जब साहित्य में एक परम्परा अ्यनी पर्याप्तता श्रसिद्ध कर देती है तब उसके स्थान पर दूसरी परम्परा ञ्रा खड़ी होती है। नई परम्परा के बीज पुरानी परम्परा की श्रपर्याप्तता में ही पनपते हैं । परम्पराओं के सूत्र इसी रूप में कहीं न कहीं आपस में जुड़ जाते हैं । साहित्य में परम्पराश्रों के श्रान्तरिक और बाह्य परिवर्तन नई-पीढ़ी को पैदा करते हैं । ये परिवर्तत केवल ऐतिहासिक परिस्थितियों के बदलने का प्रतिबिम्ब मात्र नहीं होते; बल्कि जीवन ओर जगत के विविध संहिलष्ट सम्बन्धों की गतिशील पारस्परिक प्रतिक्रियाश्रों झौर गहरे प्रभावों के परिणाम-स्वरूप प्रतिफलित होते हैं ।
इसलिए नई उम्र के सभी कवि कविता में नई पीढ़ी की परम्परा में अपना स्थान नहीं बना पाते हैं क्योंकि केवल नई उम्र न तो नई चेतना का प्रमाण है श्लौर न ही कला और जीवन की जटिल परिस्थितियों की नई माँग को समझ पाने की शर्ते । हिन्दी में नई उम्र के अ्रनेक कवि कविता के रूढ़ रूप-विधान को शाश्वत मान कर विबेक-हीन और जीवन-बोध से शून्य भावुकता के सायाजाल से भ्रभी तक अपने को मुक्त नहीं कर पाए हैं । उनकी कोरी भाव॒कता उनकी कविता को 'बाक्स आफिस हिट' के श्राम बाजारू फिल्मों या फिल्मी गीतों की तरह सरल और सस्ते मनों- रंजन की वस्तु बना देती है। और बे इस प्रकार की लोकप्रियता को सफलता मान कर श्रपने कला-विकास की तमाम सम्भावनाओ्रों को कुंठित कर लेते हैं । कोरी भावुकता उस परिवर्तित जीवन सत्य को अनुभव झ्ौर अभिव्यक्त नहीं कर सकती, जिसकी श्रदम्य आवश्यकता ने कला की पिछली पोढ़ी की क्षमता को श्रपर्याप्त सिद्ध कर दिया है। गीत नामक रचनां में कुछ गिने-चुने रोमाञचक भावों में से किसी एक को कई अलंकार-चित्रों में उपस्थित करने का आरावृत्ति-परक ढंग नई उम्र के कवियों में सरलता से प्रचलित हो गया है। वे इस सीमित परिधि में ही चक्कर काटने में ही झ्पनी सार्थकता समभते हें । उनके मीतों का मीटर लाइट म्यूजिक की धुनों पर खड़ा होता है ।
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नई पीढ़ी : नई कविता : दायिस्व का प्रश्न ? ६५
लाकि वे उसको फिसी-न-किसी तरन्नृम में गा सकें श्रोर यह सिद्ध कर सकें कि झतका गौत गेय है। लेकिन क्या भावुक तुकान्त पद्य “लाइट म्यूजिक की गेयता पाकर गीत-काब्य बन सकता है ? क्या प्रावृत्ति-परक ढंग एक गीत को एक कविता बनाने को क्षमता रखता है? क्या इन गीतों का संगीत पभ्रपने स्वर-संकेतों से भाव-संकेत भी पेदा करता है ? क्या ये गीत “निराला' के काव्य-संगीत की परम्परा के उत्तराधिकारी हैं ? इस बिषय में “निराला' के गीत बहुत महत्त्वपूर्ण हैं भ्ोर उनके लिए शिक्षाप्रद हें, जो भावुक तुकान्त पद्य के पझ्राव॒त्ति-परक प्रकार को गीत समझ बेठे हें ।
दूसरी झोर काव्य-संगीत विशेषतः संगीत को भ्रधिक महत्त्व देने वाले कवि हिन्दी-भाषा में हो संगीतात्मक क्षमता का प्रभाव मानकर बंगाली को ओर देखने लगे हें। हिन्दी का व्याकरण ही उन्हें संगीत-विरोधी लगता है भ्रौर इसलिए वे जनपदीय बोलियों झ्ौौर भ्रन्य प्रान्तीय भाषाओं को संगोत-परक विशेषताझों को लाने के लिए भ्रपनी भाषा को ही विक्ृत करने को तंयार हें । वे यह नहीं देखते कि क्या बात है कि समान-कारक चिन्ह होते हुए भी उदू-काब्य में संगीतात्मकता क्यों पैदा हुईं, जब कि उदूं भोर हिन्दी एक-ही खड़ो बोली का विकसित रूप हैं ? प्रत्येक भाषा का शाब्द-संगीत भ्रलग होता है; यह संगीत भाषा में व्यवहार-परम्परा के माध्यम से लोक-मानस के भावों को स्वर-प्रयंभयों सतत पड़ने वाली प्रतिछ॒वियों से पेदा होता रहता है, काव्य में भाषा-संगीत के इस निचोड़ को प्रतिष्ठित करके ही गोत-काव्य को नए जीवन-सत्य का वाहक बनाया जा सकता है । गीतकारों को गीत को कोरी भावुकता से मुक्त करने के लिए एक झोर शब्दों के स्वर-भ्र्यभय संगीत को भाषा के संगीत से प्रहणा करना होगा और दूसरी भ्रोर नए-जीवन-सत्य को मुखरित करने की उसको प्रपर्याप्तता को भी समझना पड़ेगा ।
इस तरह के गीतों को प्रपर्याप्तता का भाव म॒क््त-छन्द के आग्रह का एक प्रबल कारण बन गया । मुक््त-छन््द का आधार भाव का वेग ही है। प्रजातन्त्र के मुक्तभाव ने वाल्ट ह्विटमेन को प्रोजस्वी तिर्भोक विचारों के लिए मुक््त-छन्द के पथ पर डाला था। दूसरी ओर म॒कक्त-छनन््द को अस्वस्थ मानसिकता के जटिल उदयारों की छाया में प्रतीकवादी और अ्तियथार्थवादी कवि-कला- कारों ने भ्रराजक रूप से विकसित करने का प्रयत्न किया । भविष्यवादी सायकोवस्की को मुक््त- भावना की व्यंगोक्तियों को मुक्त-छन््द के माध्यम से ही प्रभावशाली अ्रभिव्यक्ति मिली । बंगालो में रवोखनाय ने शोर हिन्दी में “निराला ने मुक्त-छन््द को रचना की परम्परा को झागे बढ़ाया । “निराला' ने अपनी छुन्द-रचना के आधार वेदिक छुन्दों तक में खोज निकाले थे । निराला ने स्वर-संकेतों से मुक््त-छल्द में आरोह-भ्रवरोह ओर प्रवाह पैदा करने का साहसिक सफल प्रयास किया । झ्राज हिन्दी में प्रनेक दूसरे नये कवि भी मुक्त-छन्द के प्रयोग से नये जीवन सत्यों को काव्य-रचना में मुखरित करने का प्रयास कर रहे हें । मुक्त-छन््द-रचना से सबसे बड़ी बात यह हुई कि भाषा को संगीतात्मक विशेषता को नजदीक से समझा गया और गद्य को भी काव्य के अभ्रनुकुल बल्कि प्रभिव्यक्ति के लिए अधिक उपयोगी झोर कलात्मक बना दिया' गया। मुक्त-छनन््द भ्रपनी भ्रराजकता को अवस्था को पार कर चुका है और शभ्रव वह स्वयं एक. सन्तुलित लय झौर संगठित प्रवाह के भ्रन्तर्गत विकसित हो रहा है श्र भ्राज मुक्त-छन््द-रचना का भ्रर्य छन्दहीन रचना कदापि नहीं है; बल्कि नये छन्दों के निर्माण के लिए मुक््त-छनन््द ने कवियों का पथ प्रशस्त कर दिया है । इसके विपरीत, मुक्त होने के कारण मुक्त-छन््द की सीमाप्नों को समझना कठिन भी है; भौर विशेषतः पुराने छन््दों से इस छुन्द का लय-संतुलन ज्यादा जटिल है। परिणाम
६६ काव्य-धारा
यह है कि जो मये कवि इसे सरल समझ कर कोरा गद्य लिख देते हैं वे मुक्त-छन््द को बदनाम करते हैं। अ्संबद्ध भाव-चित्रों को छोटे-बड़े व।क्यों के टुकड़ों में संकलित कर देने भात्र से मुक्त छन््द नहीं बन जाता है। मुक्त-छनन््द केवल एक प्रकार नहीं है। गहुरी भ्रनुभूति, सजग दृष्टिकोण झौर तीद्न ज्ञीवन-बोध जिस भावोद्गार के बेग को बोद्धिक संतुलन के साथ जो एफ मुक्त लघ-मय रूप प्रदान करते हें वह मुक्तव्छन्द का सहज रूप है। श्रभिव्यक्ति-प्रकार के भ्रराजकरूप को, जो मुवत-छन्द या किसी भी छन्द-विधान में प्रश्नय देते हैं, उन पर वृुरुहृता और. कृत्रिमता का श्रारोप लगाया जाना स्वाभाविक है। |
इन प्रकार-भेदों से ऊपर प्रमुख समस्या श्राज के कवि के सामने यह है कि उसकी अनुभूति की सीमा में जीवन-जगत की जटिल परिस्थितियों का वह यथार्थ केंसे समाएं। जो उस्चकी कला-वाणी में ध्वनित होकर लोक-मानस को भनभनाने में सहज समर्थ हो ? वह फंसे भ्रसावारण झनुभूति को साधारण श्रर्थात प्रेषणीय कलात्मक बना सके ? विज्येषतः हिन्दी के नये कवियों के सामने यह एक चेतावनी-भरा प्रइन है। क्योंकि छायावादी कविता का युग समाप्त हो गया है, स्वयं छायावादी कवियों की शैली एक सीमा पर श्राकर श्रपना चमत्कार खो बेठी है। और यह भी सत्य है कि छायावादी कविता हिन्दी की श्रेष्ठ कविता रही है श्रोर श्राधुनिक हिन्दी-कविता के भ्रग्रदृत छायावादी ही हैं ; फिर भी यह स्पष्ट है कि छायावादी काव्य-शेली श्रब नया चमत्कार दिखाने में भ्रतमर्थ है । इस शेली की भाषा ने ही स्वयं उसको झ्ाग बढ़ने से भ्रब रोक दिया है झौर नये कवियों क्री भाषा एक तया रूप श्रत्तियार कर रही है, जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों, समास-पुर्ण पदों, श्रन्वय से समर में श्राने वाली वाक्यावलियों की श्रधिकता को उतना स्थान नहीं रह गया है जितना छायावादी कविता में था। स्वयं 'निराला' जेसे छायावादी कवि ने नये भावों की अभिव्यक्ति के लिए 'नये पते! को रचनाश्रों में छायावादी भाषा के मोह को तोड़ दिया है, इसी तरह पन््त के. 'पल्लव' और 'ग्राम्या' की भाषा में अ्रन्तर है।
छायावाद के इस ह्वास के बाद महत्त्वपूर्ण काव्य-रचना का इसरा नया रूप अभी हिन्दी में स्पष्ठ नहीं हो पाया है। प्रत्येक नया कवि, जो सजग और विवेकशील है भर साथ ही कला के सामाजिक दायित्व को महसूस करता है साधारणीकरण की समस्या से चिन्तित है। इस समस्या को सुलझाने के निमित वह विदेशी कवियों से परामर्श करने के लिए भी मानसिक साहित्य-यात्राएँ करता है झौर दूर के चमत्कारों से प्रभावित होकर हिन्दी में नया चमत्कार करना चाहता है । बह एज्रा पाउण्ड के पास जाता है श्र टी० सी० इलियट से सलाह माँगता है। कुछ कान में गुरु-मंत्र भी लेने पहुँच जाते हैँ । किन्तु बावजूद शभ्रपती कला-सिद्धियों के ये दूर देश के कवि हिन्दी कविता पर सीवा प्रभाव नहीं डालते हैं श्रौर जिस ढंग की कविता प्रथन महायुद्ध के बाद अशान्ति और शंका के विश्वासहीव भाव से इन कवियों ने लिखी थी बह पुरवर्ती शैलियों की कई विशेषताशों से श्रनुप्रारणित थी और उसकी दिलष्टबोधता भी गुण मानी गई। टी० सी० इलियट का “दी बेस्ट लेण्ड' सन् १६२२ में युद्धोत्तर कविता के प्रतिनिधि रूप में प्रकाशित हुश्रा था। इलियट अपनी कविता में रईसों के तिहासत पर बेठकर इन्सानिवत को देखने का प्रयास करता है, वह वस्तृन्मुखी होकर भी अन्त में दान, दयनीयता और नियन्त्रण की वकालत करता है । विकृत छवि-चित्रों को नए प्रतीकों के माध्यम से उपस्थित करने में ही इन कवियों ने श्रपती विशेषता दिल्लाई और समाज में नए जीवन की सम्भावनाझों पर पर्दा डालने की एक प्रकार से कोशिश की है । वे भी एक प्रकार के _ भविष्य श्रौर नई सम्भावना की श्लोर संक्रेत करते हें; लेकिन उनका भ्रनुभान जीवन की ऐतिहासिक
नई पीढ़ी : नई कविता : दायित्व का प्रश्न ? ६७
परिस्थितियों के व्यापक यवार्य पर प्राथारित न होकर भय और प्राशंका के झ्राधार पर खड़ा किया गया है । नई हिन्दी कविता के लिए इन दूर देश के कवियों के कृतित्व से कुछ सीखने को भले ही मिल जाय लेकित हिन्दी कविता का नेतृत्व उनका कतित्व कदापि नहीं कर सकता, श्रौर दूर दूर के कवियों के तद्देशीय प्रदोगों को हिन्दी कविता की परम्परा श्ौर परिस्थितियों में सुधार के नुस्खे को तरह नहीं इस्तेमाल किया जा सकता । क्योंकि हिन्दी कविता की नई पीढ़ी की परिस्थितियाँ, सम- स्पाएँ भ्रौर सम्भावनाएं सिन््न हैं। श्राज भारतीय जीवन जिन ऐतिहासिक परिस्थितियों में से गुजर रहा है, बहुत कुछ समान होते दुए भी, उनकी वंसी ही प्रतिक्रिया यहाँ के जन-मानस और जीवन जगत पर नहाँ होती है जेसी पाइ्चात्य देशो में होती है । युद्ध, भ्ौर शान्ति, शोषण झोर भ्रत्याचार की प्रतिक्रिया पूर्व भौर पश्चिम में एक-सी नहों हो रही है, यह स्पष्ट है। इसलिए कला और संस्कृति के में भी जीवन-बोध, श्ौर विश्व-बोध फी सीमाएं भी बदल गई हैं। भारतीय जीवन में बावजद झाथिक शोषरणा-जन्य मानसिक पतन के एक विशेष प्रकार की नैतिक उदात्त मानवीय भावना गजती रहती है, जो साज्राज्यवाद, पूंजीवाद, झौर श्रव तमाम वादों का, जो मनुष्य के विकास की सम्भा- बताझ्रों को रुद्ध फरते हैँ, किसी न किसी रूप में विरोध करती है। इस उदात्त नतिक जीवन स्वर की चेतना केवल रुग्ण-समाज के मानस-चित्रों की विकृत प्राकृतियाँ खींचने में नहीं दिखाई दे सकती है । उसके लिए नए कवि को, झपने देश, भ्पनी परिस्थिति, भ्रपनी जमीन पर खड़ें होकर विद्व- जीवन के मर्म को समझना पड़ेगा-- यह रास्ता कृतिकार का रास्ता है श्र दूसरा रास्ता अ्रनुकृतिकार का रास्ता है । भ्ाज केवल “निज कवित्त केहि लाग न नीका' के आधार पर अ्रपने को नया कवि मानने के लिए दलबन्द साहित्यिक प्रयत्नों का जो सूत्रपात नई कविता के नाम पर हुआ है, उससे बचकर ही नई कविता अपने विकास की सम्भावना्रों के मार्ग पर झागे बढ़ सकती है। साधारण जीवन से भ्रसाधारण यथार्थ का चुनाव, उसको फिर नए सजीव सार्थक प्रतीकों के माध्यस से जन-मानस तक पहुँचाने के साधारणीकरण के कलात्मक प्रयास में ईमानदारी से लगकर ही नए कवि नई कबिता को नए युग-सत्य का सन्देशवाहक बना सकते हें । इसके विपरीत कविता को किन्हीं संकीर्ण सीमाश्रों में कंद करके रीतिकालीन प्रवृत्ति का नया संस्करण प्रस्तुत करना कविता में नयापन नहीं पैदा कर सकता है। हिन्दी कविता के नयेपन को सजाने संवारने, श्रौर सजीव बनाए रखने का उत्तरदायित्व उल सभी नए कवियों पर है, जो कला झोर जीवन के प्रति जागरूग दृष्टिकोण रखते हें श्रौर ईमा- नदारी से कला-साधना के पथ पर श्नग्नसर है, फिर चाहे बे मुक्त-छन्द में भ्रपने को प्रगट कर सके चाहें गीतों की तान में । लेकित इतना जरूर है कि जिन कैला-रूपों और काव्य-परम्पराप्रों की पर्याप्तता झ्राज असिद्ध हो गई है, उनसे भ्रागे ही हमको क़दम उठाना होगा, पीछे नहीं । झ्ागे कदम बढ़ाने का भ्रर्य यह नहीं है कि परम्परा के जित आझाधारों पर हिन्दी कविता का नया रूप नये कला-पयों का निर्माण कर रहा है, उन झ्राधारों की शिल्पकारियों श्रौर विशेषताओं को जात-बूझूकर फंशनपरस्ती में त्याज्य घोषित किया जाय; लेकिन साथ ही सम्प्रति को श्रदम्य .. झ्ावश्यकता और भविष्य की उदात्त सम्भावना को ययार्य रूप से भ्रभिव्यक्त करने में यदि विगत _. को कुछ विज्येषताएँ नए कला-संस्कार के पथ में रोड़ा बनकर प्राती हें तो स्वाभाविक है कि उन्हें .. छोड़ना ही पड़ेगा; बल्कि तोड़ना भी पड़ेगा । नई कविता का स्तर ऊंचा करने के लिए तथाकथित
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उपेक्षा के बुर्जुआ संस्कार से ऊपर उठना होगा। नई कबिता लोक-मानस की तृप्ति तभों कर सकेगी जब कि बह प्रेषणीय भी हो श्रौर साथ ही कला के नव-विकास के साथ-साथ लोकरुचि का संस्कार करती चले । केवल लोक-मानस की क्षण्िक तृप्ति करने वाली कविता को सफल समभकर जनवादी बताना जन-जीवन के सांस्कृतिक विकास की सम्भावनाओरों को रुद्ध करना है श्रौर इस तरह सस्ती लोकप्रियता का मार्ग जन-विरोधी मार्ग है। इसमें शक नहीं कि लोक-मानस की तृप्ति के साथ-साथ कला का नया विकास करना और उसके श्रतुसार ही लोक-मानस के कला-प्रिय संस्कारों को उन्तत बनाते चलना जटिल श्रौर कठिन कार्य है; लेकिन नई कविता भर नई पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा दायित्व यही है। इस दायित्व की गम्भीरता को ईमानदारी से भ्रनुभव करने पर स्पष्ट हो जाता है कि जो नये कवि श्रपनी कविता की कृत्रिमता और दुरूहता तथा जीवन-बिरोधा दाशंनिकता का औचित्य समय की परिस्थितियों में खोजते हें श्रोर कहते नहीं थकते कि परिस्थितियां का प्रतिबिम्ब ही उनके मानस पर ऐसा पड़ता है कि दुरूहता श्ौर कृतन्रिमता ही उतकी नई कविता के गुर हैं, तो वे स्वयं श्रपनो कला-गअ्रक्षमता और जन-विरोधी बुर्जुआ फंशनपरस्ती का नंगा रूप सामने रखकर अपनी उत्तरदायित्वहीनता के प्रति क्षमा की भीख-सी माँगते दिखाई देते हैं । यह एक दयनीय स्थिति है श्रौर इस स्थिति से मुक्त होने का एक ही मार्ग है कि ईमानदारी से वे अ्रपने दायित्व को भ्रनुभव करें । नई कविता के विकास ओर निश्चित रूप-निरूपरा की तमाम सम्भावनाएँ नई पीड़ी का अपने दापित्व के प्रति ईमानदार रहते पर निर्भर करतो हैं ?
- ऑििओं
रहस्य-उद्घाटन यह रहस्य-उद्घाटन-रत मन, यह भ्रसफल जन, यह संश्लथ तन, हिय में यह अम्बर-विहरण रण, यह टटे उड्डीयन-साधन !
क्र) पंख नोच पटका मानव को, किसी खिलाड़ी ने धरती पर, पर होती रहती हे उसके, अन्तर में पंखों की फर-फर, पृथिवी माता ने पहनाई उसे बेड़ियाँ आकर्षण की, और किसी ने सुलगा दी है हिय में चिनगी संघर्षण की, परवश है, पर चाह रहा है यह करना रहस्य-उद्घाटन, यह आकुल मन, यह अति लघुजन, पंखहीन यह, यह संश्कथ तन !
(२) निगड़-बद्ध मानव के युगपद, पाश-बद्ध मानव के युग भुज; और सतत, आक्रान्त किये हैं उसे एक अभिशाप-ताप-रुज, जिसे मेदिनी ने जकड़ा हें, तुच्छ समझता जिसे प्रभंजन-- और नियति ने डाल दिए हें जिसके रोम-रोम में बन्धन-- उसी द्विपद को नील गगन ने भेजा है उड्डीन-निमन्त्रण ! गूँज रही है उसके हिय में पंखों की सन-सन-सन-सन-सन !!
(लक) मानव रहा न जाने कितने युग-युग लॉ सोया-सोया-सा; क्या हिसाब कितने युग से वह विचर रहा खोया-खोया-सा ? किन्तु नींद में भी तो उसने देखे उड़ने के ही सपने ! झौ' संतत विचरण में भी तो रहा खोजता डेने अपने !! नहीं पा सका हे श्रब तक भी अपने पंख और अपनापन, यहू रहस्य-उद्घाटदन-रत-मन, यह प्रसफल जन, यह संश्कथ तन !
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काव्य-धारा
हक बया जाने कितनी लम्बी है उसकी यात्रा की पगडंडी ? क्या जाने कितना कर आया माग्गे-क्रण भ्रब तक यह दंडी ? नित देशाटन, सतत परिब्रजन, संतत चलन, दिग्भश्रमण क्षण-क्षण, सतत अतन्द्रित निमिष-गणन यह, यह दिककाल-संकलन क्षण-क्षण, यही रहा है मानव का क्रम, यही नियति का हैं रेखांकन ! यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन, कर-कर भ्रमण हुआ संइलूथ तन! !
( ५ ) पीछे मुड़कर कौन निहारे कितनी दूर आ चुका मानव ? करता है स्वीकार गणित भी इस दिशि अपना पूर्ण पराभव ! भागे की भी कया गिनती हो जहाँ, सकुचते हें मनवन्तर ? जहाँ ब्रह्म-दिन भी छोटे हें, लघु हें द्युति-वर्षों के अन्तर !! इस महान दिक-कालाणंव में मानव करता सतत संतरण, यह रहस्य-उद्घाटन-रत-मन, यह असफल जन, यह संश्लथ तन!
ही, मानव की भोली में संचित हें कितने ही कंकड़-पत्थर, जो कुछ मिला पन््थ में, उसने वह सब उठा लिया है सत्वर, यह सब संचित बोभ युगों का टाँगे वह अपनी लकुटी पर, भुका भार से चला जा रहा, नाप-नाप पथ-लीक निरन्तर ! इतने पर भी गूंज रहे हें हिय में 'नेति-नेति' के ही स्वन !! यह रहस्य-उद्घाटन-रत-मन, सुन-सुन होता क्षण-क्षण उन्मन! ! !
| के मानव ने विसुष्टि लीला लखपूछा निज से 'कासा ? को5हं ?? मानव अपने अन्तस्तल में निरख, कह उठा 'साहँ ! सोऊहं !! इस 'को5हं ? सो5हं' की भ्रब॒ तक रार मची है अन्न्तस्तल में, 'नेति' और 'इति' जूक रही है मानव के इस हृदय-विकल में ! यह रण व्यस्त कर रहे उसके रोम-रोम, श्रोणित के कण-कण, है रहस्य-उद्घाटन-रत-मन, यद्यपि है संश्कथ मानव-तन; हे जगत-रूप हृदयंगम करने कहाँ-कहाँ दौड़ाई निज मति ! कितनी प्रखर साधना उसकी, श्रति प्रचंड विज्ञान-ज्ञान-रति !!
काव्य-घारा
एक-एक कर दूर हटाए प्रकृति-नतंकी के अन्तर-पट, किन्तु ग्रभो तक इतने पर भो मिटा न रंच यवनिका-संकट ! परदे में हो रही प्रकृति की नृत्य-चलित पाजन की भन-भन! ! यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन, सुन-सुन होता क्षण-क्षण उन्मन! ! ! $:7$:)
लोलामयी प्रकृति मातव से खेल रही है भ्राँख-मिचौनी, औ' मातव है, अपिहित लोचन, जड़गुण-बद्ध, स्तब्घ, भ्रति मौनी ! ऐसा खेल कि रहता ही है संतत दांव इसी मानव पर, मानव के शिर पर है मंडित जिज्ञासा अभिशाप, भयंकर ।
कहाँ जाय ? किस दिशि यह भाँके ? ढंढ़े कहाँ ? किसे यह क्षण-क्षण ?
यह रहस्य-उद्घाटन-रत-मन, यह असफल जन, यह संश्लथ तन! ( १० ) कभी कुहुक आई अम्बर से, ढूंढ़ों' यों बोले सब उड्गण, मानव ने उद्ग्रीवी होकर उधर उठाएं अभ्रपने लोचन, इतने में 'ढदूढ़ो ! दृढ़ो !' के आए स्वर पाताल अतल से, मानव ने घबड़ा कर मोड़े, अपने युग-दुग चकित अबल से, किन्तु उसी क्षण दिशि-दिशि गूंजा दूंढ़ों! ढंढ़ों! का यह गुंजन, किधर निहारे किसको ढूँढ़े, यह बौराया-सा जन उन्मन ? | कि, बाहर तो, 'इंढ़ो-दढ़ो' की सब दिशि यह गुंजार भरी हैं; पर, भीतर भी यही महाध्वनि मन्थन-शीछर अ्रपार भरी है; लखों चतुदिक वह पागलर-सा शभ्राकुल मानव डोल रहा हे, अपने युग-युग के यत्नों को निज दुग-जल में घोल रहा है; उसे दिखाई फड़ा सभी दिशि, अपने हिय का संतत कंपन, यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन, अमित हुआ हे, हे संइलथ तन; ( १२ ) यह गंभीर सृजनाणंव दुस्तर परम अगम फंनिछ चिर पंकिल ! लहराते जिसके अन्तर में नित्य सनातन प्रश्न तिमिंगिल ! ! “कुत आजाता इयं विसूष्टि: ?' .'क इह प्रवोचत ?' अ्रहो 'बेद कः ? “अस्थाध्यक्ष: परमे व्योमनि अंग, वेद यदिवान वेदसः ?”* अपना मुख फंछाए आए सम्मुख ये चिर प्रश्न पुरातन ! यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन, है संडकूथ तन, है भ्रति उन्मन ! !
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काव्य-धारा
| १३) यों बन आई अभ्रतिथि; मनुज के हिय में यह विदेशिनी पीड़ा, यों मानव अपने को भूला, भूल गया वह अपनी ईड़ा ! चिदानन्द-मय अभ्रपनी सत्ता उसने अ्रपनें से बिसराई; प्रन्ों की उलभन में पड़कर अश्रपनी विषपदा और बढ़ाई; किन्तु श्रेंजा है मानव-दुग में ऊहा-पोह-व्यथा का अ्रंजन, झ्रत: रहस्योद्घाटन-रत-जन, है उत्सुक यद्यपि संइलथ तन;
( १४ ) मानव की जिज्ञासा की है साक्षी स्वयं प्रकृति कल्याणी, युग-युग से हुंकारें करता चला आा रहा है यह प्राणी ! यह भीषण दिक््काल-प्रहर उस ध्वनि-ध्यान से चिर, कंपित है !/ लख मानव के यत्न निरन्तन प्रखर प्रभाकर भी स्तंभित है !! देख-देख कर इस वामन को अ्रमित चकित हें नभ-तारक-गण, यह रहस्य-उद्घाटन रत-जन, चला जा रहा है संश्छथ तन;
(१५ ) अम्बर काँपा अवनी काँपी, काँप उठे नभ के सब तारे, इस मानव की “न-इति न-इति' सुन, सभी लोक-लोकान्तर हारे, काल केपा, आकाश कप उठा, सुन-सुन इसकी “न-इति' हठीली, सबने देखा, है मानव की ग्रीवा उन्नत, यदि रूचीली । इतिहासों के पन्ने भी हें मानव का कर रहे संस्मरण, यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन, चला जा रहा है संश्लथ तन;
(१६ ) कोटि-कोटि ज्योतिवंषों तक फंला है विस्तार मनुज का, कहाँ-कहाँ तक पहुँच चुका है अ्रति तनु मन इस द्विपद द्वियुज का! विस्तुत है इसकी लीला, रलूघु विद्युन्मणि से ब्रह्मांडों तक; इसके महाकाव्य की गाथा पहुँची हैँ अ्रगणित कांडों तक ! किन्तु पता क्या कितने गहरे, और करेगा यह अ्रवगाहन ? यह रहस्य-उद्घाठन-रत-जन, यह अश्रति उन्मन, यह संश्लथ तन ! ( १७ ) ग्रमित ज्ञान भंडार युगों के यत्नों से संचित कर पाया, यह मानव निज रिक्त कोष को नाना रत्नों से भर लाया,
काव्य-घारा
जहाँ सभी दिशि इस अ्रग-जग के स्फुरणों में था केवल संभ्रम जहाँ अंध व्यस्तता मात्र थी वहाँ लखा इसने कारण-क्रम! निरलंकृता प्रकृति को इसने पहनाये नियमों के कंकण यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन फिर भी फिरता हैँ नित उन्मन ! सी, किन्तु पैठ गहरे जो झांका तो नियमितता हुई तिरोहित, केवल देवायत्त भावना होने छूगी पुनः आरोहित; पशु स्फुरणकारी पदार्थ कुछ जग में मानव ने देखा है जिसे दीप्ति-सक्रिय तत्त्वों' की श्रेणी में उसने लेखा है होता रहता इन तत्त्वों के अणुओं का नित संघति-भेदन*, इसे निहार पूछ उठता हे; 'क्यों-क्यों इस जन का उन््मन मन? (7१९ )| जिसे कराल कार मेटेगा अहो कोन-सा अणु विशेष वह ? क्यों संघति-मेदन होता है, क्यों होता है अणु अशेष वह ? इन प्रइनों का नहीं दे सका उत्तर यह मानव विज्ञानी यादिच्छक भ्रणु-भेदन लीला * अब तक नहीं किसी ने जानी कहो क्यों न अ्रकुलाये मानव देख-देख यह पटावरण घन ? यह रहस्य-उद्घाटन-रत जन, पंख-हीन यह, यह संश्छथ तन !! (२० ) मानव ने विद्युन्मणियों को देखा नयनों में अ्रचरज भर, मानो विश्व भरा गया सम्मुख अपना मूतं रूप ही तज कर; ज्योति-किरण तो थी तरंगमय, अब घनत्व भी हुआ तरंगी, मानों ऋण विद्युन्मणियों” में बना रही ब्रह्मांड अनंगी । लुप्त हो रहे हें क्या जग से मूतं-अमूर्त रूप के बन्धन ९ पूछ रहा हे यह आकुलछ-सा यह रहस्य-उद्धाटन-रत जन !
( २१ ) असन््तोष है इस मानव को सारे जग के इस सपने से,
झ्रौ' जग की क्या करे शिकायत, असन्तुष्ट हे वह अपने से ।
१--दीप्ति-सक्रिय तत््व--रेडियो एक्टिव सबस्टेन्स, जेसे रेडियम इत्यादि । २--भणु-संघति-भेवन---डिस्ट्न्टी प्रेशन भ्रॉफ एटम । ३--प्रणु-भेदन लोला--स्पोस्टेनियस डिस्ह्न्टीग्रेशन । ४--ऋणविद्युन्मरियां-- एलेक्ट्रोन्स विद्युत्करा जो पभ्रणुओं से भी सूक्ष्म है ।
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काव्य-धारा
यह भ्राया है करने इतने ब्रह्मांडों का तत्त्व-निरीक्षण, किन्तु मिले हैं निपट अधूरे उसे इन्द्रियों के यह लक्षण। इतने क्षुद्र, भ्रसंगत इतने, ये विज्ञान-ज्ञान के साधन ! तब फिर क्यों न हृदय में खीभे यह रहस्य-उद्घाटन-रत जन ? (९३२ ) श्रोत, चक्षूु, रसना, स्पशेन, मन, घछ्राण केवल यह मानव, सुलभा रहा उलभने जग की, खोज रहा है अचरज नव-नव, किन्तु साथ ही नई समस्या मानों उपजाता जाता है; एक प्रइन सुरूका कि दूसरा उसके संनिधान आ्राता है । साँक-सवेरे रहती ही है सम्मुख एक पहेली नूतन ! यह रहस्य-उद्घाटन-रत जन उलभन में उलभा है प्रतिक्षण! ! | २३ 0) जाना है जगरूप मनुज ने, इन लघु इन्द्रिय-उपकरणों से; कार्य और कारण की लड़ियाँ उसने गथी हें स्मरणों से, पर, यथार्थता क्या हैं ? यह जो हैँ केवल इन्द्रिय-संवेदन ?? पूर्वोत्तर का घटना-क्रम ही, हैं क्या कारण-कार्य-विवेचन ? ये प्रश्नावलियाँ सदियों से करती हें मानव-हिय-मन्थन, यह रहस्य-उद्घाटन-रत जन, यह संश्लथ तन, यह नित उन्मन; $ बएए + ये इन्द्रियाँ कभी कया देंगी हमको यथार्थता का परिचय ? नयनों से देखा है जिसको, है क्या वही वास्तविक निश्चय ? प्रकृति विछोकी जब आँखों से, तब क्या देखी! केवल राई ! ! तब अवलोकी इक छल-छाया ! देखी बस केवल परछाँई !! दृश्य सत्य हे तो सपना भी है यथार्थ का पूर्ण प्रकेतन ? यों विचार कर रहा युगों से यह रहस्य-उद्घाटन-रत-जन । ( २५ ) नयनों ने घनत्व देखा था, नयनों ने तारल्य निहारा, पर, मानव के गहन ज्ञान ने यह सब भेद मिटाया सारा, झब देखा कि जगत है केवल धन और ऋण विद्युत्कणिका-मय; झ्रौ' विद्युन्मणियाँ भी ऐसी जिनका कठिन वास्तविक परिचय; ऐसो मणियाँ, होता रहता जिनका प्छवन बिना ही कारण; तब फिर कारण-कार्ये तक॑ का जन-हिय से हो क्यों न निवारण?
काव्य-घारा
( २६ ) यों इन्द्रिय-गण की परिगणना, यों मन का घटना संश्लेण, हिय को जेंचे अधूरे ये सब, ये जग के सब रूप-विशेषण ! किन्तु क्या करे ? थक कर बेठे क्या यह मानव हिय-हारा-सा ? अपनी भौतिकता को कंसे करे क्रमित यह बेचारा-सा ? भूतग्रस्त है जो, वह कंसे भौतिकता का करे उत्क्रमण ? यह रहस्य-उद्घाटन-रत जन, सोच रहा है यों अपने मन; ( २७ ) क्या हैं स्रोत ज्ञान का ? पूछा यों जब मानव ने अपने से, तो आई इक ध्वनि कि ज्ञान है केवल इन्द्रिय के कंपने से ! बोल उठा भोतिक विज्ञानी, हें इन्द्रियाँ ज्ञान की साधन, इनके बिना कहो कंसे हो मानव का यह ज्ञानाराधन, मानव ने अपने स्वरूप के सुने तक्कंमय ये सब प्रवचन, किन्तु तत्त्व-उद्घाटन-रत-जन, पा न सका सन््तोष शान्ति-धन! ( २८ ) क्या हैं वे इन्द्रियाँ कि जिनने दिया ज्ञान-भण्डार अतुल यह ! क्या हैं केवल साधन ही, यों बोला मानव झाकुल यह ! कहो, इन्द्रियों से ही केवल ज्ञान-नोदना कंसे जागी ? केवल यह उपकरण-समुच्चय कंसे बना ज्ञान-अनुरागी ? क्या विज्ञान-ज्ञान का होता हैँ केवल इन्द्रिय-संवेदन ? पूछ रहा है श्राज अथक-सा यह ॒रहस्य-उद्घाटन-रत-जन ! $+ दे... झादि-मनुज ने रूपट देखकर अग्नि बनाई सदन-लालिता ! वह भी कौन प्रेरणा जिसने कहा : करो तुम वन्हि-पालिता ? आदि-मनुज ने पशुगण देखे, उन्हें बनाया निज-अनुगामी ; वह कया थी प्रेरणा कि जिसने कहा : बनो तुम इनके स्वामी ? यह जो आदि प्रेरणा हिय में, हे यह भी क्या इन्द्रिय-स्पन्दन ? अयवा यह है ज्ञान अभौतिक ? पूछ रहा है यों जन-उन्मन ! 0 अपने को उपकरण-समुच्चय कंसे माने मानव-पश्राणी ? जब कि विचार और चिन्तन की उसने पाई अभ्रमर निशानी
चर
रद काव्य-बारा
मनुज कर रहा है घोषित यों: भरे, नहीं हूँ भूत-संघ में ! में हूँ सांग उपकरण-संयुत, पर फिर भी हूँ नित-प्नंग में ! ! इसी नित्य प्राप्तव्य ध्येय की ओर जा रहा है यह रूघु जन, यह रहस्य-उद्घाटन-रत-मन, पंख-हीन यह, यह संइलूथ तन !!
७७68 सुमित्रानन्दन पन््त नव अरुणोदय
तुम कहते, उत्तर बेला यह, कभी न निज हित सांचा क्षण भर
में संध्या का दीप जलाऊ ! क्यों प्रभाव, क्यों देन्य घृणा ज्वर तुम कहते, दिन ढलने को अरब, अ्रब क्या तारों के खँडहर में
में प्राणों का अ्घ्य चढ़ाऊं ! नग्न व्यथा की गाथा गाऊँ ? मेरा पंथ नहीं, में कातर देख दिवाकर को अस्तोन्मुख
ज्योति क्षितिज निज खोज बाहर, पंकज उर होता अंतमुख,
रहा देखता भीतर, अ्रब क्या युग-संध्या, तम-सिंधु , छास-तट,
तथ्यों का कटु तम लिपटाऊं ! स्वर्ण-तरी किस तीर छगाऊँ ? मेंने कब जाना निशि का मुख ? में प्रभात का रहा दूत नित,
प्रथक् न सुख से ही माना दुख, नव प्रकाश संदेशवाह स्मित, अंधकार की खाल ओोढ़ अरब नव विकास-पथ में मुड़ में अब
कज्जल में सन प्राण तपाऊं ? क्यों न भोर बन फिर मुसकाऊं ?
जग-जीवन में रे अस्तोदय,
में मानसधर्मी, अक्षय वय आओ, तम के कूल पार में
नव अरुणोदय तुम्हें दिख्लाऊ ?
४ नं 32...
काब्य-घारा ७ बाहर-भीतर यह छोटा सा घर का आँगन, डाली पर उड़ गाती कोयल, जहाँ राम की अभ्रदूभुत माया भर पड़ते झाशा के कोंपल, कभी धूप है तो फिर छाया,--- ज्ञात नहीं, कब क्या हो जाए,
भाव-अभावों का जग उन्मन ! अपने ही सुख-दुख से निर्मित गृह-कलहों वादों से कंपित, क्षण आ्राशा ने राश्य प्रतिफलित चित्त-वृत्तियों का लघु दपंण ! यहाँ उदय होकर दिन ढलता, जन्म-मरण सँग जीवन -पलता, तुतलाता, घुटनों बल चलता, . . खेल-कूद, भर हास कल रुदन! सूरज चाँद,--दूब पर हिमजल, तितली, फूल, गज, रँग, परिमल, चिड़ियों की उड़ती-परछाई, आते जाते विधि पाहुन बन !
/
सेंग-संग फिरते प्रछय झौ' सृजन !
जीवन का चंचल यथार्थ छल, भरता रीता होता अंचल,
मधु पतझकर खिलते कुम्हलाते, भोर-साँक बिलमाते कुछ क्षण !
इस आँगन के पार राजपथ,
चलता महत् जगत जीवन-रथ, दिशि-दिशि के कलरव कोलाहल
उपजाते नित नव संवेदन ! दूर, मंजरित खुले क्षितिज पर
नील पंख फैलाए अंबर उड़ता उड़ता उड़ता जाता,
बिठा पीठ पर मानव का मन !
भू को अंधकार का है भय,
शिखरों पर हँसता अरुणोदय, युग-स्वप्नों की चाप सुनहली . भरती उर में गोपन स्पंदन ! ््छ रामधारीसिंह दिनकर चाँद ओर कवि रात यों कहने छूगा मुझसे गगन का चाँद, जानता है तू कि में कितना पुराना हूँ ?
आदमी भी क्या ग्रनोखा जीव होता है ! ह उलभनें अपनी बनाकर आप ही फंसता, . और फिर बेचैन हो जगता न सोता है ।
में चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते; और लाखों बार तुमसे पागलों की भी चाँदनी में बेठ स्वप्नों पर सही करते ।
उप काव्य-धारा
आदमी का स्वप्न ? हे वह बुलबुला जलका, में न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
झ्राज बनता और कल फिर फूट जाता है; किन्तु तो भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो ! बलबुलों से खेलता कविता बनाता है ! में न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली, चाँद ! फिर से देख, मुभको जानता है तू ? स्वप्न मेरे बुलबुले हें? है यही पानी ? आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू ?
भाग में उसको गला लोहा बनाती हूँ; भ्औौर उस पर नींव रखती हूँ नये